Wednesday, January 25, 2012

मज़दूर-संघर्षों के बारे में

अंतर्राष्ट्रीय जन-आंदोलन तथा
देश में मज़दूर-संघर्षों के बारे में
कुछ चुनिन्दा रिपोर्टें



सुर्ख-रेखा प्रकाशन

(जनवरी-२०१२)




इस अंक में
-          यूनियन के अधिकार के लिए मारूति-सुज़ूकी कर्मचारियों
            का संघर्ष                                                                                  
-          राजनैतिक महत्वः मारूति सुज़ूकी मज़दूरों की
            संघर्ष ललकार                                                               
-          जो खबरें नहीं बनतीं
            गुडग़ांव पट्‌टी के कर्मियों के संघर्ष की कुछ झलकें             
-          मानेसर-गुडग़ांवः
            मारूति सुज़ूकी का मज़दूर संघर्ष- एक नज़र                                
-          गुड कंडक्ट बाँड क्या है?                                                           १७
-          गुड़गांव : मज़दूर हलचल का धधकता अखाड़ा                              १७
-          मज़दूरों को उजाड़ने के लिये लहू की होली-
            दर्जन मज़दूर हलाक                                                       १९
-          लुधियाना : औद्योगिक जगत की बेचैनी                            २०
-          छोटी पावरलूम फैक्ट्रियों में मज़दूर हलचल                                   २२
-          चन्नोः पैप्सिको मैनेजमैंट झुकाई                                      
            लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए मज़दूर संघर्ष की जीत                   २५
-          पूँजीवादी आर्थिक हमले के खिलाफ                                 
            जनतक रोष की अँगड़ाई                                                 २७
-          साम्राज्यवादी प्रबंध को झटके
            इज़राईल की धरती पर वर्ग संघर्ष की तरंगे                                   ३०
-          वाल स्ट्रीट ''कब्ज़ा करो अभियान''
            साम्राज्यवादी प्रबंध को झटके-पे-झटका                           ३४
-          नए रूप में जारी रह रहा 'कब्ज़ा करो' अभियान                ३९


यूनियन के अधिकार के लिए
मारूति-सुज़ूकी कर्मचारियों का संघर्ष
-अमर लंबी
जून महीने मारूति उद्योग के मानेसर (हरियाणा) प्लांट के कर्मचारियों ने अपनी १२ दिन लंबी हड़ताल के माध्यम से मैनेजमैंट के साथ कांटे की टक्कर लेकर यूनियन बनाने के अपने मौलिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए ज़ोर आज़माइश की है।
प्लांट के ३००० से अधिक कर्मचारियों द्वारा कर्मचारियों की रज़ा अनुसार मैनेजमैंट के हाथों की कठपुतली बनी यूनियन को छोड़कर अलग यूनियन बनाने की खबर मिलते ही, मैनेजमैंट जल-भुन गई। पूरी मैनेजमैंट ने चल रही शिफ्ट के सारे मज़दूरों को तुरन्त इकट्‌ठा करके डराया-धमकाया तथा तुरन्त ही ''मज़दूर निताओं को फैक्टरी में से निकाल दिया।
मैनेजमैंट के इन कदमों ने फैक्टरी कर्मचारियों में रोष की ज्वाला भड़का दी। अगले ही दिन (४ जून) को २००० से अधिक कर्मचारी काम छोड़कर फैक्टरी के अन्दर ही धरने पर बैठ गए।
मैनेजमैंट ने बिजली, पानी के कनैक्शन काट दिये, कन्टीन बन्द करवा दी तथा फैक्टरी गेट पर भारी पुलिस फोर्स तायनात करवा दी। हड़ताली कर्मचारियों के विरुद्ध कु-प्रचार के अतिरिक्त सुरक्षा गार्डों को भड़काकर मज़दूरों पर हमले भी करवाए गए। लेकिन मज़दूर अलग यूनियन बनाने की मांग को लेकर अपने संघर्ष पर डटे रहे।
मुश्किल हालातों के शिखर तक झेलते हुए भी संधर्ष कर रहे मज़दूरों की चर्चा आस-पास की फैक्टरी इकाइयों में जंगल की आग की तरह फैल गई तथा जल्दी ही इस सारी की सारी औद्योगिक पट्ठी की फैक्ट्रियों की इकाईयों में एक सांझी ऐक्शन कमेटी का गठन हो गया। ऐक्शन कमेटी के नेतृत्व में ९ जून के दिन फैक्ट्री-गेट पर नारे लगाए गए धरने में हज़ारों मज़दूर शामिल हुए।
फैल रही मज़दूर हलचल से बौखलाकर हुड्‌डा सरकार ने हड़ताल को गैर-कानूनी करार दे दिया। सांझी ऐक्शन कमेटी ने इसको सारे मज़दूरों पर हमला समझते हुए इसका जवाब १५ जून को पूरी औद्योगिक पट्‌टी में टूल-डाऊन हड़ताल के ऐलान के साथ दिया।
१७ जून को मैनेजमैंट के साथ हुए समझौते में निकाले गए ११ मज़दूरों को वापस लिया गया है। मैनेजमैंट नई यूनियन के नेताओं के साथ बातचीत करने तथा अगले आने वाले मज़दूर मामलों के समाधान के लिए फैक्ट्री की गवर्निंग काऊंसिल बनाने तथा इस में नई यूनियन के नेताओं को रखने के लिए मजबूर हुई है।
अपने इस संघर्ष द्वारा मारूति उद्योग के हज़ारों कर्मचारियों ने यूनियन बनाने के अपने मौलिक अधिकार को बुलन्द किया है और मैनेजमैंट को नई यूनियन के साथ जुड़ने के अपने दृढ़ निश्चय की ठोक-बजाकर सुनवाई की तथा औद्योगिक पट्‌टी के सभी कर्मचारियों ने हड़ताली कर्मचारियों के समर्थन में डँटकर सही सूझ-बूझ को प्रकट किया है।
इस संघर्ष का महत्व इस बात में है कि ये विदेशी भाईबन्दी वाली बड़ी कम्पनी के मज़दूरों की तरफ से लड़ा गया है। इसका केन्द्रीय मुद्‌दा यूनियन बनाने के अधिकार की रक्षा बना है। जापानी भाईबन्दी वाली ये बड़ी कम्बनी मर्ज़ी मुताबिक यूनियन बनाने की मज़दूरों की तीव्रइच्छा को कुचलने में नाकाम रही है। ये प्राप्ति इस बात के बावजूद है कि इस संघर्ष को किसी इन्कलाबी लीडरशिप का नेतृत्व प्राप्त नहीं था।
(जुलाई-अगसत)

राजनैतिक महत्वः
मारूति सुज़ूकी मज़दूरों की संघर्ष ललकार
-अमर लम्बी
मारूति मैनेजमैंट ने मजदूरों की मर्ज़ी की यूनियन को मान्यता न देने और मज़दूरों ने अपनी एकता के ज़ोर यह हक हासिल करने की ठानी हुई है। यह टकराव अकेले मारूति में नहीं समुची गुडगांव-मानेसर पट्‌टी में चल रहा है। दशक पहले मारूति में उठी और मैनेजमैंट द्वारा जबर के साथ बूझाई संघर्ष की मशाल भी इस हक की प्राप्ति के लिए थी।
मारूति मजदूरों ने बीते जून में १३ दिनों की हड़ताल के बावजूद चाहे आज़ाद यूनियन को मान्यता नहीं मिली परन्तु, मज़दूर ताकत के बल पर निकाले गए नेताओं को बहाल करा लिया गया। युनियन के कार्यकर्ताओं को मज़दूरों की मुश्किलें हल करने के लिए बनाई गई गर्वनिंग काऊंसिल में ले लिया गया। मज़दूरों की एकता से बढ़ते जमाव को तोडऩे के लिए इस संघर्ष के बाद मैनेजमैंट ने यूनियन को तोड़ने के लिए बड़े हमले की तैयारी कर ली। मैनेजमैंट ने प्रशासन, कचहिरी और प्रैस को अपने हाथ तले कर दोबारा फिर हमला बोल दिया। रोजाना दो चार अस्थायी मज़दूरों को काम से जवाब देना शुरू कर दिया। मज़दूरों को जलील करने के लिए अमानवीय दुश्कर्म करते हुए खाने में काकरोच और मख्खियां मिलाना शुरू कर दिया। दहशत फैलाने के लिए गुंडों को खुली छुट्‌टी दे दी गई। गुंडे घरों और कालोनियों के चक्कर लगाने लगे। २८ अगस्त को फैक्ट्री गेट के आगे ५०० की गिनती में पुलिस और गुंडे तैनात कर दिए गए। २९ और ३० अगस्त को और मज़दूर निकाल दिए गए। ''गुड कंडक्ट बांड'' भरने वाले को ही अंदर जाने दिया गया और ये हर मज़दूर के लिए अनिवार्य कर दिया गया। बांड न भरने वाले को जाबते का ऊलंघन करने वाला हड़ताली मज़दूर माना जाएगा का नोटिस चिपका दिया गया।
मारूति के समुचे मज़दूरों ने बांड भरने से कोरा जवाब दे दिया। सौ प्रतिशत हड़ताल फिर शुरू हो गई। एक, पांच और बारह सितंबर को रैलीयां, प्रदर्शन और सड़क जाम के आहवान पर हज़ारों मज़दूर शामिल हुए। डी.सी. को मांग पत्र देने से पहले शहर में प्रदर्शन किया गया। यह यूनियन की मान्यता की मांग को ही सहमती थी। यह सहमती जून की हड़ताल में और दृढ़ता से सामने आई जब मारूति मज़दूरों ने ४ जून को फैक्ट्री के अंदर ही कब्ज़ा कर हड़ताल शुरू कर दी।
मारूति कर्मियों पर जुल्म के विरोध में समुची उद्योगिक पट्‌टी में हड़ताल फैल गई। संघर्ष का सर्मथन करने के लिये उलझन में पड़ी हुई सुधारवादी नेतृत्व वाली युनियनों को भी मुँह रखने के लिए हड़ताल का आह्‌वान करना पड़ा। सरकार को भी दबाव मान कर हड़ताल पर लगाई गई पाबंदी को वापिस लेना पड़ा। सरकार और मैनेजमैंट को बातचीत के लिए मानना पड़ा। निकाले गए नेताओं को वपिस लेना पड़ा, ''यूनियन को मान्यता भी देंगे'' की बात स्वीकार करनी पड़ी। अब दोबारा से छेड़े गए यूनियन को तोडने के लक्ष्य से हुए हमले पर मज़दूरों की प्रतिक्रिया भी वैसे ही व्यापक है। बल्कि और भी ज़ोरदार लग रही है। सुज़ूकी की दो और फैक्टि्रयों में भी सहानुभूति के तौर पर हड़ताल फैल गई। सुजूकी के मज़दूर जनरल बॉडी की मीटिंग रखने के लिए मांग करने लगे। अलग अलग विचारों और उलझनों के बावजूद मज़दूरों के विरोध को समाप्त करने के लिए जितना बड़ा हमला है, उतना ही यह वर्ग घृणा को प्रचंड करते हुए दिखाई पड़ रहा है।
उच्च तकनीक पर आधारित साम्राज्यवादी साँझीदारी वाले बड़े उद्योगों में काम करता यह मज़दूर वर्ग बाहरमुखी हालातों की बजह से तीखी  वर्ग चेतना और ऊँची संगठनात्मक क्षमता ग्रहण करने की रौशन सम्भावनाएं रखता है। असल क्रांतिकारी नेतृत्व की अगवाई मिलने पर ऊँची वग चेतना को ग्रहण करके यह मज़दूर वर्ग अंधी लूट पर निर्मित साम्राज्यवाद के स्तंभों को हिला के रखने के और किसानों और समुचे मेहनतकशों के संघर्ष में नेतृत्व निभाने वाली अपनी सच्ची वर्गीय राजनैतिक भुमिका को साकार करने में सक्षम हो सकता है। चेतन मज़दूर वर्ग द्वारा ऐसे सम्भावत तूफानी झटकों के डर से ही वो इनके चेतन और इकट्‌ठा होने के रास्ते में कांटे बीजते हैं। इसी डर को भांप कर ही मानेसर-गुड़गांव उद्योगिक पट्‌टी के कारखानों के प्रबंधक मज़दूरों के सही रास्ते पर इकट्‌ठा होने के रास्ते में रोकें लगा रहे हैं। इसलिए मानेसर प्लांट की मैनेजमैंट ने मज़दूरों की अपनी मनपसंद यूनियन बनाने की मांग को मानने की बजाय फैक्ट्री बंद करके आर्थिक नुकसान झेलने की नीति को पहल दी है। वे इस मज़दूर संघर्ष के राजनैतिक महत्व को पहचान रहे हैं। सिर्फ आर्थिक हितों को ही सब कुछ नहीं समझ रहे। देश के मज़दूर वर्ग को पूँजीपतियों से सीखने की ज़रूरत है। तत्कालीन आर्थिक हितों से आगे अपने बुनियादी हितों के बारे में सोचने की जरूरत है। संगठित होने के लोकतांत्रिक और राजनैतिक  अधिकार को संघर्ष के बल पर हासिल करने और निभाने के महत्व को पहिचानना चाहिए। ट्रेड यूनियन नेतृत्व पर आम तौर पर आर्थिकवादियों, सुधारवादियों का दबदबा होने के बावजूद मारूति सुज़ूकी और उद्योगिक पट्‌टी के और मज़दूरों ने आज़ादी से युनियन बनाने के लोकतांत्रिक राजनैतिक अधिकार को पहचान पाने में सफलता हासिल की है। बड़ी मुश्किलों को सहन कर के इस अधिकार के लिए संघर्ष करने का दम दिखाया है। इसे मज़दूर वर्ग के एक अहम मुद्‌दे के तौर पर उभारने में सफलता अर्जित की है। भारी मुश्किलें झोल कर जूझने का दम दिखाया है। यह इस संघर्ष की एक अहम राजनैतिक प्राप्ति है। संघर्ष का तात्कालीन नतीजा कोई भी हो, यह अनुभव व्यर्थ और फिज़ूल नहीं जाएगा।
(स्तिम्बर-अक्तूबर)

