Thursday, December 10, 2015

1) a. टिकाने पर चोट



टिकाने पर चोट मारो

            किसी भी संघर्ष की चोट के घेरे को संसदीय सियासत की जरूरतांे तथा वर्तमान ढांचे की सीमा में बांध कर रखना, सभी शासक वर्गीय सियासतदानों द्वारा बार-बार बरता जा रहा ढंग है।
            कपास की खेती की बर्बादी का दोषी पंजाब कांग्रेस तथा ऐसे अन्य हिस्सों द्वारा कृषि विभाग, कृषि मंत्री व बादल सरकार को बनाया जा रहा है। स्वयं अकाली-भाजपा सरकार कीटनाशक दवाइयों के डीलरों तथा नकली कंपनियों पर कारवाई कंेद्रित कर रही है। परन्तु दोष किसानों पर मढ़ रही है। कल को दबाव बढने पर किसी मंत्री को चलता करना एवं उसके स्थान पर किसी चिड़ी सिंह, बाज़ सिंह या बाघ सिंह को मंत्री बना देना, कोई अनोखा कदम नहीं होगा। परन्तु वास्तव में दोषी वर्गों तथा उनकी देशद्रोही नीतियों की तरफ उंगली भी नहीं उठाई जाएगी।
            कपास की बर्बादी के मामले में कीटनाशक दवाइयों की संपूर्ण भारतीय मंडी पर हावी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सरदारी है। कृषि लागत वस्तुओं की समूची मंडी पर विशालकाय देसी-विदेशी कंपनियों की प्रधानता कृषि क्षेत्र की सच्चाई है। यही कपास की बर्बादी का आधारभूत कारण है। इन कंपनियों को हावी बनाने वाली राजनीति किसी एक संत्री या मंत्री की नहीं, संपूर्ण शासक वर्ग की है। राजसŸाा पर स्थापित पक्ष इसे जी-जान से लागू करता है। राजगद्दी से वंचित विरोधी इसका नकली विरोध करते हैं। देसी-विदेशी कंपनियों की लूट तीखी होती है। उनकी तिजोरियां भरती हैं। मेहनतकश किसान जनता कंगाल होती है। ज़मीनों-जायदादों तथा अन्य पैदावारी साधनों से वंचित होती हैं। सूदखोरों तथा जागीरदारों के पास धन-दौलत व ज़मीन एकत्रित होती जाती है। कपास की बर्बादी के मुद्दे को लेकर इस संपूर्ण लूट के जाल को निशाने पर रखना चाहिए। शासक वर्गीय सर्व स्वीकृत सियासत का प्रतिनिधित्व करतीं मौजूदा सरकारों तथा लुटेरे वर्गों पर निशाना साधना, टिकाने पर चोट मारना है।

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