Thursday, January 31, 2013

भूमि-अधिग्रहण बिल को मंत्रीमंडल की स्वीकृति बड़ी जोकों का पक्षपात बेपर्द


भूमि-अधिग्रहण बिल को मंत्रीमंडल की स्वीकृति
बड़ी जोकों का पक्षपात बेपर्द
13 दिसम्बर को केन्द्रीय मंत्रीमंडल ने भूमि-अधिग्रहण बिल को मंजूरी दे दी है। मंजूरी एक साल से अधिक समय की चर्चा के बाद दी गई है। पहले संसद में पेश हुआ बिल, संसद की स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा गया था। फिर इसको मंत्रियों के ग्रुप के हवाले किया गया था। अब मंत्रीमंडल की स्वीकृति के बाद इस बिल को संसद के शीतकालीन सत्र में पेश करने का फैसला किया गया था। परन्तु अब ये कदम बजट सत्र तक आगे डाल दिया गया है।
अब तक जो हुआ है, इसने पूंजीपति तथा बड़ी उद्योगिक जोंकों के प्रति शासकों के प्रेम-भाव को बेपर्दा किया है। किसानों की, विशेषकर गरीब किसानों कीमीने जबरन हथियाने की कार्यवाई में आई तेजी के कारण देशभर में हाहाकार मच उठी थी। सरकार बड़ी ही बेरहमी से अंग्रेसाम्राज्यवादियों द्वारा 1894 में बनाए कानून की तीखी छुरी चला रही थी। किसानों तथा प्रत्य्क्ष-अप्रत्यक्ष रूप में खेतीबाड़ी पर निर्भर लोगों का उजाड़ा हो रहा था। कई स्थानों पर परिणाम शासकीय लश्करों तथा लोगों के दरमियान तीखी खूनी झड़पों तक पहुंच रहा था। लम्बे तथा विलंबित संघर्ष चल रहे थे। इन हालातों में दी के ऐलानों के : दशकों के बीत जाने के पश्चात् देश के शासकों ने अंग्रेसाम्राज्यवादियों के कानून को बदलकर नया कानून लाने का दिखावा करने कीरूरत महसूस की। परन्तु जो बिल पेश किया गया, वो हाथी के दांत, दिखाने के और, खाने के और वाली हालत को दर्शाता था। ये छलावा इतना प्रत्यक्ष था कि स्वयं संसद की ग्रामीण विकास स्टैंडिंग कमेटी को इस सम्बन्धीोरदार टिप्पणी करनी पड़ी थी। पिछले बिल में दिए गए मूल उद्देश्य चिकनी-चुपड़ी बातें करते थे। परन्तु, ''जनतक उद्देश्यों के नामाधीन किसानों सेमीने छीनने के लिए अफसरशाही के हाथ खुले रखे गए थे। स्टैंडिंग कमेटी ने टिप्पणी की कि ''इस प्रकार सरकार द्वारामीन अधिग्रहण करने के कदमों को परिभाषित जनतक उद्देश्यों तथा आधार ढांचे के निर्माण की परियोजनाओं तक सीमित रखने की बजाय, बिल सरकार द्वारा कंपनियों के लिए किसी भी रूप मेंमीन अधिकृत करने के लिए द्वार पूरी तरह खोलता है। ये सरकारी कारोबार हों, निजी कारोबार हों या सरकारी-निजी सांझे कारोबार हों, कार्यकार्णी के लिए मनमर्जी की कार्यवाई के लिए इतनी खुली ताकतें पूर्णत: मनमर्जी चलाने के समान हैं तथा इनका भूमि-अधिग्रहण पुन: निवास तथा् पुन: जीविका बिल 2011 उदेशिका में दिये गए बयान अनुसार ऊँचे उद्देश्यों के साथ दूर का भी सम्बन्ध नहीं बनता।  स्टैंडिंग कमेटी ने सिफारिश की कि बिल की वे धाराएँ ''जो कारोबारों के मुनाफों के लिए, कार्यकारिणी को जनतक उद्देश्यों तथा आधार ढांचे को परिभाषित करने के मामले में मनमर्जी चलाने की भारी छूट देती ''हैं हटा देनी चाहिए।
परन्तु शरद पवार के नेतृत्व में बने मंत्रियों के समूह ने इन सिफारिफों को चुपचाप रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। दूसरी तरफ, व्यापार तथा उद्योगिक प्रतिनिधित्व करते हुए शोर-शराबा डाला गया था कि जनतक उद्देश्यों की परिभाषा अभी भी सीमित है। शरद पवार ने तसल्ली कराते हुए कहा कि निजी कंपनियों के लिएमीन-अधिग्रहण करने की विशेष धारा बहुत विशाल हैं, इसमें उद्योग के योजनाबद्ध घने क्षेत्र विकसित करने तथा काखाने लगाने के लिएमीन लेकर देने के कदम शामिल हैं। इसका मतलब है कि जनतक उद्देश्यों की परिभाषा इतनी लचकीली रखी गई है जितनी येयादा सेयादा हद तक हो सकती है। उसने व्याखया की कि जनतक उद्देश्यों का अर्थ राष्ट्रीय पूंजी निवेश तथा पैदावारीोनो की सथापना और उद्योगिक पट्टियां का निर्माण भी होगा जैसे कि दिल्ली तथा मुंबई जैसे क्षेत्रों में हो रहा है।
