बाढ़ की चपेट में पंजाब :
आपदा
से जूझते और एक दुसरे का सहारा बनते लोग
हुकुमती जवाबदेही और मुआवजा हक का सवाल
मानसून
के इस सीजन में पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड बाढ़ की भीषण चपेट में आए हुए हैं। भारत - पाक सीमा
के दोनों तरफ का पंजाब बाढ़ की भयानक मार झेल रहा है। हमारी तरफ के मौजूदा हालतों
की तस्वीर हमारे सामने है और यह काफी गंभीर और व्यापक नुकसान को दर्शा रही है।
पहले ब्यास और रावी के पानी ने माझा और दोआबा के साथ-साथ फिरोजपुर-फाजिल्का
क्षेत्रों में काफी नुकसान किया और अब सतलुज और घग्गर भी उफान पर हैं। भाखड़ा बांध
के फ्लड गेट भी खोले जा रहे हैं। बाकी बांध भी इस समय खतरे के निशान पर बह रहे
हैं। रोपड़, लुधियाना, पटियाला और
संगरूर क्षेत्रों में भी पानी की मार पड़ने का खतरा बना हुआ है। जलमग्न हो चुके
पंजाब में हो रहे नुकसान का अभी से अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। अब तक की
रिपोर्टों के अनुसार, बाढ़ से 4.33 लाख
एकड़ क्षेत्र प्रभावित हुआ है। इन्हीं अनुमानों के अनुसार भी किसानों की फसलों का
लगभग तीन हजार करोड़ का नुकसान हो चूका है। दिहाड़ीदार मजदूरों और अन्य छोटे धंधों
वालों की दुश्वारियों का कोई अंदाजा ही नहीं है। अब तक 1400
गांव बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं और यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। राज्य के 3.54 लाख लोग प्रभावित हुए हैं और 32 लोगों की अब तक
मृत्यु हो चुकी है। यह तो अभी प्रारंभिक आंकड़े हैं, संकटमय
स्थिति की पूरी तस्वीर नहीं है। जो दुश्वारियाँ लोग झेल रहे हैं और जो इस कारण आने
वाले समय में झेलनी पड़ेंगी, उनका आकार-विस्तार और गहराई
अंदाजों से परे है। यह पंजाब के लोगों के लिए गहरे संकट की घड़ी है, बहुत मुश्किल वक्त है। गरीबी और जीवन-यापन के संकटों में जीवन की गाड़ी
खींच रहे मेहनतकश लोगों के लिए यह बहुत बड़ी आपदा है, उनके
जीवन में भारी हलचल है। घर उजड़ रहे हैं, दोबारा बसने के लिए
सालों-साल लगेंगे। यह दर्द जितना बयान किया जा सके, कम है।
जितना बांटा जा सके, कम है। इस समय प्रान्त के लोगों का पहला
सरोकार इस आपदा से निपटना है, इससे पार पाना है, इस पर विजय प्राप्त करना है और मानवीय हस्ती की गरिमा को बरकरार रखना है।
इस आपदा से निपटना लोगों के लिए प्राथमिक कार्य बन गया है।
इस
आपदा से निपटने के लिए लोगों को इस राज-व्यवस्था से भी निपटना होगा,
क्योंकि यह महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह राज-व्यवस्था और इसका
प्रशासनिक ढांचा ही है, जो बदलते मौसमों को भी आपदाओं में
बदल देता है। यह जनविरोधी ढांचा और इसकी अक्षम कारगुजारी है, जो अधिक बारिश को ही बाढ़ में बदल देती है और एक आपदा का भयावह दृश्य रच
देती है। लुटेरी जमातों की मुनाफे की लालसा सामान्य मौसमी घटनाओं को भी लोगों के
लिए संकट में बदल देती है। मौसम की मार, चाहे वह सूखा हो या
