Friday, February 1, 2013


 श्रुति-अगवा कांड विरोधी संघर्ष और
दिल्ली गैंगरेप की घटना

जन अनुभव की झलकें

तथा  सबक

सुर्ख-रेखा प्रकाशन

(जनवरी, 2013)
इस पैम्फलिट में
-कौन किसका सहारा!
    श्रुति-संघर्ष अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष      
-श्रुति अगवा कांड तथा हरियाणा-बलात्कार तूफान
    बलात्कारी निजाम, बलात्कारी सत्ता, बलात्कारी सियासत,
    बलात्कारी संस्कृति, बलात्कारी मीडिया      8
-श्रुति अगवा कांड के खिलाफ आक्रोश पूर्ण संघर्ष ललकार       20
-जनतक प्रचार अभियान की एक झलक         27
-संघर्ष जीता गया- श्रुति मां-बाप के सुपुर्द         34
-श्रुति की घर वापसी:
    लोक-संघर्ष की जीत भारतीय 'लोकतंत्र बेनकाब     37
-''आपका संघर्ष ही था जिसने मुझे शक्ति प्रदान की’’     40
-''जनतक लड़ाई जारी रखेंगे’’
    गुन्डागर्दी विरोधी ऐक्शन कमेटी, फरीदकोट का ऐलान        42
-श्रुति संघर्ष के सबकों का दामन थाम कर आगे बढ़ो     46
-दामिनी मौत से नहीं हारी       56
-बलात्कार आंधी आक्रोश       65
-''यह निजाम ही औरत-विरोधी तथा जन-विरोधी है’’   67
-''चुल्लू भर पानी में डूब जाएं आसाराम’’ 71

कौन किसका सहारा!
श्रुति-संघर्ष अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष
श्रुति अगवाकांड विरुद्ध संघर्ष का एक दौर लोगों की झोली को आंशिक जीत से नवाज गया है। अगवाकार बलातकारी अपराधी टोला लोगों की जागी तथा झिंझोड़ी हुई शक्ति ने राजसत्ता की गोद से घसीट निकाला है। जिस सुरक्षा कवच को पहनकर ये टोला अपराध जगत में बेधड़क उड़ता फिर रहा था, सुरक्षा कवच लोगों की ताकत ने चकनाचूर कर दिया है। एक प्रकार से इस टोले के साथ अनहोनी घटना हुई है। राजनैतिक सरपरस्ती तथा पुलिस की सुरक्षा का अहंकार फीका पड़ा है। राजसत्ता की हिमायती सीढ़ी के पैरों तले से सरक जाने पर ये टोला सीधा अदालत की दहलीज पर आ गिरा है। पटाखों की तरह रिवालवरों की गोलियाँ दागते, जश्न मनाते तथा ललकारे मारते रहे इस गिरोह के सदस्य होश ठिकाने आने पर रोते-बिलखते देखे गए हैं। यह श्रुति के लिए, उसके मां-बाप, भाईचारे तथा सभी सहानुभूति रखने वाले लोगों के लिए दिली तसल्ली की घड़ी थी। अगवाकार टोले ने ऐसी नौबत आने की संभावना के बारे में सोचा तक नहीं था।
बलातकारी राजसत्ता जन-संघर्ष के अन-अनुमानित तीखे जलवों सदका इस नतीजे पर पहुँच गया था कि इस गिरोह की सरे-आम हिफाजत जारी रखना बहुत मँहगा साबित होगा। राजसत्ता के मालिकों तथा उच्च पुलिस अधिकारियों के होश उड़ गए थे। उनके लिए ये समय अगवाकार तथा बलातकारी व्यक्तियों के निजी अस्तित्व की चिंता करने का नहीं था। लोगों की नाराजगी तथा आक्रोष के तेज से दागी हो चुके राजनैतिक कप्तानों तथा उच्च अधिकारियों की संभव हद तक हिफाजत की चिंता करने का था। अत: उन्होंने अगवाकार टोले को कम से कम एक बार तो सलाखों के पीछे डालने का कड़वा घूँट भर लिया था। उच्च अधिकारी इस हालत में भी माथा-खपाई करने लगे थे कि इस टोले की गिरफ्तारी के बाद मसले की राजनैतिक कडिय़ों को जग-जाहिर होने से बचाने के लिए क्या किया जाए। इन योजनाओं की चर्चाओं में एक दफा तो निशान का पुलिस मुकाबला बना देने पर हुए विचार-विमर्श की चर्चा भी शामिल है।
लेकिन पीडि़त श्रुति को ऐसे कदमों से आजादी हासिल न हुई। राजसत्ता की रजा अदालती नाटक द्वारा श्रुति पर ठोस दी गई। उसे पंजाब सरकार की बन्दी बना दिया गया। श्रुति को इस कैद से आजाद करवाकर पूरी दुनिया को आपबीती सुनाने के लिए स्थिति बनाने की खातिर जन-शक्ति को राजसत्ता से तीखी कशमकश के एक दौर में से गुजरना पड़ा। सभी कपटी, कमीने तथा बेईमानी के श नाकारा हो जाने के पश्चात् ही पंजाब की हुकूमत ने श्रुति के माता पिता को सौंपने का फैसला किया। जिसे अदालती फैसले द्वारा औपचारिक रूप दिया गया।
इसके पश्चात् श्रुति अगवाकांड के मुद्दे पर जन-शक्ति तथा सत्ता की शक्ति के मध्य टकराव का अगला दौर शुरू हुआ है जो अभी तक जारी है। 'प्रेम कहानी के मन-घड़न्त कसीदे तथा निशानों-घालियों का मुजरिमाना चरित्र अब बहस का मुद्दा नहीं रहा। अब श्रुति अदालत को भी तथा जनता को भी अपनी दासत्तां स्वयं बता रही है। इस दास्तां द्वारा राजनैतिक नेताओं, उच्च पुलिस अफसरों तथा यहां तक कि मीडिया के एक हिस्से और न्यायपालिका के कुकर्मों की सूची जग जाहिर हो रही है। श्रुति की तरफ से हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश के समक्ष दायर की गई पटीशन में पंजाब पुलिस के मुखी मुख्य-मंत्री के मीडिया सहालकार, बठिण्डा जोन की पुलिस के आई.जी., फरीदकोट रेंज के डी.आई.जी. तथा अन्य कई अधिकारियों के नाम अगवाकार गिरोह की सुरक्षा करने तथा श्रुति को बदनाम करने के दोषियों के रूप में गिने गए हैं।
श्रुति की इस आवाज को जन-शक्ति की तरफ से राजसत्ता के मालिकों के खिलाफ गूंजते नाअरों तथा फटकारों का मजबूत समर्थन हासिल है। 27 नवम्बर को फरीदकोट में जुड़ी भारी गिनती की जन-एकत्रता तथा लोगों का आक्रोश मुख्य रूप में अगवाकारों को पनाह देने वाली राजनैतिक-प्रशासनिक मंडली के खिलाफ सेधित था। लोगों ने श्रुति संघर्ष के अपने अनुभव में ये देख लिया है कि राजसत्ता बलातकारियों तथा अगवाकारों की ढाल है। दूसरी तरफ श्रुति जैसी मजलूम पीडि़त लड़कियों की ढाल जागृत हुए, गतिशील तथा संगठित लोगों की शक्ति है। बाद में अमृतसर में अकाली दल का जिला महासचिव बने एक लट्ठमार गुण्डे द्वारा एक लड़की को अपमानित करने, डराने-धमकाने और फिर उसके ए.ऐस.आई. पिता को कत्ल कर देने की घटना ने तथा इन सभी मामलों में पुलिस की निन्दनीय भूमिका ने इस बात की पुष्टि की है कि जैसे जैसे राजसत्ता की गैर-कानूनी लट्ठमार शाखाएँ फैल रही हैं, बहु-बेटियों तथा संबंधियों की सुरक्षा के लिए खतरा बढ़ रहा है। तेज किए जा रहे वर्गीय दमन के ये श समाजिक हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। देश की राजधानी में हुए ताजा खौफनाक बलातकार काण्ड ने एक अलग ढंग से पूरे देश के बारे में इस बात की गवाही पेश की है। दूसरी तरफ इस घटना के खिलाफ लोगों का आक्रोश छलकता दिखाई दिया है। धर्मों, जातियों, साम्प्रदायों तथा अन्य सीमा-रेखाएँ एक तरफ रह गई हैं। लोगों का आक्रोश राष्ट्रपति भवन की तरफ सेधित हुआ है तथा सरकार लोगों को मजलूम लड़की का पक्ष लेने की सजा देने के लिए लाठियों की बौछार पर उत्तर आई है। इन परिस्थितियों में बढ़ रही गुण्डागर्दी साधारन हिंसा का समाजिक मसला न रहकर राजनैतिक हिंसा तथा अत्याचारों के अंग के रूप में सामने आ रहा है। लोगों का ध्यान, आक्रोश तथा संघर्ष इस पहलू की तरफ सेधित होने की अच्छी झलकें मिल रही हैं। पहले ही संगठित जनतक समूहों की सरगर्मी के अतिरिक्त अब पंजाब में अलग अलग जगह विशेष गुण्डागर्दी-विरोधी प्लेटफार्म अस्त्तिव में आ रहे हैं तथा गुण्डागर्दी के राजनैतिक पक्ष को भी सम्बोधित हो रहे हैं।
इस दृष्टि से श्रुति  अगवाकांड के विरुद्ध संघर्ष की सबसे बड़ी प्राप्ति यह है कि इसने गुण्डागर्दी तथा बलातकार जैसे मसलों के पीछे सक्रिय मूलभूत वर्गीय टकराव को संघर्ष के मुद्दे के रूप में पंजाब की जनता के समक्ष पेश किया तथा उभारा है। निश्चित तौर पर इस प्राप्ति से बहु-बेटियों तथा उनके माता-पिता की सुरक्षा के सामाजिक मसले पर संघर्ष को बल मिलेगा ही मिलेगा। इससे भी बढ़कर ये प्राप्ति सामाजिक मुद्दों के वर्गीय तत्व की पहचान करने में लोगों की सहायता करेगी तथा वर्गीय संघर्षों को प्रचण्ड करने में भागीदार बनेगी।
जहाँ तक क्रांतिकारी शक्तियों की श्रुति  संघर्ष में भूमिका का सवाल है, संघर्ष की आंशिक सफलता में दरूस्त पहुंच तथा पैंतड़े को अपनाते हुए अदा किये क्रांतिकारी शक्तियों के रोल की न सिर्फ महत्वपूर्ण बल्कि निर्णायक भागीदारी रही है।
प्रत्यक्ष घोर अन्याय के खिलाफ न्यायसंगत, स्वभाविक स्थानीय जन आक्रोश का प्रतिनिधित्व कर रही गुण्डागर्दी विरोधी ऐक्शन कमेटी के प्लेटफार्म प्रति तथा संघर्ष के नेतृत्व तथा सहायता के मसले के प्रति दरुस्त पहुँच के कारण ही हरकत में आई लोक-शक्ति बिखराव से बच सकी है तथा लोगों की एकजुट शक्ति की चोट सफलतापूर्वक वास्तविक दुश्मनों के खिलाफ सेधित हो सकी है। विशेष तौर पर श्रुति की बरामदगी तथा निशान की गिरफ्तारी के पश्चात् लोक-शक्ति की सांझी तीव्र धार को बिना ऐलान सरकारी हिरासत में से श्रुति की रिहाई की तरफ पूरे जोर से केन्द्रित करने तथा हरकतशील करने के पैंतड़े ने बहुत सहत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फरीदकोट ऐक्शन कमेटी के नेतृत्व में चले संघर्ष को बाहर से मिली सहायता तथा भ्रातृ सुझाव तथा बाहर की हिमायती शक्ति का बल स्थानक शक्ति पर निर्भर करते हुए ही कारगर हो पाया है। सीमिताओं के बावजूद फरीदकोट ऐक्शन कमेटी का प्लेटफार्म एकजुट रूप में अगवा काण्ड के असल मुजरिमों के खिलाफ डट पाया है। इसी कारण लड़ाई का अच्छा नतीजा प्राप्त हुआ है तथा असल राजनैतिक-प्रशासनिक मुजरिमों को ऐसी राजनैतिक कीमत देनी पड़ी है, जिस के वे लायक थे।
क्रांतिकारी शक्तियों के सुचेत हिस्सों ने लोगों के बीच में नीम तथा गैर-प्रतिपक्षी विरोधों तथा दूसरी तरफ लोगों के दुश्मनों से असल तथा मुख्य विरोध में अंतर कायम रख कर चलने की समझदारी दिखाई है। कठिनाइयों के बावजूद संघर्ष की शक्तियों को एकजुट रखने तथा संघर्ष की धार को असल निशाने की तरफ सेधित रखने में सफलता प्राप्त की है।
(अगले पन्नो पर दी जा रही सामग्री श्रुति अगवाकांड तथा इसके खिलाफ हुए संघर्ष के विभिन्न पहलूओं तथा सबकों की झलक पेश करती है। इस सामग्री द्वारा हमने विभिन्न प्लेटफार्मों/शकसियतों का दृष्टिकोण भी पाठकां के सामने रखने का प्रयास किया है।)

















श्रुति अगवा कांड तथा हरियाणा-बलात्कार तूफान
बलात्कारी निजाम, बलात्कारी सत्ता, बलात्कारी सियासत, बलात्कारी संस्कृति, बलात्कारी मीडिया
यदि कोई अपनी नजरों के जाले को हटाकर देख सकता है तो श्रुति अगवा कांड की असलियत दिल दहलाने वाली ही नहीं है, बल्कि आँखें खोल देने वाली भी है तथा आक्रोश पैदा करने वाली भी। लोगों की आँखों में धूल झोंकने वाला बिकाऊ मीडिया इसे प्रेम कहानी बताता है। परन्तु जीती-जागती मानवीय संवेदना के लिए यह बलात्कारी पंजों में छटपटाती मासूमियत का दृश्य है। ये बलात्कारी पंजे किसी अकेले मर्द के पंजे नहीं हैं। ये राजसत्ता के पंजे हैं। वर्तमान सामाजिक निजाम के पंजे हैं। जन-दुश्मन सियासत के पंजे हैं। लहू मे रची हुई सामन्ती-संस्कृति के पंजे हैं तथा जनता को ''अंधी प्रजा ज्ञानहीन’’ (गुरू नानक देव जी की एक पंक्ति) में परिवर्तित करने की सेवा निभा रहे मीडिया के पंजे हैं।