कुल मिलाकर ये हुआ है कि 2011 में पेश हुए बिल सम्बन्धी आम तौर पर किसानों तथा और गरीब लाचारों के हितों के पक्ष से की गई मांगें, सिफारिशें या सुझाव आम तौर पर अलग रख दिये गए हैं। दूसरी तरफ, जमीनों के लिए भूखी बड़ी जोंकों की मांगों तथा उनका प्रतिनिधित्व करते मंत्रालयों की सिफारिशें आम तौर पर अपनाई गईं हैं। पुंजीपतियों की मांग पर आधारभूत बिल के हस्तालेख में कई शोध किए गए हैं। एक शोध ये है कि ये बिल पहले ली जा चुकींमीनों पर लागू नहीं होगा। अर्थात् जिनकीमीनों को हड़प किया जा चुका है या रोगार उजड़ चुका है, उनके लिए नए कानून की रौशनी में रोगार कोई और मुआव या पुन:आवास तथा रोगार के लिए कोई कदम नहीं लिया जाएगा। ही पुर्व अधिग्रहितमीनों के मामलों के जायजा नाजायहोने के मसले पर पुन: विचार किया जाएगा। शोध कहता है कि जो बीते समय में हो चुका है, उसे किसी विशेष से विशेषतर हालत में ही विचारा जा सकता है।
पुंजीपतियों तथा व्यापार मंत्रालय ने शोर-शराबा करके ये शर्त भी मद्धम करवा दी है किमीन गंवाने वाले 80 प्रतिशत किसानों की सहमति लेनीरूरी है। सरकारी प्रोजैक्टों के मामले में सहमति की यह शर्त 67 प्रतिशत तक सीमित कर दी है पहली शर्त निरोल निजी कंपनियों के कारोबारों के लिएमीन अधिग्रहण करने के मामले में लागू होगी जनतक-निजी हिस्सेदारी वाले कारोबारों के मामलों में ये शर्त 70 प्रतिशतमीन मालिकों तक सीमित कर दी गई है वर्णनयोग्य बात यह है कि आजकल ये तथाकथित निजी-सरकारी हिस्सेदारी कारोबार, पुंजीपतियों के लिए मनपसंद क्षेत्र बने हुए हैं इस चोर-दरवाजे के माध्यम द्वारा निजी कारोबार लोगों की कीमत पर सरकारी ाने तथा जायदादों में से भारी भरकम मोटी रकम प्राप्त करते हैं वसूलियां, धन इकट्ठा करने तथा मुनाफों के भरपूर मौके हासिल करते हैं
परन्तु सहमति की शर्त के मामले में बिल के पहले दस्तलेख में, बहुत ही महत्वपूर्ण संशोधन ये किया गया है कि भूमि हीन वे सब लोग जिनपर खेती कारोबार के उजडऩे का असर पडऩा है, सहमति के अधिकार से बाहर कर दिए गए हैं मूल हस्तलेख में केवलमीन छिनने वालों की सहमति की बात नहीं थी, प्रभावित होने वाले 80 प्रतिशत लोगों की सहमति की बात थी इस के अनुसार भूमिहीन वे सभ खेत-दूर, पट्टेदार, कारीगर तथा लघु-उद्योगपति भूमि-अधिग्रहण के मामले में आपात्ति प्रकट कर सकते थे, जिनकी रो-रोटी भूमि अधिग्रहण किए जाने से प्रभावित होती थी तथा जो सम्बन्धित क्षेत्र में तीन सालों से भी अधिक समय से बसे हुए हैं अब इन हिस्सों को आपत्ति प्रकट करने का अधिकार देने से इंकार किया ही गया है, साथ ही, मुआवजे, पुन:आवास तथा रोगार देने के प्रबन्धों की गारन्टी से भी इंकार कर दिया गया है ये सबकुछ केवल उन हिस्सों तक सीमित कर दिया गया है, जिनकी भूमि-अधिगृहित की जाएगी
