ट्रंप की धौंस:
मोदी
हकूमत की प्रतिक्रिया और भारत के लिए आगे की राह का सवाल
- पावेल कुस्सा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत की मोदी
हकूमत के साथ किये जा रहे व्यवहार ने भारतीय सत्ता के उच्च हलकों में एक अजीब सी
बेचैनी और हताशा पैदा कर रखी है। पिछले दशकों में,
सभी भारतीय हकूमतें जिस
तरह अमेरिका के साथ भारत के संबंधों का अनुकीर्तन करती रही हैं और इन्हें विकसित
करने में सक्रिय रही हैं, उससे भारतीय सत्ता के गलयारों ने अमेरिका
की नज़र-ए-इनायत हासिल रखने की एक धारणा बना रखी थी,
जिसे ट्रंप के टैरिफ
हमले ने अचानक खतरे में डाल दिया है। ट्रंप सरकार मांग कर रही है कि भारतीय
बाजारों को अमेरिकी वस्तुओं के लिए पूरी तरह से शुल्क-मुक्त कर दिया जाए और देश
में उनकी निर्बाध बिक्री की गारंटी की जाए। भारतीय हुक्मरानों द्वारा की गई बहुत
सी पेशकशों के बावजूद, ट्रंप की इच्छाओं के अनुसार यह समझौता न
होने के कारण ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50% कर लगा दिए गए हैं। इन भारी करों के कारण
कई भारतीय निर्यात प्रभावित हुए हैं। भारतीय वस्तुओं के कई उत्पादन केंद्रों से
छंटनी की खबरें भी आने लगी हैं। ट्रंप द्वारा मोदी सरकार पर रूस से कच्चा तेल
खरीदना बंद करने हेतु भी दबाव बनाया गया है। ट्रंप के इस दबाव ने मोदी हकूमत को
उलझन में डाल दिया है। लेकिन मोदी सरकार इन उलझनों से निकलने का कोई वैकल्पिक
रास्ता निकालने के बजाय, यूक्रेन मुद्दे पर अमेरिका और रूस के बीच
समझौते की उम्मीदें पाल कर ही ट्रंप के आक्रामक व्यवहार से मुक्ति पाने की संभावना
जता रही थी। ट्रंप द्वारा भारत सरकार को खुलमखुल्ला दी जा रही चेतावनियों के
दरमियाँ भी भारतीय हकूमत के विभिन्न हिस्सों में अभी भी यही सुर सुनाई दे रहे हैं
कि भारत-अमेरिका संबंध बहुत गहरे और दीर्घकालिक हैं और मौजूदा संकट का इन पर
ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा। पिछले दो दशकों से अलापी जा रही वही सुर फिर से दोहरायी
जा रही है कि 21वीं सदी भारत और अमेरिका के बीच सहयोग के जरिये आने
वाली समृद्धि की सदी है। इसका सबसे प्रकट
और विनयशील निरूपण शशि थरूर द्वारा इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में लिखे एक लेख में
देखने को मिला है। इस "बुद्धिजीवी राजनेता" ने अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान
के सामने भारत के साथ अमेरिकी संबंधों के फ़ायदे गिनाने की कोशिश की है। अमेरिकी
हुक्मरानों से भारत को खो न देने के लिए अनुरोध किया है और भारत को खोने की तुलना 1940
के दशक में चीन के अमेरिका के हाथों से निकल जाने से की है, जब
चीनी क्रांति ने अमेरिकी साम्राज्य को चीन से खदेड़ दिया था। शशि थरूर की यह सोच
भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान में आम रूप से ही पाए जाने वाले विचारों का ही प्रतिबिंब
है। ऐसे आम विचारों में, भारत को 1940 के दशक के चीन की तरह अमेरिकी अधीनता में
ही कल्पित किया जा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में भी,
