कुछ तकनीकी कारनों की वजह से ''सुर्ख रेखा'' अब ''सुर्ख लीह'' कहलायेगा। यह ऐक कम्यूनिसट क्रांतिकारी पब्लिकेशन है, जो लोगों को सामाजिक क्रांति की ज़रूरत एवं महत्व के बारे में जागृत करने के लिए सक्रिय है। ''सुर्ख लीह'' इस पब्लिकेशन की तरफ से पंजाबी में निकाली जाने वाली दो मासिक पात्रिका है।
Thursday, December 10, 2015
1) हरित क्रांति के मैदानों की फसलें
हरित क्रांति के मैदानों की फसलें
सफेद मच्छर एवं आत्महत्याएँ
-डैस्क से विशेष रिपोर्ट
कृषि संकट
तथा कजऱ्ा पीडि़त किसानों की आत्महत्याएँ खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। ताज़ा
कहर सफेद मच्छर के हमले का है। 40-50 हज़ार रुपए प्रति एकड़ ज़मीन ठेके पर लेकर
खेती करने वाले किसानों की तो इसने कमर ही तोड़ डाली है। अच्छी फसल होने से तीन
महीने के रोज़गार की खेत मज़दूरों की उम्मीद भी धूल-धुसरित हो गई है। इस हमले की
लपेट में आई भूमि 5.40 लाख एकड़
है। बर्बाद हुई फसल 2 लाख एकड़ है। नुक्सान का अंदाज़ा 700 करोड़ का है।
किसान खेत मज़दूर संगठनों के अंदाज़े इस सरकारी आंकड़े से कहीं ऊँचें हैं।
किसानों ने
छिड़काव करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, परन्तु मच्छर बेरोक बढ़ता गया है। बेअसर
छिड़कावों का व्यापार करने वाले दोषियों में जर्मन बहुराष्ट्रीय कंपनी बायर क्राॅप
का नाम आता है। भारत में इसकी शाखा बायर कृषि विज्ञान के नामाधीन काम करती है।
इसकी कीटनाशक दवाई ओबेराॅन की सिफारिश केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड ने की है। पंजाब
कृषि विभाग ने इसकी 90 हज़ार लीटर सप्लाई को यकीनी बनाया है। इस पर 33 करोड़ रुपए खर्च
किए हैं। 50 प्रतिशत
सब्सिडी दी है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से इसकी सिफारिश करवाई गई है। कृषि विभाग
के निदेशक मंगल सिंह संधू अनुसार सब्सिडी भारत सरकार के दिशा निर्देशों पर दी गई
है। कृषि विभाग ने सड़कों पर पुडि़याँ बेचने वाले नीम-हकीमों की भांति इसकी ‘सफलता‘ का प्रचार किया है।
बड़े स्तर पर जनसंपर्क अभियान चलाया है। परन्तु सारे वादे तथा दावे निरे धोखे का
माल साबित हुए हैं।
भारतीय
सरकारों तथा विभागों ने इस बात को पूर्णतः नज़रअंदाज़ कर दिया कि यह बहुराष्ट्रीय
कंपनी संसार भर में बदनामी के दागांे से भरी हुई है। इसके बोर्ड मैंबरों पर हिटलर
के गैस चैंबरों को ज़हरीली गैसों की सप्लाई करने के मुकद्दमे चले थे। नशेडि़यों
तथा मरीज़ों के वजर््िात खून से तैयार की गईं इसकी दवाइयों से हज़ारों मौतें हुईं
हैं। 2006 में
हज़ारों जानें जाने के बाद इसकी एक और दवाई टारसीलोल पर पाबंदी लगाई गई। इसकी एक
और गर्भनिरोधक दवाई के खिलाफ जर्मनी की अदालत में 9000 मुकद्दमे दर्ज