श्रुति अगवा कांड ''इजत पर हाथ डालने’’ की साधारण घटना नहीं है। हालांकि ऐसी साधारण घटना भी अपने चरित्र तथा नतीजों के पक्ष से कभी भी साधारण घटना नहीं होती, घिनौना अत्याचार होती है। बलात्कार या इसकी कोशिश का शिकार हुई किसी औरत के बिना कोई भी उसके शारीरक तथा मानसिक संताप की गहराई को महसूस नहीं कर सकता। परन्तु फिर भी श्रुति अगवा कांड की घटना कुछ और रूप में घटी। किसी जीत के जश्न के पटाखों की भांति रिवाल्वर की गोलियां चली। बाहूबलियों की आर्थिक-राजनैतिक ताकत के नगाड़े की धमक से धरती कांप उठी। कत्लों, अगवाजनियों तथा हर प्रकार के संगीन अपराधों तथा अपनी राजनैतिक पहचान के तमगे जैसे अपनी छाती पर लगाए शहर में बेफिक्री से घूमने वाला अपराधियों का नीम-सियासी टोला, नागरिक सुरक्षा से वंचित श्रुति के परिवार पर झपटा और 'अमन-कानून को पैरों तले रौंध कर 15 वर्षीय मासूम बच्ची को उनके हाथों से छीनकर ले गया। अपनी लट्ठमार राजनैतिक सेवा तथा इसके बदले में हासिल हुई सियासी सरपरस्ती के नशे ने अगवाजनी के लिए किसी नाटक की जरूरत नहीं रहने दी थी। इस टोले को सीता को अगवा करने वाले रावण की तरह भीख माँगने का ढोंग रचाने की जरूरत नहीं थी। ये टोला तो दिन-दिहाड़े अपनी ताकत का झंडा लहराना चाहता था, श्रुति तथा उसके माता-पिता को इस टोले के विरुद्ध ऐफ.आई.आर. दर्ज करवाने की सजा देना चाहता था।
आश्रहीनता तथा बेवसी के अहसास से रौंध देना चाहता था। संगीन मुकद्दमों में मुजरिम करार दिया गया निशान, शासन की सरपरस्ती तले पल रही उस लट्ठमार ताकत का ''निशान’’ है, जो राज कर रहे वर्गों द्वारा रजा से बाहर हो रहे लोगों को तथा सियासी विरोधियों को भयभीत करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
इस कारण लम्बे समय तक पुलिस की बेहरकती, जिस का इकबाल अब स्वयं पंजाब के पुलिस-मुखिया को करना पड़ा है, चौकसी की कमी नहीं है, किसी प्रकार की ड्यूटी से कोताही का आम मामला नहीं है। ये 'निशानों तथा 'घालियों को सुरक्षित शरण देने की सोची-समझी नीति का नतीजा है। इस अहसास का नतीजा है कि फौज-पुलिस की बाजूओं के अतिरिक्त, शासकों को निशानों तथा घालियों जैसे लट्ठमारों की बाहों की भी जरूरत है। इन बाजूओं की दिल-दहलाने वाली ताकत को स्थापित करना, लोगों में इन्हें देखते ही थर-थर कांपने का डर पैदा करना, आज के रावण शासकों की जरूरत बनी हुई है। उच्च पुलिस अधिकारियों ने इस जरूरत के अनुसार चलते हुए अपना वही धर्म निभाया है, जिसकी उनसे उम्मीद की जाती है।
फिर भी हजारों जख्मी दिलों की आक्रोशपूर्ण आवाज ने तथा संगठित जन ताकत के जलवों ने बलात्कारी राजसत्ता तथा सियासत की नंगी आतंक-लीला पर पर्दा पोशी की कुछ राजनैतिक जरूरत पैदा की। इस पर्दा पोशी के अंग के रूप में वे उच्च पुलिस अधिकारी बदल दिये गए, जिन्होंने श्रुति की तथा-कथित चिट्ठी तथा श्रुति और निशान के तथा-कथित विवाह की तस्वीरें जारी की थीं। पंजाब पुलिस के मुख्य अधिकारी ने एक बार इस कार्यवाई को गलती माना। दोषियों के विरुद्ध कार्यवाई के मामले में, पुलिस की निश्क्रयता का इकबाल किया तथा ये प्रभाव देने की कोशिश की कि अब पंजाब की हुकूमत तथा पुलिस का सारा जोर अपराधियों के सुराग ढूंढ निकालने तथा उन्हें कानून के कटधरे में लाकर खड़ा करने में लगा हुआ है।
परन्तु कुछ दिनों के अन्तराल के बाद ही निशान तथा श्रुति को खोज निकालने का जो नाटक पेश किया गया, उसके सुत्रधार बने पंजाब पुलिस के मुख्य अधिकारी तथा मुख्य मंत्री के मीडिया सलाहकार ने पुन: गिरगिट की तरह रंग बदल लिया। नाबालिग श्रुति को फिर से निशान की 'पत्नी घोषित किया गया। अपने 'पे्रमी के साथ 'खुशहालश्रुति के कल्पित चित्र पेश किए जाने लगे। श्रुति अदालत में पेश की गई। उसने मां-बाप के पास जाने तथा मैडीकल करवाने की इच्छा प्रकट की। परन्तु जग की नजरों से दूर, अदालत ने भेदपूर्ण ढंग से श्रुति की दुबारा 'सुनवाई करके स्वयं ही ये कह दिया कि वह न मैडीकल करवाना चाहती है तथा न ही मां-बाप के पास जाना चाहती है। उसे नारी-निकेतन भेजने के नाम पर पुलिस के हाथों में सौंप दिया गया। श्रुति की इच्छाओं के 'प्रसारण का एकाधिकार पुलिस के हवाले कर दिया गया। उसे किसी से मिलने या न मिलने का अधिकार भी उच्च पुलिस अफसरों की मुट्ठी में दे दिया गया।
श्रुति की मां ने पत्रकारों को बताया था कि श्रुति यदि वह मां-बाप के पास जाती है तो निशान सारे परिवार को खत्म कर देगा। सभी जानते हैं कि श्रुति के अगवा करने वाला गैंग कत्लों, अगवाजनियों तथा डकैतियों के अपराधों से सिर से पैर तक लथपथ है। हिंसक धावा बोलकर अगवा की गई श्रुति लम्बे समय तक उसके पंजों में रही है। इस हालत में श्रुति को धमकाने तथा जबरदस्ती (धक्के से) अपनी मर्जी अनुसार चलाने की संभावना को रद्द करने का जरा सा भी आधार नहीं बनता। परन्तु पंजाब पुलिस के मुखी, मुख्य मंत्री के मीडिया सलाहकार, कुछ पत्रकारों तथा संपादकों ने प्रचारक अंधेरगर्दी का बीड़ा उठा लिया है। मुख्य-मंत्री का मीडिया सलाहकार, कुछ दिन पहले ही श्रुति की चिट्ठी तथा तस्वीरें जारी करने को गलत ठहराते सरकारी बयानों पर कालिख पोतकर स्वयं वही कुछ करने पर उतर आया है। यहीं बस नहीं, वो संघर्ष करते लोगों को धमकाने पर भी उतर आया है। वह कह रहा है कि प्यार के मामले को बलात्कार का मामला करार देकर लोगों को गुमराह किया गया है। अब असली कहानी पता चल गई है। अत: इस संभावना पर विचार किया जा रहा है कि श्रुति को अगवा करने का मामला उठाने वालों के विरुद्ध, लाऊड-स्पीकरों पर बलात्कार की रट लगाने वालों के विरुद्ध कानून की किस धाराओं के अधीन केस दर्ज किये जा सकते हैं। पुलिस-मुखी ने कहा है कि इस मसले को उठाने वाले खामखाह श्रुति की इजत खराब कर रहे हैं! ऐसा नहीं करने दिया जाएगा।
मीडिये का एक हिस्सा श्रुति मामले को मां-बाप द्वारा बेटियों का मर्जी से शादी करवाने का अधिकार रौंधने के मसले के रूप में पेश करने पर उतर आया है। एक अंग्रेजी अखबार का सम्पादकीय श्रुति को उन लड़के-लड़कियों में शामिल करता है, जो प्रति वर्ष पे्रम-विवाह करने के कारण मां-बाप द्वारा 1000 की गिनती में कत्ल कर दिये जाते हैं। उसके अनुसार श्रुति की 15 वर्षीय आयू मात्र एक तकनीकी मामला है। ये सम्पादक जी कहते हैं कि कानूनन चाहे इसे विवाह नहीं माना जा सकता, परन्तु किसी को प्रेम करने से कौन रोक सकता है! प्रत्येक पहलू पर नजर रखने के दमगजे मारने वाला मीडिया इस सच्चाई से आँखें मूंद लेता है कि निशान के खिलाफ श्रुति ने पहले ही उसे जबरदस्ती अगवा करने की ऐफ.आई.आर. दर्ज करवाई हुई है। इस ऐफ.आई.आर. को वापिस न लेने का मामला ही 23 सितम्बर को श्रुति के घर पर टूट पडऩे जैसे हिंसक अहंकार के प्रदर्शन का कारण बना है। इस प्रदर्शन में मर्दाना अहंकार, आर्थिक सरदारी के अहंकार, शक्तिशाली राजनैतिक हैसियत तथा सरपरस्ती के अहंकार, लट्ठमार गुन्डा ताकत तथा राजसत्ता के हिमायती सहारे के अहंकार के सभी अंश मौजूद हैं। कहने को कहा जा सकता है कि श्रुति ने ऐफ.आई.आर. मां-बाप के दबाव में आकर दर्ज करवाई होगी, परन्तु पक्षपाती नजर वाले मीडिया को कातिलों, डकैतों, लट्ठमारों के टोले तथा चोटी के पुलिस अधिकारियों द्वारा श्रुति पर किसी दबाव की संभावना तक नजर नहीं आती। ये बात भुलाई नहीं जा सकी कि राजसत्ता के जिन मालिकों और मीडिया को नाबालिग श्रुति के प्रेम के अधिकार की 'मीठी तरंगे बेचैन कर रहीं है, उनको प्रेम के अधिकार की हकीकी मामलों में बेटियों को मौत के मूँह में धकेल देने वाले धार्मिक सियासी चौधरीयों के कुकर्मों के समय जरा सी पीड़ा भी नहीं होती। परन्तु इतिहास में यह सच्चाई दर्ज हो चुकी है कि श्रुति पर झपटने वाले बलात्कारी गठजोड़ की वर्गीय-राजनैतिक वंशावली बेटियों के अरमानों का गला दबाने तथा जान की बलि ले लेने वाले बीबी जागीर कौर जैसे सियासतदानों के साथ एकजुट है।
(2)
श्रुति अगवा कांड दौरान कांग्रेसी सियासतदानों ने यह प्रभाव छोडऩे की कोशिश की है कि वह बलात्कारी प्रबन्ध तथा बलात्कारी सियासत का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके खिलाफ संघर्ष का झण्डा उठाने वाले हैं। परन्तु पड़ोसी राज्य हरियाणे की दशा पर दृष्टि डालते ही यह दावा हवा हो जाता है। हरियाणा बलात्कारी तूफान के दर्पण द्वारा भारत के बलात्कारी निजाम की घनी झलक देखी जा सकती है। पिछले तीन सालों में हरियाणा में बलात्कार की घटनाओं में 35 प्रतिशत बढ़ौतरी हुई है।
मासूम बच्चियों से लेकर विवाहित औरतों तक इस अत्याचार का संताप भोगते वालों में शामिल हैं। हरियाणे में बढ़ रहे बलात्कारों की वास्तविकता को सोनिया गाँधी ने 9 अक्तूबर को इन शब्दों में स्वीकार किया, ''मैं जानती हूँ कि बलात्कार की घटनाएँ बढ़ रही हैं। परन्तु ये केवल हरियाणे में ही नहीं हो रहा।’’ सोनिया गाँधी सच्चा खेड़ा गांव के दौरे पर आई थी, जहां 16 साल की लड़की ने बलात्कार का शिकार होने के पश्चात् स्वयं को आग लगाकर आत्मदाह कर लिया था। सन् 2011 में हरियाणा में बलात्कारों के 733 मामले सामने आए थे। बहुत सारे मामले समूहिक बलात्कारों के हैं। इन हिंसक हमलों का सब से ज्यादा शिकार दलित औरतें बन रही हैं।
औरतों के साथ बलात्कारों का सिलसिला हरियाणे में दलितों पर बढ़ रहे अत्याचारों के साथ सम्मिलित रूप में आगे बढ़ रहा है। 1989 में अनुसूचित जातियां तथा अनुसूचित कबीलों पर हो रहे शोषण को रोकने का कानून बना था। परन्तु इसका सबसे घोर उलंघन हरियाणा में हुआ है। हरियाणे में इस कानून अनुसार कोई भी कदम नहीं उठाया गया। किसी भी जिले को इस कानून अनुसार ज्यादतियों वाला क्षेत्र घोषित नहीं किया गया। जबकि दिल दहला देने वाली जुल्मी घटनाएँ धड़ाधड़ घटती रही हैं। पुलिस दलित औरतों के साथ हुए बलात्कारों को उपरोक्त कानून के अधीन दर्ज नहीं करती, साधारण बलात्कार कानूनों के अधीन ही दर्ज करती हैं। कानून ज्यादतियां रोकने के लिए प्रत्येक जिले में निगरान कमेटी बनाने को कहता है, परन्तु ये किसी भी जिले में नहीं बनाई गई। कानून सामाजिक न्याय मंत्रालय अधीन राज्य स्तर पर अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित कबीलों के लिए कमीशन बनाने को कहता है, परन्तु इसका कोई अस्तित्व नहीं है। कानून, हर महीने की 20 तारीख को डिप्टी कमिश्नरों से दलितों पर ज्यादातियों का रीव्यू करने की मांग करता है, परन्तु यह कभी किसी भी जिले में नहीं हुआ। कानून दलितों पर हो रही ज्यादतियों को रोकने के लिए विशेष अदालत कायम करने को कहता है, परन्तु ऐसी कोई भी अदालत मौजूद नहीं है। इन स्थितियों में 2007 से 2009 तक हरियाणा में दलितों के साथ अत्याचारों में 74 प्रतिशत बढ़ौतरी हुई है तथा इसके साथ जुड़कर ही बलात्कार की घिनौनी घटनाओं में उछाल आया है।
हरियाणा बलात्कार घटनाओं के विवरण दर्शातें हैं कि कैसे पूरा सामाजिक प्रबन्ध बलात्कारी मर्द को सुरक्षा प्रदान करता है। अनेकों परिवारों तथा औरतों के साथ मुलाकातों के दौरान ये बातें बार बार दोहराई गई हैं, कि पुलिस अक्सर ही लम्बे समय तक बलात्कार की ऐफ.आई.आर. दर्ज नहीं करती। मजलूम औरत पर समझौता करने के लिए दबाव डालती है। ऐसा ही गांवों के सामन्ती चौधरी करते हैं. एक सरपंच द्वारा बलात्कार की शिकार एक लड़की के पिता को धमकाया गया कि वह 35000 रुपए लेकर समझौता करले तथा मामले को खत्म करे, नहीं तो नतीजे भूगतने के लिए तैयार रहे। उसकी बेटी के साथ ऐसी बातें पिता के पास से अलग लेजाकर भी की गईं। पिता सरपंच के दरवाजे पर बेबस बैठा रहा, जब कि बलात्कार का दोषी सरपंच के घर में कुर्सी पर बैठा था।