ऐसी अपेक्षाएँ और ऐसी सुर
भारतीय शासक वर्गों के दृष्टिकोण से अमेरिका के साथ संबंधों की स्थिति को बयान
करती है। यहां तक कि अभी भी भारत सरकार द्वारा फिर से व्यापार वार्ता शुरू होने की उम्मीद की जा रही
है और नए-नए प्रस्ताव पेश किये जा रहे हैं। दुनिया की साम्राज्यवादी महाशक्ति से उदार
व्यवहार की ऐसी अपेक्षा, देश के नीति-निर्माताओं की दशा और दिशा का
बयान भी बन रही है। यह अलग विषय है कि ट्रंप द्वारा भारत को बार-बार करों के
माध्यम से धमकाने के बावजूद मोदी सरकार द्वारा चुप्पी साध लेने का जो रवैया अपनाया
गया है, कैसे वह स्वयं ही अमेरिका-भारत संबंधों की वास्तविक
स्थिति को कुछ इस तरह रेखांकित करता है कि ये संबंध समानता पर आधारित सहयोग और सहचार्य
के संबंध नहीं हैं, बल्कि इन सबंधों में एक ओर साम्राज्यवादी शोषण और
उत्पीड़न का लक्ष्य और दूसरी ओर एक अधीनस्थ हैसियत की वास्तविकता प्रत्यक्ष है। अगर
अब तक के इन संबंधों के सभी पहलुओं की जाँच-पड़ताल की जाए, तो
भी यही तस्वीर उभरती है।
अब, भले ही मोदी सरकार द्वारा भारतीय किसानों
के हितों की रक्षा के दावे किये जा रहे हों,
लेकिन इन बयानों के
पर्दे के पीछे ट्रंप प्रशासन को लुभाने और मनाने के प्रयास भी किये जा रहे हैं।
व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू होने के बाद से ही इस तरह के कई कदम उठाए गए हैं
जिन के जरिये ट्रंप प्रशासन को खुश किया जा सके। मसलन, ट्रंप
को डॉलर में व्यापार जारी रखने का भरोसा दिया गया,
मोटरसाइकिल, सैटेलाइट
ग्राउंड इंस्टॉलेशन और व्हिस्की जैसी कई चीज़ों पर टैक्स में कटौती की गई। गूगल पर
टैक्सों में कटौती की गई और इसी तरह मेटा जैसी ट्रंप समर्थित कंपनियों पर करों में
कटौती कर ट्रंप को खुश करने की कोशिश की गई। इसी तरह, सेना
की हिचकिचाहट के बावजूद F-35 लड़ाकू विमान खरीदने का भरोसा दिया गया।
यह भी कहा गया कि भारत अमेरिका से कच्चे तेल और गैस का मुख्य खरीदार बनेगा, परमाणु
रिएक्टर खरीदने की बातें की गई, और उस समय ट्रंप के दोस्त बने अरबपति एलन
मस्क को खुश करने की कोशिश की गई। उनकी 8,000 इलेक्ट्रिक कारों को देश में बिक्री की
मंज़ूरी दी गई और उनकी स्टारलिंक कंपनी के कारोबार के लिए रास्ते खोले गए। भारतीय
हुक्मरानों की इन तमाम कोशिशों के बावजूद,
जब ट्रंप ने भारी टैक्स
लगाए, तो भारतीय शासक यही कहते रहे कि ये दूसरों की तुलना
में तो कम ही हैं! अब, समझौता सिरे न चढ़ने के बाद भी मोदी सरकार
ने देश में कपास पर आयात शुल्क खत्म कर दिया है,
जिसकी सीधी मार कपास
उत्पादक किसानों पर पड़ेगी। विडंबना यह है कि भारत सरकार ने तो पूरी तरह दंडवत
होते हुए अमेरिका से आने वाले कपास पर कर समाप्त कर दिए हैं, जबकि
अमेरिका ने उसी कपास से बन कर जाने वाले कपड़ों पर अमेरिका में कर लगा दिए हैं। यह
स्थिति दर्शाती है कि किसानों की सुरक्षा के केवल खोखले दावे ही किये जा रहे हैं
और इन दावों के ज़रिए ही अपनी देशभक्ति साबित करने की कोशिश की जा रही है, जबकि
वास्तव में अमेरिकी साम्राज्यवादी अधीनता को पूरी तरह स्वीकार किया जा रहा है।