हैं। इसके उपयोग के कारण सैंकड़ों पूर्णतः स्वस्थ औरतों की जानें जा चुकी हैं। इस
प्रकार यह कंपनी मुनाफे की अमानवीय पूँजीवादी हवस का अत्यंत घिनौना नमूना बनी हुई
है। सब कुछ जानते-समझते हुए भी इस अपराधी कंपनी को खुली छूट देकर शासकों ने
किसानों तथा अन्य भारतीय जनता के साथ दुश्मनों वाली भूमिका निभाई है।
आजकल यह
कंपनी बीजों तथा कीटनाशकों की मंडी में दनदनाती घूम रही है। फसलों की पैदावार, संभाल, ढ़ुलाई, खोज तथा
जड़ी-बूटियों के क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने की ओर बढ रही है। सन् 2013-14 में बीजों की
बिक्री से एक अरब से ऊपर कमा चुकी है।
बायर एवं
इसके कीटनाशक आॅबेरोन का मामला पहला, भिन्न व एक मात्र मामला नहीं है। कृषि
रसायनों तथा बीजों का कारोबार करने वाली साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के
कुकर्मों की लड़ी बहुत लंबी एवं पुरानी है। ‘हरित क्रांति‘ ने बहुत समय पूर्व
ही भारत को ज़हरीली व खतरनाक कृषि रसायनों की सबसे बड़ी मंडी बना दिया था।
ब्रिटिश
ऐग्रो कैमीकल ऐसोसीएशन फाॅर आॅक्सफाम ने 45 वर्ष पूर्व एक सर्वेक्षण के आधार पर बताया
था कि अमरीका से जिन कीटनाशकों का पिछड़े देशों को निर्यात किया जा रहा है, उनमें से तीस फीसदी
स्वयं अमरीका में प्रतिबंधित हैं। इंग्लैंड भी अपने देश में प्रतिबंधित 11 कीटनाशक पिछड़े
देशों में बेच रहा था। परन्तु इसके बावजूद भारतीय शासक हमारे देश में इन कीटनाशकों
की पैदावार, आयात तथा
प्रयोग में वृद्धि करते गए। इस प्रकार 1982 तक भारत में प्रतिबंधित कीटनाशकांे की
मात्रा इनके उपयोग के 70 फीसदी तक पहुँच गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा यह कीटनाशक
ज़हरीले तथा खतरनाक घोषित किए गए थे। इन प्रतिबंधित कीटनाशकों में डी.डी.टी., बी.एच.सी., पैराथीन, हैपचारल, लिंडेन, बी.डी.सी.पी., 4-डी हर्बीसाईट, पैराकफ तथा
टैक्साफाईन शामिल थे। डी.डी.टी. से 20 गुना ज़हरीली पैराथीन का 100 मिलीग्राम अर्थात्
एक ग्राम का 10वां भाग
चमड़ी पर लगते ही एक किलो के चूहे को मार सकता है।
इसके
अतिरिक्त रिव्यू अधीन संदिग्ध कीटनाशकों की एक और लंबी संपूर्ण सूची तैयार की गई
थी। विश्व स्वास्थ्य संस्था ने इन्हें ‘‘अत्यंत खतरनाक‘‘ व ‘‘अति खतरनाक‘‘ श्रेणियो में शामिल
किया था। इनमें एलडीकार्ब, कारबोफ्रान, कलोरोफैनफिनफास, डाईक्लोरोविष, ऐंडोसलफान, मोनोक्रेटोफास, आॅक्सीडेमेटिन, मिथाईलफौरेट, फासफोमीडिन तथा
पायरमफाॅस इथाईल शामिल थे।
फिर भी
भारत में इनकी 510 लाख
किलोग्राम सालाना खपत हो रही थी। यह विश्व भर में कीटनाशकों के प्रयोग की सबसे
ऊँची मात्रा थी। यह चर्चा ज़ोरों पर थी कि ये कीटनाशक मानव स्वास्थ के लिए भीषण