जो खबरें नहीं बनतीं
गुडग़ांव पट्‌टी के कर्मियों के संघर्ष की कुछ झलकें
-अप्रैल २००६ में ४५०० से ज्यादा कच्चे मज़दूरों ने हीरो हांडा के गुडगांव पलांटों पर कब्जा कर लिया। वेतन बढ़ाने और काम करने के हालात में सुधार की मांग रखी। मैनेजमैंट ने पुलिस बुला ली पानी और बिजली को काट दिया। न पुलिस अन्दर गई न बाहर से कोई और मदद मिल सकी। मज़दूरों ने बातचीत के लिए एक दल बाहर भेजा। जब उनहोनें बताया कि मैनेजमैंट ने मांगे मान ली हैं, तभी जाकर मज़दूरों ने कब्जा छोड़ा।
-जनवरी २००७ में डैल्फी कार कलपुर्जे बनाने वाली फैक्ट्री के २५०० अस्थायी मज़दूरों ने फैक्ट्री पर कब्जा कर लिया। कब्जा दो दिन बाद छोड़ा। अगस्त ३००७ में इन्होनें फिर कब्जा कर लिया। कम से कम वेतन बढ़ाने की मांग रखी गई और कामयाबी हासिल की गई।
-अगस्त २००७ में हरियाणा सरकार द्वारा कम से कम वेतन बढ़ाने के बाद फरीदाबाद और गुड़गांव की दर्जन से ज्यादा कंपनियों में अस्थायी कर्मियों ने इसी तरह फैक्ट्रीओं पर कब्जे किए। कम से कम वेतन बढ़ाने वाली मांग में सफलता हासिल की।
हरियाणा के इस ऑटोमोबाइल उद्योगिक केंद्र में यूनियन को मान्यता ना देना, युनियन बनते  ही नेताओं को निकाल देना, बाकी मज़दूरों को, ''गुड कंडक्ट बांड'' (अच्छा चाल चलन) भरने के बाद ही अंदर जाने देना और जो नहीं भर रहे हैं उन्हें निकाल देना, नई ठेका भर्ती कर लेना आम बात है। फैक्ट्री के प्रबन्धक सरकार और प्रशासन यह काम मिल कर करते हैं। इसके जवाब में मज़दूरों ने संघर्ष की एक ऐसी शक्ल बनाई है जिसमें यूनियन बन सके या ना बन सके,,  वे सामूहिक रूप से काम बंद करके फैक्ट्री पर अंदर से ही कब्जा जमा कर बैठ जाते हैं। मैनेजमैंट द्वारा बिजली और पानी काट देने की पीड़ा वे अंदर ही झेल लेते हैं। ना कोई समाचार बाहर जाता है ना कोई मदद ही बाहर से मिल पाती है। प्रशासन ऐवं मैनेजमेंट को पुलिस को अंदर घुसा कर कब्जा छुडवाना नफे वाली बात नहीं लगती। इस लिए वे आंशिक मांगे मान कर या झूठ फरेब द्वारा मज़दूरों के आगे झुकने का स्वांग रचाते हैं। मारूति कर्मियों ने भी बीते जून में हड़ताल के समय फैक्ट्री पर अंदर से कब्जा जमाने की संघर्ष शक्ल अपनाई थी और संघर्ष के आगे मैनेजमेंट और सरकार दोनों को झुकने के लिए मजबूर कर दिया था।
(स्तिम्बर-अक्तूबर)