तथाकथित अमेरिका-भारत मैत्री पर छाए ट्रंपमय
अनिश्चितता के बादलों के बीच, यह सवाल अहम है कि अब भारत के लिए क्या
रास्ता हो। भारतीय हुक्मरानों ने अब तक जो रास्ता चुना है, वह
साम्राज्यवादी देशों की अर्थव्यवस्थाओं से बंधा विकास का रास्ता है। साम्राज्यवादी
देशों के लिए देश की अर्थव्यवस्था को मंडी के रूप में ज्यादा से ज्यादा खोलना और
देश के बड़े पूँजीपति घरानों के लिए साम्राज्यवादी देशों समेत दुनिया के विकसित
मुल्कों के बाज़ारों तक पहुँच बनाना। यह रास्ता भारत में साम्राज्यवादी
बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा पूँजी निवेश के मार्ग को प्रशस्त करने और यहां से
निर्यातोन्मुखी विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग)
को प्रोत्साहित करने का मार्ग है। साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की नीतियों के
तहत, सभी भारतीय हकूमतें विकास के इसी मार्ग को अपनाती आ
रही हैं। इसी रास्ते पर चलकर ही भारत के विश्व गुरु बनने के दावे किए जाते रहे हैं
और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत के विश्व में अग्रणी
स्थान हासिल कर लेने की उम्मीदें जताई जाती रही हैं। इस मामले में चीन को भी पीछे
छोड़ देने के दावे किए जाते रहे हैं। खासकर पाँच साल पहले कोविड संकट में घिरे चीन
के मुकाबले भारत को साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए मैन्युफैक्चरिंग
हब बनाने की उम्मीदें भी इसी मार्ग के भरोसे रखी गई थीं। लेकिन ऐसी तरक्की की
उम्मीदें पालते समय चीन द्वारा की गई प्रगति के पीछे काम करते कारकों को
नज़रअंदाज़ कर दिया गया। चीन की वर्तमान तरक्की में समाजवादी चीन के दौर में
विकसित किये गए मज़बूत आर्थिक और औद्योगिक आधार की मुख्य भूमिका रही है, जिसके
ज़रिए साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की नीतियों के दौर में अमेरिकी छत्रछाया के तले
अन्य बाज़ारों तक पहुँच बनाकर उत्पादन किया गया। हालाँकि चीन द्वारा की गई तरक्की
के मायनों की चर्चा भले ही एक अलग मुद्दा है,
लेकिन फिर भी भारत के
दूसरा चीन बनने का मार्ग दूर की कौड़ी है। भारत के पास न तो वैसा औद्योगिक आधार है
और न ही अब दुनिया के बाज़ारों तक 80 और 90 के दशक की तरह पहुँच हो पाना सम्भव है।
भारतीय हकूमतों द्वारा अपनाया गया विकास का यह मार्ग
और यह पूरा मॉडल देश को विश्व साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था से बाँधने का मॉडल है।
विशेषतया, अमेरिकी साम्राज्यवादी और पश्चिमी यूरोपीय
साम्राज्यवादी देशों की अर्थव्यवस्थाओं की दास अर्थव्यवस्था के रूप में भारतीय
अर्थव्यवस्था की मुकम्मल ढलाई कर देने का मॉडल है। वर्तमान दौर में, विश्व
साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था संकट का सामना कर रही है और यह संकट विभिन्न
साम्राज्यवादी देशों के बीच आपसी विरोधों को भी तीव्र कर रहा है। साम्राज्यवादी
संकट की यही तीक्ष्णता ट्रंप जैसे हुक्मरानों को भारत जैसे देशों की मंडियों तक
बहरहाल मनचाही पहुँच बनाने के लिए धकेल रही है। यही कारण है जिस के चलते ट्रंप