बारिश, को कई गुना बढ़ा देती है। इसीलिए पानी की कमी,
सूखा और बाढ़ हमारे देश के लोगों की नियति बन गए हैं। ऐसा होने में
यहां इस ढांचे की कमजोर बुनियादों और अपर्याप्त ताने-बाने जैसे बुनियादी कारण हैं,
वहीं तात्कालिक तौर पर इसमें हकूमतों की लचर कार्यकुशलता, लोगों के प्रति वफादारी का अभाव, विश्वासघात की घोर
प्रवृत्ति, कुप्रबंधन, लापरवाही और
समग्र रूप से जनविरोधी रवैया भी सम्मिलित है। ये दोनों पहलू मिलकर विशेष मौसमी
घटनाओं को आपदाओं में परिवर्तित कर रहे हैं।
पंजाब
में आए मौजूदा बाढ़ों में भी ये दोनों पहलू शामिल हैं। मूल कारण तो धरती पर हो रही
मौसमी तब्दीलियां और जोंक विकास मॉडल द्वारा प्रकृति की जा रही तबाही है। पृथ्वी
पर हो रही मुनाफाखोर तकनीकी प्रगति ने सहज प्राकृतिक चक्र को भारी नुकसान पहुंचाया
है। यह क्षति बहुत व्यापक और गंभीर है। यह विकृत और बेडोल अनियोजित प्रगति धरती पर
पर्यावरणीय बदलावों के लिए जिम्मेदार है। ओजोन परत की तबाही,
बढ़ता तापमान, सिकुड़ते ग्लेशियर, फैलते समुद्र, ढहते पहाड़, सूखे
और तबाही मचाने वाली बाढ़ें इत्यादि तक इन बदलावों की लंबी श्रृंखला है। विश्व
पूंजीवाद के फलस्वरूप उतपन इस घटनाक्रम में हमारा देश भी शामिल है। हमारे पड़ोसी
राज्यों जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक प्रक्रियाओं के साथ
मुनाफामुखी पर्यटन व्यवसायों और मुनाफाखोर औद्योगिक परियोजनाओं के जरिए जमकर
खिलवाड़ किया गया है। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, पहाड़ों
की तबाही और विनाश ने मिलकर, यहां पड़ने वाली बारिश से होने
वाली क्षति को कई गुना बढ़ा दिया है। यहां होने वाली सामान्यतः बारिश भी अब बाढ़
का रूप ले लेती है और यह नीचे की ओर बसे पंजाब में आकर तबाही मचाती है। आगे,
पंजाब में भी यही जोंक विकास मॉडल प्राकृतिक चक्र को रौंदे जा रहा
है। यहां भी बेतहाशा हो रही खनन गतिविधियों ने नदियों के किनारों को कमजोर कर दिया
है। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बुरी तरह प्रभावित कर दिया गया है। नदियों के
समग्र प्रवाह क्षेत्र को मुनाफामुखी लालसाओं ने सँकरा कर दिया है और पानी बढ़ने की
स्थिति में जब नदी अपने स्वाभाविक प्रवाह क्षेत्र तक फैलती है तो वह नुकसान में
बदल जाता है।
इसके
अलावा,
नदियों के किनारों पर बांधों की रखरखाव, मजबूती
और निर्माण किसी भी हकूमत के लिए कोई मुद्दा नहीं होता, क्योंकि
इसके लिए सरकारी बजट की जरूरत होती है। बड़ी रकम जुटाने की आवश्यकता पड़ती है
यद्पि इन रकमों से कोई सीधा मुनाफा नहीं मिलता। इसलिए नदी के पानी को नियंत्रित
करने, संभालने और नियमित प्रवाह में रखने के लिए राज्य में
कोई प्रभावी ढांचा नहीं है। जो पुराने डैम बने हैं, बस वही
हैं। दशकों से नदियों के पानी को नियंत्रित करके और अधिक उपयोग में लाने के लिए
कुछ नहीं किया गया। पंजाब और हरियाणा में पानी के बंटवारे को लेकर ही सियासी खेल
