निरंकुश भारतीय शासन के अधीन केंद्र-प्रदेश संबंधों के मुद्दे के बारे में दृष्टिकोण का सवाल
भारत
की वर्तमान तथाकथित एकता और अखंडता की रूप रेखा ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा
गढ़ी गई है। 1935 के अधिनियम के माध्यम से इसे एक संवैधानिक जामा भी उन्होंने ही पहनाया
था। क़ौमियतों के साथ निरंकुश भारतीय शासन का थोपा हुआ वर्तमान रिश्ता ब्रिटिश
भारत की विरासत है। कुछ क़ौमियतों के मामले में, यह
अपेक्षाकृत प्रत्यक्ष औपनिवेशिक साम्राज्यवादी सैन्य विजयों का प्रतिबिंब है। इन
क्षेत्रों में क़ौमी उत्पीड़न के विरुद्ध भावनाओं का पक्ष अपेक्षाकृत प्रचंड नज़र
आता है।
भारतीय
निरंकुशता का अग्रणी वर्ग बहुराष्ट्रीय दलाल पूंजीवाद है। यह किसी एक क़ौमियत के
प्रभुत्व वाली राज्य-व्यवस्था नहीं है। बहुराष्ट्रीय देश होते हुए भी,
क़ौमी सवाल के आंतरिक विस्तार की दृष्टि से भारत क्रान्ति-पूर्व रूस
से भिन्न है।
बहुक़ौमी
भारतीय राज्य न तो क़ौमियतों का स्वैच्छिक संघ है और न ही संघीय शासन। इसका
संविधान कभी भी क़ौमियतों की स्वायत्तता का प्रतिनिधि नहीं रहा है। इसके
प्रावधानों और शक्तियों का विभाजन शुरू से ही केंद्र के पक्ष में रहा है। इसलिए,
हम निरंकुश भारतीय राज्य की शक्तियों के निरंतर जारी रह रहे
केंद्रीकरण को प्रदेशों की स्वायत्तता का क्षरण नहीं मानते, जैसा
कि संपादक-कॉमरेड कहते हैं, बल्कि निरंकुश राज्य के अधीन
केंद्र की सत्ता को और मज़बूत करने वाला बताते हैं और इसका विरोध करते हैं।
वास्तव
में भारतीय दलाल पूंजीवाद के लिए एक मज़बूत केंद्र की आवश्यकता की भावना को तीव्र
करने में तेलंगाना के क्रांतिकारी कृषि सशस्त्र संघर्ष और अन्य संघर्षों ने
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का मानना था कि यदि इस संघर्ष
को वापस न लिया गया होता, तो भारतीय राज्य सत्ता के
लिए इसे दबाना-कुचलना संभव नहीं होता। इस प्रकार तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष ने नए
भारतीय राज्य के लिए एक मज़बूत केंद्र बनाए जाने हेतु एक बड़े सबक की भूमिका
निभाई। "शक्तिशाली केंद्र" का विचार क़ौमियतों के प्राकृतिक संसाधनों की
साम्राज्यवादी और दलाल पूंजी द्वारा लूट की सुरक्षा सुनिश्चित करने की नीति का
हिस्सा था, जिस का वादा 1948 की औद्योगिक नीति में किया गया
था। बाद में, नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम के सशस्त्र कृषि
क्रांतिकारी संघर्षों (और क़ौमियतों के सशस्त्र संघर्षों की भी) की चुनौतियों ने
भारतीय शासक वर्गों की "मज़बूत केंद्र" बनाने की धुन को और भी तीब्र कर
दिया। क्षेत्रीय स्तर के शासक वर्गीय राजनीतिक दलों द्वारा राज्य सत्ता के सबसे
महत्वपूर्ण क्षेत्र, उसके शस्त्रीकरण के केंद्रीकरण को
सामान्यतः स्वीकृति ही किया गया है। क़ौमियतों की धरती पर साम्राज्यवादी और दलाल
पूंजी द्वारा जल, जंगल, ज़मीनों की
लूटपाट सुनिश्चित करने और बड़े ज़मींदारों के हितों की रक्षा के लिए यह आवश्यक है।
आपातकाल
के दौर ने भी भारतीय शासक वर्ग और जनता के बीच अंतर्विरोधों (और शासक वर्ग के आपसी
अंतर्विरोधों) से निपटने के लिए केंद्र की शक्तियों के महत्व को प्रतिबिंबित किया।
इसकी पृष्ठभूमि में हुक्मरानों के लिए एक तीखा सिरदर्द बना सत्तर के दशक का जन
बेचैनी का कारक काम कर रहा था। 1980 के चुनावों के
दौरान इंदिरा कांग्रेस ने भारतीय राज्य की स्थिरता और मज़बूत केंद्र के नारे के