हकूमत करों का दबाव बनाकर मन वांछित छूट लागू करवाने का रास्ता अपना रही है।
साम्राज्यवादी संकटों के कारण दुनिया में अनिश्चितता का माहौल भी बना हुआ है। इन
संकटों के कारण ही साम्राज्यवादी और विकसित पूंजीवादी देशों में अपने-अपने बाजारों
के लिए संरक्षणवादी कदम उठाए जा रहे हैं। विश्व पूंजीवाद द्वारा गढ़ा गया
वैश्वीकरण का नारा एक वैचारिक हथियार के रूप में मात खा रहा है। अमेरिकी
साम्राज्यवादियों द्वारा अपने ही स्वामित्व वाले विश्व व्यापार संगठन के सभी
नियमों और विनियमों को कदमों तले रौंदा जा रहा है और खुद इनकी अवहेलना कर मुक्त
व्यापार समझौतों के लिए अन्य देशों पर दबाव डाला जा रहा है। इन परिस्थितियों में, भारत
जैसे देशों के लिए मंडियों की तलाश और भी कठिन कार्य है। इन परिस्थितियों में भारत
के पास किसी एक या दूसरे साम्राज्यवादी देश की शरण में जा कर आगे बढ़ने का विकल्प
नहीं है। न ही, रूस और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष का लाभ उठाते हुए
किसी एक या दुसरे से कम - ज्यादा रियायतें प्राप्त करने से ऐसा कोई रास्ता निकलने
वाला है। रूसी और चीनी नेताओं के साथ बैठकें करके मोदी वैकल्पिक संभावनाओं का आभास
देने की कोशिशें कर रहे हैं, लेकिन यह कोशिशें अमेरिकी साम्राज्यवादी अधीनता के दायरे की
सीमाओं के अंदर-अंदर खेलने की गुंजाइशों का इस्तेमाल भर है। मूलतः, उम्मीदें
अभी भी अमेरिकी साम्राज्य से ही नज़र-ए-इनायत की हैं।
भारत के पास अपनी नियति संवारने का अपना रास्ता होना
चाहिए। इस के लिए भारत को आत्मनिर्भर विकास का रास्ता अपनाना होगा। इसके लिए
निर्यातोन्मुखी उत्पादन की बजाय घरेलू बाजार के लिए उत्पादन की ओर रुख करना होगा।
इसके लिए घरेलू बाजार का विस्तार करना होगा और उसे जीवंत बनाना होगा। सिकुड़ते
घरेलू बाजार की वर्तमान स्थिति की एक झलक अमेरिका द्वारा 50
प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के कारण भारतीय उत्पादकों के लिए पैदा हुई स्थिति में भी
देखी जा सकती है। भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले कपड़े, चमड़ा, झींगा, मछली
और कालीन आदि कई उत्पाद हैं जो देश के बाजार में इसलिए नहीं बिकते क्योंकि यहां की
एक बड़ी आबादी रोजमर्रा की आवश्यकताओं की इन वस्तुओं को भी खरीदने में असमर्थ है।
घरेलू बाजार में इनकी खपत न होने के कारण ही ये अमेरिकी बाजार में पहुंचते हैं, जबकि
ये ऐसी वस्तुएं हैं जिनके बिना किसी भी देश के लोग तंगी और आभाव में अपना जीवन
गुजारते हैं। हमारे देश के लोगों को आमतौर पर ही जूते, बैग
और कपड़ों की कमी का सामना करना पड़ता है,
जबकि यहां बनी ये
वस्तुएं विदेशी बाजारों में जाती हैं। स्थानीय बाजार में लोगों की क्रय शक्ति में
वृद्धि करके ही इन उत्पादकों की निर्यात पर निर्भरता कम की जा सकती है।
घरेलू बाजार में जान फूंकने का बुनियादी समाधान कृषि
की प्रगति और कृषि में लगी आबादी की क्रय शक्ति में वृद्धि है। चूँकि देश की कुल
श्रम-शक्ति में सबसे बड़ी आबादी कृषि क्षेत्र में लगी हुई है, इसलिए