अभिषाप हैं। हर प्रकार के भोजन पदार्थों, जल, दुधारू पशुओं, मछलियों, मुर्गियों, मानवीय अंगों तथा
लहू तक में, इनके
खतरनाक हद तक ऊँचे अंशों की बड़े स्तर पर प्राप्त नमूनों द्वारा पुष्टि हो रही थी।
दूसरी तरफ
इन कीटनाशकों के कृषि के लिए आफत बन जाने के बड़े सबूत सामने आ रहे हैं। यह
हानिकारक कीड़ों को खाने वाले जीव जंतुओं, पँछियों तथा मित्र कीड़ों का सफाया किए जा
रहे हैं। पर फसलों के दुश्मन कीड़ों तथा नदीन में इनसे लड़ने की क्षमता विकसित हो
रही है। कीड़ों के लश्कर बड़े हो रहे हैं। 1982 तक कीड़ों की ऐसी 15 किस्में ध्यान में
आ चुकी थीं जिन पर हर प्रकार के रसायण बेअसर हो रहा थे। 20 ऐसी किस्मों का
पता चल चुका था जो एक कीटनाशक के संपर्क में आते ही उससे मिलते-जुलते अन्य
कीटनाशकों के विपरीत मुकाबले की क्षमता (क्राॅस रजि़स्टेंस) विकसित कर लेते हैं।
बाज़ार में महंगेे से महंगे एवं नए से नए कीटनाशकों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों का
बोलबाला था। परन्तु खेतों में सफेद मक्खी, अमरीकन कीड़े, लीफ-वर्म, बाल-वर्म तथा
प्लांट हाॅपर जैसे कीड़ों का बोलबाला था। गेहूँ तथा धान की फसलों पर कीड़ों की 18 अन्य नई किस्मों ने
हल्ला बोल दिया था।
बिमारियों
के लिए छिड़काव के नतीजे भी कुछ अलग नहीं थे। पंजाब-हरियाणा में गेहूँ का 30 से 40 फीसदी रकबा फलेरी
माईनर की लपेट में था। करनाल बँट ने दूसरे दौर का हल्ला बोल दिया था। बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के बिना परखे रसायणों की भूमिका चर्चा में आ रही थी। फलेरी माईनर के
मुकाबले के लिए प्रयुक्त रसायणों की वजह से गड़बड़ हो गई थी। पंजाब कृषि
विश्वविद्यालय ने ग्रैमीनन तथा आईसोप्रोटोन का छिड़काव बंद करने की हिदायत कर दी
थी। पंजाब सरकार द्वारा 300 नदीननाशकों के टैंडर जारी होने थे। बिना परखे नदीननाशकों पर
पाबंदी के खिलाफ बहुराष्ट्रीय कंपनियों, डीलरों तथा स्थानक उत्पादकों द्वारा पंजाब
सरकार पर दबाव डाला जा रहा था। पहले रसायणों का आयात केवल हिंदुस्तान इंसैक्टीसाइड
लिमिटिड के माध्यम से हो सकता था। परन्तु अब केंद्र सरकार ने पंजाब के स्थानक
उत्पादकों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों से आयात की गई सामग्री के साथ यह नदीननाशक
दवाइयाँ तैयार करने की अनुमति दे दी थी। परन्तु अभी भी विश्वविद्यालय की सिफारशों
के पालन की मजबूरी पंजाब सरकार के लिए रुकावट बन रही थी। अतः पंजाब कृषि
विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की जबरन जुबान बंद कर दी गई। विश्वविद्यालय ने
साजि़शी पलटी मार कर उन्हीं बिना परखे हुए रसायणों के ग्रुप के प्रयोग की सिफारिश
