पत्रकारों पर देशद्रोह के मुकदमे
कश्मीर समस्या और इसके इतिहास पर लिखी
पुस्तकों पर प्रतिबंध
प्रेस
स्वतंत्रता के जम्हूरी अधिकार को कुचलने के मोदी सरकार के हमले लगातार जारी हैं।
पिछले अगस्त असम पुलिस ने 'द वायर' न्यूज़ समूह से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन और करण थापर के
खिलाफ भारतीय दंड संहिता की कुख्यात धारा 152 के तहत देशद्रोह के दो मामले दर्ज
किए। असम पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर और जारी किये गए समनों में इन दोनों पत्रकारों
पर देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खतरे में डालने के
आरोप लगाए गए हैं। लेकिन वास्तव में इन पत्रकारों का अपराध क्या है? दरअसल इन पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा 'द वायर'
में भारत के एक नौसेना अधिकारी शिव कुमार द्वारा इंडोनेशिया में एक
समारोह में दी गई जानकारी के बारे में खबर प्रकाशित करने के कारण दर्ज किया गया
है। इस खबर में दी गई जानकारी के अनुसार उस अधिकारी ने बालाकोट घटना के बाद भारत
और पाकिस्तान के बीच हुई सैन्य झड़पों के दौरान भारत के राफेल जेट गिराए जाने का
कारण भारतीय राजनीतिक नेतृत्व द्वारा सेना पर लगाई गई पाबंदियों और दबाव को बताया
था।
इंडोनेशिया
की राजधानी जकार्ता में दिए गए इस बयान ने मोदी सरकार के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी,
जो लंबे समय से उपरोक्त झड़पों में हुए भारतीय नुकसान के तथ्यों को
छिपाती आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा बार-बार भारत और पाकिस्तान के
बीच युद्ध रोकने के बारे में दिए गए बयानों से घिरी मोदी सरकार के लिए यह खबर एक
और झटका थी। इसने भारत के दूतावास सहित राजनीतिक नेतृत्व को इस बयान से पीछा
छुड़ाने के लिए जोर-शोर से जुटने को मजबूर कर दिया। दूसरी ओर, 'द वायर' न्यूज़ समूह, जो अपनी
स्वतंत्र पत्रकारिता के कारण मोदी सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ था, उसे सबक सिखाने के लिए सरकार ने इस मौके का इस्तेमाल किया और दोनों वरिष्ठ
पत्रकारों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया।
यहाँ
यह भी ध्यान देने योग्य है कि इन पत्रकारों के खिलाफ यह मामला असम में दर्ज किया
गया,
जो आजकल भाजपा के सांप्रदायिक एजेंडे और विभाजनकारी राजनीति का
अखाड़ा बना हुआ है। इससे भी आगे बढ़ते हुए इस बदले की कार्रवाई को अंजाम देने के
लिए असम पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की परवाह करने की जहमत भी नहीं उठाई।
उल्लेखनीय है कि इन पत्रकारों के खिलाफ पहली एफआईआर दर्ज होने के बाद सुप्रीम
कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाने के आदेश जारी किए थे।
सुप्रीम
कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए असम पुलिस ने नए समन जारी कर दिए,
जिनके बारे में बाद में पता चला कि पत्रकारों के खिलाफ यह मुकदमा
तीन महीने पहले ही दर्ज कर लिया गया था, लेकिन इसे बाद में
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को दरकिनार करने के लिए फिर से सक्रिय किया गया। पत्रकार
समूहों और जम्हूरी अधिकार संगठनों ने सरकार के इस दमनकारी कदम की निंदा करते हुए न
केवल इन पत्रकारों के खिलाफ मामले रद्द करने की मांग की, बल्कि
भारतीय दंड संहिता की धारा 152 को रद्द करने की भी मांग की, जो
औपनिवेशिक काल की धारा 124 का ही बदला हुआ रूप है। जम्हूरी लोगों के विरोध और
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई कानूनी रोक के चलते, अभी तक इन
पत्रकारों की गिरफ्तारी तो नहीं हुई, लेकिन असम पुलिस द्वारा
दर्ज किए गए मुकदमे जस के तस हैं, जिसके कारण गिरफ्तारी का
खतरा अब भी बना हुआ है।
मोदी
सरकार और असम पुलिस के इन कदमों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि बालाकोट हमले के
बाद हुई सैन्य झड़पों के बारे में भारतीय सरकार न केवल अहम तथ्य छिपा रही है,
बल्कि ऐसे तथ्यों को प्रकाशित करने वाले स्वतंत्र पत्रकारों को दमन