ये खबरें भी छपी हैं कि किस प्रकार बलात्कार का शिकार होने वाली एक लड़की को तथा उसकी दोनों बहनों को गांव के स्कूल से निकाल दिया गया, जैसे उन्होंने कोई अपराध किया हो। वास्तव में ये बेटी के मां-बाप पर 'विधि के विधान को मान लेने के लिए तथा केस को आगे न बढ़ाने के लिए दबाव डालने की कोशिश थी। ये तथ्य भी कम दिल दहलाने वला नहीं है कि बलात्कार की शिकार एक लड़की का पिता पुलिस द्वारा ऐफ.आई.आर. दर्ज न करने तथा धैर्य छीन लेने वाले व्यवहार का सामना करने के बाद सदमा बर्दाश्त न कर पाया और अत्महत्या कर गया।
शासक पार्टी के सियासतदान आम तौर पर यही बात दोहराते रहे हैं कि बलात्कार के मामलों को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। सोनियां गांधी ने भी ''यह सभी जगह हो रहा है’’ कह कर हरियाणा की कांग्रेस सरकार की सफाई पेश करने पर ही जोर लगाया है। राजनैतिक नेताओं के दृष्टिकोण का नंगा इजहार एक कांग्रेसी नेता के इस बयान के माध्यम से हुआ कि जिन मामलों को बलात्कार के मामले कहा जाता है, उनमें से 90 प्रतिशत रजामंद सैक्स के मामले होते हैं। औरतों और तथाकथित नीची जातियों पर सामाजिक धौंस का प्रतिनिधित्व करती खाप पंचायतों ने ये कहकर सामन्ती संस्कृति की नुमाइश लगाई है कि बलात्कार का हल 15-16 साल की उम्र में लड़कियों की शादी करना है। ये बात ध्यान देने योग्य है कि प्रेम-विवाहों के मामले में यही खाप पंचायतें लड़के-लड़कियों तथा उनके परिवारों को बिरादरी से निश्कासित कर देने, गांव से बाहर निकाल देने, जलालत भरी हिंसक सजाएँ देने तथा उनकी जान तक ले लेने पर अमादा हो जाती हैं। परन्तु यदि किशोर बच्चियों के विवाह नहीं किये जाते तो उन्हें बलात्कार एक स्वाभाविक मामला लगता है। बलात्कारों में आई तेजी इनके लिए लड़कियों को बेटियों-बहूओं के रूप में घरों में कैदी बनाकर रखने की वकालत का बहाना बन जाती हैं। बलात्कारियों के लिए सजाएँ, सजाएँ देने की शौकीन इन पंचायतों के एजेंडे पर नहीं है।
लेकिन मसला केवल खाप पंचायतों तक सीमित नहीं है। सामन्ती सांस्कृति वर्गीय, जात-पातीय तथा मर्दाना प्रभुसत्ता और वोट बटोरने वाली राजनैतिक प्रभूसत्ता एक-दूसरे में पुर्णत:सम्मिलित हैं। इसकी पुष्टि औम प्रकाश चौटाला ने खाप पंचायतों के बयानों की हिमायत करके की, बाद में जिससे वो मुकर गया। यहीं पर बस नहीं, दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाले देश की राजधानी में भी राजनेता, औरतों के बराबरता के अधिकारों की गारंटी को असंभव करार देते हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बयान दिया है कि ऐसी सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकती। इसलिए औरतें समय को ध्यान में रखते हुए घरों से बाहर निकलें।
(3)
ऊपर हरियाणा के एक राजनेता द्वारा 90 प्रतिशत बलात्कारों को सहमती के मामले करार देने का जिक्र आया है, यह बलात्कारी प्रबन्ध के राजनैतिक चेहरे की मिसाल है। परन्तु अगर बलात्कारी प्रबन्ध का अदालती चेहरा देखना हो तो जजों की मानसिकता को टटोलना होगा। यह मानसिकता ऊपर जिक्र में आई मानसिकता से दो कदम आगे जाती है। 1996 में ''साक्षी’’ नाम के संगठन ने बलात्कार के मसले पर, जजों के विचारों का सर्वे किया। 119 जजों का विचार था कि मर्द, औरत की सहमति के बिना बलात्कार कर ही नहीं सकता। बेशर्मी की सीमा पार करते हुए कुछ जज तो यह कहने तक चले गए कि रजामन्दी के बिना शारीरक तौर पर लिंग का योनि में प्रवेश वैसे ही असम्भव है। यह मानसिकता बलात्कार को अपराधों की सूची में से खारिज कर देने की मानसिकता है। यह बलात्कार खिलाफ किसी भी कानून की आवश्यक्ता को रद्द करने वाली मानसिकता है। ऐसे जजों की नजरों में बलात्कार के मुकद्दमें कोई मुकद्दमें ही नहीं बनते। इस लिए यह कोई हैरानी वाली बात नहीं है कि पिछले समय में अदालतों में बलात्कार के लटकते मामलों की गिनती 78 प्रतिशत से बढ़कर 83 प्रतिशत हो गई है। जो फैसले हुए हैं, उनमें से एक चौथाई केसों में ही सजाएँ हुई हैं और बहुत से मामलों में न्यूनतम सजाएँ हुई हैं।
बलात्कारी प्रबन्ध का यह अदालती चेहरा सिर्फ मर्दाना अहंकार से भरी हुई मानसिकता की ही झलक पेश नहीं करता, इसमें उच्च जातीय अहंकार एवम् वर्ग अहंकार भी घुला हुआ है। ताकतवर लुटेरे वर्गों द्वारा अपने लट्ठमार गुन्डों और सैना-पुलिस द्वारा औरतों से बलात्कारी हिंसा को गरीबों को 'सबक सिखाने और जलील करने के लिए अक्सर ही इस्तेमाल किया जाता है। बलात्कारी प्रबन्ध की अदालती मानसिकता कैसे इस घिनौनी सामूहिक वर्गीय लिंग हिंसा को दोष मुक्त करती है, इसकी एक मिसाल बिहार के परारीया गांव में गरीब देहाती औरतों के साथ पुलिस लश्कर द्वारा बलात्कार किए जाने पर, इन औरतों के बारे में अदालत द्वारा अपने निर्णय में की गई नीचे लिखी टिप्पणी से मिलती है:-
''यह सम्भावना रद्द नहीं की जा सकती कि इन औरतों ने एक हजार रुपए की वह रकम हासिल करने के लिए झूठ बोला हो, जो उनके लिए एक भारी रकम बनती है।’’ हजार रुपए की यह रकम सरकार द्वारा बलात्कार की शिकार इन औरतों के मुआवजे के तौर पर दी गई थी, जनता के दबाव की वजह से दी गई थी और अपने चेहरे पर पर्दा डालने के लिए दी गई थी। जज ने उपरोक्त पंक्तियों से पहले दोषी पुलिसकर्मियों द्वारा पेश हुए वकील की दलीलों के हवाले दिए, जिनमें कहा गया था कि इन गरीब औरतों की ''इजतदार शरीफ घरों से सम्बन्धित’’ औरतों के साथ तुलना नहीं हो सकती, क्योंकि यह नीचे दर्जे के धन्धे करने वाली और अविश्वसनीय चाल चलन वाली औरतें हैं।
इन हालतों में औरतों से बलात्कार एवं अगवाजनियों की गिनती का ग्राफ निरन्तर ऊपर जा रहा है। 2010 में देश भर में बलात्कार के 5484 मामले सामने आए जबकि 2011 में यह गिनती 7112 तक पहुँच गई। इस समय दौरान अगवाजनियों की संख्या 10670 से बढ़कर 15282 तक जा पहुंची।
हरियाणा में बलात्कार का संताप झेल रहे गरीब परिवारों की अनेकों कहानियां दिखलाती है कि इस अपराध के खिलाफ लड़ाई के दौरान एक अकेले मर्द से नहीं, पूरे प्रबन्ध के घिनौने व्यवहार से ही पाला पड़ता है। देहाती चौधरियों की सामाजिक ताकत, धन-दौलत की ताकत, राजनेताओं के समर्थन की ताकत, पुलिस की ताकत और अदालती ताकत सब सीधे या टेढ़े ढंग से मजलूम औरत और उसके परिवार के खिलाफ खड़ी हो जाती है। परेशान करती है और मनोबल को गिराती है। कितने ही परिवारों ने अपनी कहानी बताई है कि कैसे परेशानियों के बाद केस दर्ज हो जाने के बाद भी उन पर धमकियों और खतरों की तलवार लटकती रहती है। घर का गुजारा चलाने और मुकद्दमा लडऩे के दरमियान तीखा आर्थिक तनाव पैदा हो जाता है, जो हर पल आत्मा को रौंधता रहता है।
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सामन्ती संस्कृति बलात्कारियों के लिए तगड़ा सहारा बनती है। यह बलात्कार की शिकार निर्दोष और मजलूम लड़की को अलगाव एवं बेबसी की हालत में धकेल देता है। समाज उसे तिरस्कार की नजरों से देखता है। वह सीता की तरह किसी अग्नि परीक्षा में से निकल कर 'पवित्र होने का सबूत भी नहीं दे सकती, क्योंकि आज के बलात्कारी प्रबन्ध का रावण रामायण के रावण से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है! उसे समाज ताने कसता और मजाक उड़ाता नजर आता है, शर्मिदन्गी उसे स्वैच्छित कैदी में बदल देती है। इन दिनों हरियाणे की कितनी ही माताओं ने कैदी बनने के लिए मजबूर हुई अपनी बेटियों की दास्तां सुनाई है। कुछ मामले ऐसे भी हैं, जहां समाज की तीखी नजरों से बचने के लिए और ताकतवरों की धौंस से दूर होने के लिए परिवारों के गांव छोड़ जाने तक की नौबत आई है।
इस सामन्ती संस्कृति ने लोगों के मनों को जकड़ा हुआ है। यह संस्कृति बलात्कार का शिकार लड़की के अपनों को भी बेगाने में बदल देती है। उसे 'दुषित और 'दोषी बना देती है। उसे शक की नजरों से देखा जाता है। वो माता-पिता, भाईयों तथा भाईचारे के लिए बोझ समझी जाती है। जिस हद तक हम बलात्कारी प्रबन्ध की जड़ों की ताकत बनते हैं. उस हद तक हम खुद भी मुजरिमों की श्रेणी में आते हैं। बेटियों को नसीहतें देने और कैदी बनाने का मार्ग अपनाते हैं। दिमागों पर पड़ी सामन्ती संस्कृति की मिट्टी बलात्कार के मामलों पर मिट्टी डालने के लिए प्रेरित करती है और बलात्कारी प्रबन्ध उसका फायदा उटाता है। पंजाब के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार द्वारा यह कहना कि श्रुति अगवा कांड के खिलाफ आवाज उठा कर श्रुति को बेइजत किया जा रहा है, सामन्ती संस्कृति का तीर चला कर लोगों को भटकाने की ही कोशिश है।
वे सभी लोग बधाई के हकदार हैं, जिन्होंने श्रुति अगवा कांड के खिलाफ संघर्ष का झण्डा उठा कर साधारण लोगों और महिलाओं के स्वाभिमान की रक्षा के लिए आवाज बुलन्द की है। सुचेत या अचेत उन्होंने बलात्करी प्रबन्ध से टक्कर ली है और इसके विभिन्न रूपों की अपने तजुर्बे द्वारा पहचान की है। साधारण लोगों एवम् महिलाओं के स्वाभिमान की रक्षा के लोकतांत्रिक अधिकार को जोर से बुलन्द करने के लिए जरूरी है कि बलात्कारी प्रबन्ध की असलियत को और अच्छी तरह समझा जाए, संगठित जन शक्ति और संघर्षों को प्रचन्ड किया जाए और गली-सड़ी सामन्ती सांस्कृतिक मुल्यों से छुटकारा पाने और इनको चुनौती देने के मार्ग पर चला जाए।
श्रुति अगवा कांड के खिलाफ आक्रोश पूर्ण संघर्ष ललकार
(जन आत्म-सम्मान का परचम बुलन्द)
24 सितम्बर को फरीदकोट शहर की घनी आबादी में रहते एक पढ़े-लिखे मुलाजिम परिवार की 10वीं कक्षा में पढ़ती 15 वर्षीय नाबालिग लड़की को शहर के एक बदनाम निशान सिंह का 8 सदस्यों वाला गुन्डा गिरोह अगवा करके ले गया। पिस्तौल एवम् लोहे की राडों से लैस गुन्डों से मां-बाप ने खाली हाथ मुकाबला किया। गुन्डों ने उनके बाजू तोड़ डाले तथा सिरों पर राडों से प्रहार किया। ये पूर्ण रूप से जानलेवा हमला था। इस अत्यन्त घिनौनी घटना ने लोगों को पुराने समय में हथियारबद्ध डाकूओं द्वारा घरों से युवा लड़कियां को उठा ले जाने की याद ताजा करवा दी है।
घटना की फौरन सूचना मिलने के बावजूद, कम से कम एक घन्टे बाद पहुँचे डी.ऐस.पी. ने पुलिस धमकियों भरा क्रूरतापुर्ण व्यवहार किया। निशान सिंह और उसके गुन्डा गिरोह की पीठ थपथपाने वाली पुलिस के बारे में श्रुति  के मां-बाप और फरीदकोट के लोगों को तभी से स्पष्ट हो गया था जब इसी निशान सिंह के गुन्डा गिरोह द्वारा जून महीने में अगवा की गई श्रुति को पुलिस से हुई गुप्त बातचीत द्वारा एक महीने बाद चाहे वापिस लाने के लिए मजबूर होना पड़ा था, पर उस वक्त श्रुति द्वारा अगवा और बलात्कार की लिखवाई रिर्पोट पर पुलिस ने कोई कार्यवाई नहीं की थी और निशान सिंह को थाने बुलाए जाने की कोशिश भी नहीं की थी, गिरफ्तार करना तो कहीं दूर की बात थी।
