किसान आत्महत्याऐं
सूदखोर कजऱ् के फंदे में जकड़ी सांसें
मोदी सरकार का पिछला एक साल किसानों
की आत्महत्याओं में 20 फीसदी वृद्धि का साल है। यह आत्महत्याएँँ घोर आर्थिक मंदहाली
का नतीजा है जिसने मानवीय रक्त के प्यासे राक्षस का रुप धारण कर लिया है। सूदखोर
कर्जा किसानों की गर्दन पर लिपटा शीर्ष फंदा बना हुआ है। कितने ही फंदों की
छोटी-छोटी रस्सियां मिल कर इस शीर्ष फंदे में सम्मिलित हो जाती हैं। और अधिक मजबूत
हो रहा यह शीर्ष फंदा खेती व खेतों के श्वास हर रहा है।
फ्रंटलाईन
के 4 सितंबर 2015 के अंक में
किसानों की आत्महत्याओं की जो रिर्पोट प्रकाशित हुई है वह सूदखोर कर्जे द्वारा
रक्त चूसने की इंतहा को सामने लाती है। इन मिसालों में आत्महत्याएँ करने वालों के
सिर पर कर्ज तथा ब्याज की 6 से 10 रुपए प्रति 100 रु तक की ली जा
रही ब्याज दरों का जिक्र है। ब्याज दर ब्याज के अंधाधुँद सिलसिले का जि़क्र है। इस
अंधी लूट तथा आत्महत्याओं की वजह से मची हाहाकार के फलस्वरुप कर्नाटक की सरकार को
साहूकारों की गिरफ्तारियों का नाटक रचने के लिए मजबूर होना पडा है।
इतने ऊँचे
ब्याज पर किसानों द्वारा अपनी गर्दन सूदखोर कर्जे के शीर्ष फंदे के आगे कर देने
में चर्मसीमा पर पहुँची आर्थिक मंदहाली की मजबूरी काम करती है। जमीन की कमी इस
मंदहाली की जड़ है। सस्ते बैंक कर्जो की उपलब्द्धता में व्यापक कमी मजबूरियों में
वृद्धि करती है। कई प्रांतों में फ्रंटलाईन द्वारा की गई पडताल दर्शाती है कि कैसे
कर्जे में जकडे़ भूमिहीन तथा कम-भूमिहार किसान जमीन ठेके पर लेने के लिए भारी
कर्जा उठाते हैंै।
खेती खपत
वस्तुओं की बेहद महंगी रकमें अदा करने के लिए साहूकारों के आगे हाथ फैलाते हैं।
कैसे निरोल ब्याज पर पैसा देने वाली सूदखोर जोकों के अतिरिक्त लगभग हर जोंक सूदखोर
बन कर पेश होती है। इनमें बड़ी जमीनों वाले जागीरदार भी शामिल हैं तथा फसलों की
बिक्री के दरमियान थोपे हुए बिचैलिए भी शामिल हैं जिन्हें ’आढतिया’ कहा जाता है।
सूदखोरी के धंघे में कीटनाशक व खादों के डीलर भी शामिल हैं जो किसानों को बंधुआ
खरीददार बनाते हैं। सूदखारी के बल पर वे
किसानों पर मजऱ्ी की कीमतें थोपते हैं। पहला ब्याज काट कर बाकी बची रकम ही
किसानों को खेती खपत पदार्थों के रूप में ही किसानों के हाथ में देते हैं। ऐेसी
परिस्थितियों में मर चुकी फसलें व लुढकीं कीमतें घोर निराशा उत्पन्न करती हैं जो
आत्महत्याओं का कारण बनती हैं। पंजाब में इन दिनों ’सफेद मच्छर’ की वजह से मर चुकीं फसलों के सदमे में
खुदकुशी करने वाले किसानों की बेबसी का कारण ज़मीन की कमी तथा कजऱ् मुख्य रूप से
नज़र आ रहे हैं। इन किसानों ने कजऱ् लेकर ज़मीन के ठेके की बड़ी रकमों की
व्यवस्था की है। परन्तु खत्म हुई फसलों के
साथ ही उनकी जीवन लीला भी खत्म हो गई।
फ्रंटलाईन
की रिर्पोटें यह भी दर्शाती हंै कि कैसे गन्ना,कपास अथवा अन्य
कच्चा माल हड़पने वाले इनका भुगतान रोक लेते हैं तथ इस रकम को कारोबार मुनाफे के
लिए इस्तेमाल करते हैं। दूसरी तरफ किसान आगामी फसल के लिए लाखों का कर्ज़ उठाता
है। कैसे चीनी के ठेकेदार फसल बोने से पहले सौदेबाज़ी द्वारा किसानों को गन्ने की