इस क्षेत्र की समृद्धि देश की समग्र प्रगति का आधार बनती है। कृषि क्षेत्र की
समृद्धि, भूमि सुधारों के जरिये गरीब व भूमिहीन किसानों व
खेतिहर मजदूरों को भूमि का मालिक बनाने की आमूल-चूल तब्दीली द्वारा ही की जा सकती
है। इसके साथ जुड़े अन्य कदमों, जैसे सस्ते या ब्याज-मुक्त दीर्घकालिक ऋण
उपलब्ध कराने, मौजूदा ऋणों को समाप्त करने, सरकारी
मंडीकरन की उचित व्यवस्था करने और निजी कंपनियों को फसलों के मंडीकरन से बाहर रखने
जैसे कदमों की एक लंबी श्रृंखला के साथ,
कृषि क्षेत्र विकास की
राह पर अग्रसर हो सकता है और देश के औद्योगीकरण की प्रक्रिया को गति प्रदान करने
का आधार बन सकता है। औद्योगीकरण के लिए कच्चा माल उपलब्ध करवाने और तैयार माल की
खपत के लिए समृद्ध हुआ कृषक वर्ग इन वस्तुओं का उपभोक्ता बाजार बनता है। वर्तमान
में, साम्राज्यवादी देशों का माल हमारे उपभोक्ता बाज़ार पर
भी कब्जा जमाए बैठा है और दूसरी तरफ कृषि क्षेत्र की बदहाली ने घरेलू बाज़ार को
बेहद सिकोड़ दिया है। देश में आने वाला साम्राज्यवादी पूँजी निवेश देश के प्राकृतिक
संसाधनों और श्रम शक्ति का अंधाधुंध दोहन करता है और यहां से कई गुना पूँजी लूट कर
ले जाता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था में पुनर्निवेशित नहीं हो पाती
और भारतीय उद्योग तथा कृषि हमेशा पूँजी की कमी से जूझते रहते हैं। घरेलू
बाज़ार-उन्मुख उत्पादन का यह मॉडल यहां कृषि क्षेत्र के भीतर अर्ध-सामंती संबंधों
के पूर्ण उन्मूलन की माँग करता है,
वहीं यह साम्राज्यवादी
देशों के साथ सभी गैर-बराबरी वाली व्यापार संधियों को रद्द करने और अर्थव्यवस्था
के महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक उनकी पहुँच को निषेध करने की भी माँग करता है।
यही एकमात्र रास्ता है जिसे अमेरिकी साम्राज्यवादी
धौंस के जवाब में भारत को अपनाना चाहिए। लेकिन अब तक ऐसा न हो पाने का मूल कारण यह
है कि भारत का शासक वर्ग देश के बड़े पूँजीपतियों के हितों के अनुसार सोचता और
योजनाएँ बनाता है। उन बड़े पूँजीपतियों के हित साम्राज्यवादी कम्पनियों से जुड़े
हुए हैं और वे इन कम्पनियों के छोटे साझेदारों के रूप में उत्पादन और व्यापार की
प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं। वे साम्राज्यवादी संरक्षण से जुड़कर ही
फलते-फूलते हैं और उनकी तो हस्ती ही साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से
जुड़ी होती है। यही स्थिति भारतीय जनता को,
अमेरिकी साम्राज्यवाद की
छत्रछाया तले विकास करने के भ्रम में रखती है।
इस प्रकार,
अंततः विकास के इस मार्ग
का सवाल एक राजनीतिक सवाल है, क्योंकि इसे लागू करने वाले वर्ग की देश
में वर्तमान राजनीतिक हैसियत के चलते देश के किसानों, मजदूरों
और अन्य श्रमिकों की प्रगति की गारंटी करने वाले विकास मार्ग को अपनाना संभव नहीं
है। इस प्रकार के जन-हितकारी विकास पथ को अपनाने के लिए लोगों की राजनीतिक हैसियत
और वर्चस्व के सवाल को संबोधित होना आवश्यक है।
september 2025
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