फरीदकोट के लोगों के मनों में पुलिस गुन्डा गठबन्धन के खिलाफ नाराजगी और गुस्सा दूसरी बार की घटना ने और बढ़ा दिया। उन्होंने तुरन्त एक ऐक्शन कमेटी बना कर कोतवाली के आगे लगातार धरना शुरू कर दिया। जैसे जैसे इस दर्दनाक घटना की खबर फैलती गई, धरने में लोगों का शामिल होना भी बढ़ता गया। 28 सितम्बर को सारा फीरदकोट शहर बन्द किया गया। 30 सितम्बर को दोबारा फिर शहर बन्द करके डी.सी. दफ्तर के आगे दिए धरने के अतिरिक्त सादिक, गोलेवाला, दीप सिंह वाला आदि आस-पास के कई बस अड्डों पर जाम लगाने जैसे जनता की बड़ी गिनती वाले ऐक्शनों ने इस स्थानीय धरने को इलाका स्तरीय तीखे संघर्ष में बदल दिया। विभिन्न किसान, खेत मजदूर, नौजवान और विद्यार्थी संगठन इस संघर्ष में शामिल हो गए।
तीखा हो रहा संघर्ष और बादल सरकार की कलाबाजियां
फरीदकोट के लोगों में चर्चा है कि निशान सिंह को शासक पार्टी अकाली दल के नेताओं की सरपरस्ती हासिल है। 24 सितम्बर को श्रुति को अगवा करने के एक दिन पहले लोगों ने निशान सिंह को बाबा फरीद मेले के अवसर पर सुखबीर बादल की उपस्थिति में वी.आई.पी. कुर्सियों पर बिराजमान देखा है। इस दिन मजीठीए के सहपाठी और यूध अकाली दल के एक लीडर के घर जब सुखबीर बादल गया तो निशान सिंह भी साथ ही था। इस प्रकार इस अपराध के कदमों के निशान शासक पार्टी अकाली दल के नेताओं की तरफ जा रहे थे। इन सबूतों से लोगों में आक्रोश की अग्नि दिन-प्रतिदिन तेज हो रही थी। लेकिन जब जिले के ऐस.ऐस.पी. तथा डी.ऐस.पी. की तरफ से अखबारों में निशान सिंह और श्रुति के तथाकथित विवाह की तस्वीरें जारी की गईं एवं साथ ही दावा किया गया कि श्रुति निशान के साथ अपनी मर्जी से गई है इस बात ने लोगों के आक्रोश की अग्नि के लिए तेल का काम किया। 12 अकतूबर को फरीदकोट, कोटकपूरा, बरगाड़ी, बाजाखाना, सादिक और गोलेवाला समेत समूचा जिला बन्द कर के हजारों लोगों ने डी.सी. दफ्तर के आगे रैली की और घन्टा भर जाम लगाया। यहाँ तक कि कोटकपूरा शहर में भी चाय और कैमिस्टों की दुकाने बन्द रहीं। शहर के विभिन्न समाज सेवी, व्यापारिक और राजनैतिक संगठनों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ धरना लगा कर नारेबाजी की।
इस बढ़ रहे दबाव से पुलिस को तीन अकाली नेताओं को सी.आई.ए. थाने बुलाकर पुछताछ करने का ड्रामा रचना पड़ा और गुन्डा गिरोह के कुछ सदस्यों को गिरफ्तार करना पड़ा। इनहीं दिनों पुलिस को इस अगवा कांड से जुड़े अकाली नेता डिम्पी और निशान सिंह की मां नवजोत कौर की पुर्व जमानतें रद्द करनी पड़ीं। दोनों बादल, बाप-बेटे को और पंजाब के राजपाल को अपने अपने फरीदकोट दौरे रद्द करने पड़े और डिम्पी परिवार को उसके बाप के अंतिम संस्कार के मौके पर तीखे सामाजिक बाईकाट का सामना करना पड़ा। सुखबीर बादल को, निशान के साथ अपने सम्बंधों पर पर्दा डालने के लिए उसकी गिरफ्तारी के लिए 5 लाख रुपए के इनाम का ऐलान करना पड़ा। मुख्य मंत्री बादल द्वारा 21 अक्तूबर को बरामद हुई श्रुति को खुद आकर मां-बाप को सौंपने (तथा राजनैतिक छवि बहाल करने अनु:) की इच्छा पूरी न हो सकी। छोटे एवम् बड़े दोनों मुख्य मंत्रियों ने ऐसी कलाबाजियां तो दिखाईं परन्तु एक बार भी इस घटना पर दु:ख व्यक्त नहीं किया, श्रुति के मां-बाप से हमदर्दी के दो शब्द भी नहीं कहे और गुन्डा गिरोह के सरगना निशान के खिलाफ जुबान तक नहीं खोली।
निशान सिंह के गुन्डा गिरोह की इस जंगली करतूत ने स्कूल-कॉलेज में पढ़ती लड़कियों के मनों में आक्रोश की आग भड़काई है। 23 अक्तूबर को बठिन्डा शहर में पंजाब स्टूडैंटस यूनीअन (शहीद रंधावा) के नेतृत्व में राजिन्द्रा कालेज, पंजाबी युनिवर्सिटी रीजनल सेन्टर और सरकारी आई.टी.आई. की सैंकड़े महिला विद्यार्थीयों द्वारा रोष प्रदर्शन किया गया। यह रोष प्रदर्शन श्रुति अगवा कांड में सामने आ रही पुलिस, तथा राजनैतिक नेताओं की शर्मनाक भूमिका के विरोध में किया गया है। छात्राओं ने पुलिस-गुन्डा-राजनैतिक गठबंधन के खिलाफ नारे लगाए और अंत में जिला कचहरियों के पास पुलिस प्रशासन, गुन्डा गिरोह और राजनैतिक नेताओं के गठजोड़ का पुतला फूँका।
संघर्ष कर रही ऐक्शन कमेटी के अह्वान पर 24 अक्तूबर को दशहरे वाले दिन विभिन्न शहरों और कस्बों में रावण की बजाए पुलिस, गुन्डा गिरोह एवं राजनैतिक गठजोड़ की अर्थियां फूँकी गईं। भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां) और पंजाब खेत मजदूर युनियन ने इनके पुतले बना कर फरीदकोट के अतिरिक्त लंबी (मुक्तसर), अबोहर (फाजिलका), भटिण्डा, दिड़बा (संगरूर), मानसा, बरनाला, अजितवाल (मोगा), फतेहगढ़ चूड़ीयां (गुरदासपुर), लोपो के और रमदास (अमृतसर) ग्यारह जगहों पर परिवारों समेत भारी गिनती में इकट्ठा हो कर इन बुराई की ताकतों के पुतले फूँके। लोक मोर्चा पंजाब और टी.ऐस.यू. द्वारा लगभग सभी स्थानों पर और पी.एस.यू. (शहीद रंधावा) और नौजवान भारत सभा द्वारा कई जगहों पर बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया।
फरीदकोट शहर में भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां) के नेतृत्व में सैंकडों किसानों, मजदूरों ने दिन के समय शहर में रोषपूर्ण प्रदर्शन किया और पुलिस प्रशासन को पुतलों से किसी किसम की छेड़छाड़ करने से सख्ती से सावधान करते हुए शाम को होने वाली एकत्रता का माहौल तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विभिन्न संगठनों और संघर्ष कमेटी के नेताओं ने हजारों लोगों की एकत्रता को संबोधित किया। श्रुति के पिता ने धरने को सम्बोधित करते हुए कहा कि उसे पंजाब सरकार या पुलिस से इन्साफ की कोई उम्मीद नहीं है। उसने घटना की सी.बी.आई. से जांच की मांग की।
जिला बठिन्डा में भी विभिन्न संगठनों द्वारा टीचर्ज होम में रैली करने के पश्चात् शहर के बाजारों में रोष प्रदर्शन किया गया और मिनी सचिवालय के सामने पुलिस-सिआसत-गुन्डा गठजोड़ के पुतले फूँके। सैंकड़ों लोगों की एकत्रता में भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां), पंजाब खेत मजदूर यूनियन, नौजवान भारत सभा, डेमौक्रेटिक टीचर्ज फ्रन्ट, पी.एस.यू. (शहीद रंधावा) और विभिन्न संगठनों समेत लोक मोर्चा पंजाब भी शामिल हुए।
महल कलां और जैतो में भी मुख्य मंत्री का पुतला फूँका गया। मानसा में दो लड़कियों ने खुद पुतलों को आग लगाई। बरनाला में दो विभिन्न जगहों पर पुतले फूँके गए। लंबी में भारी गिनती में सैंकड़ों किसानों, मजदूरों, आर.एम.पी. डाक्टरों और युवाओं ने रोष रैली करने के बाद भारी गिनती में तैनात पुलिस की उपस्थिति में पुलिस, सियासत, गुन्डा गिरोह के पुतले फूँके।
अब सरकारी गिरफ्त में संताप झेल रही श्रुति
श्रुति को बरामद करने के पश्चात् चीफ जुडीशियल मजिसट्रेट के सामने दिए गए उसके बयान को राजनैतिक दबाव की वजह से रहस्यमयी ढंग से बदल दिया गया। ऐसा ही मैडीकल जाँच के सवाल पर श्रुति की इच्छा के बारे में हुआ। श्रुति को बरामद करके उसे मां-बाप को सौंपने के पुलिस अधिकारियों द्वारा किए गए वादे भुला दिए गए। श्रुति को मां-बाप को सौंपना तो दूर की बात है, उसे उनसे मिलने तक न दिया गया और पुलिस की गिरफ्त में जालन्धर नारी निकेतन भेज दिया गया। नारी निकेतन के स्टाफ द्वारा ऐसे संगीन मसले में आई हुई लड़की को नारी-निकेतन में रखने से इन्कार कर देने पर वहां पुलिस का पहरा लगा दिया गया। यानि गुन्डा गिरोह के हाथों से लेकर अब श्रुति को सरकार ने अपने कब्जे में रखा हुआ है। उससे मिलने गए मां-बाप को उसे मिलने की अनुमति नहीं दी गई। पुलिस की मौजूदगी में उसकी मां को सिर्फ दो मिनट मिलने दिया गया। इस दौरान मां-बेटी गले लग कर रोती रहीं। इतने में ही मिलने का समय समाप्त हो गया।
सरकार और उसकी पुलिस ने जो सख्त पाबंदी श्रुति के मां-बाप को मिलने पर लगाई हुई है, ऐसी पाबंदी तो जेल में सजा काट रहे कत्लों जैसे संगीन जुर्मों के किसी अपराधी पर भी नहीं लगाई जाती। इस घोर अन्याय के खिलाफ संघर्ष कमेटी ने एक बड़ा काफिला ले कर नारी निकेतन श्रुति को मिलने जाने के ऐलान के साथ, पुलिस द्वारा न मिलने देने की स्थिति में वहीं धरना मारने का ऐलान कर दिया।
अगले दनि श्रुति का स्वास्थ्य खराब होने पर उसे पुलिस की निगरानी में चोरी-चोरी रात के अन्धेरे में फरीदकोट ला कर, जज के सामने पेश कर, मैडीकल बोर्ड द्वारा जांच के हुक्म प्राप्त किए गए। पता लगने पर शहर के सैंकड़ों लोगों ने फरीदकोट  मैडीकल कॉलेज अस्पताल के आगे धरना लगा दिया। पुलिस, अस्पताल के पिछले दरवाजे से श्रुति  को ले कर फरार हो गई।
संघर्ष कमेटी द्वारा नारी-निकेतन के आगे धरना मारने के किए ऐलान से घबराहट मानते हुए सरकार को श्रुति के मां-बाप को जालन्धर बुला कर श्रुति से मिलाने का एक ड्रामा और करना पड़ा है। श्रुति की मां के द्वारा मांग करने पर उसे अलग हो कर मिलने की इजाजत भी देनी पड़ी है। श्रुति की मां ने बाद में पत्रकारों को बताया कि श्रुति बहुत डरी हुई है और वह घर आना चाहती है। यह पूरा घटनाक्रम इस बात की स्पष्ट गवाही देता है कि श्रुति को अब गुन्डों की जगह सरकार ने अगवा किया हुआ है।
शिकंजे में फंसी बादल सरकार
पहले ही बादल सरकार को, दिन-ब-दिन जागृत हो रहे मेहनतकश और इन्साफपसन्द लोगों का बार बार सामना करना पड़ रहा है। अपने जन-विरोधी और राष्ट्र विरोधी काले कारनामों की वजह से उसे जगह जगह किसानों मजदूरों और अनेक वर्गो के लोगों के दिनों-दिन तीव्र हो रहे संघर्षों का सामना करना पड़ रहा है।
एक जन-विरोधी सरकार होते हुए ये अपनी राजनैतिक कदरों कीमतों से भी बुरी तरह गिर चुकी है और संघर्षशील एवम् इन्साफपसन्द सामाजिक हिस्सों में अपनी बची खुची प्रतिष्ठा भी गंवा चुकी है। श्रुति अगवा कांड ने इसकी इस अवस्था को सिरे लगा दिया है। दोनों बादलों द्वारा फरीदकोट जाने की हिम्मत न कर सकना इस स्थिति की स्पष्ट एवं उग्र मिसाल है।
दरअसल- अकाली भाजपा सरकार और विशेष कर बादल परिवार विभिन्न संगीन अपराधों के दागों से भरे हुए हैं। वे निशान सिंह को सुरक्षा कवच उपलब्ध कराने के लिए तत्पर हैं। परन्तु सरकार ऐसा करते हुए खुद अपने ऊपर इस से भी ज्यादा संगीन दागों को लगवाने के रास्ते पर पड़ी हुई है और जन-विद्रोह की तीव्र हो रही तरंगों को आमन्त्रण दे रही है। परन्तु ताकत के नशे में अन्धे हुए बादल परिवार को अपने राज-शक्ति की सलामती के लिए यही रास्ता ठीक लग रही है। उन्हें लगता है कि इस रास्ते पर चल कर ही वे पंजाब पर ''25 साल’’ राज कर लेंगे।
श्रुति अगवा कांड विरोधी संघर्ष, एक पंजाब स्तरीय संघर्ष में तबदील होने की सम्भावनाएं लिए बैठा है। विशाल जन-विरोध के पंजे में फंसी अकाली भाजपा सरकार साल सवा साल तक आ रहे लोक सभा चुनाव के मद्देनजर ऐसी स्थिति से बचना चाहती है। परन्तु गुन्डा गिरोह को पालने तथा सुरक्षा देने के अपने कर्म-धर्म में वो इतना आगे बढ़ चुकी है कि उसके निकल पाने की कोई राह नहीं है। अगर श्रुति मां-बाप के सुपुर्द नहीं की जाती है तो जन-विरोध ठन्डा नहीं होगा। अगर सुपुर्द कर दी जाती है तो पता नहीं वह कौन कौन से अकाली नेताओं की करतूतों को सामने ला कर रख दे। चाहे बड़े बादल की श्रुति को अपने हाथों से मां-बाप के सुपुर्द करने की सियासी चाल फेल हो गई है। फिर भी सियासत के अपने उम्र भर के तुजुर्बे से संघर्ष को तोडऩे के लिए और पंजाब के दूर-दराज के गांवों-शहरों तक रोजाना हो रही थू-थू को बन्द करने के लिए वह कोई पत्ता खेल सकता है।