फसल के बंधुआ विक्रेता बना देते हैं। उन्हें बीज, खाद तथा कीटनाशकों
के बंधुआ खरीददार बना देते हंै। मिल गन्ने की कटाई पर भी कब्जा जमा लेती है। रस से
भरा किसान का गन्ना कब काटा जाएगा, यह उसके बस में नहीं होता। गरीब तथा छोटे
किसान की फसल की बारी सबसे आखिर में आती
है। तब तक गन्ने मुरझाने लगते हैं। गन्ने का वजन व कीमत आधी रह जाती है। फ्रंटलाईन
ने इस दुख से आत्महत्याए्ँ करने वाले किसानों की कहानी बयाँ की है। यह भी बताया है
कि बी‐टी‐ कपास की मंडियों
में इस बार उल्लू बोलते नज़र आए हैं। फसलों की कीमतों में प्रति कविंटल 2,000 रुपए की गिरावट
दर्ज की गई है जबकि काटन कार्पोरेशन मंडियों में दिखाई नहीं पड़ी।
ज़मीन तथा
संसाधनों के भारी अभाव में, छानबीन किए बिना, थोपा हुआ
व्यापारीकरण किसानों के गले का फंदा बन गया है। यह फसली विभिन्नता जैसे मनमोहक
नामों से किसानों पर थोपा गया है। परन्तु आसमान छूती लागत कीमतों ने कजऱ् का
मकड़जाल और मजबूत कर दिया है। ऐसी हालतों में तामिलनाडू के आत्महत्या करने वाले एक
किसान ने सवा चार लाख का कर्ज ले कर पांच एकड़ जमीन ठेके पर ली। सहकारी बैंक से 25 हजार ही मिले। 4 लाख सूदखोर से
लेने पड़े। 12 हजार
महीना ब्याज उतारता रहा। बरसात ने कपास तबाह कर दी तथा जीने की इच्छा भी।
ऐसी
आत्महत्याएँ दर्शाती है कि किस प्रकार भारी ठेका, ब्याज़ तथा उच्च
लागत कीमतें उतारकर कर तैयार की गई फसल की तबाही कम ज़मीनों वाले किसानों के लिए
असहनीय हो जाती हैं। व्यापारीकरण का चक्रव्यूह बहुत सारे पापड़ बेलने को मज़बूर
करता है। बरसात पर निर्भर क्षेत्रों में अधिक जल पर निर्भर फसलों की खेती करवाता
है। ऐसे हालातों में आत्महत्याएँ करने वालों ने पानी की प्यासी फसलों के लिए 6-6 बार गहरे से गहरे
बोर किए। मीलों तक पानी के लिए पाईप दबाए परन्तु मौसम, मंडी, तथा सरकारें सबने
ही दुश्मनी निभाई। खर्चों से कंगाल हुए किसानों की बर्बाद हुईं या मंडियों
में बिखरीं पड़ी फसलों ने सूदखोरों के
घरों में दीये जला दिए परन्तु भूमि पुत्रों के घरों में मातम के अंधेरे फैला दिए।
यह रिपोर्ट
ज़मीन की कमी झेल रहे किसानों के
दुख-दर्दों से घिरे जीवन पर रौशनी डालती है। इन दुख दर्दों के समक्ष बेबसी की हालत
में खेत में खड़ा पेड़ ही ‘मुक्तिदाता‘ बन जाता है। जब
नारियल के पेड़ बेचकर राहत की उम्मीद नहीं रहती तो किसान पेड़ से लटक कर आत्महत्या
कर लेता हैं। कीड़े मारने में असमर्थ रहे कीटनाशक
आत्महत्या के काम आते हैं। जब जिंसों की खरीद मंडी घोर निराशा लाती है तो
खेतों में खड़ी कपास या गन्ने की फसल सूखे डंडे अथवा घास फूस समान दिखने लगते हैं।
किसान इन्हें आग लगा देता है और अपने हाथोें से जलाई इस चिखा में छलांग लगा देता
है। ऐसे ‘हादसे‘ कोई फिल्मी कहानीं
नहीं हैं बल्कि छानबीन के दौरान सामने आए सच्चे विवरण हैं।
दूसरी तरफ
तबाही के खतरे से किसानों की सुरक्षा करने से सरकार ने हाथ खड़े किए हुए हैं। खेती
जिंसों की खरीद मंडी से यह दूर ही रहना चाहती हैं। देश को कपास कारपोरेशन, पटसन कारपोरेशन, फूड कारपोरेशन जैसी
संस्थाओं का अजायब घर बनाने पर तुली हुई्रं हैं। मेहनतकश किसान के लिए मंडी की