खेले जाते रहे हैं, लेकिन नदी के पानी की संभाल करके किसी भी
तरह से सिंचाई ढांचे का विस्तार नहीं किया गया। इन परियोजनाओं के निर्माण पर एक
पैसा भी खर्च नहीं किया गया। अब न केवल पानी व्यर्थ बह रहा है, बल्कि यह तबाही भी मचा रहा है। नदियों की विनाशकारी मार को काबू करने के
लिए वही करने की जरूरत है, जो दुनिया के कई देश कर चुके हैं।
वे काफी हद तक बाढ़ों पर काबू पा चुके हैं या उनसे होने वाली क्षति को काफी हद तक
सीमित कर चुके हैं। और ऐसा करने के लिए चंद्र भ्रमण तकनीक की भी जरूरत नहीं है।
साधारण किस्म के छोटे-छोटे डैम बनाने हैं। हमारे शासकों द्वारा भले ही दुनिया की
तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की बातें की जा रही हों, लेकिन
हमारे देश का नाकारा बुनियादी ढांचा पानी के तेज प्रवाहों को भी संभालने और निपटने
में सक्षम नहीं है।
तात्कालिक
संदर्भ में भी मानसून सीजन के दौरान बाढ़ की संभावना को मद्देनजर रख की जाने वाली
तैयारियां अनुपस्थित हैं। मौसमी नालों, नदियों
और ड्रेनों की सफाई न करना सहित, सभी इंतजाम गायब हैं।
बांधों की सफाई नहीं की गई। इस बार भी भारी बारिश की भविष्यवाणियों के बावजूद
सरकार लापरवाह रही। बी.बी.एम.बी. के पानी के मुद्दे पर हरियाणा के साथ टकराव का
नाटक करने में व्यस्त रही। इन कुप्रबंधनों में बांधों को जरूरत के अनुसार खाली
करने, अतिरिक्त पानी को समायोजित करने की क्षमता बनाने और
उच्चतम सीमा तक पानी भरने से बचाने के लिए नियंत्रित मात्रा में पानी को छोड़ते
रहने जैसे कदम न उठाना भी शामिल है। ऐसे कदम कुछ हद तक पानी की मार को सीमित करने
में भूमिका निभा सकते थे। उल्लेखित गंभीर रूप से अक्षम बुनियादी ढांचे के कारण इन
तात्कालिक कदमों की जरूरत कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन ये सभी प्रयास सरकारी बजट की
मांग करते हैं, सरकारी खर्च - चेष्टा मांगते हैं, लोगों के प्रति वफादारी मांगते हैं, और राजनीतिक
इच्छाशक्ति मांगते हैं। लेकिन सरकारों के पास इनमें से कुछ भी नहीं है। न तो इस ओर
ध्यान है, न ही यह हकूमति सरोकार का मुद्दा है। बस सब कुछ 'भगवान के भरोसे' है। बस संकट खड़ा हो जाने पर नौटंकी
है, भागदौड़ करने का प्रभाव है, बड़े-बड़े
ऐलान हैं, फोटो-शूट हैं। इस मामले में सभी अवसरवादी
सत्ताधारी और राजनेता एक-दूसरे से आगे निकल जाने की दौड़ में शमिल हैं। अपने आप को
बड़े जन-हतैषी के रूप में पेश करने के लिए उतावले हैं। अपने वोट बैंक सुनिश्चित
करने के लिए पानी के पास खड़े होकर, हाथों में रोटियां रखकर
खाने का नौटंकी कर रहे हैं। वास्तव में तो वह अपने अवसरवादी व्यवहार की नुमायश ही
लगा रहे हैं। हकीकत यह है कि सरकार के पास इस आपदा के समय डूबते लोगों को पानी से
निकाल पाने के बहुत ही लचर इंतजाम हैं। सरकारी सहायता बेहद अपर्याप्त है जो लोगों
तक राहत पहुंचाने के मामले में बहुत सीमित है। हमेशा की तरह लोग ही लोगों का सहारा