इस हालात में ज्यादा से ज्यादा सतर्कता बरकरार रखते हुए संघर्ष कमेटी के लिए भी अपना संघर्ष जारी रखने और आगे बढ़ाने के सिवा कोई चारा नहीं है। ताजा समाचारों के अनुसार संघर्ष कमेटी और श्रुति के मां-बाप संघर्ष सें डटे हुए हैं। विभिन्न किसान मजदूर नौजवान और विद्यार्थी संगठन संघर्ष के दृढ़ समर्थन पर डटे हुए हैं। भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां) और पंजाब खेत मजदूर यूनियन द्वारा 55000 की गिनती में एक हाथ-पर्चा छपवा कर प्रान्त के विभिन्न शहरों में बांटा जा रहा है। युवाओं की बड़ी टोलियां इसे बांटने के लिए पूरे उत्साह से आगे आ रही हैं। 5 नवम्बर को जिला स्तरीय रैलियां, प्रदर्शन और पंजाब सरकार के मुख्म मंत्री के विशेष सलाहकार- बैंस के पुतले फूंकने का अह्वान किया गया है। 9 नवम्बर को विभिन्न जनतक संगठनों ने बठिन्डा शहर में एक विशाल प्रदर्शन करने का ऐलान किया है।












जनतक प्रचार अभियान की एक झलक
(किसानों-खेत मजदूरों का हैंडबिल)
इन्साफपसंद लोगो,
फरीदकोट में हुए श्रुति अगवा कांड के मामले में पुलिस प्रशासन और अकाली-भाजपा सरकार गुन्डा गिरोह के हक में पूरी तरह डट गई है। वह 15 साल की नाबालिग लड़की को गुन्डा गिरोह मां-बाप के बाजू तोड़ कर और गोलियां चला करे घर में से बालों से घसीट कर अगवा करने वाली दिल दहला देने वाली घटना को लड़की के मर्जी से घर से भागने की कहानी में बदलने के लिए सख्त जोर लगा रही है। इस  गुन्डागर्दी के विरुद्ध आवाज उठाने वाली ऐक्शन कमेटी और संघर्षशील लोगों के संगठनों पर कानूनी कार्यवाई की धमकियां दे रही है। वह जादूगरों की तरह काले को सफेद और सफेद को काला दिखलाने का खेल खेल रही है। वह पीडि़त और नाबालिग लड़की को अपनी कैद में रख कर मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रही है। ''श्रुति डाकटरी जांच नहीं करवाना चाहती।’’ ''श्रुति मां-बाप के पास नहीं जाना चाहती।’’ ''श्रुति मां-बाप को नहीं मिलना चाहती’’ ''श्रुति मर्जी से गई थी।’’ ''श्रुति अपने आप को निशान की पत्नी कहती है।’’ आदि खबरें फैला कर सरकार एक तीर से कई शिकार करना चाहती है। एक तो वह अगवा के दोषी निशान को बचाना चाहती है और ऐसे गिरोहों का खुद में भरोसा पक्का करना चाहती है। दूसरा इस केस से जुड़ कर हुई अपनी बदनामी का दाग धोना चाहती है। तीसरा गुन्डा गिरोह की अकाली नेताओं से जुड़ी तारों पर पर्दा डालना चाहती है। चौथा संघर्षशील और इन्साफपसन्द लोगों द्वारा लड़े गए और लड़े जा रहे हकी संघर्ष को अनावश्यक और गलत साबित करना और कुचलना चाहती है।
सिर चढ़ कर पुकारती हकीकत को पहचानो
संघर्ष इरादे प्रचण्ड करो
यह जाना पहचाना सत्य और तथ्य है कि श्रुति 15 वर्षीय नाबालिग लड़की है, जो कत्लों और बलात्कार जैसे गम्भीर केसों में भगौड़े गुन्डा गिरोह के सरगने निशान और पुलिस के चुंगल में लगभग एक महीना रही है। इसके बावजूद जब श्रुति को सब से चोरी, भारी पुलिस फोर्स की मौजूदगी में मूँह ढ़क कर एक बड़े और खतरनाक अपराधी की तरह फरीदकोट की अदालत में पेश किया गया तो जजों, वकीलों, पुलिस और मां-बाप के पास जाने का बयान दिया। पर इसके बाद वकीलों और मां-बाप को अदालत से बाहर निकाल कर, और कुछ देर बाद फिर अन्दर बुला कर बताया गया कि वह मां-बाप के पास नहीं जाना चाहती। यह सच्चाई है कि लड़की ने यह बात मां-बाप और वकीलों के सामने  अपने मूँह से नहीं कही। बल्कि यह भी सच है कि अदालत में उसने अपनी मर्जी से घर से जाना या विवाह करवाने के बारे में नहीं कहा। इससे आगे जालन्धर के नारी निकेतन में मिलने जाना चाहते मां-बाप को भी पुलिस अपनी निगरानी में ही ले कर गई। वहां भी पुलिस वालों ने ही मां-बाप को आकर कहा कि श्रुति उनसे मिलना नहीं चाहती।
पर जब मां-बाप द्वारा जोर डालने के बाद श्रुति को उसकी मां के सामने लाया गया तो उसने कोई इन्कार नहीं किया बल्कि वह मां की गोद में आ कर रोती रही। अभी मां-बेटी के छलकते बेताब मन का बोझ हल्का भी नहीं हुआ कि मौके पर मौजूद पुलिस अफसरों ने एक-दो मिन्ट बाद ही यह कह कर दोनों को अलग कर दिया कि समय पूरा हो गया है, जैसे श्रुति कोई कैदी हो। कैसा घोर अन्धकार है, कत्लों डकैतियों और बलात्कार जैसे अति घिनौने अपराधों के दोषियों को तो सजाएं होने के बाद भी मां-बाप, रिशतेदारों, दोस्तों आदि सब के साथ जेलों में घन्टों तक मुलाकात की छूट दी जाती है। पर यहां जुल्म का शिकार हुई बच्ची को अपने मां-बाप से मिलने की भी रोक लगा रखी है। जरूरत तो इस बात की थी कि लड़की को अदालत में पेश करने से पहले मां-बाप से मिलने की आजादी दी जाती। जब कि मां-बाप और ऐक्शन कमेटी ऐस.ऐस.पी. से यह मांग भी कर चुके थे और प्रशाासन द्वारा मिलाने का वादा भी किया गया था। फिर भला क्यों नहीं मिलाया गया? और अभी भी भला उसे मिलने पर क्यों रोक लगा रखी है? सो स्पष्ट है कि पहले श्रुति को गुन्डा गिरोह के प्रधान निशान द्वारा अगवा कर के रखा गया और अब बादल सरकार द्वारा योजनाबद्ध ढंग से अगवा करके ही रखा गया है।
लड़की के मन पर इस घटना के सहम और दहश्त की सच्चाई तो इतनी मूँह जोर है कि पुलिस के उच्च अधिकारियों को खुद मानना पड़ा है कि वह मानसिक तौर पर परेशान है। यहां तक कि कूड़ प्रचार में सबसे आगे रहे एक समाचार पत्र को भी यह सच्चाई लिखने पर मजबूर होना पड़ा कि लड़की मानसिक तौर पर परेशान है। इतनी बड़ी घटना होने के पश्चात् उसके कोमल मन पर पड़े भय को दूर करने के लिए जरूरत तो यह थी कि उसे चैन भरे और मन हल्का करने वले खुले और आम माहौल में रखने के लिए मां-बाप के सुपुर्द किया जाता, परन्तु हुआ इससे बिल्कुल विपरीत। बादल सरकार, पुलिस प्रशासन  और अदालती कार्यवाई का अमल जिस दिशा में बह रहा है, इस से यह चिंता भी निराधार नहीं है कि सरकार द्वारा वहां तैनात किए गए विशषज्ञ श्रुति को तनाव मुक्त करने की बजाए उसे और भी बद्तर हालत में पहुँचाने का कारण बन जाएं और फिर सरकार उसे पागल करार दे कर किसी पागलखाने में पहुँचा दे।
बलिहारे जाएँ ऐसी 'पंधक सरकार के जो श्रुति को तो अपराधियों की तरह पेश कर रही है और अपराधियों जैसा व्यवहार कर रही है, पर अति घिनौने और अनगिनित जुर्मों से फरीदकोट निवासीयों पर डर बिठाने वाले निशान सिंह की गिरफ्तारी के बाद आज तक एक शब्द भी नहीं बोल रही। सो साफ है कि यह सब कुछ निशान और उसके गिरोह को बचाने के लिए किया जा रहा है।
24 सितम्बर को सवेरे 10 बजे के करीब घनी आबादी वाली फरीदकोट की डोगर बस्ती में हथियारों के बल पर घटित इस अगवा घटना के शुरू से ही पुलिस की भूमिका साफ तौर पर दोषी निशान और उसके गिरोह को बचाने वाली दिखाई दैती रही है। घटना की सूचना फौरन मिलने के सवा घन्टा बाद पुलिस का श्रुति के घर पहुँचना, (जहां से थाना सदर की पैदल दूरी 7-8 मिन्ट की है) आ कर भी डी.ऐस.पी. गुरमीत सिंह का गाड़ी में से न उतरना। लम्बे समय तक दोषियों में से किसी एक को भी न पकडऩा। ऐस.ऐस.पी. और डी.आई.जी. द्वारा श्रुति की चिट्ठी और निशान से विवाह की तस्वीरें प्रैस को जारी करना (जिसे डी.जी.पी. और आई.जी. तक को गलत कहने पर मजबूर होना पड़ा) आदि प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। इस से पहले भी निशान के खिलाफ श्रुति द्वारा दिए बयान के आधार पर चाहे पुलिस को 24 जून से उसे अगवा कर बलात्कार करने जैसे संगीन दोषों तहित पर्चा दर्ज तो करना पड़ गय पर उसे न तो पकड़ा गया और न ही उसे भगौड़ा करार देने की कानूनी कार्यवाई की गई, बल्कि उसके द्वारा पुर्व जमानत की अदालत में लगाई अर्जी वापिस लेने की बात, उसे ऊँचे स्तर से गिरफ्तारी न होने के बारे में मिले पक्के भरोसे की तरफ ही इशारा करती है। उसके अतिरिक्त कई गम्भीर केसों में लिप्त होने के कारण पलिस के लिए उसकी गिरफ्तारी अति आवश्यक और उसके भगौड़ा होने के बावजूद निशान श्रुति को अगवा करने से एक दिन पहले (23 सितम्बर को) बाबा फरीद मेले के अवसर पर जब वहां सुखबीर बादल पहुँचा तो वह पहली वी.आई.पी. कुर्सियों पर बिराजमान था। इसी, दिन मजीठिए के सहपाठी और यूथ अकाली दल के एक लीडर के घर जब सुखबीर गया तो निशान भी उसके साथ था। परन्तु पता होने के बावजूद पुलिस ने उसे हाथ तक नहीं लगाया। यह उसकी अकाली-भाजपा सरकार के प्रमुख बादल और मजीठीए से जुड़ती मजबूत कड़ी का प्रतीक है।
सो इस प्रकार श्रुति कांड के मामले में डी.जी.पी. सुमेध सैनी और मुख्य  मंत्री के मीडिया सलाहकार के बयान पूरी तरह निशान सिंह के पक्ष में आने के अलावा उसकी गिरफ्तारी के बावजूद उसके जुर्मों के बारे में कोई खुलासा नहीं किया गया। इस से यही नतीजा निकलता है कि पुलिस और बड़े अकाली लीडरों की छत्रछाया में निशान सिंह को पाला पोसा गया है। इस बात की पुष्टि इस केस में श्रुति की चिट्ठी और विवाह के बारे में तस्वीरे प्रैस को जारी करने वाले अफसरों को सजा देने की बजाय मुख्यमंत्री द्वारा तरक्कियां देने से भी होती है। हालांकि पुलिस के ए.डी.सी. और डी.जी.पी. उनकी कार्यवाई को खुद गलत मान चुके हैं। परन्तु अब अगर निशान को पकड़ा भी गया है तो यह दिन-ब-दिन बढ़ और फैल रहे जन-संघर्षों के दबाव का ही नतीजा है। फिर भला यदि फरीदकोट की अदालत श्रुति द्वारा डाक्टरी-जाँच करवाने और मां-बाप के पास जाने के बारे में दिए बयान पर अमल करने की बजाय मां-बाप को बाहर निकाल कर लड़की का नया, यह बयान लिख लेती है कि न मुझे डाक्टरी करवानी है और न मां-बाप के पास जाना है तो इससे हमें उलझन में नहीं पडऩा चाहिए। बल्कि स्पष्ट होना चाहिए कि पुलिस एवमं सरकार के साथ साथ अदालत भी गुन्डा गिरोह का ही पक्ष ले रही है। इस लिए जहां पूरी शासक मंडली के विरुद्ध जन-संघर्ष विशाल करने और आगे बढ़ाने की जरूरत है, वहीं पुलिस, प्रशासन, सरकार और अदालत की मुजरिमाना भूमिका से पर्दा उठाने के लिए हाईकोर्ट या सी.बी.आई. से जांच करवाने की भी जरूरत बनती है।
मां-बाप के श्रुति से मिलने पर बंदिश क्यों?
अकाली-भाजपा सरकार और उसके मुखिया बादल परिवार को खतरा है कि अगर लड़की को मां-बाप से मिलवाया गया तो वह अपने घर जाने की मांग करेगी। जहां जाकर वह गुन्डा गिरोह तथा निशान द्वारा की गई जोर-जबरदस्ती का खुलासा करेगी और निशान की पीठ थपथपाने वाले बड़े अकाली लीडरों और उच्च पुलस अफसरों की भी पोल खोलेगी।  परन्तु इसके विपरीत यदि लड़की सरकार की हिरासत में रहेगी तो न सिर्फ ऐसे पापों के घड़े ही ढ़के रहेंगे बल्कि लड़की पर दबाव डाल कर निशान के हक में और मां-बाप एवम् संघर्षशील लोगों के खिलाफ मनमर्जी के बयान लेने भी आसान हो जाऐंगे। अत: समभव है कि 21 अक्तूबर को पुलिस द्वारा गोआ से दिखाई श्रुति की बरामदगी और निशान की गिरफ्तारी से कई दिन पहले ही दोनों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया हो और इतने दिन लड़की पर अपनी मर्जी से जाने, विवाह करवाने और मां-बाप के पास न जाने जैसे बयान देने के लिए दबाव डाला जाता रहा हो। इस बात का संकेत ए.डी.जी.पी. द्वारा 16 अक्तूबर को फरीदकोट में आ कर दिये गए इस बयान से मिलता दिखाई देता है कि ''खुफिया रिपोर्टों के अनुसार श्रुति सुरक्षित है और उसे जल्दी वापिस लाया  जाएगा।’’ इतने भरोसे से कोई उच्च अधिकारी बयान तब ही दे सकता है, जब दोषी तथा श्रुति पूरी तरह उनकी पहुँच या कब्जे में हो।