कर दी जिसे एक साल पहले उसने रद्द कर दिया था। इस प्रकार हिंदुस्तान इंसैक्टीसाइड
लिमिटिड को दरकिनार करके बिना परखे हुए रसायण जनता पर थोप दिए गए। (देखें-इंडियन
एैक्सप्रैस, 30 नवंबर,1982 तथा जफरनामा फरवरी,1983)
यह उस समय
की बात है जब इंदिरा गांधी ने समाजवाद की नकली रट लगाना छोड़ दिया था और आयात
उदारता के नए दौर की डुगडुगी पकड़ ली थी। अतः कीटनाशकों के आयात तथा पैदावार के
लिए देश के दरवाज़े और चैड़े किए जा रहे थे। पुराने अथवा वैकल्पिक नामों के अधीन
इनके आयात एवं पैदावार में तेज़ी आ रही थी। ( जिसकी रफ्तार 90वें के विश्वीकरण
तथा आथर््िाक सुधारों के अगले दौर में और अधिक तेज़ हो गई थी।)
80 के दशक
में बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा इनके कीटनाशकों के बारे में दो बातों के कारण संसार
भर में धिक्कारपूर्ण चर्चा हुई। इन कीटनाशकों ने सूडान में ‘गेज़रा‘ नामक कपास पट्टी की
खेती को तबाह कर दिया था। भारत में भी इन कीटनाशकों का खर्चा फसल के कुल खर्चे के 60-70 फीसदी तक जा रहा
था। जबकि कीड़ांे के हल्ले भयानक होते जा रहे थे। कई कृषि विशेषज्ञों तथा कीट
माहिरों ने भय प्रकट किया था कि भारत के बडे भूमि क्षेत्रों के साथ गेज़रा जैसी
होनी हो सकती है।
दिसंबर 1984 में भोपाल में
अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कारबाईड के कीटनाशकों के प्लांट में से रिसी
ज़हरीली गैस मिथाइल आईसोसाइनेट ने हज़ारों
लोगों की बली ले ली थी। इसने लाखों लोगों को अपने भयानक असरों की लपेट मंे
ले लिया था। इसने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अमानवीय मुनाफाखोरी की व्यापक चर्चा
छेड़ दी।
परन्तु
भारतीय शासक इन अपराधियों के विरुद्ध कुछ करने की बजाय विदेशी पूँजी का उत्साह
कायम रखने की राष्ट्रध्रोही रट लगाते रहे। यह हैरानी की बात नहीं है कि 2 वर्ष पूर्व उसी
ऐंडोसलफान रसायण द्वारा केरल के किसानों पर कहर ढाए जाने के समाचार आए,
जिस प्रतिबंधित रसायण के प्रयोग के विरुद्ध 45 वर्ष पूर्व भारत
के वैज्ञानिकों ने आवाज़ उठाई थी।
पंजाब एवं
हरियाणा के किसानों तथा खेत मज़दूरों की रोज़ी रोटी पर आॅबेरोन का जानलेवा छिड़काव
शासकों के इस लंबे जन-दुश्मन व्यवहार का ही एक उदाहरण है।
1) a. टिकाने पर चोट
टिकाने पर चोट मारो
किसी भी
संघर्ष की चोट के घेरे को संसदीय सियासत की जरूरतांे तथा वर्तमान ढांचे की सीमा
में बांध कर रखना,
सभी शासक वर्गीय सियासतदानों द्वारा बार-बार बरता जा रहा ढंग
है।
कपास की
खेती की बर्बादी का दोषी पंजाब कांग्रेस तथा ऐसे अन्य हिस्सों द्वारा कृषि विभाग, कृषि मंत्री व बादल
सरकार को बनाया जा रहा है। स्वयं अकाली-भाजपा सरकार कीटनाशक दवाइयों के डीलरों तथा