मानेसर-गुडग़ांवः
मारूति सुज़ूकी का मज़दूर संघर्ष- एक नज़र
-अमर लंबी
(४ जून से २१ अक्तूबर २०११)
हरियाणा के ज़िला गुडगांव के उद्योगिक क्षेत्र में भारत की सब से बड़ी कारें बनाने वाली कंपनी मारूति सुज़ूकी की पांच फैक्ट्रियां हैं। इनमें से दो असैंबली प्लांट हैं। एक मानेसर में है और दूसरा इससे २० किलोमीटर दूर गुडगाव प्लांट है। इसके अतिरिक्त तीन और फैक्ट्रियां मानेसर में हैं (१) सुज़ूकी पावरट्रेन (यह इंजन, गीयर बॉक्स और ऐक्सल सप्लाई करती है) (२) सुज़ूकी कास्टिंगज़, (३) सुज़ूकी मोटर साईकल्ह्णा। यह संघर्ष मारूति सुज़ूकी मानेसर के मज़दूरों ने लड़ा, चाहे इस दौरान समय समय पर दूसरी फैक्ट्रियों के मज़दूर भी हड़ताल करते रहे और संघर्ष के समर्थन में डटते रहे। इसके अतिरिक्त मानेसर क्षेत्र के और आटो फैक्ट्रियों के मज़दूर भी हडतालों और दूसरी संघर्ष गतिविधियों में शामिल होते रहे। रिपोर्टें बताती हैं कि पूरे ज़िले में दस लाख के करीब ऑटो उद्योग मज़दूर कार्यरत हैं।
जून २०११ के शुरू से ही मारूति सुज़ूकी के लगभग ३५०० मज़दूर फैक्ट्री निज़ाम के साथ भिडंत में हैं। उनका संघर्ष उद्योगिक क्षेत्र की अन्य ऑटो फैक्ट्रियों में फैल गया है। फलस्वरूप संसार की तीसरी और भारत की सबसे बड़ी कार कंपनी का प्लांट ठप्प होकर रह गया। पिछले २० सालों में भारत के इस सबसे अहम नौजवान मज़दूरों के संघर्ष ने कंपनी द्वारा अस्थायी और स्थायी मज़दूरों में दरार डालने की चाल को फेल करके रख दिया है। इस संघर्ष ने भारतीय शासकों के विकास मॉडल की धुरी पर चोट की और इस पर निशाना साधा। इस विकास मॉडल की बहुत ही अहम धुरी है आर्थिक और उत्पादन ढाँचे को संसार बाज़ार और विश्व के सबसे ऊंचे तकनीकी स्तरों के साथ नत्थी करने के साथ साथ मज़दूर शक्ति (वर्क फोर्स) का निर्दयी अस्थायीकरण करना। यह अस्थायीकरण अनेकों साधनों तथा तरीकों द्वारा ठोसा गया। प्रधान मंत्री ने मज़दूर बेचैनी/संघर्ष पर चिंता जताते हुए हुकूमत का भार मज़दूरों के विरुद्ध डाला। हुड्‌डा सरकार ने धमकियाऔर डरावे देने के साथ साथ बड़े स्तर पर पुलिस भी झोंकी, ठेकेदारों ने देसी बंदूकों का भी प्रयोग किया, हो हल्ला मचाते हुए कॉर्पोरेट प्रैस मीडिया भी कंपनी के पक्ष में रहा। मज़दूरों में शासक वर्ग के घुसपैठिए सी.पी.आई., सी.पी.आई.(एम) और इन जैसे ही और नेताओं, बिचौलियों और दलालों (ब्रोकरज़) ने भी अपनी कलाबाज़ियों से कंपनी की सेवा की। कानूनी कागज़ का टुकड़ा (जो किसी भी पक्ष के लिए कोई मायने नहीं रखता) भी लहराया और मोबाइल फोनों पर (जो मोबाईल कंपनी ने एक करोडवीं कार बनाते वक्त कंपनी द्वारा मज़दूरों को तोहफे के तौर पर दिए गए थे) मज़दूरों और उनके परिजनों को धमकाने के लिए संदेश भी भेजे गए। परन्तु जैसे कि मारूति सुज़ूकी कंपनी का चेयरमैन आर.सी. भारगव खुद मानता है कि ''जब मुश्किल (मज़दूर विरोध की) शुरू होती है (तो बस) यह जाती नहीं।'' ''जो बात चल निकली वो कहां रुकती है।'' सो, इस तरह इस कंपनी ने के लिए (और दूसरी कंपनियों के लिए भी) यह मुश्किल शुरू हो चुकी है।
मारूति सुज़ूकी (मानेसर) के मज़दूरों का संघर्ष कई दौर से गुज़रा है। ४ जून से १७ जून तक हड़ताल, १७ जून से २८ जून तक फैक्ट्री चली पर, ज़ोर आज़माइश होती रही और कंपनी मज़दूरों पर बड़े हमले की तैयारी करती रही, २८ अगस्त से ३० सितंबर तक तालाबंदी (लॉक आऊट) और कंपनी द्वारा हमला और ७ अक्तूबर से २१ अक्तूबर तक फिर हड़ताल हुई। इस कुल समय के दौरान दर्जनों घटनाएं घटीं। चालें और जवाबी चालें चली गईं, हमलों और जवाबी हमलों का लंबा सिलसिला चला। यहां पर हम महत्वपूर्ण घटना विकास संक्षिप्त रूप में देने की कोशिश करेंगे।
हड़ताल और फैक्ट्री कब्ज़ा (४ जून से १७ जून)
प्लांट के मज़दूरों ने अपनी यूनियन 'मारूति सुज़ूकी एम्पलाईज़ यूनियन' बनाई। कंपनी मालिकों ने हमले शुरू कर दिए। खाली काज़ पर मज़दूरों के दस्तख़त करवाने की कोशिश की गई। निलम्बनों और बर्खास्तगियों का सिलसिला शुरू कर दिया गया। ४ जून से मज़दूरों ने हड़ताल शुरू कर दी और फैक्ट्री के अंदर ही बैठ गए। (सिट-इन-स्ट्राईक)। एक तरह से मज़दूरों ने फैक्ट्री पर कब्ज़ा कर लिया जो १७ जून तक जारी रहा। दूसरे मज़दूरों, मज़दूर परिवारों और उनके समर्थकों ने फैक्ट्री में डटे हुए मज़दूरों के लिए खाना और बाकी ज़रूरी चीजों का प्रबंध किया। यह अस्थायी और स्थायी मज़दूरों का सांझा मोर्चा संगठित करने और युनियन बनाने के अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहा था। प्रबंधकों ने फैक्ट्री के गेट बंद कर दिए, गेट पर गार्ड तैनात कर दिए ताकि गेट के भीतरी मज़दूर अपने बाहर वाले मज़दूरों, समर्थकों और प्रेस से संपर्क न बना सकें। ६ जून को गेट के अंदर व बाहर पुलिस भी तैनात कर दी गई, जिसने गेट के बाहर मज़दूरों और समर्थकों द्वारा लगाए गए टैंट भी हटा दिये।
९ जून को एटक, सीटू, एच.एम.एस. समेत कई युनियनों की सांझा ऐक्शन कमेटी के आह्वान पर लगभग २००० मज़दूरों ने फैक्ट्री गेट के सामने रोष रैली की। हरियाणा सरकार ने हड़ताल को गैर-कानूनी घोषित कर दिया और पुलिस के दो ट्रक और तैनात कर दिए। आस-पास की दो-अढ़ाई सौ तक छोटी बड़ी फैक्ट्रियों ने उत्पादन कम कर दिया या बिल्कुल बंद कर दिया। यह फैक्ट्रियां मारूति सुज़ूकी को पुर्जे सप्लाई करती हैं। प्लांट बंद होने की वजह से इनको सप्लाई बंद करनी बड़ी। विभिन्न यूनियनों ने १४ जून को संघर्ष के समर्थन में पूरे इलाके की फैक्ट्रियों के मज़दूरों को २ घंटे की हड़ताल का आह्वान दिया पर मौके पर ही यह आह्वान वापिल से लिया गया। एटक सचिव ने कहा, ''बातचीत चलने'' की वजह से यह आह्वान वापिस लिया जा रहा है। एटक और दूसरे केंद्रीय यूनियनों के नेताओं कीमध्यस्तता से १७ जून को हड़ताल और फैक्ट्री पर से मज़दूरों का कब्ज़ा समाप्त हो गया। कंपनी ने बर्खास्तगियों को निलम्बनों में बदलने का भरोसा दिलाया। हड़ताल के दिनों का वेतन काटने, (एक दिन के बदले में दो दिन का वेतन) का फैसला हुआ। कंपनी ने ब्रह्मकुमारीज़ से मज़दूरों की आत्मिक शांति और अच्छे उद्योगिक संबंधों के लिए भाषण करवाए। (जैसे लुधियाना में हड़ताल के बाद हीरो ग्रुप के मालिकों ने बाबा रामदेव के कैंप लगवाए थे।)
मज़दूरों पर कंपनी द्वारा हमले की तैयारी (१७ जून से २८ अगस्त)
१७ जून से २८ अगस्त तक के बीच कंपनी प्रबंधकों ने मज़दूरों पर बड़े हमले की तैयारी की। कानपुर और अन्य आई.टी.आई. संस्थानों से नई भर्ती शुरू कर  दी गई। मज़दूरों के निलम्बन संबंधी दिए गए भरोसे से प्रबंधक पीछे हट गए। फैक्ट्री के अंदर लॉन और खुले स्थानों (जिनको हड़ताल के दौरान मज़दूर इस्तेमाल करते थे) के चारों ओर आड़ कर दी गई। एम.एस.ई. यूनियन के रजिस्ट्रेशन के लिए दिए गए प्रार्थना-पत्र को सरकारी अधिकारियों ने खारिज कर दिया।
११ साल बाद प्रबंधकों की पिट्‌ठू, ''मारूति उद्योग कामगार युनियन'' का कंपनी ने चुनाव करवाया, मज़दूरों ने इसका बायकॉट किया। सिर्फ १२ वोटों का भुगतान हुआ। इनसें से ज्य़ादातर पदवियों के लिए खड़े हुए उम्मीदवार ही शामिल थे। २८ जुलाई को ६ और मज़दूर निलंबित कर दिए गए। चार मज़दूरों को उनके काम के स्थान से पुलिस पकड़ कर ले गई। मज़दूरों ने इसका विरोध किया। सारी फैक्ट्री का काम बंद करके मज़दूर एक जगह पर एकत्रित हो गए। कुछ घंटों की हड़ताल के बाद प्रबंधक झुक गए और गिरफ्तार मज़दूरों को रिहा करवा लिया गया। परन्तु नई भर्ती जारी रही। २३-२४ अगस्त को चार और मज़दूर निलंबित कर दिए गए। २८ अगस्त की रात को, जिस समय ओवर टाईम लगाने वाले बहुत ही कम मज़दूर फैक्ट्री में थे, ४०० के करीब 'दंगा पुलिस' फैक्ट्री में दाखिल की गई। अगले दिन किसी भी मज़दूर को फैक्ट्री जाने नहीं दिया गया। ५०० मीटर लंबी एलुमिनियम की चादरों की दीवार से फैक्ट्री को ढक दिया गया ताकि ना तो अंदर से बाहर कुछ दिखाई दे, न ही बाहर से फैक्ट्री के भीतर कोई देख सके। ११ अन्य मज़दूरों को बर्खास्त और १० को निलंबित कर दिया गया। तालाबंदी शुरू हो गई। कंपनी द्वारा यह ऐलान कर दिया गया कि 'अच्छे व्यवहार के इककार' पर दस्तख़त किए बगैर कोई मज़दूर काम पर नहीं रखा जाएगा। मज़दूरों ने इस बाँड पर दस्तखत करने से इन्कार कर दिया। ३३ दिनों की इस तालाबंदी के आखिर में १३०० वर्कर प्लांट के अंदर थे जिनमें से ८०० नए भर्ती किए गए थे।
१२ सितंबर को नज़दीकी मुँझाल शोवा के १२०० अस्थायी मज़दूरों ने हड़ताल कर दी। इस से हौंडा और हीरो हौंडा की फैक्ट्रियों के उत्पादन को खतरा खड़ा हो गया। दूसरे दिन १२५ मज़दूरों को स्थायी (रैगूलर) करवा लिया गया।
१४ सितंबर को सुज़ूकी पॉवर ट्रेन, सुज़ूकी कास्टिंग्ह्णा और सुज़ूकी मोटर साईकल के हज़ारों मज़दूरों ने मारूति सुज़ूकी के मज़दूरों के पक्ष में हड़ताल कर दी। उन्होंने अपनी मांगे भी रखीं। (जैसे अस्थायी मज़दूरों को स्थायी करने की मांग)। एक दिन के बाद ही मारूति सुज़ूकी को गुड़गांव वाला प्लांट भी बंद कर देना पड़ा, क्योंकि सुज़ूकी पॉवर ट्रेन से सप्लाई बंद हो गई। यह हड़ताल १६ सितंबर तक चली, जब एच.एम.एस. ने हड़ताल वापिस ले ही। यह लॉक आऊट ३० सितंबर तक चला। कंपनी ने १८ ट्रेनी फैक्ट्री में वापिस बुला लिए और ४४ बर्खास्तगियों को निलंबन में बदलने का भरोसा दिया। मज़दूरों को बाँड पर हस्ताखर करने पर सहमत होना पड़ा। हड़ताल के दिनों का वेतन बिलकुल न देने की वजह वेतन में कटौती करना तय हुआ। इस तालाबंदी के दौरान मज़दूर फैक्ट्री के सामने विरोध कैम्प लगाकर जमे रहे। १३ स्तिम्बर को ऐटक, सीटू, ऐच.ऐम.ऐस. और ११ आज़ाद यूनियनों के आधार पर 'ऐक्शन कमेटी' दोबारा बनाई गई। १३ सितंबर को १५०० मज़दूरों और विद्यार्थियों ने गुडगांव में प्रदर्शन किया। १५ सितंबर को कंपनी द्वारा नए अस्थायी भर्ती किए गए मज़दूरों को तीन बसों में भर कर फैक्ट्री के अंदर लेजाने की कोशिश में हुई झड़पों में चार हड़ताली मज़दूर जख्मी हुए और गिरफ्तार कर लिए गए। १६ सिंतबर को 'सांझा ऐक्शन कमेटी' ने प्रदर्शन करने का ऐलान किया, पर वापिस ले लिया। जापान और दिल्ली में २२ सितंबर को संघर्ष के समर्थन में प्रदर्शन हुए। इस तालाबंदी के दौरान कंपनी के मुताबिक २२००० कारों का उत्पादन रुका और १५ करोड़ डॉलर का घाटा पड़ा।
संघर्ष के दौरान दूसरी हड़ताल और कब्ज़ा
(७ अक्तूबर से १४ अक्तूबर तक)
३ अक्तूबर को जब मज़दूर काम पर गए, प्रबंधन ने १२०० उन अस्थायी मज़दूरों को अंदर जाने से रोक दिया जिन्होंने पहले हड़ताल, विरोधी कैंप, धरने में हिस्सा लिया था। स्थायी मज़दूरों के काम के स्थान और विभाग बदल दिए गए। निराश होकर १०० अस्थायी मज़दूर फैक्ट्री छोड़ गए। बाकी के गेट पर आते रहे। ७ अक्तूबर को फैक्ट्री मज़दूर हड़ताल दौरान अंदर ही कब्ज़ा करके बैठ गए। इसी के साथ सुज़ूकी पॉवर ट्रेन, सुज़ूकी कास्टिंग्ह्णा और सुज़ूकी मोटर साईकल के मज़दूरों ने भी ऐसा ही किया। उन सब ने अस्थायी मज़दूरों को काम पर रखने की मांग की और इस के साथ ही मज़दूरों को फैक्ट्री मे लाने के लिये बस सेवा चालू करने की माँग की, जो अक्तूबर के शुरू में ही कंपनी ने बंद कर दी थी। इसके अतिरिक्त ऑटो उद्योग के क्षेत्र की और फैक्ट्रियों में भी थोड़े समय (एक दो दिन) हड़ताल हुई। मारूति सुज़ूकी मानेसर में तालाबंदी के दौरान नए भर्ती किए मज़दूरों में से कम से कम आधे मज़दूर हड़ताल करके फैक्ट्री पर कब्ज़ा करने में शामिल हुए। ७ से १४ अक्तूबर तक के दिन इस सम्पूर्ण संघर्ष में सब से व्यापक, जुझारू और असरदार मज़दूर सक्रियता के दिन थे। दस हज़ार से ह्णयादा मज़दूर हड़ताल पर थे। न सिर्फ हड़ताल पर थे बल्कि उनमें से बहुत बड़ा हिस्सा अपनी-अपनी फैक्ट्रियों पर कब्ज़ा जमाए बैठा था। (सबसे उभर कर सामने आई मांग अस्थायी मज़दूरों को स्थायी रोज़गार देना था, न सिर्फ मारूति सुज़ूकी मानेसर प्लांट में ही बल्कि और जगहों पर भी।) हज़ारों मज़दूर हड़ताल करके अपने कामों को निपटा कर संघर्ष में शामिल और समर्थन में सक्रिय थे। मारूति सुज़ूकी का गुडगांव प्लांट, पुर्जों की सप्लाई से वंचित, अपनी आखिरी साँसे लेने लगा और अंत में बंद हो गया। ९ तारीख को हरियाणा सरकार ने मज़दूरों को ४८ घंटे में संघर्ष खत्म करने की चेतावनी दी, जिसका उनपर कोई असर नहीं हुआ। कंपनी मालिकों की तरफ से निलंबित और बर्खास्त करने के ऐलान होते रहे। सुज़ूकी मोटर साईकल फैक्ट्री गेट पर ठेकेदारों के गुंडों द्वारा मज़दूरों पर हमला हुआ। गोलियां चलाई गई और बीयर की खाली बोतलों से हमला किया गया। यह हमला सामने खड़ी पुलिस की मिलीभगत से हुआ। मारूति सुज़ूकी मानेसर प्लांट के अंदर २००० से २५०० तक की गिनती में पुलिस तैनात की गई थी। कंपनी और सरकार के इशारे पर प्रैस मीडिया में मज़दूुरों के खिलाफ 'तोड़-फोड़' करने, अनुशासन भंग करने, हिंसा करने  और ३० सितंबर का 'समझौता तोड़ने' का धूँआधार प्रचार हो रहा था। सी.पी.आई. और इन जैसे और नेताओं का वश नहीं चल रहा था। वे पूर्णतः बेबस थे। 'ऐसोचेम' और ठेकेदार एवं स्थानीय सामंत-चौधरी सब मिलकर ऊँची आवाज़ में सरकार से हड़ताल को कुचल देने की मांग कर रहे थे। पर मज़दूर डटे हुए थे और अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे थे। इन दिनों का संघर्ष गुडगांव उद्योगिक केंद्र में और भी बड़े और व्यापक संघर्ष की स्पष्ट संभावनाएं रखता था।
१४ अक्तूबर का बड़ा पुलिस हमला,
फैक्ट्री कब्ज़ों का उठाए जाना और विरोध कैंप
१४ अक्तूबर को प्रधान मंत्री ने कहा कि ''मज़दूर हलचल (लेबर अनरेस्ट) गंभीर चिंता का विषय है। हमें चाहिए कि हम इसे कुशलता से निपटाएं।'' उसी दिन २८ बर्खास्तगियों के ऐलान हुए। कंपनी के गले का कांटा बने मज़दूर नेताओं की गिरफ्तारियों, पुलिस छापों का दौर शुरू हुआ। बड़े स्तर पर पुलिस मज़दूरों पर हमले करने पर उतर आई। मारूति सुज़ूकी के मानेसर प्लांट में पुलिस ने मज़दूरों की साँझा रसोई (लंगर) पर कब्ज़ा कर लिया। मज़दूरों के इस लंगर से पॉवर ट्रेन फैक्ट्री के मज़दूरों समेत ४००० मज़दूरों को खाना सप्लाई होता था। पुलिस ने प्लांट के अंदर पानी की सप्लाई, कंटीन और शौचालय पर कब्ज़ा जमा लिया। यह सब मज़दूरों को फैक्ट्री से बाहर निकालने के लिए किया गया।
इस बड़े हमले के समक्ष १४ अक्तूबर की रात को मारूति सुज़ूकी के मानेसर प्लांट के अंदर डटे हुए मज़दूरों को कब्ज़ा छोड़ कर बाहर आने का फैसला करना पड़ा। अगले दिन दूसरी फैक्ट्रियों के मज़दूरों को भी कब्ज़े छोड़ने पड़े।
फैक्ट्रियों के बाहर विरोध कैंप और २१ अक्तूबर का समझौता
१५ अक्तूबर से लेकर फैक्ट्रियों के बाहर विरोध कैंप और धरनों की शकल मे संघर्ष चला। १४ तारीख के बड़े हमले के बाद फैक्ट्री कब्ज़े छोज़ने के कारण चाहे मज़दूरों को एक कदम पीछे हटना पड़ा, परन्तु संघर्ष फैलाने और समर्थन जुटाने के हालात बाकायदा बने हुए थे। नज़दीक के नोएड़ा उद्योगिक केंद्र में बहु-राष्ट्रीय कंपनी के 'सोलर पैनल' फैक्ट्री के १५०० मज़दूरों ने १६ तारीख को हड़ताल कर दी। मारूति सुज़ूकी के मज़दूरों ने काली दीवाली मनाने का आह्वान दिया। अनेक जगहों से समर्थन में कार्यवाईयां हुईं और सहानुभूती का नारा बुलन्द किया गया। १७ तारीख को गुड़ग़ायों में ट्रेड यूनियन एकमुठता प्रकट करते हुएहज़ारों मज़दूर और विद्यार्थियों ने रैली की। दर्जनों यूनियनों ने कलकत्ता में समर्थन रैली की। मध्यस्तताओं की गतिविधियां तेज़ हुईं। सौदेबाज़ी की गुप्त और खुली (पर ज्यादातर आम मज़दूरों से छुपा कर गुप-चुप विचार विमर्श) बातें होने लगीर्ं। बहुराष्ट्रीय कंपनी, अन्य कंपनियां तथा सरकार मज़दूरों के गुस्से से डरे हुए थे। वे चिंतित थे। दहशत एवं कूटनीतिक चालों द्वारा एक बार मज़दूर संघर्ष खत्म करने या टालने का रास्ता ढूँढ रहे थे। सी.पी.आई. जैसे नेताओं के हित भी उन्हीं के साथ मिलते थे और ये बिचौलिए अपनी कलाबाज़ियों द्वारा सेवाएं देने के लिए हाज़िर थे। आखिर में जैसा कि रिपोर्टें बताती हैं। ४२ घंटे चली लंबी 'मैराथॉन' बातचीत के आखरी दौर में समझौता हो गया। इस 'मैराथॉन' बातचीत की एक विशेष खूबी यह थी कि यह मज़दूर प्रतिनिधियों को बार बार दी गई 'गिरफ्तारियों' की धमकी के दौरान हुई और यह सारी बातचीत ''मीटिंग की जगह से बाहर जाने की कदाचित्‌ इजाज़त नहीं'' की हालत में हुई। अपने संघर्ष के मज़दूर साथियों से नेताओं को सलाह भी नहीं करने दी गई।
फलस्वरूप २१ अक्तूबर को समझौते का ऐलान हुआ। २२ अक्तूबर को फैक्ट्रियां दोबारा चालू हो गईं। २१ तारीख को जो समझौता हुआ उसके मुताबिक मज़दूर जो अहम बात मनाने में कामयाब रहे वह है, १२०० अस्थायी मज़दूरों की बहाली। इसके बिना उस समय तक निकाले गए ९७ मज़दूरों में से ६४ बहाल करवा लिए गए और बाकी ३३ मज़दूरों की बर्खास्तगियों को निलंबनों में तबदील कराने में कामयाबी मिली। ऐम.एस. इम्पलाईज़ यूनियन को कंपनी ने मान्यता नहीं दी पर कंपनी ने यह माना कि बनाई जाने वाली दो कमेटियों में मज़दूरों को बराबर प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। इन कमेटियों (ग्रीवैंसेज़ कमेटी और लेबर वैल्फेयर कमेटी) में सरकारी प्रतिनिधि लेबर अफसर शामिल होगा।
एक बार समझौता हो गया है। फैक्ट्रियां चल पड़ी हैं। मज़दूर लहर के लोग और अन्य रुचि रखने वाले लोग घटनाओं का ध्यान से निरीक्षण करते रहेंगे (यह लिखे जाने तक एक खबर आ भी गई है, ४ नवंबर को मारूति सुज़ूकी के एक बेनाम प्रबंधक ने प्रैस को बताया कि जिन निलंबित (कोई ३०+३) मज़दूरों के बारे में जांच पड़ताल करने के बाद फैसला किए जाने की बात समझौते में कही गई थी, वे ''प्लांट की नौकरी से अलग हो गए हैं।'' यह कोई भी समझ सकता है, ''अलग हो गए या कर दिए गए'' इनमें लगभग सभी मज़दूर पदाधिकारी शामिल थे।)
पर एक बात स्पष्ट है- गुड़गांव में मज़दूर हालत और हलचल को देख कर पक्का नतीजा निकलता है कि यहां संघर्ष के अखाड़े धधकते रहेंगे और इसके शांत होने के आसार नहीं हैं। (नवम्बर-दिसम्बर)
गुड़गांव उद्योगिक पट्ठी : मज़दूर हलचल का धधकता अखाड़ा
दिल्ली के बार्डर से लगता, हरियाणा का गुड़गांव ज़िला एक अहम उद्योगिक केंद्र है। समाचार पत्रों के मुताबिक इस उद्योगिक पट्ठी में कोई २० लाख मज़दूर काम करते हैं। बड़ी ऑटो एवं टैक्सटाइल इंडस्ट्री का यह अहम केंद्र है। मज़दूरों की अंधाधुन्द लूट की जाती है और गुंडों और पुलिस की ताकत के दम पर मज़दूरों को दबाया-कुचला जाता है। बीते वर्षों में हरियाणा सरकार और फैक्ट्री मालिकों ने पूरा ज़ोर लगाया कि इस क्षेत्र को मज़दूर यूनियनों से मुक्त रखा जाए। परन्तु पिछले कुझ समय से बात उनके हाथ से निकलती जा रही है। २००५ में हौंडा जापानी मोटर साईकल फैक्ट्री के मज़दूरों के संघर्ष और पुलिस द्वारा किए अन्धे ज़ुल्म के बाद हालत ने करवट लेना शुरू किया है। मज़दूर संघर्षों के अखाड़े गर्माने और युनियनें बनने का अमल तेज़ हुआ है। अक्तूबर २००६ में हीरो हौंडा के मज़दूरों का संघर्ष, २००७ में डैल्फी (कारों के पुर्जे बनाने वाली फैक्ट्री) के मज़दूरों का संघर्ष, अगस्त २००७ में दर्जन से ज्यादा फैक्ट्रियों में न्यूनतम वेतन बढ़ाने का संघर्ष और २००९ में रीको ऑटो इंडस्ट्री के मज़दूरों का तालाबंदी के खिलाफ संघर्ष और इस दौरान फैक्ट्री मालिकों के गुंडों द्वारा एक मज़दूर का कत्ल करने के विरुद्ध ७० से ज्य़ादा फैक्ट्रियों के एक लाख मज़दूरों की हड़ताल कुछ अहम संघर्ष हैं। इसी कड़ी में मारूति सुज़ूकी के मज़दूरों का बीते दिनों में जून २०११ से अक्तूबर २०११ तक का लंबा और शानदार संघर्ष शामिल है। हालात इस बात से पर्दा उठा रहें है कि बड़े (देसी-विदेशी) पूंजीपतियों और सरकार की गुड़गांव को मज़दूर संघर्षों और युनियनों से मुक्त रखने की योजना मिट्‌टी में मिल गई है और आने वाले समय में गुड़गांव मज़दूर संघर्षों का और भी महत्वपूर्ण अखाड़ा बनकर उभरेगा। (नवम्बर-दिसम्बर)

