रक्तचूस सूदखोरी
सूदखोरी एक ऐसा ढ़ंग है जो भारत के
अर्ध-जागीरू कृषि प्रबंध में से अधिशेष निचोड़ने का अहम स्त्रोत है। ग्रामीण
क्षेत्र में, गरीब किसान
जनता तथा खेत मज़दूर कजऱ् के भारी बोझ के अधीन हैं। जागीरदारों की तीखी लूट का
शिकार होने के कारण अपने साल भर के लिए रोज़गार योग्य आमदन न जुटा सकने के कारण, यह हिस्से अक्सर ही अभाव तथा मुश्किलों के हालात में गांवों के जागीरदारों तथा
सूदखोरों से ऊँची ब्याज़ दरों पर कजऱ्ा या अनाज लेते हैं। ये ब्याज दरें इतनी खून
चूसने वाली होती हैं कि एक बार इन सूदखोरों के पंजे में जकड़ा आदमी जल्दी निकल
नहीं सकता। कई तो इन सूदखोरों के दशकों तथा उम्र भर के लिए बंधुआ गुलाम बन कर रह
जाते हैं अथवा अन्य रूपों में जागीरदारों तथा सूदखोरों की गुलामी तथा लूट की
ज़ंजीरों में जकड़ कर रह जाते हैं। पहली बात तो यह है कि सरकारी बैंक, सभा सोसाइटियां तथा
वित्तीय संस्थााएं खेती क्षेत्र के लिए बहुत ही कम कजऱ्ा देती हैं और जितना देती
हैं, वो भी
जायदाद की गारंटी पर देती हैं। जिस कारण खेत मज़दूर तथा गरीब किसान यह कजऱ्ा लेने
की हालत में ही नहीं होते और फिर जरूरत पड़ने पर कजऱ्ा मिलने की भी गारंटी नहीं
होती। इसलिए इस संस्थागत कजऱ्े का बड़ा
भाग जागीरदार तथा अन्य ग्रामीण धनवान ही हड़प जाते हैं। इस पैसे को वे आगे गांव के
गरीबों का कई गुना ऊँची ब्याज दरें लगाकर सूदखोरी के माध्यम से खून चूसने के लिए
इस्तेमाल करते हैं। गांव के गरीबों के लिए कजऱ्ेका मुख्य स्त्रोत यह जागीरदार तथा
सूदखोर - साहुकारों जैसे पारंपरागत स्त्रोत ही हैं। सूदखोरी के माध्यम से ग्रामीण
क्षेत्र में से निचोडा़ गया अधिशेष भी दोबारा खेती में पूँजी के रूप में नहीं
लगता। बल्कि इसका प्रयोग सूदखोरी के जाल को और बिछाने तथा गरीब किसानों की ज़मीन, संसाधन तथा अन्य
संपत्तियां हथियाने के लिए किया जाता है। इस प्रकार भूमि लगान की तरह ही, सूदखोरी द्वारा
किया जाने वाला अधिशेष क़दर का निकास कृषि विकास के पैरों की बेडि़यां बन जाता है।
यह अवस्था
कार्ल माक्र्स के इस कथन का महत्व उभारती है कि सूदखोरी ऐसी रक्त चूसने वाली जोंक
है जो उस पैदावारी ढंग को भी बर्बाद कर देती है जिस पर वह पलती है।
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