साथ शासक वर्गों का समर्थन हासिल किया। पंजाब में प्रतिक्रियावादी आतंकवाद के दौर
में केंद्रीय कार्यपालिका की अधिकार शक्ति का उपयोग कर, राष्ट्रपति
शासन लगाने, दमनकारी केंद्रीय कानून लागू करने और प्रांतीय
पुलिस की कमान केंद्रीय सुरक्षा बलों को सौंपने जैसे कदमों को शासक वर्गों के एक
बड़े हिस्से का समर्थन भी "मज़बूत केंद्र" के बारे में आम सहमति को
दर्शाता था। इस आम सहमति की पुष्टि मनमोहन सिंह के "सबसे बड़े आंतरिक
खतरे" के आख्यान से जुड़ कर भी हुई। सलवा जुडूम और फिर ऑपरेशन ग्रीन हंट के
घटनाक्रम के सबंध में भी हुई। आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर केंद्र का नियंत्रण
बढ़ाने के भाजपा सरकार के कदमों ने भी यही दर्शाया है। इस मामले में, शासक वर्गीय दलों के मतभेदों में एतराज किसी मज़बूत केंद्र को लेकर नहीं
हैं। ये शिकायतें मज़बूत केंद्र की शक्तियों के "बढ़े" इस्तेमाल और आपसी
झगड़ों-मुकाबलेबाजी में उनके इस्तेमाल के विरोध तक सीमित हैं। इस आपसी खींचतान का
स्वरूप भी अवसरवादी है और "मज़बूत केंद्र" की ड्राइविंग सीट के नियंत्रण
या उससे उनकी दूरी पर निर्भर करता है। तथाकथित क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक व्यवहार
भी अक्सर मज़बूत केंद्र की कुर्सी से निहित स्वार्थों के पूरा होने की संभावनाओं
से तय होता है। ये दल सिर्फ़ इस मायने में "क्षेत्रीय" हैं कि उनके
राजनीतिक फेफड़ों के लिए वोट बैंक के ऑक्सीजन सिलेंडर स्थानीय हैं। उनकी सीमित
पहुँच आमतौर पर स्थानीय राजकीय संसाधनों तक ही होती है। वे केंद्रीय कुर्सी के लिए
किसी न किसी "राष्ट्रीय" पार्टी का समर्थन करने के बदले में स्थानीय
राजकीय संसाधनों के मलाईदार हिस्से का एक बड़ा भाग अपने लिए सुरक्षित रखना चाहते
हैं। इस मलाईदार हिस्से के लिए प्रतिस्पर्धा करते हुए, वे एक
उपयुक्त केंद्रीय "बॉस" की छत्रछाया के लिए भी प्रतिस्पर्धा करते हैं।
इस तरह यह पहलू क्षेत्रीय और "राष्ट्रीय" दलों के बीच बदलते परस्पर
विरोधी गठबंधनों के सूत्र की भूमिका निभाता है।
मुल्क
के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल समय-समय पर संविधान के अनुच्छेद 356 का दंश झेलने वालों और लाभार्थियों में शरीक रहे हैं। इसलिए,
"केंद्र" की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस खंड
का विरोध कभी भी बड़बड़ाहट से आगे नहीं बढ़ा। अक्सर यह टंटा-तकरार
सह-प्रतिद्वंद्वियों द्वारा इसके "दुरुपयोग" तक ही सीमित रही है। कारण
यह है कि यह खंड क्षेत्रीय शासक वर्गीय दलों सहित सभी के काम आ जाती है। क्षेत्रीय
दलों को स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों की सरकारों को उखाड़ फेंकने के लिए इस अनुच्छेद
से लैस केंद्रीय आकाओं की मदद की ज़रूरत होती है।
हम
जनता के नज़रिए से अनुच्छेद 356 का विरोध करते
हैं। हम इसे निरस्त करने के पक्षधर हैं। जनता का सबसे बड़ा सरोकार यह है कि यह
अनुच्छेद कानून-व्यवस्था के नाम पर केंद्र की दमनकारी शक्ति का जनता पर सीधा
इस्तेमाल करने का ज़रिया बनता है। यह जनता पर हमला करने के मामले में प्रांतीय
सरकारों की हिचकचाहट के अंश को दरकिनार करने का ज़रिया बनती है।
आजकल
चर्चित "डबल इंजन" सरकार का मोदी ढाँचा मूलतः कोई नई बात नहीं है। इसी
ढाँचे को लागू करने की इंदिरा मार्का कार्य-प्रणाली ने अकालियों को न चाहते हुए भी
धर्म युद्ध मोर्चा शुरू करने पर मजबूर कर दिया था। आपसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के