का चुनिंदा निशाना बनाकर उनकी जुबान बंदी के लिए हर हथकंडा अपना रही है।
सरकारी
दमन के जरिए लेखकों की आवाज को दबाने की दूसरी कार्रवाई जम्मू-कश्मीर में
प्रतिष्ठित और सुप्रसिद्ध लेखकों की कश्मीर समस्या और इसके इतिहास पर विश्व भर में
मशहूर 25 किताबों पर प्रतिबंध लगाने का कदम है। इस संबंध में जम्मू-कश्मीर के
लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा द्वारा हस्ताक्षरित आदेश,
कश्मीर के मुख्य सचिव द्वारा अगस्त महीने के पहले सप्ताह में जारी
किए गए। इनमें कहा गया है कि ये किताबें कश्मीर समस्या के बारे में गलत प्रचार
करती हैं और जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा देती हैं। आदेशों में आगे कहा
गया है कि "यह साहित्य युवाओं की मानसिकता को आंतरिक रूप से प्रभावित करते
हुए असंतोष, अत्याचार और आतंकवादी नायकत्व को बढ़ावा देता
है। यह साहित्य कई तरीकों से कश्मीर के युवाओं को कट्टरपंथ की ओर ले जाता है,
इस में ऐतिहासिक तथ्यों की तोड़-मरोड़ कर आतंकवादियों का महिमामंडन,
सुरक्षा बलों की बदनामी, धार्मिक कट्टरता और
अतार्किकता को बढ़ावा दिया गया है, और इस तरह यह युवाओं को
हिंसा और आतंकवाद के रास्ते पर ले जाता है।"
उल्लेखनीय
है कि प्रतिबंधित सभी पुस्तकें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध
लेखकों द्वारा गहन ऐतिहासिक और तथ्यात्मक जानकारी के आधार पर लिखी गई हैं,
जिन्हें कश्मीर समस्या पर प्रामाणिक और मान्यता प्राप्त किताबों के
रूप में विश्व स्तर पर स्वीकृति प्राप्त है। इन किताबों को पेंगुइन, हार्पर एंड कॉलिन्स और रटलेज जैसे विश्व प्रसिद्ध प्रकाशन समूहों द्वारा
प्रकाशित किया गया है। प्रतिबंधित पुस्तकों में प्रसिद्ध संवैधानिक विशेषज्ञ ए.जी.
नूरानी की किताब 'कश्मीर मसला 1947 से 2012', सुमंत्रा बोस की किताब 'चौराहे पर खड़ा कश्मीर',
मानवाधिकार कार्यकर्ता अनुराधा भसीन की किताब 'एक तोड़ा-मरोड़ा राज्य: धारा 370 के खात्मे के बाद कश्मीर की अनकही कहानी',
और अरुंधति रॉय की किताब 'आजादी' आदि शामिल हैं। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय लेखकों
में पिओट्र बल्सेरोविक्ज और अग्निएस्का कुजवेस्का की किताब 'कश्मीर
में मानवाधिकारों का उल्लंघन', क्रिस्टोफर स्नेडन की किताब 'आजाद कश्मीर' और डेविड देवदास की किताब 'भविष्य की तलाश में: कश्मीर की कहानी' आदि शामिल
हैं।
मोदी
सरकार द्वारा इन ऐतिहासिक और मानवाधिकार उल्लंघनों के संधर्व में लिखी तथ्यात्मक किताबों
पर प्रतिबंध लगाना भारतीय हकूमत द्वारा कश्मीरी कौम पर ढाए जा रहे अमानवीय दमन और
कश्मीरी क़ौमियत की आजादी की लड़ाई के ऐतिहासिक तथ्यों को दबाने का अगला कदम है।
धारा 370 के खात्मे के बाद भारतीय राज ने कश्मीर में दमन का नया इतिहास रचा है।
कश्मीरी लोगों के संघर्ष को कमजोर करने के लिए पत्रकारों को जेल में डालने,
हजारों युवाओं को बंद करने जैसे हर दमनकारी हथकंडे अपनाए गए हैं।
कश्मीर से संबंधित किताबों पर प्रतिबंध इस तरह के दमनकारी कदमों की ही अगली कड़ी
है जो मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर लेखकों, साहित्यकारों
और पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज को कुचलने की लम्बी श्रृंखला का हिस्सा है।
इस
तरह के दमनकारी माहौल में जम्हूरी और क्रांतिकारी शक्तियों के लिए अपनी आवाज को
बुलंद करने और सरकार के नृशंस कदमों के खिलाफ डटकर आवाज बुलंद करने की और भी
ज्यादा आवश्यकता है। पत्रकार करण थापर और सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ दर्ज मुकदमों
की निंदा करते हुए भारतीय एडिटर्स गिल्ड ने इन शब्दों में चेतावनी दी है:
"गिल्ड इस मौके पर अपने साथी पत्रकारों को यह याद दिलाना जरूरी समझता है कि
वे बिना डर और भय के अपने पेशे के प्रति जिम्मेदारी निभाने के महत्व को याद रखें।
ईमानदार पत्रकारिता कभी भी अपराध नहीं होती।" आज जम्हूरी और जनपक्षधर
शक्तियों को भी इसी तरह निडरता के साथ अपनी आवाज बुलंद करते रहने की जरूरत है।
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