Thursday, January 31, 2013

विदेशी पूंजी निवेश व भारतीय 'जमहूरिअत’ बेचारी संसद


विदेशी पूंजी निवेश भारतीय 'जमहूरिअत
बेचारी संसद
भारत को विश्व का सब से बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है भारतीय संसद को इस लोकतंत्र का बड़ा स्तम्भ कहा जाता है जब लोग अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं तो नसीहत की जाती है कि अंदोलन की बजाय वे अपने प्रतिनिधि चुन कर संसद में भेजें जो भी चाहते हैं, संसद द्वारा कानूनी ढंग से लागू करवा लें आम तौर पर यह नसीहत लाठियां-गोलियों द्वारा की जाती है सरकारें लोगों के खिलाफ भी अपने प्रतिद्वदियों के खिलाफ भी अकसर यह दोष लगाती है कि वह संसद का अपमान कर रहे है इसकी कदर घटा रहे हैं इस तरह वे ''भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को तेल दे रहे हैं इन्कलाबियों के खिलाफ तो ऐसे दोष लगते ही हैं अन्ना ारे जैसों को भी संसद-विरोधी होने के 'महांदोष की दीक्षा दी जाती है
यहां हम इस बात की चर्चा नहीं करेंगे कि संसद लोगों की नहीं जोकों की संस्था है यह बड़ी जोनों की सेवा के लिए कानून बनाती है डण्डे के राज के लिए पर्दे का काम करती है परन्तु बड़ी बात यह है कि जोकों का राज वास्तव में संसद द्वारा नहीं चलता संसद के पर्दे के नीचे अफ्सरशाही द्वारा चलता है विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने इसके आदेश लागू करने का फैसला संसद में विचार-विमर्श तक नहीं किया गया अमरीका  के साथ सैनिक क्षेत्र में समझौते करने से पहले संसद में कोई चर्चा नहीं की गई जब कि ऐसे फैसले कदम लोगों के जीवन के साथ उनकी रोटी-रोजी के साथ जीने-मरने के साथ गहरा सम्बन्ध रखते हैं
आज-कल भारतीय शासकों को विदेशी देशी बड़ी जोकों के हितों के लिए जितनी तेजी से फैसले करने पड़ रहे है इस हालत में संसद का पर्दा कायम रखना मुश्किल पड़ रहा है भारतीय शासक सब खुले आम कहते हैं कि संसद द्वारा फैसले करने का तो रिवाज ही नहीं है कभी भी किसी सरकार ने ऐसा नहीं किया वैसे भी इसकीरूरत ही क्या है? इस रवैये की ता नए ाना मंत्री पी. चिदम्ब्रम ने पेश की है खुदरा व्यापार के क्षेत्र में एक वनगी व्यपार में 100 प्रतिशत बहु-वनगी व्यापार में 51 प्रतिशत पूंजी लगाने की विदेशी कम्पनियों को छूट देने का फैसला सरकार ने संसद में बगैर किसी विचार-विमर्श के लिया है इसे जायज ठहराते हुए आर्थिक सम्पादकों की एक कानफ्रेंस को सम्बोधिन करते हुए पी. चिदम्ब्रम ने कहा कि विदेशी निवेश के बारे में एसी बहस गैर-जरूरी नाजायहै उसने कहा कि यह कार्यकार्णी का फैसला है संसद की स्वकिृति की कोई आवश्यक्ता नहीं उसने आगे कहा कि खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के बारे में पहले विस्तारित कैबिनेट पेपर एन.डी.. सरकार ने 2002 में तैयार किया था फिर अब झगड़ा किस बात का है संसद के महत्व को नकारते हुए चिदम्ब्रम ने सौ की एक सुना दी ''हर सरकार को नीतियां घढऩे का अधिकार है