गुड कंडक्ट बाँड क्या है?
-हरजिंदर सिंह
मारूति सुज़ूकी के मानेसर वाले प्लांट के मज़दूरों के लंबे संघर्ष के दौरान जो बाँड मज़दूरों पर ठोसा गया और जिसका मज़दूरों ने सख्त विरोध किया, उसमें जो दर्ज है वो इस तरह है, ''अगर, ड्यूटी पर हाज़िर होने के बाद मैं धीरे काम करने (गो स्लो), बीच में काम रोकने, फैक्ट्री के अंदर हड़ताल करने (स्टे इन स्ट्राइक), नियम के मुताबिक काम करने (वर्क टू रूल), या फैक्ट्री में ऐसी गतिविधि करने जो पैदावार घटाने वाली हो या तोडफोड़ करने का फैक्ट्री प्रबंधकों द्वारा मुझे भागीदार पाया गया तो मैं, सहमत हूँ कि मुझे बिना नोटिस दिए फैक्ट्री प्रबंधक नौकरी से निकालने (डिसमिस) के हकदार हैं।'' इसी के साथ उपरोक्त में यह बातें भी लागू होती हैं. ''(१) अगर मैं झूठे बहाने से छुट्‌टी लेता हूं या इसके लिए आवेदन करता हूं। (२) अगर मैं व्यक्तिगत दिखावट, सफाई, समेत सज-धज (प्रौपर ग्रुमिंग) की कमी (लैक) दिखाता हूं। (३) निजी जिंदगी में कंपनी की प्रतिष्ठा घटाने वाला व्यवहार करता हूं। (४) शौचालय में ज्यादा वक्त लगाता हूं। (५) आदतन सफाई के बारे में लापरवाह हूं।''
इस बाँड की रूप-रेखा अपने आप में ही बहुत कुछ ज़ाहिर करती है। नौकरी से बर्खास्त करने की तलवार मज़दूरों के सिर पर है, जिसके लिए सौ बहानों का रास्ता इस बाँड द्वारा खोला हुआ है। फिर भी कुछ बातों का ज़िक्र हालात की सही तस्वीर बनाने में सहायता कर सकता है। फैक्ट्री में खाना खाने के लिए छुट्‌टी ३० मिनट है। इसके अतिरिक्त सारे दिन में ५ से ७ मिनट की दो छुटि्‌टयां (बे्रेक) चाय आदि पीने के लिए हैं। इसके अतिरिक्त कोई और ब्रेक नहीं, ना शौचालय जाने की, ना बीड़ी बगैरा पीने की। बीच में कोई, एक-दो मिनट का दम भी नहीं ले सकता। ब्रेक का समय इतना कम है कि ५०० मीटर दूर कंटीन तक बहुत तेज़ भाग कर चाय पीकर वापिस आना बहुत मुश्किल है। २-३ मिनट लेट होने पर भी जुर्माने हैं, सुपरवाइज़रों-मैनेजरों की गालियां और थप्पड़ भी हैं। ड्यूटी पर पहुंचते समय कुछ मिनट लेट होने का मतलब जुर्माने तथा गैर हाज़िरी है। एक गैर हाज़िरी के बदले तीन दिन का वेतन काटने का नियम है। यह मारूति सुज़ूकी के प्रबंधकों का अनुशसित लेबर (डिसिपलिनड वर्कर) का नमूना है। (और यह नमूना सिर्फ यहीं पर ही नहीं है)। इसके अतिरिक्त मारूति सुज़ूकी की एक और विशेषता है। मारूति सुज़ूकी भारत के ही नहीं बल्कि पूरे विश्व स्तर पर सब से ज्यादा और सब से उच्च स्तर के मशीनीकृत प्लांटों में से एक है। यहां कंप्यूटर से चलने वाली बहुत तेज़ ऑटोमैटिक मशीने एवं रोबोट हैं। इस प्लांट में बहुत तेज़ चलने वाली मशीनों-रोबोटों और हाथ से काम करने वाले मज़दूरों को इकट्‌ठा झोंका जाता है। काम का एक हिस्सा ये तेज़ मशीने करती हैं और दूसरा हिस्सा मज़दूर। बेहद तेज़मशीनों का मज़दूरों को मुकाबला करना पडता है। फलस्वरूप मज़दूरों  को बहुत तेज रफ्तार से काम करना पड़ता है। एक मज़दूर से दो मज़दूरों का काम लिया जाता है, उन पर काम का असहनीय बोझ लादा जाता है। इस तरीके से मारूति सुज़ूकी ने २०१० में अपने ही तय किए लक्ष्य से अढ़ाई लाख से भी ज्यादा कारों का उत्पादन किया। पूंजीवाद अपना पेट भरने के लिए (ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए) मज़दूरों को कम से कम वेतन देकर ज्यादा से ज्यादा काम करवाने का तरीका अपनाता है। पिछले दो दशकों से नई आर्थिक नीतियों के पुलंदे द्वारा यह अमल बहुत तेज किया हुआ है। साम्राज्यवादी अपना संकट मज़दूरों और लोगों पर लादते आ रहे हैं। तेज़ ऑटोमैटिक मशीनों को मज़दूरों पर काम का बोझ बढ़ाने के लिए बरतना, उनसे ज्यादा से ज्यादा काम लेना। दूसरे हाथ निर्दयी और अमानवीय काम के हालात पैदा कर वेतन-गुलामी और लूट का शिकंज़ा और कसना, मारूति सुज़ूकी इस सब कुछ की बहुत उमदा मिसाल है और यह नया बाँड इसी मकसद की पूर्ति का एक हथियार है। (नवम्बर-दिसम्बर)




झारखण्ड :
मज़दूरों को उजाड़ने के लिये लहू की होली-
दर्जन मज़दूर हलाक
२७ अप्रैल को झारखण्ड की पुलिस ने औद्योगपतियों के हितों के लिए मज़दूरों पर गोली चलाकर १२ मज़दूरों को हलाक कर दिया। पचास से ज्यादा मज़दूर ज़ख्मी हो गए, जिनमें से कई मज़दूरों की हालत गंभीर बनी हुई है। यह खूनी साका धनबाद में रचाया गया, जहाँ कोयला खानों के मज़दूर काफी समय से उन्हें उजाड़ने की कोशिशों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। ये मज़दूर दशकों से मज़दूर कलोनी में बनी अपनी झोपड़ियों में रहते आ रहे हैं। अब सरकार ये ज़मीन खाली करवा कर कंपनियों को सौंपना चाहती है। मज़दूरों की तरफ से इस कोशिश का ज़ोरदार विरोध किया जा रहा है। फायरिंग के बाद १०० से अधिक मज़दूर गिरफ्तार कर लिए गए तथा मज़दूरों की रोषपूर्ण आवाज़ को कुचलने के लिये सारे इलाके में करफ्यू लगा दिया गया। ट्रेड यूनियन संगठनों की तरफ से २९ अप्रैल को इस घिनौने ज़बर के खिलाफ झारखण्ड बन्द का ऐलान किया गया, जिसका कुछ राजनीतिक पार्टियों की तरफ से समर्थन किया गया।
इस खूनी घटना से एक बार फिर ये बात ज़ोरदार रूप में सामने आती है कि शासक, अत्याचारी राज्य की अन्धी बेलगाम, ताकत के ज़ोर पर मज़दूर-दुश्मन नीतीयाँ थोपने के मार्ग पर चल रहे हैं। इन हमलों से टकराने के लिए और मज़दूरों के हितों की रक्षा के लिये शक्तिशाली, विशाल, जुझारू और एकीकृत मज़दूर लहर के निर्माण की आवश्यकता है।
(मई-जून)