नकली कंपनियों पर कारवाई कंेद्रित कर रही है। परन्तु दोष किसानों पर मढ़ रही है।
कल को दबाव बढने पर किसी मंत्री को चलता करना एवं उसके स्थान पर किसी चिड़ी सिंह, बाज़ सिंह या बाघ
सिंह को मंत्री बना देना, कोई अनोखा कदम नहीं होगा। परन्तु वास्तव में दोषी वर्गों तथा
उनकी देशद्रोही नीतियों की तरफ उंगली भी नहीं उठाई जाएगी।
कपास की
बर्बादी के मामले में कीटनाशक दवाइयों की संपूर्ण भारतीय मंडी पर हावी
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सरदारी है। कृषि लागत वस्तुओं की समूची मंडी पर विशालकाय
देसी-विदेशी कंपनियों की प्रधानता कृषि क्षेत्र की सच्चाई है। यही कपास की बर्बादी
का आधारभूत कारण है। इन कंपनियों को हावी बनाने वाली राजनीति किसी एक संत्री या
मंत्री की नहीं, संपूर्ण
शासक वर्ग की है। राजसŸाा पर स्थापित पक्ष इसे जी-जान से लागू करता है। राजगद्दी से
वंचित विरोधी इसका नकली विरोध करते हैं। देसी-विदेशी कंपनियों की लूट तीखी होती
है। उनकी तिजोरियां भरती हैं। मेहनतकश किसान जनता कंगाल होती है। ज़मीनों-जायदादों
तथा अन्य पैदावारी साधनों से वंचित होती हैं। सूदखोरों तथा जागीरदारों के पास
धन-दौलत व ज़मीन एकत्रित होती जाती है। कपास की बर्बादी के मुद्दे को लेकर इस
संपूर्ण लूट के जाल को निशाने पर रखना चाहिए। शासक वर्गीय सर्व स्वीकृत सियासत का
प्रतिनिधित्व करतीं मौजूदा सरकारों तथा लुटेरे वर्गों पर निशाना साधना, टिकाने पर चोट
मारना है।
2) फंदे में जकड़ी सांसें
किसान आत्महत्याऐं
सूदखोर कजऱ् के फंदे में जकड़ी सांसें
मोदी सरकार का पिछला एक साल किसानों
की आत्महत्याओं में 20 फीसदी वृद्धि का साल है। यह आत्महत्याएँँ घोर आर्थिक मंदहाली
का नतीजा है जिसने मानवीय रक्त के प्यासे राक्षस का रुप धारण कर लिया है। सूदखोर
कर्जा किसानों की गर्दन पर लिपटा शीर्ष फंदा बना हुआ है। कितने ही फंदों की
छोटी-छोटी रस्सियां मिल कर इस शीर्ष फंदे में सम्मिलित हो जाती हैं। और अधिक मजबूत
हो रहा यह शीर्ष फंदा खेती व खेतों के श्वास हर रहा है।
फ्रंटलाईन
के 4 सितंबर 2015 के अंक में
किसानों की आत्महत्याओं की जो रिर्पोट प्रकाशित हुई है वह सूदखोर कर्जे द्वारा
रक्त चूसने की इंतहा को सामने लाती है। इन मिसालों में आत्महत्याएँ करने वालों के
सिर पर कर्ज तथा ब्याज की 6 से 10 रुपए प्रति 100 रु तक की ली जा
रही ब्याज दरों का जिक्र है। ब्याज दर ब्याज के अंधाधुँद सिलसिले का जि़क्र है। इस
अंधी लूट तथा आत्महत्याओं की वजह से मची हाहाकार के फलस्वरुप कर्नाटक की सरकार को
साहूकारों की गिरफ्तारियों का नाटक रचने के लिए मजबूर होना पडा है।
इतने ऊँचे
ब्याज पर किसानों द्वारा अपनी गर्दन सूदखोर कर्जे के शीर्ष फंदे के आगे कर देने