मंदी मौसमी आपदा जैसी ही आफत बन गई है। परन्तु उसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है।
मौसमी आपदा से बर्बाद फसल का बीमा नहीं। व्यापारियों के काले जादू तथा विश्व मंडी
की परछाई सदका मंडी में बर्बाद हुई फसल का बीमा नहीं है। आत्महत्याएं दर्शाती हैं
कि गरीब किसान के लिए जीवन बीमा तथा फसली बीमा में अंतर मिट गया है। फसली बीमा ही
जीवन बीमा बन गया है। परन्तु सरकारों ने खेतों के मेहनतकश किसानों को जीवन राहत
देने से मुँह मोड़ रखा है।
यह बात
वास्तविक हालात को और दर्दनाक बना देती है कि न सिर्फ जिंसों की मंडी पर, बल्कि कर्जे़ की
मंडी पर भी गिद्धांे का कब्ज़ा है। पिछले सालों से खेती के लिए कजऱ्े की राशियों
में धड़ाधड़ वृद्धि की गई है। यह राशियां किसान जनता के लिए नहीं हैं । यह राशियां
कर्जे़ की मंडी में झोकी जा रही हैं। मंडी की गिद्धों के खातिर झोकी जा रही हैं।
किसानों तथा कृषि की लूट पर पलने वाले कारोबारों की तरफ इन राशियों कों प्रवाहित
किया जा रहा है। सबसे बड़ी रकम 25 करोड से ज्यादा की कजऱ्ा राशि हासिल करने
के लिए ललर्चाई सट्टेबाज़ जोंकों के लिए
रखी गईं है।
ऐसे
हालातों में किसानों पर चढ़े कजऱ्े, कजऱ् जाल बन गए हैं। नैश्नल सैंपल सर्वे
द्वारा 2006 में जारी
की गईं रिपोर्टों के अनुसार देश भर में औसत 49 फीसदी किसान परिवारों को कजऱ्ई बताया गया
है। पंजाब में कजऱ्ई किसानों की गिनती 65 फीसदी थी। आंध्रा प्रदेश में कजऱ्ई
किसानों की प्रतिशत की दर बहुत ही ऊँची ( 82 फीसदी ) थी। इस कर्जे़ में 31 फीसदी कजऱ्े का
स्त्रोत साहूकारों को बताया गया था। कुल कजऱ्ा 1,12,000 करोड़ बताया गया
था।
श्री
एच.एस. शेरगिल तथा कई अन्य अध्ययन सूत्रों की रिपोर्टों की रौशनी में साहूकार
कजऱ्ो संबंधी उपरोक्त आंकड़ा बहुत कम है। कितनी ही अध्ययन रिपोर्टों के आधार पर
राजनीतिक आथर््िाकता संबंधी बंबई के खोज ग्रुप ने नतीजा निकाला है कि प्राईवेट
कजऱ्ा सरकारी कजऱ्े से कम से कम दोगुना है। इस आधार पर कुल किसान कजऱ्े का
अंदाजा 1,95,000 करोड़ है।
इस कजऱ्े का ब्याज़ 41,000 करोड़ रु बनता है। यह औसत ब्याज़ दर 21 फीसदी मानकर लगाया
गया अंदाजा है। विशेषज्ञ इसे भी निम्न दर मानते हैं क्योंकि साहूकार कजऱ्े की दर 150 फीसदी तक जाती है।
याद रहे कि सरकारी विशेषज्ञों की कमेटियों ने साहूकार कजऱ्े की पहले 24 फीसदी तथा बाद में
36 फीसदी
ब्याज दर को कानूनी मान्यता देने की सिफारिश की हैं।
किसानों पर
सालाना ब्याज़ की यह राशि देश की कुल पैदावार के 10 फीसदी तक पहुँचती
है। पूँजी की कमी से ग्रस्त कृषि को ब्याज़ की यह राशियां जोंक की तरह चिपकी हुई
हैं। कृषि में हो रहा शुद्ध सालाना पूँजी निवेश इस ब्याज राशि का पांचवां हिस्सा
बनता है। खोज टीम का अंदाजा है कि यदि औसत ब्याज़ की दर 8 फीसदी पर आ जाए तो
कृषि में प्रत्येक वर्ष और तीन गुना शुद्ध पूँजी लग सकती है।
कर्जे़ का यह फैलता जाल भारतीय कृषि संकट तथा
स्थिरता इश्तिहार बन गया है। किसान जनता के लिए यह मौत का सौदागर बन गया है।
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