लुधियाना :
औद्योगिक जगत की बेचैनी
लुधियाना में औद्योगिक जगत के लिये मार्च महीने की शुरुआत बेचैनी तथा गुस्से की मिलीजुली प्रतिक्रिया से हुई। केन्द्र सरकार की तरफ से पेश किये गए बजट में जब सम्पूर्ण औद्योग जगत पर दस फीसदी एक्साईज़ डयुटी लगा दी तो सारा औद्योग जगत कांप उठा। उन्होंने भिन्न-भिन्न पार्टियों और नेताओं तथा संसद सदस्यों के पास जाकर शोर-शराबा किया। जब हर तरफ से लारे ही मिले तो उन्होंने संघर्ष का मार्ग चुन लिया। ४ मार्च २०११ को हिन्दुस्तान बन्द के आह्वान को जिस प्रकार साईकिल, ऑटो, हौज़री, टैक्सटाईल, सिलाई मशीन, फरनस, रैडीमेड्‌ज़ व्यापारियों तथा होटल औद्योग ने लुधियान में बेमिसाल ढंग से इस दिन सम्पूर्ण औद्योग के सैंकड़ों मालिकों तथा हज़ारों मज़दूरों ने दरेसी मैदान, ऐक्साईज़ दफ्तर के सामने तथा माधोपुरी इलाके में तीन विशाल रैलीयाँ कीं। केन्द्र सरकार की अर्थीफूँकी गईं और सड़कें जाम की गई। लगातार जनतक-ऐक्शनों के बाद १४-१५ मार्च को हड़ताल की। इस दिन सारे के सारे औद्योगों की मशीने बन्द करके, बहादरके रोड़, दाना मन्डी में किये गए विशाल प्रदर्शन व रैली का नज़ारा देखने लायक था। जिसमें बड़े-बड़े लीडर मंच की बजाय नीचे ज़मीन पर बैठे हुए थे। केन्द्र सरकार ने संघर्ष का दबाव माना है। चाहे सिर्फ १.५ प्रतिशत टैक्स ही घटाया है। जिस प्रकार औद्योगपतियों ने मज़दूरों को बड़े स्तर पर इस संघर्ष में शामिल किया है, जिस प्रकार अर्थियां फूंकने तथा सड़कें जाम करने के संघर्ष-रूप अपनाएँ हैं, ये छोटे औद्योगपतियों के बढ़ रहे संकट के संकेत हैं।
साम्राज्यवादी दिशा निर्देशित आर्थिक नीतियों को खुलेआम अपनाने के कारण १९९१ से छोटे औद्योगपतियों को बर्बादी के मूँह में धकेला जा रहा है। व्यकितगत छोटे औद्योगपतियों की बर्बादी के बाद सामूूहिक बर्बादी की कोशिशें भी हुईं हैं। २००८ में लुधियाना के जनता नगर, शिमलापुरी इलाकों की छोटी फैक्ट्रियों को, रिहायशी आबादी की आड़ में बन्द करने के ऐलान किये गए। जब औद्योगपतियों ने मज़दूरों को साथ लेकर संघर्ष का रास्ता अपना लिया तो ये ऐलान वापस लेने पड़े। २००९ में प्रदूषण रोकने के बहाने सरकार ने सम्पूर्ण डाइंग औद्योग पर हमला बोल दिया। कई फैक्टि्रयों को ज़बर्दस्ती सील कर दिया। जब गुस्साकर औद्योगपतियों ने ज़बर्दस्त संघर्ष का मार्ग चुना तो सरकार झुक गई। उन्हें औद्योगपतियों के साथ समझौता करना पड़ा। ये दो घटनाएँ सरकार की छोटे औद्योगपतियों के विरोध की नीति तथा रवैये को स्पष्ट करती हैं।
छोटे औद्योगपतियों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जैसे मंहगी बिजली, बिजली की नाम मात्र सप्लाई, हफ्ते में दो-दो, तीन-तीन दिनों के कट, जो महीनों तक लगातार चलते रहते हैं और लेबर, विशेष कर प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी। यदि सरकार की नीयत ठीक हो तो उपरोक्त समस्याएँ हल हो सकती हैं। इस के साथ-साथ कच्चे तथा तैयार माल की कीमतें पहले तय करने, टैक्स घटाने तथा छोटे औद्योगपतियों को सस्ते कर्ज़ों दिलवाने से छोटे औद्योग को तबाह होने से बचाया जा सकता है। पर सरकार साम्राज्यवादियों के साथ जुड़े हुए बड़े पूंजीपतियों का पक्ष लेती है। छोटे औद्योगपतियों के प्रति उसका रवैया नकारात्मक है। इसलिए छोटे औद्योगोपतियों को अपने संगठन बनाकर संघर्षों की तैयारी करनी चाहिए। अपने संकट का बोझ मज़दूरों के कंधों पर डालने की बजाय उसके साथ अपने विरोधी टकरावों को हल करते हुए उन्हें अपने संघर्षों में शामिल करने की कोशिशें करनी चाहिए। उपरोक्त सरगर्मियों की घटनाओं ने यह दिखाया है कि जब भी मज़दूरों को साथ ले कर औद्योगपतियों ने संघर्षों का मार्ग अपनाया है तब सरकार घबरा जाती है। मज़दूर वर्ग को चाहिए कि इन छोटे औद्योगपतियों के साथ एकता तथा संघर्ष का रिश्ता कायम करें, अपने हितों की रक्षा के लिए डटकर संघर्ष करें। इसके साथ ही मज़दूरों को साम्राज्यवादियों तथा उनके वफादार पूँजीपतियों के खिलाफ छोटे औद्योग के न्यायपूर्ण संघर्षों की हिमायत भी करनी चाहिए। ऐसा करने के लिए बुनियादी महत्वता वाली बात यह है कि मज़दूर वर्ग स्वयं इंकलाबी राजनैतिक ताकत बनकर उभरे। मज़दूर वर्ग की भूमिका की अनुपस्थिति में बड़े पूंजीपतियों की अधीनगी की गिरफ्त से आज़ादी की छोटे औद्योगों की इच्छा किसी भी किनारे नहीं लग सकती।
(मई-जून)

छोटी पावरलूम फैक्ट्रियों में मज़दूर हलचल
-हरजिंदर सिंह
इस बार फिर पिछले साल की तरह सितंबर-अक्तूबर में लुधियाना की पावरलूम की छोटी फैक्ट्रियों में व्यापक और लंबे समय तक हलचल हुई है। जो अभी भी किसी न किसी रूप में जारी है। टैक्सटाइल मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में शहर के पिछले वर्ष के विभिन्न संघर्ष केंद्रों और अन्य नए इलाकों में एक के बाद एक लगभग १५० टैक्सटाईल मिलों के २५०० कारीगरों ने हड़ताल करके उस समय काम ठप्प कर दिया, जब मालिकों ने मज़दूर मांगे मानने से इन्कार कर दिया और श्रम विभाग के अधिकारियों ने मालिकों के खिलाफ बनती कार्यवाई करने की बजाय मज़दूरों के थकाने और लटकाने का रुख़ धारण कर लिया। मज़दूरों के जगह-जगह रोष प्रदर्शन, लेबर अधिकारियों के दफ्तरों के आगे धरने, प्रदर्शन रैलियां और घिराव जैसे ऐक्शन होने लगे। मालिकों का संगठन और लेबर अधिकारी मज़दूरों के न्यायसंगत संघर्ष को दबाने के लिए उन्हें झूठे केसों में फंसाने और समाचार पत्रों के विज्ञापनों द्वारा बदनाम करने के कमीने हथकंडों पर उतर आए। मज़दूर एकता और दृढ़ भ्रात्री समर्थन के बलबूते पर इन कमीने हथकंडों को फेल करने के साथ साथ संघर्ष को दृढ़ता से अंत तक चलाया गया और कुछ मांगों की प्राप्ति की गई है।
अन्य उद्योगिक मज़दूरों की तरह छोटे पावरलूम मिलों के मज़ूदर भी मालिकों की अंधी लूट और अत्याचार के शिकार हैं। अमानवीय दशा में जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर हैं। कारखानो में कम से कम लेबर कानून भी लागू नहीं हैं। न्यूनतम वेतन स्केल और ८ घंटे का काम दिन (वर्किंग-डे) लागू नहीं। फैक्ट्री का कारीगर होने का सबूत पहचान-पत्र, हाज़िरी कार्ड, ई.एस.आई, प्रॉविडेंट फंड, सालाना बोनस, छुटि्‌टयां वगैरा लागू नहीं। कठिन और बुरी काम-हालतों में अक्सर दुर्घटनाएं हो जाती हैं। मज़दूर ज़िंदगी भर के लिए नकारा हो जाते हैं या उन्हें अपनी जान से हाथ धोने पड़ते हैं। मज़दूरों से दुर्व्यवहार और मारपीट के अलावा दुर्घटनाग्रस्त मज़दूरों का मुआवज़ा भी हज़म कर लिया जाता है। पिछले वर्ष संघर्ष द्वारा पीस रेट में कुछ बढ़ोतरी करवाई गई थी, परन्तु अंधाधुंद बढ़ती महंगाई से असल वेतन में कमी आई है। इसके अतिरिक्त वर्क लोड की गंभीर समस्या है। यह सभी मामले बार-बार संघर्ष फूटने का कारण बनते हैं।
पिछले साल कारखाना मज़दूर यूनियन ने पावरलूम इंडस्ट्री-क्षेत्र में फैलते हुए विजयी संघर्ष करने के पश्चात्‌ व्यवसाय और समूचे वर्करों के प्रतिनिधियों पर आधारित टैक्सटाइल मज़दूर यूनियन का गठन किया था। उसी समय से ही यूनियन को मजबूत और सुदृढ़ करने का अमल जारी था। इस वर्ष से योजनाबद्ध ढंग से संघर्ष लड़ने के लिए साप्ताहिक मीटिंगों के पश्चात्‌ १४ अगस्त को मज़दूरों की बड़ी एकत्रता बुलाई गई। जिसमें ५०० मज़दूर शामिल हुए। मांगों-मसलों पर चर्चा करने के पश्चात्‌ एक मांग पत्र तैयार करने के बाद अपनी-अपनी फैक्ट्री के मालिकों को, लेबर विभाग एवं अन्य संबंधित अधिकारियों को देने का फैसला हुआ। मांगें ना मानने पर कामकाज ठप्प करके हड़ताल पर जाने का फैसला कर लिया गया। मांग पत्र में महंगाई में बढ़ोतरी के अनुसार पीस रेट में २५ प्रतिशत बढ़ोतरी, ई.एस.आई., कार्ड, ८.३३ प्रतिशत बोनस, छुटि्‌टयां, दुर्घटना से बचाव के लिए फैक्ट्री के अंदर सुरक्षा प्रबंध, पक्के रजिस्टर पर हाज़िरी, पहचान-पत्र, कच्चे माल की कमी, बिजली कटौती आदि के कारण फैक्ट्री बन्द होने की स्थिति में मज़दूरों को हाज़िर मान कर प्रतिदिन वेतन ८ घंटे के ३०० रुपए देने आदि मांगे उठाई गईं। कई मालिकों ने मांग पत्र पकड़ कर फाड़ दिए, कईयों ने लेकर रख लिए, ध्यान नहीं दिया। ९ सितंबर को सहायक लेबर कमिश्नर, डिप्टी डायरैक्टर ऑफ फैक्ट्रीज़, ई.पी.एफ, कमिश्नर, ई.एस.आई. वगैरा को मांग पत्र देकर कानूनी सुविधाएं लागू करवाने की मांग की गई। लेबर विभाग ने १४, २१ और २९ सितंबर को मालिकों को बुलाया। मालिकों ने लेबर कानून तो क्या लागू करने थे, उन्होंने लेबर विभाग के बुलावे की भी परवाह नहीं की। मालिकों के अड़यिल रवैये के खिलाफ २२ सितंबर को ८५ फैक्ट्रियों के मज़दूरों ने हड़ताल करके पुड्डा ग्राऊंड चंडीगढ़ रोड़ पर धरना लगा दिया। अन्य विभिन्न फैक्ट्रियों के मज़दूर भी हड़ताल करके धरने प्रदर्शन में शामिल होने लगे। इस हड़ताल का असर उन क्षेत्रों में भी पड़ा जिन्होंने पिछले वर्ष सी.टी.यू. पंजाब से संबंधित लाल झंडा टैक्सटाईल एंड हौजरी मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में संघर्ष लड़ा था। ताजपुर रोड पर गीता कालोनी, महांवीर कलोनी, पुनीत नगर आदि की ५०-६० फैक्ट्रियों के मज़दूर भी करवटें लेने लगे। इस क्षेत्र से २०० मज़दूर ज़िला कचहरी में सांझा ऐक्शन के लिए पहुंचे। १८ अक्तूबर को फिर ५०-६० फैक्ट्रियों के मज़दूरों ने बोनस के मुद्‌दे पर हड़ताल कर दी। ६-७ सौ हड़ताली वर्करों ने श्रम विभाग के आगे धरना देकर अधिकारियों को मांग पत्र दिया। जहां एक तरफ टैक्सटाइल मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में अपनी मांगे मनवाने के लिए मज़दूर लंबी हड़ताल के साथ साथ संघर्ष को विखराने और उलझाने के लिए शुरू किए गए कूड़-प्रचार और झूठे केसों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे, वहीं दूसरी तरफ  ताजपुर इलाके के लीडर बोनस के रूप में कुछ आर्थिक राहत दिला कर मालिकों से सौदेबाज़ी कर गए। अगर ऐसी सौदेबाज़ी न की जाती तो बड़ी प्राप्ति की जा सकती थी, क्योंकि इस समय तक टैक्सटाइल वर्कर यूनियन के न्यायसंगत संघर्ष के समर्थन में जहां मोल्डर ऐंड स्टील वर्करज़ यूनियन के नेतृत्व में मज़दूर लामबंद होकर लगभग हर एक धरने-प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे, वहीं अन्य भ्रात्री संगठनों जैसे- भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां), बी.के.यू. (डकौंदा), किरती किसान सभा, मोल्डर एंड स्टील वर्करज़ यूनियन, लोक एकता संगठन, मज़दूर यूनियन इलाका खन्ना-समराला, पी.एस.यू., नौजवान भारत सभा, पंजाब रोड़वेज़ इम्पलाइज़ यूनियन (आज़ाद), डैमोक्रेटिक इम्पलाइज़ फरंट, इंटक आदि भी संघर्ष कर रहे टैक्सटाईल मज़दूरों के पक्ष में लेबर विभाग के आक्रामक और विलम्बित व्यवहार के विरुद्ध ज़िला प्रशासन के समक्ष हो रहे रोष प्रदर्शनों में शामिल हो कर ज़िला प्रशासन को सांझा मांग-पत्र देकर तुरंत निपटाने की मांग कर रहे थे। आखिर में लंबे, साहसी और दृढ़ता से लड़े जा रहे संघर्ष की बरकतें सामने आने लगीं। दीवाली से कुछ दिन पहले अकेले अकेले मालिक मज़दूरों और उनकी यूनियन के साथ कुछ मांगे मान कर मज़दूरों को काम पर ले जाने लगे। पीस रेट में कुछ बढ़ोतरी, बोनस, हाज़िरी कार्ड, ई.एस.आई. आदि मांगे माननी पड़ीं। आखिर मालिकों को मज़दूर ताकत के सामने झुकना पड़ा और मज़दूरों की मांगे मान कर काम पर बहाल करना पड़ा। (नवम्बर-दिसम्बर)