में चर्मसीमा पर पहुँची आर्थिक मंदहाली की मजबूरी काम करती है। जमीन की कमी इस
मंदहाली की जड़ है। सस्ते बैंक कर्जो की उपलब्द्धता में व्यापक कमी मजबूरियों में
वृद्धि करती है। कई प्रांतों में फ्रंटलाईन द्वारा की गई पडताल दर्शाती है कि कैसे
कर्जे में जकडे़ भूमिहीन तथा कम-भूमिहार किसान जमीन ठेके पर लेने के लिए भारी
कर्जा उठाते हैंै।
खेती खपत
वस्तुओं की बेहद महंगी रकमें अदा करने के लिए साहूकारों के आगे हाथ फैलाते हैं।
कैसे निरोल ब्याज पर पैसा देने वाली सूदखोर जोकों के अतिरिक्त लगभग हर जोंक सूदखोर
बन कर पेश होती है। इनमें बड़ी जमीनों वाले जागीरदार भी शामिल हैं तथा फसलों की
बिक्री के दरमियान थोपे हुए बिचैलिए भी शामिल हैं जिन्हें ’आढतिया’ कहा जाता है।
सूदखोरी के धंघे में कीटनाशक व खादों के डीलर भी शामिल हैं जो किसानों को बंधुआ
खरीददार बनाते हैं। सूदखारी के बल पर वे
किसानों पर मजऱ्ी की कीमतें थोपते हैं। पहला ब्याज काट कर बाकी बची रकम ही
किसानों को खेती खपत पदार्थों के रूप में ही किसानों के हाथ में देते हैं। ऐेसी
परिस्थितियों में मर चुकी फसलें व लुढकीं कीमतें घोर निराशा उत्पन्न करती हैं जो
आत्महत्याओं का कारण बनती हैं। पंजाब में इन दिनों ’सफेद मच्छर’ की वजह से मर चुकीं फसलों के सदमे में
खुदकुशी करने वाले किसानों की बेबसी का कारण ज़मीन की कमी तथा कजऱ् मुख्य रूप से
नज़र आ रहे हैं। इन किसानों ने कजऱ् लेकर ज़मीन के ठेके की बड़ी रकमों की
व्यवस्था की है। परन्तु खत्म हुई फसलों के
साथ ही उनकी जीवन लीला भी खत्म हो गई।
फ्रंटलाईन
की रिर्पोटें यह भी दर्शाती हंै कि कैसे गन्ना,कपास अथवा अन्य
कच्चा माल हड़पने वाले इनका भुगतान रोक लेते हैं तथ इस रकम को कारोबार मुनाफे के
लिए इस्तेमाल करते हैं। दूसरी तरफ किसान आगामी फसल के लिए लाखों का कर्ज़ उठाता
है। कैसे चीनी के ठेकेदार फसल बोने से पहले सौदेबाज़ी द्वारा किसानों को गन्ने की
फसल के बंधुआ विक्रेता बना देते हैं। उन्हें बीज, खाद तथा कीटनाशकों
के बंधुआ खरीददार बना देते हंै। मिल गन्ने की कटाई पर भी कब्जा जमा लेती है। रस से
भरा किसान का गन्ना कब काटा जाएगा, यह उसके बस में नहीं होता। गरीब तथा छोटे
किसान की फसल की बारी सबसे आखिर में आती
है। तब तक गन्ने मुरझाने लगते हैं। गन्ने का वजन व कीमत आधी रह जाती है। फ्रंटलाईन
ने इस दुख से आत्महत्याए्ँ करने वाले किसानों की कहानी बयाँ की है। यह भी बताया है
कि बी‐टी‐ कपास की मंडियों
में इस बार उल्लू बोलते नज़र आए हैं। फसलों की कीमतों में प्रति कविंटल 2,000 रुपए की गिरावट
दर्ज की गई है जबकि काटन कार्पोरेशन मंडियों में दिखाई नहीं पड़ी।
ज़मीन तथा
संसाधनों के भारी अभाव में, छानबीन किए बिना, थोपा हुआ