गुन्डा गिरोह जन-विरोधी सियासतदानों और लुटेरे प्रबन्ध की जरूरत है
आज बादल सरकार और पुलिस प्रशासन इतने बड़े स्तर पर उठे जन-विरोध को नजरअंदाज करके दिन-दिहाड़े श्रुति को हथियारों के जोर पर अगवा करने वाले गुन्डा गिरोह के सरगना निशान को बचाने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं, जिसके ऊपर पहले भी लूट-डकैतियों, कत्लों और बलात्कार जैसे गम्भीर अपराधों के 22 केस दर्ज हो चुके हैं। सरकार के इस व्यवहार का कारण साधारण नहीं है। लोगों की बहू-बेटियों की इज्ज़त और जानमाल के लिए खतरा बने निशान जैसे गुन्डा गिरोह अकाली दल बादल समेत सभी जन-विरोधी सियासतदानों के लिए सोने की खान हैं। यही गिरोह इनके लिए चुनावों के समय दहश्त से मतदान करवाने और बूथों पर कब्जे का साधन बनते हैं। इन लीडरों के लिए लोगों की जमीनों-जायदादों पर कब्जा करने का साधन बनते हैं। इसलिए इन जन-विरोधी सियसतदानों द्वारा इन गिरोहों को प्रोत्साहन, हथियार, नशे और राजनैतिक सुरक्षा दे कर पाला पोसा और पैदा किया जाता है। यह हकीकत 12 अक्तूबर को फरीदकोट बन्द के दौरान रैली में कांग्रेस के भूतपूर्व शिक्षा मंत्री ने खुद परवान की है कि हम सियासी लोग ही इन्हें पालते-पोसते हैं। इस से भी आगे साम्राज्यवादियों की दिश/निर्देशित जन-विरोधी नीतियों तहत बड़े जागीरदारों, पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों समेत बड़े लुटेरों को मालामाल करने के लिए सरकारों द्वारा उठाए जा रहे जन-विरोधी कदमों के खिलाफ उठती खरी लोक लहरों पर झपटने के लिए भी ऐसे गिरोह, शासकों द्वारा पैदा करना, इनकी जरूरत और नीति का हिस्सा है। इन हकी लहरों पर चोट करने के लिए शासकों द्वारा इन गिरोहों के जरिए चुनिन्दा जन-नेताओं को निशाना बनाया जाता है। साधू सिंह तखतूपुरा का कत्ल और इससे पहले विद्यार्थी नेता पिरथीपाल रंधावा का सोच समझ कर करवाया कत्ल इस नीति की प्रत्यक्ष  मिसालें हैं।
इस लिए आओ, बादल सरकार द्वारा श्रुति कांड में अब तक निभाई गुन्डा गिरोह पक्षीय कुल भूमिका को ध्यान में रखो। जब तक लड़की सरकार के हाथ में है, उसके नाम पर किए जा रहे झूठे प्रचार के भ्रम से बचो। शासकीय मंडली द्वारा बेटी के दूर हो जाने का दुख झेल रहे बेबस और लाचार मां-बाप के जख्मों पर नमक छिड़कने वाले किए जा रहे झूठे प्रचार का कड़ा जवाब दो। श्रुति को मिलने पर मां-बाप पर, लगाई पाबन्दी समाप्त करवाने और लड़की मां-बाप को सैंपने के लिए बादल सरकार और पुलिस प्रशासन के नाक में दम करो। बादल सरकार और पुलिस प्रशासन को जगह जगह फटकारो। गुन्डा गिरोह के सरगना निशान और उसके साथियों समेत इस गिरोह का साथ देने वाले सारे पुलिस अफसरों और उसकी पीठ थपथपा रहे अकाली लीडरों को सजाएं दिलाने के लिए ऐक्शन कमेटी द्वारा शुरू किए संघर्ष को पंजाब भर में तेज करो। उसके संघर्ष आहवानों को भरपूर समर्थन दो।
द्वारा:
प्रांतीय कमेटी,
भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां)
प्रांतीय कमेटी,
पंजाब खेत मजदूर यूनियन
(21 अक्तूबर 2012)







संघर्ष जीता गया- श्रुति मां-बाप के सुपुर्द
निरन्तर जारी रह रहे तीव्र जनतक दबाव की वजह से पुलिस को गुन्डा गिरोह के एक के बाद दूसरे सदस्य, समेत निशान की मां और डिम्पी समरा को गिरफ्तार करना पड़ा। महीना भर बादल सरकार इस दाब पर रही कि उसकी छत्रछाया में पल रहे इस गुन्डा गिरोह के चरित्र की जनतक पहचान, छुपी रह सके। परन्तु जन शक्ति के सामने यह दांव चल नहीं पाया। गुन्डा गिरोह को सुरक्षा देने का पैंतड़ा प्रत्यक्ष हो कर जनतक संघर्ष के चोट निशाने में आ गया था। रोजाना के विरोध प्रदर्शनों को धामने के लिए सरकार ने एक और पत्ता खेला। पुलिस कमिशन्नर गौरव यादव ने श्रुति के साथ बाचचीत की। अगले दिन दीप मल्होत्रा (स्थानक ऐम.ऐल.ए.) के हाथ मीठी गोलियों दे कर भेजीं मलहोत्रा दो घन्डे श्रुति को मिलने से पुर्व और बाद में उसके मां-बाप से मिला और दावा किया कि ''श्रुति के बारे में अब तक पंजाब पुलिस और मीडिया द्वारा की गई बयानबाजी गलत है। श्रुति अपने मां-बाप के पास ही रहना चाहती है। उसके द्वारा अदालत में दिया गया बयान किसी दबाव या तनाव की वजह से दिया गया था।’’ विधायक दीप मल्होत्रा ने श्रुति से मिलने पर कहा, ''अगले दो-तीन दिनों तक श्रुति अपने मां-बाप के पास आ जाएगी और उसकी इस वापसी के बाद पैदा हुआ सारा वाद-विवाद समाप्त हो जाएगा।’’ (पंजाबी ट्रिबियून, 1 नवम्बर 2012) ये सरकार के पीछे हटने का संकेत था।
परन्तु इसके बावजूद अभी तक सरकार द्वारा श्रुति पर सख्त पुलिस निगरानी जैसी की तैसी कायम थी। एक नवम्बर को लोक मोर्चा पंजाब के प्रांतिय सचिव  जगमेल सिंह, पंजाब खेत मजदूर यूनियन के प्रांतीय सचिव लछमण सिंह लेवेवाला, ग्रीन हंट ऑपरेशन विरोधी जमहूरी मंच पंजाब के को-कनवीनर डा. परमिन्दर सिंह समेत विभिन्न जनतक जनवादी व्यक्तियों के एक ग्रुप को नारी निकेतन में तैनात पुलिस ने श्रुति को मिलवाने से यह कह कर इन्कार कर दिया कि, ''ऊपर से सरकार के हुक्म हैं.....।’’ श्रुति को अपना वकील करने के लिए वकालतनामे पर हस्ताक्षर भी नहीं करने दिए।
श्रुति को सख्त पुलिस पहरे में रख कर मनमर्जी के बयान दिलवाने की कोशिशें लगातार जारी थीं। उधर निशान ने अदालत में पटीशन दायर की थी कि श्रुति के धारा 164-ए के तहित बयान दर्ज किए जाएं। यह सब कुछ निशान को सजा से बचाने के तरीके थे। पंजाबी ट्रिबियून में यह खबर भी लगी कि ''श्रुति के बयान के आधार पर बच सकता है, निशान।’’
उधर संघर्ष कमेटी अपने फैसले पर कायम थी। 5 नवम्बर को फरीदकोट और 9 नवम्बर को भटिण्डा में होने वाले प्रदर्शन की तैयारी के लिए शहर एवम् आस-पास की विभिन्न संस्थाओं के अतिरक्ति विभिन्न शिक्षा संस्थाओं के अतिरिक्त भटिण्डा, मानसा, मोगा, फरीदकोट और अनेकों गांवों में रैलीयां और सभाएँ आयोजित की गईं। 5 तारीख को 5-6 सौ के फरीदकोट प्रदर्शन के बाद 9 तारीख को भटिण्डा में हजारों मर्द-औरतों का प्रदर्शन एवम् रैली बेमिसाल थे। विभिन्न नेताओं ने बताया कि पुलिस श्रुति से गुन्डा गिरोह के पक्ष में बयान दिलाने में फेल हुई है। गुन्डा गिरोह को अकाली नेताओं के समर्थन का  भांडा फोड़ते हुए नेताओं ने इस केस की जांच सी.बी.आई. से करवाने की मांग की और श्रुति को पुलिस पहरे से मुक्त करवाने के लिए 18 नवम्बर को जालन्धर नारी निकेतन के आगे धरना लगाने का ऐलान किया। धरने में शामिल श्रुति के मां-बाप ने स्टेज से लोगों को बताया कि पुलिस दबाव ने उनकी बेटी की हालत पागलों जैसी कर दी है। सरकार मां-बेटी के रिश्ते में दीवार बन कर खड़ी हो गई है। ऐक्शन कमेटी द्वारा फरीदकोट में काली दीवाली मनाने के ऐलान किए गए।
पुलिस पर सियासी दबाव में काम करने के दोष लगाते हुए श्रुति के पिता ने 5 नवम्बर को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में पटीशन दायर कर निश्पक्ष जांच की मांग की है। उन्होंने सम्बन्धित जज पर भी पक्षपाती होने के दोष लगाए।
7 नवम्बर को श्रुति अगवा कांड विरोधी ऐक्शन कमेटी के नेतृत्व में संगरूर शहर के बनासर बाग में रैली करने के बाद शहर में प्रदर्शन किया गया और डी.सी. दफ्तर के आगे धरना लगा कर मांग पत्र दिया गया और श्रुति अगवा कांड की जांच सी.बी.आई. से करवाने की मांग की गई। इस प्रदर्शन में एक दर्जन के करीब विभिन्न जनतक और जनवादी संगठन शामिल हुए। 8 नवम्बर को श्रुति के पिता ने इलाका मैजिस्ट्रेट के आगे श्रुति की घर वापसी और उसके बारे में पुलिस द्वारा किए जा रहे प्रचार को बन्द करने और श्रुति का इलाज करवाने की मांग करती दो पटीशनें दायर कीं।
ऐक्शन कमेटी ने सरकारी वकील के ऊपर आपने दायरे से बाहर जा कर दोषियों का साथ देने का दोष लगाते हुए 18 नवम्बर को शहर में रोष प्रदर्शन किया और एक अकाली नेता की सिफारिश पर लगाए इस वकील को बदलने की मांग की।
16 नवम्बर को उपरोक्त दायर पटीशनों पर बहस होना तय था। परन्तु सरकारी वकील द्वारा जवाब दावा तैयार न किया होने की वजह से सुनवाई 19 तारीख को डाल दी गई। ऐक्शन कमेटी ने सरकारी वकील पर केस जान-बूझ कर लटकाने के दोष लगाए। इस तरह बुरी तरह फंसी बादल सरकार को एक बार तो कड़वा घूंट पीने पर मजबूर होना पड़ा है। 19 तारीख को जज ने पूरा दिन चली बहस के बाद 21 तारीख को श्रुति को अदालत में पेश हो कर बयान देने के आदेश जारी किए। 21 तारीख को श्रुति ने लिखित बयान में कहा कि वह अपने मां-बाप को प्यार करती है और बिना किसी शर्त के घर जाना चाहती है। श्रुति ने दोष लगाए कि पुलिस द्वारा उसके बारे में फैलाई जा रही अफवाहों में कोई सच्चाई नहीं है। 21 तारीख की सुनवाई पर श्रुति मां-बाप के सुपुर्द किए जाने से संघर्ष की पहली प्ररंभिक जीत हुई है। 27 तारीख को जालन्धर नारी निकेतन वाला धरना बदल कर ऐक्शन कमेटी ने फरीदकोट में विजयी रैली का ऐलान किया। 27 नवम्बर को हुई रैली में 2000-2500 मर्दों-औरतों की भरी एकत्रता में श्रुति भी हाजिर थी। उसका बयान स्टेज से पढ़कर सुनाया गया। जिस से पुलिस, गुन्डा, सरकार गठजोड़ की पूरी तरह से पुष्टि हो गई।



श्रुति की घर वापसी:
लोक-संघर्ष की जीत भारतीय 'लोकतंत्र बेनकाब
श्रुति की घर वापसी, अगवाकारों-गुन्डों को सजाएँ और अगवाकारों को पनाह देने वाले राजनैतिज्ञों और पुलिस के उच्च अधिकारियों को बेनकाब करने और उपयुक्त सजाएं दिलाने के लिए 24 सितम्बर से लगातार एक संघर्ष चल रहा है। यह संघर्ष शहर से शुरू हो कर पूरे जिले एवं पंजाब राज्य तक फैल चुका है। यह संघर्ष शहर निवासियों द्वारा बनाई गिई गुन्डागर्दी विरोधी ऐक्शन कमेटी के नेतृत्व में चल रहा है। पंजाब के मजदूरों, किसानों, विद्यार्थीयों, युवाओं, मुलाजिमों, औरतों के संगठनों एवम् जनतक लोकतांत्रिक संगठनों द्वारा इस संघर्ष का पूरा पूरा समर्थन किया जा रहा है। इस संघर्ष का तात्कालिक निशाना, पहले पूरा एक महीना अगवा हुई लड़की को गुन्डों अगवाकारों के चुंगल में से छुड़वाने की मांग पर और इस पूरे महीने, बच्ची को पुलिस की कैद से रिहा करवाने की मांग पर केन्द्रित रहा है। अब तक दो महीनों से चल रहे इस संघर्ष ने जन-शक्ति अवम् जन-संघर्ष की झोली में जीत और पुलिस-सियासी-गुन्डा गठजोड़ के पल्ले शर्मिन्दगी ही डाली है।
मां-बाप का सिर फोड़ कर और बाजू तोज कर, बालों से घसीट कर ले जाई गई इस नाबालिग बच्ची श्रुति के साथ असाधारण अत्याचार के दोषी अगवाकारों को पनाह देने वाले अकाली सियासतदान और पुलिस के उच्च अधिकारी अपने माथे पर कलंक का काला टीका लगवाने से बच नहीं सके। संघर्ष के प्रारंभिक दिनों में ही अगवाकारों के साथ ये भी जन-आक्रोश के निशाने पर आ गए थे। लोगों से बहुत ज्यादा थू-थू करवाई है।