चन्नोः
पैप्सिको मैनेजमैंट झुकाई
लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए मज़दूर संघर्ष की जीत
-हरजिंदर सिंह
संगरूर पटियाला रोड पर गांव चन्नों में पैप्सिको इंडिया होल्डिंग में रक्त-चूस ठेकेदारी प्रथा के सताए अस्थायी मज़दूरोंने एक बार फिर अपनी एकता और संघर्ष के बल पर १० दिनों की सफल हड़ताल करके प्रबंधकों की मज़दूर विरोधी साजिशों को नाकाम करके जहां अपने आर्थिक हितों की रक्षा की है, वहीं यूनियन बनाने और संघर्ष करने का लेकतांत्रिक अधिकार भी बहाल करवाया है।
पहले भी इस साल के जनवरी महीने में फैक्ट्री के समूचे दिहाड़ी-मज़दूरों ने ४ दिन हड़ताल करके कुछ तात्कालिक गरमाई हुई प्रबल मांगे मनवा लीं थी॥ कुछ मांगे अभी रहती थीं, जैसे कच्चे दिहाड़ी मज़दूरों को रैगूलर करना, सरविस में गैरकानूनी ब्रेक सिस्टम और ठेकेदारी सिस्टम खत्म करके रैगूलर मज़दूरों वाली और लेबर कानून की सारी सुविधाएं लागू करने की मांगे थीं। इस तरह मज़दूरों के काटे गए प्रोविडंट फंड का हिसाब, खाता नं., प्रोविडंट फंड की रसीद प्रति महीना देने, और कंपनी का पहचान पत्र देने जैसी मांगे थीं। इस वजह से मैनेजमैंट तथा ठेकेदारों के विरूद्ध मज़दूरों का क्रोध बढ़ रहा था। पिछले समय से रैगूलर और अस्थायी मज़दूरों के बीच बेहतर तालमेल और सांझे हितों की सूझ-बूझ का फैलाव मैनेजमैंट और ठेकेदारों को चुभ रहा था। मज़दूरों की संगठित होती एकता को चोट पहुंचाने की योजना अनुसार उन्होंने एक ऐसे ठेकेदार को मज़दूरों पर ठोस दिया जो पहले ही वर्करों की नफरत का पात्र था। मज़दूरों का आक्रोश भड़क उठा। उन्होंने अपनी मांगों को लेकर २ नवंबर से संघर्ष का बिगुल बजा दिया। प्रबंधकों ने जवाबी हमला करते हुए दूसरे ही दिन ९ मुख्य अस्थायी मज़दूरों को काम से निकालने, हड़ताली समूचे मज़दूरों का ८ दिन का बेतन काटने और एक इकरारनामे पर हस्ताक्षर करवाने के बाद काम पर लेने के हुकम जारी कर दिए। रैगूलर मज़दूरों के संगठन के कुछ नेताओं को भी नौकरी से निकाल देने का संकेत देकर फैक्ट्री के अंदर दहशत का माहौल बना दिया गया।
मज़दूरों ने मैनेजमैंट की धमकियों की परवाह न करते हुए बड़ी रैली करके संघर्ष जारी रखने का फैसला कर लिया। ऐडहॉक कमेटी चुनी गई। सहायक लेबर कमिश्नर संगरूर और ई.पी.एफ. कमिश्नर बठिंडा और चंडीगड़ को शिकायत-पत्र भेज दिए गए। मैनेजमैंट द्वारा मज़दूरों के रोज़गार, सुविधाएं और अधिकारों पर बोले जा रहे धावे के खिलाफ और अपनी न्यायिक मांगों का समर्थन जुटाने के लिए मज़दूरों की बड़ी टीमे इलाके के गांवों में काफिला मार्च द्वारा लगातार प्रचार करने लगीं। फलस्वरूप गांव के लोग मज़दूरों के समर्थन में आने लगे। गांवों से नई भर्ती और दैनिक वेतन पर युवाओं को काम पर ले जाने के लिए कंपनी द्वारा भेजी गई गाड़ियां खाली वापिस आने लगीं। कंपनी में उत्पादन ४० प्रतिशत कम हो गया। अंदर काम का बुरा हाल हो गया। अंततः वर्करों की एकता और संघर्ष के फलस्वरूप प्रबंधकों को ७ नवंबर का वेतन देना पड़ा और यूनियन प्रतिनिधियों की ५ सदस्य कमेटी से सहायक लेबर कमिश्नर की मौजूदगी में शिकायत को निपटाने के लिए मीटिंग करनी पड़ी। अढ़ार्ई घंटे मैनेजमैंट से बातचीत चलती रही, प्रबंधक मज़दूरों की पुरानी सर्विस, सुविधयों की निरंतरता और पी.एफ. से संबंधित मांगें तो मानते थे, परन्तु चुनिंदा नेताओं और वर्करों को तुरंत काम पर लेने से टाल-मटोल कर रहे थे। जब वर्करों ने बिना शर्त सभी मज़दूरों की बहाली तक संघर्ष जारी रखने का फैसला सुना दिया तो आखिर मैनेजमैंट को कड़वा घूंट पीना पड़ा और ११ नवंबर को सभी मज़दूर बिना शर्त काम पर बहाल करने पड़े।
(नवम्बर-दिसम्बर)

पूँजीवादी आर्थिक हमले के खिलाफ जनतक रोष की अँगड़ाई
डा. जगमोहन सिंह
यूरोपीय देश गंभीर पूँजीवादी संकट में लगातार घिरे रहे हैं। ग्रीस की सरकार द्वारा मई महीने में नई बजट कटौतियों, टैक्सों में बढौतरी, पैंशनों में कटौती तथा निजीकरण संबंधी संसद में एक और नया बिल लेकर आने की खबर ने पूरे देश में एक जबर्दस्त लोक-उभार दोबारा खड़ा कर दिया। पिछले साल बजट कटौतियों के खिलाफ युरोप के भिन्न-भिन्न देशों में रोषपूर्ण हड़तालों में ग्रीस भी शामिल था। अपने संकटों को हल करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों ने ३ लाख से अधिक मज़दूरों को बेरोज़गार कर डाला था। देश के मज़दूर पेंशन भोगी तथा बाकी जनता पहले से ही भारी बेचैनी से गुज़र रही थी। इस नए बिल की खबर ने जलते पर तेल डालने का काम किया। सम्पूर्ण देश में तथा मज़दूरों समेत समाज के प्रत्येक वर्ग में तीखी हलचल मच गई। हज़ारों तथा लाखों की संख्या वाले रोष प्रदर्शनों की लड़ी दर लड़ी चल पड़ी। वाम-पंथी मज़दूर फ्रन्ट के नेतृत्व में मई के अंतिम सप्ताह से शुरू हुए ये रोष-प्रदर्शन पूरा जून महीना जारी रहे। राजधानी ऐथन्ह्णा के अतिरिक्त कम-से-कम तीन दर्जन शहरों में लाखों  मज़दूरों तथा आम लोक इन प्रदर्शनों में शामिल हुए। लोगों ने पुलिस की नाकाबन्दियों को तोड़ा, पुलिस ने साथ मुकाबला किया, पत्थर फैंके, अश्रु गैस का सामना किया, गिरफ्तारियाँ दीं।
प्रचीन यूनानी संस्कृति के चिह्न एक पहाड़ी की फसील पर एक बड़ा बैनर लटकाकर उसपर लिखा हुआ था, ''राजनैतिक ताकत मज़दूरों के हाथ में हो।'' ५ जून के दिन राजधानी ऐथन्ह्णा में हुए रोष प्रदर्शन में ३ लाख से अधिक की गिनती में लोग शामिल हुए। ये ग्रीस में पिछले २० सालों में सब से बड़ी जन सभा थी। लोगों ने सरकार को भंग करने के नारे लगाए। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा फण्ड, यूरोपीयन यूनियन तथा केन्द्रीय युरोपीयन बैंक- तीनों के हमलावर गठजोड़ को देश में से बाहर निकल जाने के ऐलान किए गए। संसद में ये नया बिल लाने के लिए १५ जून को देश में सामान्य हड़ताल हुई। ४८ घण्टे की इस हड़ताल दौरान पूरे देश में रोष प्रदर्शनों का तांता लगा रहा। राजधानी में संसद के सामने एकत्रित हुए लोगों ने संसद भवन का घिराव किया, पुलिस प्रबन्धों को खदेड़कर पुलिस के नाक में दम कर दिया।
जून महीने के अंतिम दिनों तक ग्रीस के लोगों का संघर्ष तीव्र होकर और विशाल पैमाने तक फैल चुका था। सरकार द्वारा गिरफ्तारियाँ जारी थीं। ये संघर्ष जिसका राष्ट्रीय टकराव की लहर जैसा नक्शा दिखाई देता था, इसमें देश के मज़दूरों की बड़ी गिनती के अतिरिक्त समाज के हर वर्ग तथा अलग-अलग राजनैतिक विचारों वाले लोग शामिल हुए हैं। लोगों ने ये महसूस किया है कि उनकी जेबों पर ही कैंची नहीं चल रही बल्कि लोकतंत्र तथा राष्ट्रीय पहचान दाव पर लगी हुई है।
                स्पेन की तथाकथित समाजवादी सरकार द्वारा लम्बे समय की गंभीर आर्थिक मंदी का भार लगातार लोगों पर डालते रहने के कारण, मंदी का भार लगातार लोगों पर डालते रहने के कारण, अमीर पूंजीपतियों को अथाह सुविधाएँ देने वाले कदमों तथा शिखर छू रही बेरोज़गारी ने लोगों के सब्र का पियाला पूरी तरह भर रखा है। मई महीने स्पेन में राज्य स्तरीय तथा नगरपालिका चुनावों के दौरान राजधानी मैडरिड समेत अनेकों शहरों में दस-हज़ारों की गिनती वाले धरने पर ज़ोरदार रोष प्रदर्शन हुए हैं। नौजवानों द्वारा शुरू किए गए इन प्रदर्शनों में और लोग भी शामिल होते रहे। लोगों के रोष को देखते हुए राजधानी मैडरिड के पिउरटा डैल चौंक और अन्य अनेकों स्थानों पर पुलिस दखलअंदाज़ी करते हुए धरने पर बैठे लोगों को उठाने की हिम्मत नहीं कर सकी। राजधानी के इस चौंक में लोगों की गिनती रात को ३० हज़ार तक जा पहुँची थी। १० जून को प्रधानमंत्री द्वारा वेतन सुधार बिल को कैबनिट में पास कर देने के बाद इन रोष-प्रदर्शनों में और तेज़ी आई। १५ जून को बजट के खर्चों में १० प्रतिशत की कटौती के खिलाफ संसद को हज़ारों लोगों ने घेरा हुआ था। संसद सदस्यों का एक हिस्सा हैलीकॉप्टर के माध्यम से तथा कई अन्य सदस्यों को पुलिस की मदद से संसद में पहुँचना पड़ा। लोग गद्‌दी पर बैठी स्पैनिश सोशलिस्ट वर्कर्ह्णा पार्टी तथा विरोधी पॉपूलर पार्टी, दोनों से ही दुखी हैं। वे कह रहे हैं कि कोई भी पार्टी ताकत (सत्ता) में आ जाए वो पूँजीपति वर्ग तथा बैंकों की रक्षा ही करती है, लेकिन मेहनतकश लोगों पर लगातार हमले होते रहते हैं।
इन ही दिनों में पोलैण्ड की सौलिडैरिटी पार्टी द्वारा कम से कम वेतन में बढौतरी करने तथा पैट्रोलियम पर एक्साईज़ ड्यूटी कम करने आदि माँगों को लेकर रोष प्रदर्शन हुए हैं। सौलिडैरिटी द्वारा संकट ग्रस्त ग्रीस समेत अन्य युरोपीयन देशों के मज़दूरों को इन रोष प्रदर्शनों में शामिल होने का आह्वान किया गया है।
जून महीने के अंतिम दिनों में ब्रिटेन के हज़ारों अध्यापक सरकार द्वारा पेंशन सुधारों की स्कीम की बन रही योजना के खिलाफ हड़ताल पर चले गए। इस हड़ताल में इमीग्रेशन कर्मचारी भी शामिल हुए। बर्तानिया में जनतक क्षेत्र के मज़दूर वेतन जाम होने तथा बढ रही बेरोज़गारी का सामना कर रहे हैं। सरकारी बजट कटौतियों द्वारा खड़ी की जा रही समस्याओं के सताए हुए लोगों द्वारा आने वाले दिनों में राष्ट्रीय स्तर के साँझे या तालमेल वाले विरोध प्रदर्शन होने के हालात विकसित हो रहे हैं।
(जुलाई-अगस्त)