व्यापारीकरण किसानों के गले का फंदा बन गया है। यह फसली विभिन्नता जैसे मनमोहक
नामों से किसानों पर थोपा गया है। परन्तु आसमान छूती लागत कीमतों ने कजऱ् का
मकड़जाल और मजबूत कर दिया है। ऐसी हालतों में तामिलनाडू के आत्महत्या करने वाले एक
किसान ने सवा चार लाख का कर्ज ले कर पांच एकड़ जमीन ठेके पर ली। सहकारी बैंक से 25 हजार ही मिले। 4 लाख सूदखोर से
लेने पड़े। 12 हजार
महीना ब्याज उतारता रहा। बरसात ने कपास तबाह कर दी तथा जीने की इच्छा भी।
ऐसी
आत्महत्याएँ दर्शाती है कि किस प्रकार भारी ठेका, ब्याज़ तथा उच्च
लागत कीमतें उतारकर कर तैयार की गई फसल की तबाही कम ज़मीनों वाले किसानों के लिए
असहनीय हो जाती हैं। व्यापारीकरण का चक्रव्यूह बहुत सारे पापड़ बेलने को मज़बूर
करता है। बरसात पर निर्भर क्षेत्रों में अधिक जल पर निर्भर फसलों की खेती करवाता
है। ऐसे हालातों में आत्महत्याएँ करने वालों ने पानी की प्यासी फसलों के लिए 6-6 बार गहरे से गहरे
बोर किए। मीलों तक पानी के लिए पाईप दबाए परन्तु मौसम, मंडी, तथा सरकारें सबने
ही दुश्मनी निभाई। खर्चों से कंगाल हुए किसानों की बर्बाद हुईं या मंडियों
में बिखरीं पड़ी फसलों ने सूदखोरों के
घरों में दीये जला दिए परन्तु भूमि पुत्रों के घरों में मातम के अंधेरे फैला दिए।
यह रिपोर्ट
ज़मीन की कमी झेल रहे किसानों के
दुख-दर्दों से घिरे जीवन पर रौशनी डालती है। इन दुख दर्दों के समक्ष बेबसी की हालत
में खेत में खड़ा पेड़ ही ‘मुक्तिदाता‘ बन जाता है। जब
नारियल के पेड़ बेचकर राहत की उम्मीद नहीं रहती तो किसान पेड़ से लटक कर आत्महत्या
कर लेता हैं। कीड़े मारने में असमर्थ रहे कीटनाशक
आत्महत्या के काम आते हैं। जब जिंसों की खरीद मंडी घोर निराशा लाती है तो
खेतों में खड़ी कपास या गन्ने की फसल सूखे डंडे अथवा घास फूस समान दिखने लगते हैं।
किसान इन्हें आग लगा देता है और अपने हाथोें से जलाई इस चिखा में छलांग लगा देता
है। ऐसे ‘हादसे‘ कोई फिल्मी कहानीं
नहीं हैं बल्कि छानबीन के दौरान सामने आए सच्चे विवरण हैं।
दूसरी तरफ
तबाही के खतरे से किसानों की सुरक्षा करने से सरकार ने हाथ खड़े किए हुए हैं। खेती
जिंसों की खरीद मंडी से यह दूर ही रहना चाहती हैं। देश को कपास कारपोरेशन, पटसन कारपोरेशन, फूड कारपोरेशन जैसी
संस्थाओं का अजायब घर बनाने पर तुली हुई्रं हैं। मेहनतकश किसान के लिए मंडी की
मंदी मौसमी आपदा जैसी ही आफत बन गई है। परन्तु उसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है।
मौसमी आपदा से बर्बाद फसल का बीमा नहीं। व्यापारियों के काले जादू तथा विश्व मंडी
की परछाई सदका मंडी में बर्बाद हुई फसल का बीमा नहीं है। आत्महत्याएं दर्शाती हैं
कि गरीब किसान के लिए जीवन बीमा तथा फसली बीमा में अंतर मिट गया है। फसली बीमा ही