बन रहे हैं। पंजाब के अन्य क्षेत्रों से दयालु और हिम्मती लोगों की टोलियां हर तरह
की मदद ले बाढ़ प्रभावित इलाकों की ओर जा रही हैं। समाज सेवी संगठन और जन-संगठन
सहायता जुटा रहे हैं। सहायता के लिए लोगों को लामबंद कर रहे हैं। पंजाबी कौमियत
अपनी मानवीय प्रगतिशील परंपराओं को जीवंत रखे हुए है और इसकी जड़ों को और गहरा कर
रही है। हरियाणा के गांवों से भी पंजाबी लोगों के लिए सहायता इकट्ठा करने की
वीडियो और खबरें आई हैं। लोगों का भाईचारा उनकी आपसी सांझ को दर्शा रहा है। इसे और
मजबूत कर रहा है। यह आपदाओं के समय अपनी मज़बूती दिखा रहा है।
इस
आपदा के मौके पर लोगों को खुद आगे आकर पीड़ित लोगों का हाथ मजबूती और दृढ़ता से
थामने और हर तरह की सहायता करने की प्रवृत्ति को और बल देने की जरूरत है। ऐसे
संकटों के समय क्षेत्रीय, जातिगत, ग्रामीण-शहरी या अन्य प्रकार की तथाकथित विभाजन रेखाएं टूटती हैं और
मेहनतकश लोगों की मानवीय, भाईचारक और वर्गीय सांझ गहरी होती
है। इसलिए हर तरह के विभाजनों से ऊपर उठकर मेहनतकश लोगों के सांझे भाईचारे को
उभारने और इसे और पक्का करने की जरूरत है। लोगों द्वारा अपनी ओर से थोड़ा-थोड़ा
जोड़कर भेजी गई सहायता न केवल भौतिक दृष्टि से, बल्कि
भाईचारे की मजबूती के दृष्टिकोण से भी मूल्यवान है। यह लोगों की असीमित अव्यत
सामर्थ्य को भी उजागर करती है और संकटों से निपटने के लिए लोगों की सामूहिक
संगठनात्मक कार्रवाई करने की क्षमता में विश्वास जगाती है। हमेशा की तरह उभर रही
इस प्रवृत्ति को और मजबूत करने की जरूरत है। लोकपक्षीय शक्तियों और वर्गीय लोक
संगठनों को ऐसे प्रयासों में जोर-शोर से सक्रिय होना चाहिए। लोगों के साझा प्रयास
जुटाने की पहल को बढ़ावा देना चाहिए और इस तरह का प्रयास जुटाने के उद्यम में
अग्रिम भूमिका निभानी चाहिए।
जन
शक्तियों को दोहरी जिम्मेदारी उठानी होगी। जहां एक ओर लोगों को अधिक से अधिक राहत
कार्यों के लिए लामबंद और संगठित करने की जरूरत है, वहीं
दूसरी ओर सरकारों की जवाबदेही तय करने और उन्हें कटघरे में खड़ा करने के कार्य की
अगुवाई का जिम्मा भी लोकपक्षीय क्रांतिकारी और जनवादी शक्तियों पर है। लोगों
द्वारा बाढ़ पीड़ितों की सीधी सहायता में सक्रियता सरकारों को बरी करने का जरिया
नहीं बननी चाहिए, बल्कि इसका सरकारों की जवाबदेही तय करने और
लोगों के प्रति बनती जिम्मेदारी को निभाने के लिए दबाव डालने की सरगर्मी के साथ
समन्वय करना चाहिए। हकूमति अक्षमता और नाकारा कारगुजारी को उजागर किया जाना चाहिए।
कड़ी आलोचना की जानी चाहिए और जिम्मेदारी तय कर उचित सजा की मांग की जानी चाहिए।
इस
अवसर पर पंजाब और केंद्र सरकारों से यह मांग की जानी चाहिए कि बाढ़ प्रभावित
क्षेत्रों में राहत कार्यों में तेजी लाई जाए, हर तरह
की सहायता के लिए सरकारी तंत्र और ढांचे को सक्रिय किया जाए, राज्य और केंद्र के संसाधनों को बाढ़ की मार झेल रहे लोगों की सहायता के