व्यापार तथा उद्योगिक मंत्रालय द्वारा की गई एक और सिफारिश भी मंत्रियों के समूह द्वारा ली गई है ये सिफारिश है कि निजी कंपनियों को शहरी दार्शनिक स्थलों के निर्माण तथा योजनाबद्ध शहरी विकास की सरकारी परियोजनाओं में शामिल किया जाए अर्थात् ये सभी कार्य सरकारी-निजी हिस्सेदारी के लेबल अधीन निजी कंपनियों के लिे मुनाफे का बड़ा स्रोत बना दिए जाएँ परिणाम ये होगा कि शहरी विकास के नामाधीन शहरों की हदों से लगने वाले ग्रामीण किसानों कीमीनों पर भूखी-हलकाई हुई मुनाफाखोर गिद्धों का हमला तेज होगा
आधारभूत बिल में किए गए संशोधनों में वय्पार मंत्रालय की इस सिफारिश की स्वीकृति भी शामिल है कि मार्किट रेट निश्चित करने का कार्य प्रांतीय सरकारों पर छोड़ दिया जाए व्यापार मंत्रालय ने अपनी सिफारिश के लिए इस दलील को आधार बनाया है कि मार्किट दरों पर मुआवजा बहुत ऊँचा हो जाएगा तथा परियोजनाओं को अर्थहीन बना देगा बहु-फसली तथा सिंचाई वालीमीने अधिग्रहण करने के मामले में सीमा रेखा की शर्त हटाने के मामले में पूंजीपतियों की मांग के सामने भी सरकार ने घुटने टेक दिये हैं पहले हस्तलेख में ये शर्त लगाई गई थी कि सिंचाई वाली तथा बहु-फसलीमीन किसी भी मकसद के लिए ली जाने वालीमीन का पांच प्रतिशत से अधिक हिस्सा नहीं ले सकती अब इस शर्त को तिलांजलि दे दी गई है इस प्रकार किसी क्षेत्र में बिजाई अधीनमीन-अधिग्रहण करने के मामले में सीमा-रेखा की शर्त को भी तिलांजलि दे दी गई है
निजी कारोबारों द्वारा प्रत्यक्ष रूप में लीमीन के मामले मेंमीन गंवाने वाले लोगों के पुनर्वास तथा पुनर्जीविका की शर्त आधारभूत हस्तलेख में अधिग्रहण की जाने वालीमीन के आकार के साथ जोड़ी गई थी अर्थात, एक विशेष सीमा से बड़े आकार कीमीन पर प्रोजैक्ट लगाने वाले निजी कारोबारियों पर ही ये शर्त लागू होनी है अब इससे भी आगे जाते हुए मूलभूत हस्तलेख में ये संशोधन किया गया है किमीन के आकार का मामला स्वछन्द छोड़ दिया गया है प्रांतीय सरकारें स्वयं ये फैसला कर सकती हैं कि किस आकार कीमीनें हथियाने वाले निजी उद्योगपतियों के उजडऩे वालों की पुनर्जीविका की जिम्मेदारी से मुक्त रखना है अगला संशोधन ये है कि अब निजी कंपनियों के लिए पुनर्वास तथा पुनर्जीविका के लिए इमारतों का निर्माण करके देने अथवा उसके वैकल्पिक रोगार का जुगाड़ करके देने की जिम्मेदारी नहीं होगी वो तय की गई राशि दे कर चलते बनेंगे
मार्किट रेट के मामले में कंपनियों को दी गई एक बड़ी रियायत यह है कि किसी क्षेत्र में किसी एक मामले में लागू किये गए मार्किट रेट को अगले किसी प्रोजैक्ट के लिए हवाले का नुक्ता नहीं बनाया जाएगा
यहीं पर बस नहीं, शहरी विकास मंत्रालय की कई तबाह कर देने वाली सिफारिशों को मूल हस्तलेख में संशोधनों के रूम में स्वीकार कर लिया गया है स्वीकार की गई एक सिफारिश यह है किमीन अधिग्रहण करने वाले कोमीन का कब् पहले ही मिल जाएगा, उजडऩे बर्बाद होने वालों के पुनर्वास तथा पुनर्जीविका का प्रबन्ध हुआ हो अथवा हुआ हो ये धारा आधार ताने-बाने से सम्बन्धित समय-बद्ध परियोजनाओं के मामले में विशेष तौर पर लागू होगी इतना ही नहीं, सरकारी कलैक्टर को केवलमीन के मुआवजे का भुगतान करने के बादमीन कब्ज में लेने का अधिकार होगा पुनर्वास तथा पुनर्जीविका के लिए रकम का भुगतान किया हो चाहे भी किया गया हो
पहले ये प्रभाव देने का प्रयास किया गया था कि सरकार तय किए गए उद्देश्यों के लिए अधिग्रहितमीन के प्रयोग सम्बन्धी बहुत ही गंभीर है यहां तक कहा गया था कि यदि अधिग्रहण की गईमीन निश्चित परियोजना के लिए प्रयोग में नहीं लाई जाती तो ये वासतविक मालिक को वापिस की या करवाई जाएगी आधारभूत बिल में किए गए संशोधन के माध्यम से इस दावे की भी हवा निकाल दी गई है शब्दों को बदलकर अब यह कहा गया है कि प्रांतीय सरकार वासतविक मालिक कोमीन वापिस कर सकती है, यदि वो ऐसा फैसला लेती है   अर्थात् अब ये प्रांतीय सरकार की मर्जी का मामला बना दिया गया है