इन गुन्डों-अगवाकारों के साथ, न सिर्फ पहले, अकाली लीडरों के और पुलिस के जिला स्तरीय उच्च अफसरों के नजदीकी सम्बन्धों के चर्चे शरेबाजार हैं, बल्कि इस अगवा के बाद भी खुद अकाली लीडर ही नहीं, पूरी की पूरी सरकारी मशीनरी, समेत राज्य मुख्य पुलिस अधिकारी भी अगवाकारों की पीठ थपथपाने और हर मुश्किल से बचाने की बेशर्म कोशिशें करते, जन-संघर्ष द्वारा रंगे हाथों पकड़ कर चौराहे पर बेनकाब किए जाते रहे हैं।
इस मामले में अकाली भाजपा सरकार के राजनैतिक प्रवक्ता बने पुलिस के राज्य मुख्य अधिकारी द्वारा इस बच्ची के खिलाफ लांछनों की आंधी चला कर, पंजाब के लोगों की आँखों मे धूल झोंककर और लड़की के बारे में सवाल एवम् शंकाएं पैदा कर के संघर्ष को पटड़ी से उतारने की मन में पाल रखी जन विरोधी इच्छा, जन-संघर्ष के आगे टिक नहीं पाई।
जब सरकार और पुलिस के उच्च अधिकारियों की सब चालों और लांछनों को पछाड़ दिया गया। पंजाब सरकार के मंत्रियों का फरीदकोट में पांव रख पाना भी लोगों द्वारा नामुमकिन कर दिया गया। इस चुनाव क्षेत्र की ऐम.पी. भी दबे-पांव आकर तट-फट नींव पत्थर रख कर चोरी-छिपे निकल गई। दिन में आई तो काली झण्डियों में घिर गई। पंजाब सरकार का एक अकाली मंत्री फरीदकोट में से कार पर से झण्डी उतार कर चोरों की तरह निकल गया। खुद बादल (दोनों-तीनों) दूर से ही दौरा रद्द कर गए। 'नन्हीं छाया पर पत्थर बरसने लगे। इस पर पंजाब के मुख्य मंत्री ने अपना भोला चेहरा बचा कर रखने के लिए अपने एक और मोहरे को इस्तेमाल किया। संघर्ष को कुचलने के लिए अपने मीडिया सलाहकार से धमकियां दिलाईं गईं, जिन्हें जन-संघर्ष द्वारा मिट्टी में मिला दिया गया।
पहले गुन्डों-अगवाकारों और बाद में पुलिस दहशत के सहारे लड़की के मन में बिठाए भय के बावजूद, अदालत में आते ही लड़की द्वारा मां-बाप के पास जाने और मैडीकल करवाने के दिए प्रारम्भिक बयान के विपरीत जा कर, सरकारी जरूरतों और इच्छा अनुसार लड़की को नारी निकेतन जालन्धर भेजने के अदालत के फैसले ने खुद ही न्याय प्रबन्ध का लोकतांत्रिक और आजाद गिलाफ कतरा-कतरा करके रख दिया। बची-खुची कसर पुलिस द्वारा इस अदालती फैसले की अवहेलना करते हुए नारी निकेतन की जगह को ही कच्ची जेल बना कर अपनी सखत पहरेदारी में कैद करके रखने ने दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र के गिलाफ को ही तार तार कर दिया।
लड़की को जालन्धर जा कर मां-बाप के मिलने पर और श्रुति द्वारा बयान देने, बयान लिखने और वकालतनामे पर दस्तखत करने पर नारी निकेतन के सामने धरने के किये ऐलान ने पुलिस ताकत द्वारा लगाई गई रोकों को हटाने के लिए सरकार और पुलिस को बेबस और मजबूर कर दिया।
लोगों में न्याय प्रबन्ध की हुई भरपूर फटकारों की वजह से, अदालत को लड़की के मां-बाप द्वारा दिए गए निवेदन पत्रों पर सुनवाई करनी पड़ी। सरकारी वकील द्वारा और सरकारी इशारे पर अगवाकारों के वकील द्वारा लगाई गई अड़चनें चाहे इस फैसले को चार दिन लेट तो कर गईं, परन्तु अन्त में लड़की की इच्छा अनुसार अदालत को फैसला करना पड़ा। श्रुति मां-बाप के सुपुर्द करनी पड़ी।
घर पहुँच कर श्रुति द्वारा अखबारों को दिए बयान ''मेरे बारे में मोहब्बत के किस्से जैसी अफवाहें बिल्कुल बेबुनियाद हैं’’ ने पुलिस, सियासी-गुन्डा गठजोड़ पर पहला करारा थप्पड़ मारा है।
इस फैसले ने लोगों में एकता और संघर्ष की जीत का अहसास पक्का किया है।
संघर्ष के टैन्ट में सही मार्ग की जै-जै कार करते हुए वक्ताओं ने इस राह का पल्ला पकड़कर चलने की कसमें लीं। शहर में हुए मार्च के समय काऊंटरों से उठ उठ कर दुकानदारों द्वारा हिलाए गए हाथों ने जीत का स्वागत किया है और भरपूर सहयोग दिया है। यह ससय का सच है, सही है कि पुलिस-सियासी-गुन्डा गठजोड़ को सजाएं दिलाने, जन एकत्रताओं में बेपर्द करने और इस से आगे इस गठजोड़ के हाथों से जालिम शक्ति छीन कर उसे जन शक्ति के अधीन करने का काम किसी एक-अकेले व्यक्ति, परिवार या समुदाय के बस में नहीं है, ये क्षमता से बड़ा कार्य है। इसके लिए जनता के पक्ष की शक्ति को एकजुट करने और संघर्ष के रास्ते पर चलाने का कार्य सिर पर है। चल रहे संघर्ष को आगे जारी रखने की सखत जरूरत है।
-जगमेल सिंह, जनरल सचिव, लोक मोर्चा पंजाब (फोन- 94172 24822)


''आपका संघर्ष ही था जिसने मुझे शक्ति प्रदान की’’
(घर लौटने के पशचात् श्रुति का जनतक बयान)
मेरे आदरणीय माता-पिता जी, अंकलों और आंटियों, भाइयो और बहनों एवं बुजुर्गो,
मैं आप सब का तहे-दिल से धन्यवाद करती हूं कि आप सब ने जी-जान से जद्दोजहद करके गुन्डों के पंजों से मुझे छुड़वाया और मां-बाप से मिलवाया। यह आपके संघर्ष की ताकत के कारण ही था कि जिस पुलिस ने मेरे मां-बाप की शिकायत पर कोई कार्यवाई न कर के गुन्डों को पंजाब से आसानी से बाहर निकल जाने दिया, उस पुलिस को मजबूर हो कर मुझे गोआ से बरामद करना पड़ा और निशान सिंह को पकडऩा पड़ा।
यह आपका संघर्ष ही था जिसने मुझे यह शक्ति प्रदान की कि मैं सभी दबाव और धमकियों की परवाह न करते हुए अदालत में डट कर अपने मां-बाप के पास जाने की मांग की और अंतत: अपने मां-बाप तक पहुँच गई। जिनके कब्जे में मैं थी उनके द्वारा मुझे डराया गया कि तेरे मां-बाप ने तेरी बहुत बदनामी कर दी है, सारे शहर में तेरी तस्वीरों वाले पोस्टर लगवा दिए हैं। मुझे जेल में बन्द निशान सिंह, उसकी मां और दुसरे दोषियों का खयाल रखने के उपदेश दिए गए। पर आपने मुझे हौसला दिया।
मुझे वह शब्द नहीं मिल रहे, जिनके द्वारा मैं आपको आभार व्यकत कर सकूँ।
मेरे बारे में विभिन्न पुलिस अधिकारियों और गुन्डों द्वारा बेशर्मी से झूठा प्रचार किया गया। आज मैं आप सब के सामने यह स्पष्ट करती हूँ कि यह सब झूठ का पुलन्दा था, जो मुझे बदनाम करने के लिए और आप सब को मेरे मां-बाप का समर्थन देने से रोकने के लिए सोची समझी साजिश के अधीन तैयार किया गया था। पुलिस द्वारा प्रचारित इन बातों में जरा सी भी सच्चाई नहीं है। जैसे मुझे तलवारों एवम् पिस्तौलों की नोक पर घर से अगवा किया गया, मेरे बाप के सिर तथा हाथ-पांव तोड़ कर उन्हें मारने की कोशिश की गई। जब मैं गुन्डों से बच कर भागी तो कैसे उन्होंने मुझे बालों से पकड़ कर घसीटा, कपड़े फाड़े, जख्मी किया, यह घटना हमारी गली के सभी लोगों ने अपनी आँखों से देखी है।
मैं चाहती हूँ कि दोषियों को सजा मिले ताकि वे दोबारा किसी की बहन-बेटी की तरफ आँख उठाकर भी न देख सकें। इसलिए मुझे और मेरे परिवार को आगे भी आप सबकी मदद की जरूरत रहेगी। मुझे यकीन है कि पहले की तरह भविष्व में भी आप हमारा साथ देंगे।
अन्त में मैं एक बार फिर आप सबका तहे-दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ।
(नोट- श्रुति सचदेवा का यह बयान उसकी और उसके मां-बाप की उपस्थिति में आज शहीद भगत सिंह पार्क में हुई धन्यवाद रैली में पढ़ा गया।)
तिथि:- 27-11-2012
बूटा सिंह
सदस्य
गुन्डागर्दी विरोधी ऐक्शन कमेटी,
फरीदकोट।












''जनतक लड़ाई जारी रखेंगे’’
गुन्डागर्दी विरोधी ऐक्शन कमेटी, फरीदकोट का ऐलान
इन्साफ पसन्द लोगो,
24 सितम्बर को डोगर बस्ती में घटित हुए हथियारों के जोर पर और मौके के पुलिस अफसरों की मिलीभुगत से हुए कांड की खबर जहां तक भी गई, वहीं संवेदनशील लोगों के मन झिंजोड़े गए। शहर में 'कुछ करें की चर्चा चल पड़ी और 24 सितम्बर को ही शहर में गुन्डागर्दी विरोधी ऐक्शन कमेटी अस्तित्व में आ गई और इन्साफपसन्द लोगों के गुस्से के बहाव को रास्ता मिल गया, आक्रोश का सैलाब बहने लगा। हर किसी को श्रुति में अपनी बहन या बेटी दिखने लगी। पूरे दो महीने बेटी की वापसी तक शहर में संघर्ष पूरे जोश-ओ-खरोश से चला। अकाली भाजपा मंत्रियों को फरीदकोट की धरती पर पैर रखने की मनाही का ऐलान हो गया। जो आया उसी का घिराव हुआ और उसे काले झण्डों के 'दर्शन करने पड़े। एक अकाली मंत्री सरकारी झण्डी उतार कर शहर में से एक दो बार गुजर गया, एक पारलीमानी सचिव अपने पिता की याद में आँखों के कैम्प का उद्घाटन करने आया तो उसे काले झण्डे दिखा कर भगा दिया। ऐम.पी. गुलशन का घिराव लामिसाल साबित हुआ। थाना कोतवाली फरीदकोट के आगे 59 दिन लगातार धरना लगाए रखना शायद पंजाब के संघर्षमयी इतिहास में एक अकेली घटना हो। शहर में गवर्नर, मुख्य-मंत्री, उप-मुख्य मंत्री और कोई मंत्री घुस नहीं पाया. शहर के सभी कारोबारियों, दुकानदार भाईयों एवं समाज सेवी संगठनों, व्यापार मण्डल और मुलाजिम संगठनों ने संघर्ष में डट कर भाग लिया। बिना शर्त किसानों एवम् मजदूरों के संगठनों ने भी इस संघर्ष को समर्थन दिया। पंजाब के मंच, मोर्चे और विद्यार्थी संगठन संघर्ष में अधिकारक तौर पर शामिल हुए। कुछ पत्रकार भाईयों और मीडिया कर्मियों ने सरकार के संघर्ष संचार को रद्द करके ऐक्शन कमेटी का पक्ष और असलियत सामने लाने में अपनी भूमिका निभाई। फरीदकोट के कुछ समझदार वकीलों ने पैनल बना कर बिना फीस अदालती लड़ाई लडऩे का साहसपूर्ण काम किया है और बहुत सारे वकीलों ने दोषियों के केस लडऩे से इन्कार कर दिया है। भटिण्डा से एन.के. जीत ने विशेष तौर पर आ कर अपनी इच्छा अनुसार बिना कोई फीस लिए केस की पैरवी करनी शुरू कर दी। कांग्रेस, पी.पी.पी., एवं सी.पी.आई. आदि के नेता ने भी इस संघर्ष में हाजिर हो कर गए। फरीदकोट के संघर्ष की तपिश अकाली भाजपा सरकार के उच्च गलियारों तक भी जा पहुंची। गुलशन विरुद्ध हुए ऐक्शन के बाद सरकार की समझ में आ गई कि श्रुति को मां-बाप के हवाले किए बिना फरीदकोट के लोग न खुद और न सरकार को टिक कर बैठने देंगे। पंजाब सरकार की इस प्रकार हुई थू-थू की वजह से ही लोगों में फैले रोष के कारण तीन बादलों में से या किसी और अकाली भाजपा लीडर, लड़की की घर वापसी के बाद एक भी हमदर्दी भरा शब्द कहने के लिए नहीं आए। उन सभी लोगों समेत फरीदकोट के शहर निवासीयों का ऐक्शन कमेटी द्वारा धन्यवाद किया जाता है और उनके द्वारा पूरे दो महीने संघर्ष के अधिकार के भरपूर इस्तेमाल की जै-जै कार की जाती है।
अकाली भाजपा सरकार को धिक्कारो
पूरा एक महीना श्रुति को गुन्डों ने अकाली भाजपा सरकार के नेताओं से अच्छे सम्बन्ध होने की वजह से अपने कब्जे में रखा। यह कोई अचानक घटित घटना नहीं है। डिम्पी समरे एवम् निशान की मां ने बहुत बड़ी रकम अपने बैंक खातों में से निकाली है। कुछ पुलिस अफसरों को रिश्वतें देने और स्थानक नौजवान अकाली नेता द्वारा सरकार के बड़े नेताओं तक इस अगवाकांड पर सहमति होने के समाचार शहर में बच्चे-बच्चे की जबान पर रहे हैं।
संघर्ष की निरन्तरता और बढ़े हुए दबाव की वजह से सरकार को लड़की को फरीदकोट अदालत में ला कर पेश करना पड़ा। परन्तु सरकार अभी लोगों का दमखम परखना चाहती थी। लड़की के घर लौटने और मैडीकल करवाने की स्टेटमेंट देने के बावजूद भी एक लेडी पुलिस अधिकारी के इशारे पर श्रुति को जालन्धर नारी निकेतन भेजने के आदेश दिये गए। इन सरकारी आदेशों का पालन करते हुए ही उसे नारी निकेतन के गैस्ट हाऊस में जेल से भी बद्तर पुलिस हिरासत में रखा गया। मां-बाप से मिलाने की रस्म महज खानापुर्ति से ज्यादा कुछ नहीं थी। लड़की को अपने वकालतनामे पर हस्ताक्षर नहीं करने दिए गए। क्या यह सब सरकारी आदेशों के बिना सम्भव है?