एक खूनी दौर के बाद, राजीव लोंगोवाल समझौते के
परिणामस्वरूप केंद्र और पंजाब में एक "डबल इंजन" सरकार का गठन हुआ।
समझौता यह था कि अब दूसरा "इंजन" कांग्रेस नहीं, बल्कि
शिरोमणि अकाली दल होगा। लेकिन क्षेत्रीय अकाली पार्टी की आंतरिक कलह ने इस विशेष
"डबल इंजन" व्यवस्था का काम तमाम कर दिया। केंद्र और राज्यों में
बदलते "इंजनों" के इस सिलसिले
ने एक अरसा पश्चात् भाजपा-अकाली दल "डबल इंजन" का रूप ले लिया।
"इंजन" बदली के इस सिलसिले के दौरान, पंजाबी
क़ौमियत का मुद्दा महज़ दांव-पेंच का खेल बनकर रह गया। पंजाबी क़ौमियत की
अर्थव्यवस्था की लगाम विश्व बैंक के हाथों में रही। विश्व बैंक के पर्यवेक्षक
चंडीगढ़ में पंजाब के अलग-अलग विभागों को नीतिगत निर्देश देते रहे। इसका अहम
दस्तावेज़ी प्रमाण विश्व बैंक की वह कुख्यात निर्देश-नुमा रिपोर्ट थी जो 21वीं सदी की शुरुआत में पंजाब सरकार के 29 विभागों के
लिए जारी की गई थी। हमने सवाल उठाया था कि हमारी राजधानी से विश्व बैंक को दफ़ा
करने की ज़रूरत का पंजाबी क़ौमियत के हितैषियों के एजेंडे
में क्या स्थान है?!
वैश्वीकरण
की साम्राज्यवादी नीतियों के सुनिश्चित क्रियान्वयन के लिए निरंकुश राज के अधीन
केंद्र की अधिकारशाही का इस्तेमाल और उसकी
मज़बूती विश्व व्यापार संगठन के दिशा-निर्देशों के अनुपालन का ही एक हिस्सा
है। इस अनुपालन की अभिव्यक्ति तीन कृषि कानूनों, बिजली
अधिनियम 2003 और कई अन्य कानूनों के ज़रिए हुई है। यह
साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के क्रियान्वयन की क़ानूनी गारंटी का तथ्य है। तथाकथित नई
आर्थिक नीतियों के पक्ष में, राज्य की सक्रिय भूमिका को एक
तयशुदा दिशा में निर्देशित करने का तथ्य।
लेकिन
इस प्रक्रिया का एक पूरक पक्ष भी है। यह विनियमन से मुक्ति,
नियंत्रण से मुक्ति और सार्वजनिक संपत्ति से मुक्ति का पक्ष है। यह
पक्ष भी विश्व व्यापार संगठन के दिशानिर्देशों का हिस्सा है।
हम
इस बात के प्रति सजग हैं कि वैश्वीकरण के संरक्षक के रूप में केंद्र को मज़बूत
करने का विरोध, कॉर्पोरेट अधिकारशाही के पक्ष में
राज्य के क़ानूनी राजदंड को त्यागने का समर्थन न बन जाए। केंद्र की जगह
साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सीधे नियंत्रण का हथियार न बने। केंद्र
द्वारा प्रांतों पर नियमों के बंधनों को ढीला करने की प्रक्रिया, बड़े व्यवसायों के लिए हकूमति नियमों से मुक्ति की नीचे की तरफ जाती सीढ़ी
का पहला डंडा न बन जाए।
हम
पूंजीपतियों को आठ घंटे की दिहाड़ी के कानून से मुक्त करके उसे बारह घंटे करने के
राज्यों के अधिकार का समर्थन नहीं कर सकते। हम उद्योगपतियों को श्रम कानूनों से
छूट देने के अधिकार का समर्थन नहीं कर सकते। न ही हम जल,
ज़मीन और जंगल पर अधिकारों के संबंध में जन दबाव में बनाए गए
केंद्रीय कानूनों या प्रावधानों को लागू करने में राज्यों की मनमानी - मालकी का
समर्थन कर सकते हैं। (ऐसे मामलों में, "केंद्र"
द्वारा राज्यों पर नियंत्रण में स्वैच्छिक कमी की झलक मिलती है)।
पिछले
अरसे में राज्यों की तरफ से पूंजी निवेश के लिए साम्राज्यवादी कंपनियों से सीधे
सौदेबाजी करने के खुले अधिकारों की मांग की जाती रही है। वैश्वीकरण की
साम्राज्यवादी सनक में विनियमन-मुक्ति का विशेष महत्व है। विश्व व्यापार संगठन,
विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की तिकड़ी, राज्यों के साथ सीधे पूँजी निवेश समझौतों के लिए केंद्रीय कानूनों व