साम्राज्यवादी प्रबंध को झटके
इज़राईल की धरती पर वर्ग संघर्ष की तरंगे
विश्वीकरण के हमले का शिकंजा दुनिया भर की जनता को पीड़ित कर रहा है। मेहनतकश और दबे-कुचले लोगों पर भारी आर्थिक बोझ लादा जा रहा है। मुख्य निशाने पर ऐशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका की जनता है। यहां पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं जो बर्दाश्त से बाहर हो रहे हैं। परिणाम स्वरूप , लोगों के संघर्ष अंकुरित रहे हैं। जनता का रक्त चूसने के लिए जिम्मेदार हूकमूतों के खिलाफ आक्रोष बढ़ रहा है। इस हालत में, अमरीकन साम्राज्यवादीयों की सब से वफादार हुकूमतों को भी अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है। कुछ देर पहले अरब देशों के लोगों का जो उभार उठा उसने अमरीकन साम्राज्यवादियों को बड़े झटके दिए। इस उभार की वजह से टयूनिशिया एवं मिरत्र देश की राष्ट्र विरोधी हुकूमतों को गद्दी छोडनी पड़ी।
अब मध्यपूर्व एशिया में अमरीकन साम्राज्यवादियों का सब से वफादार देश इज़राईल तीव्र हो रहे घरेलू वर्ग-संघर्ष की हालत में से गुजर रहा है। फिलिस्तीन की धरती पर जबर्दस्ती बसाया गया इज़राईल एक क्षेत्रीय लट्‌ठमार और पसारवादी ताकत है। अमरीकी साम्राज्यवादियों के क्रांति विरोधी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यह सबसे भरोसेमंद औज़ार का काम करता है। इज़राईल के शासक लोगों को अपने साथ जोडऩे के लिए अंधे जुनून का प्रयोग करते हैं। वे जिओनवादी मान्यताओं को हवा देते हैं। कहते हैं कि इज़राईल यहूदियों का राष्ट्र  है। यह उत्तम है। मध्यपूर्व का प्रभुत्व इस राष्ट्र के बगैर और कौन करेगा? यहूदियों की एकता का यह नारा देश के भीतरी वर्ग विरोधों को नियंत्रण में करने और धीमा करने के लिए इज़राईली शासकों का महत्वपूर्ण हथियार है। परन्तु इस हथियार के प्रयोग के बावजूद बेतहाशा लूट और दबाव के बावजूद वर्ग संघर्ष को उत्साहित करने वाली झलकियां सामने आ रही हैं।
६ अगस्त से संपूर्ण इज़राईल में भारी प्रदर्शन हुए हैं। राजधानी तेलअवीव में अढ़ाई लाख लोगों ने प्रदर्शन किया। अन्य प्रमुख शहरों में भी लोग हज़ारों की तादाद में सडक़ों पर निकल आए। सामाजिक न्याय इन प्रदर्शनों का प्रमुख नारा था। दूसरा नारा था कि इज़राईल की सत्ता भी मिरत्र के होसनी मुबारक की तरह गद्दी छोड़े। इज़राईल में इस नारे का गूंजना बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि होसनी मुबारक के खिलाफ मिरत्र के लोगों के गुस्से में इस बात का अहम रोल था कि वह फिलिस्तीन के खिलाफ इज़राईल के शासकों का साथ दे रहा था। इज़राईल जनता द्वारा होसनी मुबारक के खिलाफ मिरत्र के लोगों के संघर्ष से प्रेरणा लेने का मतलब यही है कि तीव्र हो रहे वर्ग संघर्ष के परिणाम स्वरूप जिओनवाद की जकड़ ढीली पड़ रही है।
इन रोष प्रदर्शनों से पहले १४ जुलाई के तेलअवीव के एक क्षेत्र में युवाओं ने टैंट लगा कर मकानों की बढ़ती कीमतों के खिलाफ रोष प्रदर्शन शुरू किया था। यह एक सामान्य रोष प्रदर्शन लग रहा था। परन्तु बढ़ी हुई महंगाई और बढ़ रही सामाजिक असमानता के चलते लोगों का गुस्सा फूटने को था। इस लिए यह कार्यवाई लोगों के असंतोष के विस्फोट के लिए चिंगारी का रूप धारण कर गई। फलस्वरूप ६ अगस्त को लाखों लोगों ने आक्रोशपूर्ण नारों की गूँज से राजधानी और बाकी शहरों की सड़कें भर दीं।
फेस-बुक पर युवाओं के पनीर के बहिष्कार के फैसले को लोगों का भारी समर्थन प्राप्त हुआ। यह फैसला दूध पदार्थों की बढ़ती कीमतों के खिलाफ लिया गया। इस ऐक्शन का बड़ा ठोस नतीजा निकला। दूध उद्योग को पनीर व अन्य वस्तुओं की कीमत कम करनी पड़ी। लोगों की प्रमुख मांगों में पहले महंगाई और मकानों की उच्च कीमतें शामिल थीं। परन्तु बाद में बच्चों की देखभाल के योग्य प्रबंधों की मांग उठने लगी, प्रसूति एवं बच्चों के पालन-पोषन के लिए महिलायों की छुट्ठियों  की मांग होने लगी। स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण को रद्‌द करने की मांग उठने लगी। बढ़ती राजनैतिक चेतना की अभिव्यक्ति सामाजिक न्याय की मांग से हुई।
इज़राईल के लोग लगातार  शासकों की उन पूंजीपति समर्थक नीतियों की मार झेलते आ रहे हैं जिन्हें नव-उदारवादी नीतियां कहा जाता है। यह नीतियां तथाकथित वामपंथियों और दक्षणिपंथियों दोनों ने लागू की हैं। सार्वजनिक सुविधाओं को काटने और निजीकरण के परिणाम स्वरूप  आर्थिक असमानता तेजी से बढ़े हैं। इज़राईल के ८३ प्रतिशत गरीब बच्चे स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। आठ लाख पचास हज़ार बच्चों में से ७५ प्रतिशत को भूखा रहना पड़ता है। जमीने माटी के भाव बड़े बिल्डरों को दी गई हैं। पहले लगभग सारी जमीन सरकारी थी। पर बिल्डरों ने बहुत सस्ती जमीन हासिल कर मकान बनाए और उन्हें ऊँची कीमतों पर वेचने लगे। इज़राईल में रोष की चिंगारी मकानों की ऊँची कीमतों के खिलाफ धरने से शुरू हुई।
६ अगस्त के विरोध प्रदर्शन के बाद भी हालत शांत न हुई। १३ अगस्त को राजधानी को छोड़ बाकी शहरों में रोष प्रदर्शनों का निमंत्रण दिया गया। इन प्रदर्शनों में एक लाख से भी ज्यादा लोगों ने भाग लिया। अरब आबादी के क्षेत्रों में भी प्रदर्शन हुए। इनमें यहूदियों एवं अरबों दोनों ने भाग लिया।
जब अरब क्षेत्र में प्रदर्शनों की लहर चल रही थी, तो इज़राईल के प्रधान मंत्री बैंज़ामिन नेतनयाहू को यह भम्र था कि यहूदिवादी राष्ट्र अहंकार की जकड़ बहुत शक्तिशाली है। इस आंधी के आगे कोई भी और आंधी नहीं टिक पाएगी। उसने ऐलान किया कि ''मध्य पूर्व के दिल में स्थित सिर्फ एक मेरा देश है जहां कोई आंधी नहीं, जहां कोई प्रदर्शन नहीं। पूरी धरती हिल रही हैं। सिर्फ एक मेरा देश है जो शांत है।''
परन्तु ६ अगस्त के प्रदर्शनों ने यह भ्रम तोड़ दिया। यहूदी राष्ट्र-अहंकार के बैंड बाजे को अनसुना करके इज़राईली जनता हुकूमत के खिलाफ मैदान में आ डटी। सरकार खिलाफ हुए प्रदर्शनों में ९९ प्रतिशत उपस्थिति यहूदी धर्म के लोगों की थी। देश में एक सर्वेक्षण करवाया गया, इसमें जाहिर हुआ कि ९० प्रतिशत लोग सरकार विरोधी प्रदर्शन के पक्ष में हैं। फलस्वरूप लिकुड पार्टी की सरकार को लोगों के लिए १० हज़ार सस्ते घर बनाने तथा कुछ और सुविधायों का ऐलान करना पड़ा। प्रदर्शनकारियों की मांगों पर विचार करने के लिए एक कमेटी का गठन किया गया।
परन्तु इन ऐलानों का परिणाम आक्रोश के शांत होने के रूप में नहीं निकला। सितंबर में एक और बड़े रोष-प्रदर्शन का ऐलान किया गया। नेताओं ने इस प्रदर्शन में दस लाख लोगों की शमूलियत का लक्ष्य रखा है।
इज़राईल के यह प्रदर्शन सामान्य घटनाक्रम नहीं हैं। यह भीतर-भीतर गहरी हो रही शासकों के विरोध की तीब्र भावना को प्रकट करते हैं। यदि इन भावनायों का मेल अरब जनता की साम्राज्य विरोधी भावना से हो जाता है तो यह बहुत अहम घटना-विकास होगा जो विश्वस्तरीय साम्राज्य प्रबंध के खिलाफ लोगों के संघर्षों को जोरदार बल प्रदान करेगा।
(स्तिम्बर-अक्तूबर)