जीवन बीमा बन गया है। परन्तु सरकारों ने खेतों के मेहनतकश किसानों को जीवन राहत
देने से मुँह मोड़ रखा है।
यह बात
वास्तविक हालात को और दर्दनाक बना देती है कि न सिर्फ जिंसों की मंडी पर, बल्कि कर्जे़ की
मंडी पर भी गिद्धांे का कब्ज़ा है। पिछले सालों से खेती के लिए कजऱ्े की राशियों
में धड़ाधड़ वृद्धि की गई है। यह राशियां किसान जनता के लिए नहीं हैं । यह राशियां
कर्जे़ की मंडी में झोकी जा रही हैं। मंडी की गिद्धों के खातिर झोकी जा रही हैं।
किसानों तथा कृषि की लूट पर पलने वाले कारोबारों की तरफ इन राशियों कों प्रवाहित
किया जा रहा है। सबसे बड़ी रकम 25 करोड से ज्यादा की कजऱ्ा राशि हासिल करने
के लिए ललर्चाई सट्टेबाज़ जोंकों के लिए
रखी गईं है।
ऐसे
हालातों में किसानों पर चढ़े कजऱ्े, कजऱ् जाल बन गए हैं। नैश्नल सैंपल सर्वे
द्वारा 2006 में जारी
की गईं रिपोर्टों के अनुसार देश भर में औसत 49 फीसदी किसान परिवारों को कजऱ्ई बताया गया
है। पंजाब में कजऱ्ई किसानों की गिनती 65 फीसदी थी। आंध्रा प्रदेश में कजऱ्ई
किसानों की प्रतिशत की दर बहुत ही ऊँची ( 82 फीसदी ) थी। इस कर्जे़ में 31 फीसदी कजऱ्े का
स्त्रोत साहूकारों को बताया गया था। कुल कजऱ्ा 1,12,000 करोड़ बताया गया
था।
श्री
एच.एस. शेरगिल तथा कई अन्य अध्ययन सूत्रों की रिपोर्टों की रौशनी में साहूकार
कजऱ्ो संबंधी उपरोक्त आंकड़ा बहुत कम है। कितनी ही अध्ययन रिपोर्टों के आधार पर
राजनीतिक आथर््िाकता संबंधी बंबई के खोज ग्रुप ने नतीजा निकाला है कि प्राईवेट
कजऱ्ा सरकारी कजऱ्े से कम से कम दोगुना है। इस आधार पर कुल किसान कजऱ्े का
अंदाजा 1,95,000 करोड़ है।
इस कजऱ्े का ब्याज़ 41,000 करोड़ रु बनता है। यह औसत ब्याज़ दर 21 फीसदी मानकर लगाया
गया अंदाजा है। विशेषज्ञ इसे भी निम्न दर मानते हैं क्योंकि साहूकार कजऱ्े की दर 150 फीसदी तक जाती है।
याद रहे कि सरकारी विशेषज्ञों की कमेटियों ने साहूकार कजऱ्े की पहले 24 फीसदी तथा बाद में
36 फीसदी
ब्याज दर को कानूनी मान्यता देने की सिफारिश की हैं।
किसानों पर
सालाना ब्याज़ की यह राशि देश की कुल पैदावार के 10 फीसदी तक पहुँचती
है। पूँजी की कमी से ग्रस्त कृषि को ब्याज़ की यह राशियां जोंक की तरह चिपकी हुई
हैं। कृषि में हो रहा शुद्ध सालाना पूँजी निवेश इस ब्याज राशि का पांचवां हिस्सा
बनता है। खोज टीम का अंदाजा है कि यदि औसत ब्याज़ की दर 8 फीसदी पर आ जाए तो
कृषि में प्रत्येक वर्ष और तीन गुना शुद्ध पूँजी लग सकती है।
कर्जे़ का यह फैलता जाल भारतीय कृषि संकट तथा
स्थिरता इश्तिहार बन गया है। किसान जनता के लिए यह मौत का सौदागर बन गया है।
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