नियमों के विनियंत्रण का मार्ग प्रशस्ति कर रही है। कुल मिलाकर यह राजकीय नियंत्रण
और विनियमन मुक्ति की एक ऊपर से नीचे (केंद्र से राज्यों) की ओर जाती प्रक्रिया
है। इसका अभिप्राय व्यवसायों पर राज्यों के नियंत्रण को बढ़ाना नहीं है। यह
नियंत्रण मुक्ति और निजीकरण की मंजिल के रास्ते पर एक अस्थायी पड़ाव है। यह
न्यूनतम राजकीय हस्तक्षेप और अधिकतम कंपनी नियंत्रण की तरफ जाता मार्ग है।
सर्वहारा वर्ग, केंद्रीकरण का विरोध करते हुए, राज्यों की खातिर कंपनी राज की सेवा के लिए खुले अधिकारों का समर्थन नहीं
कर सकता। राजकीय शक्तियों के केंद्रीकरण का विरोध करने का आम सर्वहारा पैंतरा,
राज्यों को निजीकरण के मार्ग पर प्रतिक्रियावादी नीतिगत कदम उठाने
के लिए विस्तृत अधिकार दिए जाने के विरोध के साथ सम्मिलित किया जाना चाहिए।
सर्वहारा
वर्ग के प्रतिनिधियों के लिए यह आवश्यक है कि वे सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध
अपने पैंतरे का, शत्रु वर्गीय शक्तियों के उद्देश्यों
से, मतभेद स्पष्ट रखने पर ज़ोर दें और इस भेद को स्थापित
करने का दृष्टिकोण अपना कर चलें। कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी हलकों में इस संबंध में
ढीलेपन का तत्व मौजूद है। इस ढीलेपन की अभिव्यक्ति जीएसटी अधिनियम के विरुद्ध
प्रतिक्रिया में भी देखी गई थी। इस अधिनियम के जरिये करों में राज्यों की
हिस्सेदारी में कटौती और कर नीतियों के मामलों में राज्यों की भूमिका को सीमित
करने का पहलू शामिल था और यह जनता के विरोध का भागी था। लेकिन यह जीएसटी हमले का
मूल पहलू नहीं था। इस पहलू पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देकर, क्रान्तिकारियों
के एक वर्ग द्वारा मूल पहलू की अनदेखी की
गई। यह मूल पहलू अप्रत्यक्ष करों की दिशा में एक बड़ा कदम था। यह कदम
साम्राज्यवादी और भारतीय कॉर्पोरेट पूँजी, सूदखोरों, ज़मींदारों आदि को दी जा रही कर रियायतों का पूरक था। यह कर नीति के
जन-विरोधी और कॉर्पोरेट-समर्थक पक्ष को धार देने वाला एक अहम कदम था।
क्रांतिकारियों के काफी बड़े हिस्से ने जीएसटी मुद्दे के आख्यान में, इस मूलभूत पहलू को केंद्र-राज्य संबंधों के आख्यान के अधीन कर दिया। इस
प्रकार, कर नीति के सवाल पर इस साम्राज्यवाद-हतैषी कदमों की
देश की जनता और मुल्क की क़ौमियतों के लिए अर्थ-संभावनाओं (संभावित निहितार्थ) की
अनदेखी की गई। यदि आज अप्रत्यक्ष कर के रूप में जीएसटी की वापसी की मांग को भुला
दिया गया है और इसे इस कर की आय में राज्यों के हिस्से और उससे भी आगे राज्यों के
हिस्से के बकाये जारी करवाने तक ही सीमित कर दिया गया है, तो
इसमें हमारी क्रांतिकारी बिरादरी की अल्प-सतर्कता का भी योगदान है। तीन कृषि
कानूनों के विरुद्ध संघर्ष के दौरान भी, भारतीय कानूनों को
विश्व व्यापार संगठन के आदेशों के अनुरूप ढालने के मूलभूत पहलू को केंद्र-राज्य
संबंधों के आख्यान के अधीन करने की धुन सामने आई थी। क्रांतिकारी और साम्यवादी
क्रांतिकारी हलकों में भी इस अंश का प्रभाव कुछ हद तक देखा गया। दक्षिणपंथी
अभिव्यक्ति वाले इस तरह के पैंतरे बुर्जुआ राष्ट्रवाद और प्रतिक्रियावादी
क्षेत्रवाद से मद्धिम विच्छेद को जाहिर करते हैं।
(सुर्ख लीह द्वारा प्रकाशित होने जा रही पुस्तिका
"पंजाबी
क़ौमियत का मुद्दा और सुर्ख लीह:
प्रतिबद्ध
के फतवों का कच्चापन और हकीकत" से एक अंश)
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