वाल स्ट्रीट ''कब्ज़ा करो अभियान''
साम्राज्यवादी प्रबंध को झटके-पे-झटका
'वाल स्ट्रीट कब्ज़ा करो' आह्‌वान पर १७ सितंबर को अमरीका के मुख्य शहर न्यूयार्क के मनहट्‌टन वित्तीय क्षेत्र के यूकोटी पार्क में लोगों के निरंतर दिन-रात के धरने पर १५ नवंबर की आधी रात को बहुत बड़ी गिनती में अमरीकी दंगा-रोकू पुलिस ने हल्ला बोल दिया। धरने में मौजूद पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया। बाहर से दूसरों को पार्क में जाने से रोक दिया। पुलिस कार्यवाई की तस्वीरें लेने से रोकने के लिए प्रैस के हवाई ज़हाज़ों की उड़ान पर पाबंदी लगी थी। टैंटों में लेटे हुए लोगों पर अंधाधुन्द लाठीचार्ज करके, अनेकों ज़ख्मी कर दिए। २०० मर्द औरतों को गिरफ्तार कर लिया गया और टैंटों का सामान ज़ब्त कर लिया गया।
'वाल स्ट्रीट' न्यूयार्क का मुद्रा बाज़ार है। यह साम्राज्यवादी सल्तनत के, कॉर्पोरेट जगत की लूट की मंडी है। यहां बड़े बड़े पूंजीपतियों और कॉर्पोरेट के दफ्तर हैं। यहां अमरीका समेत दुनिया भर के लोगों की कमाई पर हमला बोलने, अन्धे मुनाफे बटोरने की योजनाएं बनाई जाती हैं। धरनाकारियों ने इसे 'पाप की कमाई' का मंच करार दिया है।
सौ-डेढ़ सौ लोगों द्वारा शुरू किए इस धरने में लोगों की गिनती लगातार बढ़ती गई। यह सैंकड़ों से हज़ारों तक जा पहुंची। बड़ी गिनती में लोग भोजन, कपड़े, बिस्तर, दवाईयां आदि लेकर हफ्तों तक यहां टिकने का फैसला करके धरने में पहुंचने लगे। रैलियों-प्रदर्शनों का सिलसिला लगातार जारी रहा। कुछ ही दिनों में यह 'कब्ज़ा करो' अभियान अमरीका के ७० शहरों तक फैल गया। बेरोज़गार, अर्ध-रोज़गार प्राप्त युवा, विद्यार्थी, मध्यम वर्ग के लोग, जो २००८ के चुनावों में बराक औबामा के चुनाव अभियान की जान थे, बड़ी गिनती में अब इस कब्ज़ा करो अभियान में शामिल या सक्रिय थे।
देश की कई महत्वपूर्ण युनियनें, पढ़े लिखे लोग, बुद्धिजीवी हिस्से, भूतपूर्व सैनिक, हथियारबन्द बलों में शामिल रहे व्यक्ति, पत्रकार आदि धरने के समर्थन में आ चुके थे। धरने की सहायता के लिए लाखों डॉलर, कपड़े, तरपालें, भोजन, बिस्तर, दवाईयां इतनी बड़ी तदात में जमा होने लगे कि संभाल पाना मुश्किल होने लगा। इक्नॉमिक टाईम्ह्णा अनुसार अकेले न्यूयार्क में पांच लाख डॉलर फंड इकट्‌ठा हो चुका था। पिछले कुछ दिनों से संगठित लेबर में इसका समर्थन बढ़ गया था।
कब्ज़ा करो अभियान की तरफ से १५ अक्तूबर को संसार के लोगों को वित्तीय प्रणाली के खिलाफ सड़कों पर निकलने का आह्वान किया गया। इस अह्‌वान को पूरे विश्व में भरपूर समर्थन मिला। इस दिन अमरीका, कैनेडा, मैक्सिको के अलावा युरोप, लातीनी अमरीका, एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपों के ८२ मुल्कों में कोई डेढ़ हज़ार शहरों, कसबों में लोगों ने आक्रोश पूर्ण प्रदर्शन किये। अकेले अम्रीका में सौ से ज्यादा शहरों और छोटे कस्बों में लोगों ने बड़े बड़े प्रदर्शन किये। स्पेन के गावों में भी प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों में ३-४ हज़ार से ५-५ लाख तक लोग शामिल हुए। न्यूयॉर्क शहर में टाईम्ह्णा चौंक तक हुए प्रदर्शन में एक लाख लोग शामिल हुए। स्पेन के गांवों, शहरों और कस्बों मे हुए कुल प्रदर्शनों में दस लाख लोग शामिल हुए। इटली की राजधानी रोम में पांच लाख से ज्यादा लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। इन प्रदर्शनों के दौरान विभिन्न भाषणों में कॉर्पोरेट संसार, वित्तीय संस्थानों, बैंकों और इनके इशारे पर नाचती सरकारों पर तीव्र हमले किए गए। इस अभियान में बार बार यह नारे गूँज रहे थे, ''हम ९९ प्रतिशत हैं।'' ''बैंकों को मिले राहत पैकेज हमें मिली बेरोज़गारी'', ''जंगें खत्म करो, अमीरों पर टैक्स लगाओ।'' ''जंगें ९९ प्रतिशत को नहीं, १ प्रतिशत को मालामाल करती हैं।'' इस तरह इन लोगों ने कॉर्पोरेट संसार और वित्तीय ढ़ांचे से अलगाव और नफरत को प्रकट किया और जंगों के अन्याय युक्त और जनविरोधी चरित्र को उभारा है। इस जनतक आक्रोश के दैरान पूंजीवादी ढ़ांचे से लोगों के ऊबने की झलकें दिखाई दी है। लोग किसी वैकल्पिक प्रणाली की अकांक्षा करने लगे हैं जिस में ''सत्ता लोगों के हाथों में हो।'' अनेकों युवा क्यूबा क्रांन्ति  के नेता ची-गुवेरा की तस्वीरों वाली कमीजें पहन कर १५ अक्तूबर के प्रदर्शनों में शामिल हुए हैं।
१५ अक्तूबर के इन प्रदर्शनों के दौरान अमरीका, इटली, स्पेन आदि कई देशों में विभिन्न स्थानों पर हिंसक कार्यवाईयां हुईं। गाड़ियों को आग लगाने और तोड़-फोड़ की घटनाएं हुईं। हज़ारों लोगों ने पुलिस के साथ झड़पें लीं, गिरफ्तारियां हुईं, अनेकों प्रदर्शनकारी ज़ख्मी हुए। पुलिस दरिंदगी का सामना करते हुए लोगों ने घुड़सवार पुलिस पर व्यंग्यमयी टिप्पणियां कीं, ''इन जानवरों को घोड़ों से नीचे उतारो।''
अमरीकी लोगों में उठा यह रोष, निःसंदेह स्वाभाविक है। इसको किसी भी राजनैतिक पार्टी का समर्थन प्राप्त नहीं है। डैमोक्रेट्‌स ने चुप्पी साध रखी है। रिपब्लिकन चाहते हैं कि यह अभियान जल्दी से जल्दी समाप्त हो। फिर भी डैमोक्रेट्‌स और रिपब्लिकन्ह्णा के कुछ हिस्से इस अभियान में शामिल हैं। पर ७० प्रतिशत लोग हैं जो खुद को आज़ाद सोच वाले समझते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार इस अभियान में ६५ प्रतिशत लोक ३४ साल से कम उम्र के युवा और विद्यार्थी हैं। १५ नवंबर के बड़े पुलिस हमले से पहले, बार-बार गिरफ्तारियों, धमकियों भरे ऐलानों, बिजली पानी की सप्लाई काटने जैसे हथकंडों और न्यूयार्क के मेयर द्वारा धमकियों और पुचकारने का लोगों ने डट कर मुकाबला किया। विभिन्न भाषणों में उन्होंने ऐलान किया कि ''वे हमसे इस पार्क की जगह छीन सकते हैं, परन्तु हमारे आदर्श नहीं छीन सकते। हम मायूस हो कर यहां से वापिस नहीं जाएंगे। हम इस अभियान को जीत की मंज़िल तक ले जाएंगे।''
इंटरनैट पर जारी अपने संदेश में उन्होंने कहा है कि ''इस अभियान ने अमरीकी लोगों में हद से बढ़कर जागृति पैदा कर दी हैं।'' और 'गिरावट में जा रहे' इस अन्यायपूर्ण ढांचे की इस लूट के खिलाफ ''संसार के लोगों की आंखें खोली हैं।''
'कब्ज़ा करो अभियान' को अमरीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया समेत संसार के कुल साम्राज्यवादी देशों के अंदर विशेष तौर पर मिले भरपूर समर्थन का कारण अपने गहरे आर्थिक संकट को सुलझाने के लिए विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा जनसुविधाओं पर लगाए जा रहे भारी कट हैं जिन्होंने आम जनता के जीवन स्तर को बुरी तरह से नीचे गिरा दिया है। २००८ की आर्थिक मंदी के बाद अमरीका इंग्लैंड एवं यूरोप के अन्य देशों में बहुत तेजी से छांटियां हुई हैं। बेरोज़गारी में भारी बृद्धि हुई है। दूसरी तरफ दीवालिया हो चुके बैंकों, वित्तीय संस्थानों को खड़ा करने के लिए सरकारी बजट से करोड़ों-अरबों डॉलरों के राहत पैकेज दिए जा रहे हैं। इसलिए घाटे में गए बजटों का बोझ बेशुमार टैक्सों और पब्लिक सुविधाओं पर बार बार कटौतियों के रूप में लोगों पर डाला जा रहा है। यह हालात लोगों के मनों में जमा हुए क्रोध की चिंगारी को हवा दे रहे हैं। फलस्वरूप, पिछले साल से ही यूरोप के कभी एक कभी दूसरे देश के अंदर जनरोष की चिंगारी फूट रही है। इंग्लैंड, फ्रांस, इटली, स्पेन, पुरतगाल, ग्रीस आदि यूरोप का कोई भी देश इस से बच नहीं पा रहा है। इंग्लैंड के अंदर पिछले दिनों गरीब लोगों का गुस्सा दंगों के रूप में भड़क उठा। लोगों के क्रोध की भड़की हुई इस आग ने आखिर साम्राज्यवादी सल्तनत के मुख्य स्तम्भ अमरीका को अपनी लपेट में ले लिया है।
साम्राज्यवादी संकटों को सुलझाने के लिए विश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण की नई आर्थिक नीतियों की पहले से ही मार झेल रहे और संघर्ष के अखाड़ों में उतरे हुए एशिया, अ्रफ्रीका देशों के लोगों ने विकसित संसार से उठ रही रोष की ज्वाला को खुशआमदीद कह कर इसका स्वागत किया है और १५ अक्तूबर के प्रदर्शनों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है।
ऑस्ट्रेलिया के टूर पर निकले बाराक ओबामा ने स्थानीय प्रशासन को अपने अपने स्तर पर इस हालात से निपटने के लिए कहा है। स्थानीय प्रशासनों ने पिछले दिनों अमरीका के अनेकों शहरों में चल रहे इन कब्ज़ा करो धरनों को पुलिस ताकत के ज़ोर पर खदेड़ दिया था। धरनाकारियों ने पुलिस कार्यवाई का विरोध किया। पुलिस से झड़पें लीं। लाठीचार्ज हुए और सैंकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। १७ नवंबर को कब्ज़ा करो अभियान के दो महीने पूरे होने पर जश्न मनाने की तैयारियों में जुटे हुए धरनाकारियों को १५ नवंबर की आधी रात को हमला करने पहुंची भारी पुलिस फोर्स का सामना करना पड़ा। लोगों को एक बार चाहे पार्क खाली करना पड़ा पर उन्होंने पुलिस हमले का डट कर सामना किया। कड़ाके की ठंड में वे वहां से उठ कर लोअर मनहट्‌टन में जा बैठे। नए हालात से निपटने के लिए योजनाएं बनने लगीं। शर्तों पर मिले अदालती आदेश लेकर अगले ही दिन वे युकोटी पार्क में दोबारा इक्ट्‌ठा हो गए इस पुलिस कार्यवाई ने सारे देश में धरनाकारियों के लिए सहानुभूति और सरकारी प्रशासन के खिलाफ गुस्सा और बढ़ा दिया। फलस्वरूप १७ नवंबर के जश्नों के लिए जोश में बेहिसाब बढ़ोतरी हुई। वाल स्ट्रीट को जाते रास्तों पर नाकाबंदी एवं न्यूयार्क के विभिन्न ज़मीनदोज़ (सब-वेज़) पर जाम लगाने के प्रोग्राम बनाए गए। दस-दस हज़ारों से भी ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे। पुलिस को जगह जगह सैंकड़ों लोगों की गिरफ्तारियां और लाठीचार्ज करने पड़े। प्रदर्शनकारियों ने ऐलान किए, ''उन्होंने अपनी ताकत दिखाई है हम अपनी ताकत दिखा रहे हैं।'' और, ''हमारा मिशन लाखों करोड़ों लोगों का सांझा मिशन है, हम ९९ प्रतिशत ऐसे संसार में रहना चाहते हैं जो हम सबका सांझा संसार हो न कि १ प्रतिशत उन लोगों का जिन्होंने दौलत और सत्ता पर कब्ज़ा जमाया हुआ है।''
(नवंबर-दिसम्बर)

नए रूप में जारी रह रहा 'कब्ज़ा करो' अभियान
दिनों दिन बढ़ रही ठंड के प्रकोप और धरनों पर बार-बार पुलिस के हमलों के बावजूद दस-दस हज़ारों लोगों द्वारा अमरीका के विभिन्न शहरों में कब्ज़ा करो अभियान जारी रह रहा है। युरोप के इंग्लैंड, ग्रीस, नीदरलैंड आदि देशों में लोगों के आक्रोश की तीव्र लहरें रुकने का नाम नहीं ले रहीं।
कब्ज़ा करो अभियान के आयोजकों ने इस अभियान को अब नई दिशा देनी शुरू की है। इस को ''घरों पर कब्ज़ा करो'' का नाम दिया है। लोगों के बड़े बड़े समूह उन घरों पर कब्ज़ा जमा लेते हैं जिनको बैंकों ने ताले लगा दिए हैं। अमरीका के दो दर्जन से ज्यादा शहरों में लोगों ने ऐसे जनतक ऐक्शनों द्वारा घर के मालिकों को वहीं बिठा कर उनके घरों पर डेरा जमा लिया है ताकि पुलिस उन्हें वहां से उठा न सके। लोग कहते हैं, ''हम हिंसक नहीं हैं, सिर पर छत होना हर मनुष्य का जन्म्सिद्ध अधिकार हैं।''बैंक बहुत मुश्किल हालात में फंसे हुए हैं, करें तो आखिर क्या करें!
१५ अक्तूबर को संसार के लोगों को दिए आह्‌वान को मिले भरपूर समर्थन से उत्साहित हुए, ''कब्ज़ा करो'' अभियान के आयोजकों ने अब १० दिसंबर को, ''मानव अधिकार दिवस'' पर ऐसा ही एक और आह्‌वान किया है। उन्होंने विभिन्न देशों के लोगों को १० से १७ दिसंबर के बीच अपने अपने ढंग से यह दिन मनाने का आह्‌वान करते हुए यह ऐलान किया है, ''इस धरती की सरकारों को लोगों के लिए काम करने चाहिए, न कि लोगों के खिलाफ।'' अनेकों देशों के लोगों का आह्‌वान को समर्थन मिल रहा है।
(नवंबर-दिसम्बर)

''सुर्ख रेखा'' कम्यूनिसट क्रांतिकारी पब्लिकेशन है, जो लोगों को सामाजिक क्रांति की ज़रूरत एवं महत्व के बारे में जागृत करने के लिए सक्रिय है। ''सुर्ख रेखा'' इस पब्लिकेशन की तरफ से पंजाबी में निकाली जाने वाली दो मासिक पात्रिका है। इस पैम्फलिट में दी गई टिप्पणियां ''सुखऱ् रेखा'' के मई-जून, जुलाई-अगस्त, सितंबर-अक्तूबर और नवम्बर-दिसम्बर २०११ के अंकों में से ली गई हैं।

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