भूमि-अधिग्रहण बिल का उद्देश्य ये बताया गया है कि इसके द्वारामीन-अधिग्रहण करने के अमल को इस प्रकार का बनाया जाना है  कि किसानों तथा अन्य लोगों को कोई कठिनाई उठानी पड़े इस उद्देश्य का प्रभाव दिखाने के लिए आधारभूत बिल को तथाकथित जनहित धाराओं तथा शब्दावली के मोतियों में पिरोया गया था परन्तु साथ के साथ इनको अमल में लाने के पक्ष से अर्थहीन बनाने के लिए बड़ी छूटें दर्ज की गई थी बिल के चौथे शेड्यूल में पहले बने 16 कानूनों को इस बिल की सीमा से बाहर रखा गया था ये कानून एक अथवा दूसरे तरीके सेमीन-अधिग्रहण करने के सियासी अधिकारों से सम्न्धित हैं उदाहरण के रूप में, परमाणू ऊर्जा कानून, खानों-सम्बन्धीमीन अधिग्रहण कानून, विशेष आर्थिकोन कानून, कोयला-क्षेत्रमीन अधिग्रहण कानून तथा विकास कानून, बिजली कानून तथा रेलवे कानून आदि ऐसे कानून हैं जिनके नामपरमीन ग्रहण की जा सकती है, परन्तु मौजूदा बिल कानून बनने की हालत में इनपर लागू नहीं होगा इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि बिल का चौथा शोड्यूल सरकार को ये अधिकार देता है किमीन अधिग्रहण करने से सम्न्धित और किसी भी कानून को ये उपरोक्त बिल के दायरे से बाहर रखने का फैसला कर सके इस चौथे शोड्यूल को बिल से रद्द करने की कई किसान संगठनों कीोरदार मांग ठुकरा दी गई है बल्कि ये कहा जा रहा है कि नए बिल की धाराएँ पहले बिलों में बढौतरी करती हैं, इन्हें काटती नहीं हैं
बिल में दर्ज की गई एक और बड़ी छोट यह है कि यह बिल ''आपातकालीन हालतों में सरकार द्वारामीन ग्रहण करने के मामलों में लागू नहीं होगा एक और छूट सरकार को मर्जी सेमीन ग्रहण करने का अधिकार देती है सरकार की मर्जी के इन मामलों में नया कानून लागू नहीं होगा सरकार की मर्जी का यह अधिकार सिर्फ जनतक उद्देश्यों के लिए अस्थायी तौर परमीन ग्रहण करने के मामलों में लागू होगा बल्कि प्राईवेट कंपनियों कोमीन ले कर देने के मामलों में भी लागू होगा इसके अतिरिक्त बिल कलैक्टरों को, जमीन पर कब्ज के मामले में एकतरफा शक्तियों से लैस करता है, तीन सालों तकमीन इस्तेमाल करने के अधिकार देता है औरमीन मालिकों एवम् प्रभावित परिवारों को मुआवजा तय करने के मामलों में कलैक्टर के लिए अंतिम अधिकार की गारन्टी करता है
इस प्रकार यह बात और उभर कर सामने आई है कि बनाया जा रहा नयामीन अधिग्रहण कानून 1894 में अंग्रेसाम्राज्यवादियों द्वारा बनाए कानून की रूह को कायम रखता है तीव्र हुए जनतक विरोध के प्रसंग मेंमीनें ग्रहण करने के अमल को नियमित करने का प्रभाव देते हुएमीनें हड़पने का अमल जारी रखने की गारन्टी करता है यह ताजा कानून खेतीबाड़ी से जुड़े बेमीने लोगों और छोटे उद्योगपतियों से विशेष दुश्मनी के रवईए को प्रकट करत है दूसरी तरफ यह बड़ी कार्पोरेट जोंकों से प्रेमभाव को प्रकट करता है यह पुनर्वास और पुनर्जीविका के नाम पर लोगों को उजाडऩे की प्रक्रिया जारी रखने औरमीनों की भूखी बड़ी जोंकों के हितों की सुरक्षा की गारन्टी करने की कोशिश है आँखों में धूल झोंकने, पेट पर लात मारने और बस रहे लोगों को उजाडऩे की नीति को समर्पित इस कानून का पर्दाफाश करना सभी जनतक संगठनों का फर्ज है इस बिल की जन-विरोधी प्रवृति के खिलाफोरदार संघर्ष समय की मांग है