लिए झोंका जाए। हकूमत सक्रिय हो, पानी में फंसे लोगों को बचा
रही टोलियों को सरकारी सहायता उपलब्ध करवाए। यह समय सरकारी बजटों पर हक जतलाने का
सबसे अहम समय है। इस हक को तत्काल सरकारी सहायता और राहत कार्यों में तेजी लाए
जाने के लिए भी जतलाया जाना चाहिए, और साथ ही पुनर्वास के
लिए मुआवजा राशि के लिए भी। सरकारी खजाने को लोगों के लिए खोले जाने की मांग करने
की जरूरत है लेकिन इसके लिए संघर्ष की जरूरत होगी। पुनर्वास का कार्य कोई साधारण
कार्य नहीं है, मामूली और नगण्य राशियों के साथ या आधे-अधूरे
वितरण के जरिये आँसू पोंछने जैसी औपचारिक कार्रवाइयों को नामंजूर किये जाने और
पुनर्वास के लिए हर पहलू से सहायता की मांग किये जाने की जरूरत है। इसमें घरों,
फसलों, पशुओं सहित हुए हर नुकसान के मुआवजे के
साथ-साथ कर्ज माफी, ब्याज मुक्त कर्ज, दोबारा
बुवाई के लिए सहायता, और खेत मजदूरों तथा अन्य संपत्ति-विहीन
वर्गों के लिए गुजारा भत्ता देने, कॉर्पोरेट और अन्य बड़े
जोंक लुटेरों पर प्राकृतिक आपदा विशेष कर
लगाने, अडानी/अंबानी, बादल/अमरिंदर
जैसे धन कुबेरों से प्राकृतिक आपदा वसूली के जरिये पैसा इक्कठा कर बाढ़ पीड़ितों
को देने की मांगें शामिल हैं। भले ही यह अवसर तत्काल राहत कार्यों में जुटने,
पुनर्वास में सहयोग करने और साथ ही सरकार पर हर तरह की जिम्मेदारी
के लिए दबाव बनाने का है, लेकिन यह अवसर बाढ़ की मार पर काबू
पाने से संबंधित महत्वपूर्ण और बुनियादी कदमों को उभारने का भी है। बुनियादी
समाधान के इन कदमों में नदियों के प्रवाह को अवैध निर्माणों और अन्य व्यावसायिक
बाधाओं से मुक्त रखना, अनावश्यक और विनाशकारी खनन को बंद
करना, तटबंधों को मजबूत करना और इसके लिए भारी बजट जुटाना,
छोटे बांधों के निर्माण की नीति अपनाना और उनका उचित प्रबंधन करना,
राज्य में सिंचाई ढांचे का विस्तार करना, वर्षा
जल का संरक्षण और भंडारण करना, प्राकृतिक जल प्रवाह की बहाली
करना, प्राकृतिक तालाबों और जलाशयों के माध्यम से भूजल
पुनर्भरण की व्यवस्था करना, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश
में विनाशकारी तथाकथित विकास परियोजनाओं को रद्द करना, पहाड़ों
और जंगलों का संरक्षण करना और अधिक पेड़ लगाने की नीति अपनाना, तथा समग्र रूप से पर्यावरण को नष्ट करने वाले इस जनविरोधी और जोंक हितकारी
मॉडल को रद्द करना शामिल है। भले ही इन दिनों ये तात्कालिक संघर्ष के मुद्दे न हों,
लेकिन इन मुद्दों का जन चेतना में संचार करना बहुत महत्वपूर्ण है
क्योंकि बाढ़ रोकने और नदी जल संरक्षण के दृष्टिकोण से इनका बुनियादी महत्व है।
ऐसा न करने पर बाढ़ की मार बार-बार पड़ेगी और आने वाले समय में यह और ज़्यादा भीषण
होगी। इसलिए, स्थायी रोकथाम के लिए इन मुद्दों को अब उभारना,
और फिर इन्हें संघर्ष का मुद्दा बनाने की दिशा में बढ़ना आवश्यक है।
(सुर्ख लीह के सितंबर-अक्टूबर अंक से)

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