खैर! चिदम्ब्रम ने तो जो किया सो किया भारतीय लोकतंत्र का एक और स्तम्भ कहलाती सर्व-उच्च न्यायलय तो संसद का नाम सुनकर ही गुस्से में गई सर्व-उच्च न्यायलय में दाखिल हुई एक पटीशन में उपरोक्त फैसले को रद्द करने की मांग की गई थी तर्क दिया गया था कि सरकार ने यह फैसला इस वजह करके संसद में पेश नहीं किया, क्योंकि इस मुद्दे पर सरकार को संसद में बहुमत हासिल नहीं था सर्वउच्च न्यायलय ने इसके जवाब में कहा, ''यूं ही बहस का रुख मत बदलो नीतियों को संसद के सामने पेश करने की कोई आवश्यक्ता नहीं थी यह देश की सर्वउच्च अदालत का विचार है करोड़ों लोगों की रोटी-रो रोगार से तालुक रखते इस गम्भीर फैसले के बारे में संसद में चर्चा की कोईरूरत नहीं, जिसे स्वयं शासक ही लोगों की प्रतिनिधि संसद कहते हैं
पटीशन करने वालों ने यह भी मांग की थी कि यह फैसला लागू किया जाए क्योंकि रिर्व बैंक ने विदेशी मुदरा मैनेजमेंट ऐक्ट 2000 के अधीन पूंजी निवेश के बारे में निर्धारित नियमों में अभी कोई परिवर्तन नहीं किया सर्वउच्च अदालत ने उत्तर दिया कि अगर ऐसे परिवर्तन से पहले भी सरकारी प्रस्ताव लागू हो जाएंगे तो ''कोई आसमान नहीं गिरने लगा सर्वउच्च अदालत ने सरकार को कहा कि वह बाद में बैंक से नियमों में परिवर्तन करवा ले ता कि नई नीति को कानूनी वाजबीयत हासिल हो सके
पटीशनर ने तर्क दिया कि रिर्व बैंक के नियम स्पष्ट तौर पे बहु-वनगी खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की मनाही करते हैं यह नियम विदेशी मुदरा मैनेजमेंट कानून के अधीन रिर्व बैंक को हासिल अधिकारों का उपयोग करके लागू किए गए हैं इनको किसी कार्याकार्णी के फैसले द्वारा नहीं बदला जा सकता इस से भी आगे, इस कानून की धारा 48 के मुताबिक इस के अधीन बनाए जाने वाले हर सिधांत नियम की संसद द्वारा स्वकिृती लेनीरूरी है पटीशनर ने कहा कि कल को सरकार इस नीती के अधीन विदेशियों को 50लाईसैंस देने जा रही है उसने पूछा कि क्या यह ''कानूनी होगा? सर्वउच्च अदालत ने उत्तर दिया कि जब रिर्व बैंक नियमों को संशोधित कर लेगा तो बेनियमी अपने आप दूर हो जायेगी
सर्वउच्च अदालत के सामने दलीलबाजी करते हुए सरकार के सर्वउच्च वकील (अटार्नी जनरल) ने तो सभी पर्दे ही खोल डाले उसने बताया कि केवल आज की ही बात नहीं सन् 2000 से ऐसा ही होता रहा है सरकार विदेशी पूंजी के बारे में समय समय नीतियों में संशोधन करती रहती है और बाद में रिर्व बैंक उनके मुताबिक अपने नियमों को बदल लेता है उसने यूं दलीलें दी जैसे यह बहुत सहज मामला हो संसद जैसी किसी चीका वजूद ही हो
पटीशनर ने सर्वउच्च अदालत को निवेदन किया कि वे कम से कम सरकार को नोटिस जारी करके बाकाइदा जवाब तो मांग लें सर्व उच्च न्यायलय के बैंच ने पहले तो सहमति प्रकट कर दी परन्तु जब सरकारी वकील ने कहा कि रिर्व बैंक ने नियम संशोधित कर लेने हैं तो सर्वउच्च न्यायलय ने बैंच से नोटिस जारी करने का विचार त्याग कर यह फरमान जारी कर दिया कि संसद के आगे 'नीतियां पेश करने की कोई आवशकता नहीं है
यह शासकों की में संसद की वास्तविक कीमत? इस संसद को वह ''भारतीय लोकतंत्र का पवित्र सतम्भ बना कर पेश करते हैं, वह क्रांतिकारियों को बदनाम करते हैं, कि यह संसदीय प्रणाली को नहीं मानते इस के लिए खतरा खड़ा करते हैं

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