क्या सरकारी आदेशों के बिना भूतपूर्व ऐस.ऐस.पी. फरीदकोट और भूतपूर्व डी.आई.जी. तथाकथित चिट्ठियां और शादी की तस्वीरें प्रैस के लिए जारी कर सकता है? क्या सरकार की मर्जी के बिना डी.जी.पी. अगवा की कहानी को प्यार-मोहब्बत का किस्सा बना कर पेश कर सकता है? क्या मुख्य-मंत्री का सियासी सलाहकार बैंस मुख्य मंत्री की आज्ञा के बिना ऐक्शन कमेटी के सदस्यों को केस दर्ज करने की धमकियां दे सकता है? अगवाकांड को मर्जी से किया विवाह करार दे सकता है? सरकार का गुन्डों के लिए प्रेम, तब स्पष्ट रूप में जाहिर हो गया जब मुख्य मंत्री बादल ने पुलिस की सारी कार्यवाई को कलीन चिट जारी कर दी और हरसिमरत बादल भी पुलिस की उक्त कार्यवाई को सही ठहराने लगी। बादल सरकार की उस केस से सम्बन्धित कार्यशैली ने साफ कर दिया है कि वह निशान की गुन्डा टोली के भरपूर समर्थन में खड़े हैं। अकाली भाजपा सरकार के गुन्डों के प्रति हमदर्दी और प्यार के कारण एक पुलिस अफसर अक्सर इस तरह बोलता रहा जैसे उसके घर बहु-बेटी न हो और अनेकों झूठी बातें जोड़ कर बेटी को बदनाम करता रहा और लोगों को गुमराह करता रहा। इस पुलिस अफसर ने 21 नवम्बर को अदालत में लड़की को पेश करते समय कहा, ''देखना, 17 व्यक्तियों की जान तेरे हाथ में है।’’ ऐक्शन कमेटी समझती है कि सरकार के हुक्मों के बिना नीचे से लेकर ऊपर तक पुलिस अधिकारी अपनी मर्जी से अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं कर सकते, और इस प्रकार वही हुआ जो सरकार की मर्जी थी। इस लिए अकाली भाजपा सरकार और फरीदकोट के जिम्मेदार सम्बन्धित पुलिस अफसरों को 27 नवम्बर की रैली में फटकारें दी जाएंगी और मांग की जाएगी कि सरकार और उसके स्थानक यूवा अकाली लीडर को (मजीठीए के मित्र को) और इस केस में बुरी भुमिका निभाने वाले पुलिस अफसरों को लोगों के और अदालती कटहरे में खड़ा करने के लिए संघर्ष जारी रहेगा, क्योंकि जन संघर्ष के जोर पर ही इस कांड के 20 दोषियों और साजिशकारों को जेल की हवा खानी पड़ी है।
ऐक्शन कमेटी का ऐलान
ऐक्शन कमेटी ने फैसला किया है कि वे इस केस में पहले की तरह नेतृत्व करती रहेगी। इसके लिए संघर्ष चाहे अदालतों में लडऩा पड़े या जरूरत पडऩे पर जनतक लड़ाई लडऩी पड़े। इस से आगे ऐलान यह है कि इस ऐक्शन कमेटी को रजिस्टर्ड करवाया जाएगा और इसकी इकाईयां शहरी वार्डों और गांवों में बना कर इसे और मजबूत किया जाएगा और फैसला किया है कि शहर अन्दर हुई किसी भी गुन्डा कार्यवाई का जवाब ऐक्शन कमेटी पहले की तरह ही देगी। ऐक्शन कमेटी ने सभी लोगों से अपील की है कि वे ऐक्शन कमेटी से जुड़े रहें और ऐक्शन कमेटी उनके नेतृत्व और समर्थन के लिए डटी रहेगी। ऐक्शन कमेटी गुरूद्वारा साहिबजादा अजीत सिंह, गली नं. 5 अजीत नगर, फरीदकोट के प्रबन्धकों का बहुत धन्यवाद करती है क्योंकि उन्होंने पूरे दो महीने संघर्षशील लोगों को चाय, तथा लंगर की सेवा, श्रद्धा-भाव से निभाई है।
अपील
समूह शहर निवासियों और संगठनों से अपील है कि 27 नवम्बर को 11 बजे काफिले बना कर शहीद भगत सिंह पार्क में लोगों के लिए धन्यवाद और अकाली भाजपा सरकार के लिए फटकार रैली में पहुँचें।
सम्पूर्ण लोगों के धन्यवाद सहित
द्वारा:
गुन्डागर्दी विरोधी ऐक्शन कमेटी, फरीदकोट




श्रुति संघर्ष के सबकों का दामन थाम कर आगे बढ़ो
-सुखदेव सिंह कोकरी कलां, लछमण सिंह सेवेवाला
फरीदकोट में पूरे दो महीने चले संघर्ष ने पैसे, हथियारों, पुलिस और सरकार की सांझी ताकत के जोर पर गुन्डों द्वारा अगवा की गई बच्ची, श्रुति मां-बाप की गोद में वापिस ला दी है। गुन्डों के समर्थकों का मूँह काला हो गया है। बड़ी जीत और मुल्यवान सबक लोगों की झोली में डाले हैं।
संघर्ष- कभी पर्दा नहीं रहने देता
-अन्धी दौलत और जमीन के मालिक और तीन चार सालों में ही उभरे गुन्डे अगवाकार निशान ने, हथियारवन्द्ध गुन्डा गिरोह के साथ दो लड़कियों वाले इस साधारण परिवार के घर पर धावा बोला है। मां-बाप का सिर फोड़ कर, बाहें तोड़ कर, फायर कर अगवा कर के ले गया।
-इस गुन्डा गिरोह के समर्थन में शासक अकाली-सियासतदान खास कर मजीठीया और छोटे बादल जैसे, पुलिस अफसर और निशान का परिवार खड़ा है। 19-20 केस दर्ज होने के बावजूद भी, अकाली पार्टी के तराजू की तरह अदालत का पलड़ा भी उसी की ओर झुकता है, कभी कोई सजा नहीं दी। इस के जोर पर वह, इस घटना को अंजाम दे कर हथियारों को प्रदर्शित करते हुए, रास्ते में आई कारों की तोडफ़ोड़ करता हुआ, घनी आबादी में से बेखौफ होकर निकला है।
-गुन्डों और पुलिस अफसरों द्वारा बिठाए डर और परेशानी में से बाहर आई बच्ची द्वारा लोगों की इकत्रता में आ कर दिए बयान ने गुन्डों, पुलिस अफसरों और सरकार का असली चेहरा बेनकाब किया है।
-बड़े बादल द्वारा अपने 'भोले मूंह से एक भी शब्द न बोल कर और अपने मीडिया सलाहकार से संघर्ष चलाने वालों पर पुलिस केस चलाने की धमकियां दिलाने की चली चालबाजी उसका कपटी चेहरा बेनकाब कर गई।
-फरीदकोट चुनाव क्षेत्र की अकाली ऐम.पी. गुलशन ने तो मूंह ही न खोला, जबान पर ताला लगाए रखा। बठिंडा से अकाली ऐम.पी. हरसिमरत बादल, डेढ़ महीने बाद बोली, उसने पुलिस अफसरों की पीठ थपथपाई, बच्ची के खिलाफ बोला। इस तरह वह 'नन्हीं छांव की रक्षा का चढ़ाया मुखौटा उतरवा बैठी।
-जन-आक्रोश की चिंगारियों ने अकाली मंत्रियों और लीडरों के शहर में प्रवेश को मुश्किल बना दिया। बड़े बादल द्वारा अपने विधायकों और अफसरों द्वारा बच्ची को घर ला कर मां-बाप को सौंपने का संदेश भेजा गया। जन-आक्रोश ने सिर पर सेहरा सजाने की इस चाल को भी धूल में मिला कर रख दिया।
-''आजाद और निष्पक्ष’’ होने का गेट पर बैनर सजाए बैठी अदालत भी, बच्ची के बयान को ना मान कर और 21 नवम्बर वाली पेशी के समय भी बच्ची को वकील की सुबिधा न दे कर, न आजाद रही और न निष्पक्ष रही। इस व्यवहार से तथाकथित 'इन्साफ की देवी की पक्षपाती दृष्टि साफ दिखाई दी है।
-बच्ची के अखबारों में आए पहले बयान, ''मेरे बारे में मोहब्बत के किस्से जैसी अफवाहें बिल्कुल बेबुनियाद हैं।’’ ने ही, ''लड़की अपनी मर्जी से गई है, यह प्यार मोहब्बत का मसला है’’ जैसे बयान देने वाले पंजाब पुलिस के मुख्य अधिकारी और बच्ची के नाम पर नकली चिट्ठियां और तस्वीरें जारी करने वाले फरीदकोट के उस समय के डी.आई.जी. और ऐस.ऐस.पी. को करारा तमाचा लगाया है।
-घटना की तुरन्त रिर्पोट मिलने के बावजूद गुन्डा गिरोह की नाकाबन्दी न करने वाले डी.ऐस.पी. गुरमीत सिंह और मौके पर जा कर, ''हाथ में हाथ डाल कर’’ चले जाने जैसी इलजामबाजी करने वाली बेगैरत डी.ऐस.पी. कशमीर कौर तो इस अपराध को अंजाम देने में और बच निकलने में गुन्चों की सहायता करने के पापों की भागीदार बनी है।
-श्रुति को विभिन्न अवसरों पर मिलने के समय और 21 नवम्बर को अदालत में पेशी के लिए दाखिल होते समय, ''17 लोगों की जान तेरे हाथ में है, सोच समझ कर बयान देना’’ जैसी धमकी भरी बातें करने वाले थानेदार संजीव कुमार सादिक को, उसकी बेपर्दा हुई करतूत ने उसे गुन्डों के साथी के तौर पर दोषी साबित किया है।
-''लड़की को भूल जाओ। लड़की अब निशान के घर ही जाएगी।’’ ''लड़की के नाम जमीन चढ़ा देंगे’’ जैसी जलील बातें कर निशान की दलाली करने वाला एस.पी.(डी) मुँह काला करवा गया है।
-अत: कुल मिला कर देखें, यह किसी इक्का-दुक्का पुलिस अफसर की मिलीभुगत का नतीजा नहीं है। बल्कि अकाली भाजपा सरकार और खास कर बादल परिवार के बिल्कुल ऊपर से मिले इशारे पर ही निशान और उसके गिरोह को बचाने के लिए पूरा जोर लगाने की वजह से जहां सारा पुलिस प्रशासन अपने कन्धों पर लगी बुराई की फीतियों में और बढ़ावा करवा गया है, वहीं अकाली भाजपा सरकार और बादल परिवार भी अपने माथे पर काला कलंकी दाग लगवा बैठे हैं।
संघर्ष, सबक देता ही देता है
-यह संघर्ष मां-बाप द्वारा, ''अपने हाथों अपनी इज्जत खराब करने’’ के प्रतिक्रियावादी विचार को रद्द करते हुए खुलकर लोगों को बताने की हिम्मत करने की वजह से सफल हुआ है।
-दिल को झिंझोड़ देने वाले मसले खिलाफ बहू-बेटियों वाले और इन्साफपसन्द हर एक मन से उभरी, ''घरों में कोई भी सुरक्षित नहीं’’,  की फिक्रमंदी और ''कुछ होना चाहिए’’ की इच्छा की सामूहिक आवाज की ताकत ही मां-बाप का सहारा बनी है।
-ऐक्शन कमेटी द्वारा लगातार संघर्ष करते रहने से, लोगों का, संगठनों का, सहयोग लेने की वजह से और इन सबकी सक्रियता से ही गुन्डा गिरोह और सारी सरकारी मण्डली को झूकाने में सफलता हासिल की है। मां-बाप का स्वाभिमान बचाया है और सम्मान बढ़ाया है।
सरकार के कुल तंत्र द्वारा लोगों के खिलाफ बोले इस या ऐसे ही ओर धावों को थामने और पलटवार करके शिकस्त देने और अपने-आप को बचाने या कुछ हासिल करने के लिए संघर्षों में संगठित और चेतन-जुझारू ही मजबूत कदमों से खड़े रहते हैं तथा लडऩे में आगे बढ़ कर हिस्सा डालते हैं। ये किसी एक अकेले व्यक्ति या परिवार के बस का रोग नहीं होता। आइए संगठित होने की तरफ बढ़ें।
-''राज नहीं सेवा’’, ''नन्हीं छांव’’, ''भोले चेहरे’’, ''सेवा, सुरक्षा, सम्मान’’ और ''आजाद एवं निष्पक्ष न्याय प्रबन्ध’’ सब का जन-विरोधी बलहीनों के खिलाफ और महिला विरोधी चरित्र बेपर्द हुआ है और ''संघर्ष का मार्ग ही सब से सही मार्ग है’’, ''संघर्ष ही ढाल और तलवार है’’ और ''इकट्ठ लोहे की लट्ठ’’ का मार्ग उभरा है, पुष्ट हुआ है।
संघर्ष- आगे की तरफ संकेत करता है
-बादल घराने ने 25 साल राज करने के सपने पाल रखे हैं। बड़ी डींगें भी हांकी जा रही है। प्रांत में सरकार लगातार दोबारा बन जाने से अहंकार में  गरदन कुझ ज्यादा ही ऊँची की हुई है।
-केन्द्र की तरह प्रांत में भी कुल माल-खजाने, सरकारी जमीने-जायदादें, संस्थाएं- विभाग बेचने और प्राईवेट करने की नीतियां थोपी हुई हैं। लोगों से हर चीज छीन कर देसी विदेशी कारपोरेट घरानों कम्पनियों की झोली में डाली जा रही हैं। साम्राज्यवादी दखलअन्दाजी के लिए दरवाजे खोले जा रहे हैं।
-लोगों की झोली में कर्जा, गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी डाली जा रही है। मुश्किलों वाले हालात बढ़ाए जा रहे हैं। लोगों में कठिनाईयां- बेचैनी और रोष-आक्रोश बढ़ रहा है। वे संगठित हो रहे हैं। संघर्षों की राह अपना रहे हैं। शासकों की नीतियों-चालों में रुकावटें डाल रहे हैं। शासकों की रात की नींद और दिन का चैन हराम कर रहे हैं।
-लोगों के खिलाफ पुलिस के अंधाधुंद इस्तेमाल से बदनामी ज्यादा होती है। फटकारें पड़ती हैं। गद्दी खिसकती नजर आती है। गद्दी पर कब्जा जमाए रखने के लिए लोगों पर नियंत्रण रखने के लिए गुन्डा गिरोह ज्यादा फायदेमंद हैं। वे गुन्डा गिरोहों को लोगों में डर, भय, दबाव बना कर रखने की छूट देते हैं। लोगों को लूट और छीना-झपटी में उलझा कर रखते हैं। गलत और जबरदस्ती वोटों के भुगतान करवाने के साधन के तौर पर उन्हें पालते-पोसते हैं।
-यहां फरीदकोट में पिछले तीन चार सालों से इन्होंने इस निशान के गिरोह को पाला है। उसे हर केस में से बचाया है। विधान सभा चुनाव के समय बड़े बादल द्वारा और अब मेले पर छोटे बादल द्वारा स्टेज पर अपने साथ बिठा कर उसकी ताकत बढ़ाई है। उसे प्रोत्साहित किया है। पुलिस को, उसे हाथ न लगाने को कहा है। अदालत पर भी उसके पक्ष में दबाव डाला है। आम लोगों एवम् उनकी एक बच्ची के साथ दुश्मनों सा व्यवहार किया है।
-ये तो राजाओं-महाराजाओं की तरह अपना पक्का राज्य चलाने के लिए लोगों को सदा सदा के लिए अपनी दबिश के शिकंजे में रखना चाहते हैं। इसके लिए पुलिस जबर की तुलना में गुन्डों के इस्तेमाल के लाभ ज्यादा होने की वजह से, निशान और उसके गुन्डा गिरोह की अन्धी मदद द्वारा पंजाब भर में पैदा किए और नए पैदा किए जाने वाले गुन्डा गिरोहों को स्पष्ट संदेश दिया जा रहा है कि गुन्डों को पनाह देने में सरकार सियासी मजबूरियों को रुकावट नहीं बनने देगी।
-यह व्यवहार और रास्ता केवल बादल सरकार का नहीं है, बल्कि सरकारी गद्दियों पर बैठीं और बैठने के लिए तत्पर हो रहीं सभी राजनैतिक पार्टियां, प्रांतीय और केन्द्रीय भी, इस व्यवहार और रास्ते पर चल रही हैं। इन सब ने जहां लोगों को उतपीडऩ स्वीकार करवाने के लिए पुलिस-सेना, काले कानून, नए-नए हथियार और औजार, नीतियां चालें बना कर रखी हुई हैं। वहां प्राईवेट सेनाए- सलवा जुडम, कोया कमांडो, रणबीर सेना, संप्रदायक एवं मूलवादी शक्तियों और गुंडा गिरोहों को बाकायदा रूप से संगठित किया हुआ है।
संघर्ष- संगठित हिस्सों की भूमिका
-समाचार पत्रों, बयानों, धमकियों और संघर्ष को लटका कर दम निकाल देने जैसी तथा अन्य सियासी चालों द्वारा आक्रमण पर आए सरकारी प्रबन्ध के हाथ रोकने एवं पीछे धकेलने की उभरी जरूरतों ने किसानों, खेत मजदूरों, विद्यार्थियों, युवाओं, मुलाजिमों और क्रांतिकारी संगठनों द्वारा दिए गए जोरदार समर्थन ने संघर्ष को आगे बढ़ाया है।
-इस मौके पर पैदा होई नाजुक हालत की जरूरतें कई कुझ की मांग करती थीं। यह मांग थी- संघर्ष में भाग ले रहे सभी हिस्सों की एकता कायम रखते हुए एक संघर्ष सेन्टर को मजबूत करने की। लामबंदी बढ़ाने और संघर्ष को जिले से बाहर पंजाब भर में फैलाने की। सरकारी कूड़ प्रचार की धूल हटाकर असलियत को स्पष्ट करने की। सरकारी गीदड़ धमकियों की परवाह न करने की। सरकार की हर चाल और वार को समझ कर निशाने साध कर करारे पलटवार करने की। कानूनी पक्ष से भी डट कर लड़ाई देने की। भारतीय किसान युनियन एकता उग्राहां एवं पंजाब खेत मजदूर यूनियन द्वारा इन सब जरूरतों को हर पक्ष से बिना शर्त डट कर समर्थन दे कर इस संघर्ष को जीत तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई गई है।
-इस भूमिका ने सरकारी मण्डली को मात देने में सहायक बनने से भी आगे बढ़ कर, शासक वर्गों द्वारा किसानों और दुकानदारों, ग्रामीणों और शहरियों, हिन्दूओं और सिक्खों में फूट डाल कर रखने की जरूरतों तहत बनाई गई दूरियों को भी कम किया है।
संघर्ष का दामन थामे रखें
-मसला अभी आधा-अधूरा पड़ा है। गुन्डे गिरफ्तार हो गए हैं, उन्हें सजाएं देने का काम अभी बाकी है। गुन्डों की पुशतपनाही करने वाले, सेवा करने वाले, दलाली करने वाले, इनके जन्मदाता एवम् पालन करने वाली सरकार, अकाली सियासतदान और पुलिस अफसर सभी कानून के कटघरे में ले कर आने हैं। उन्हें सजाएं दिलानी हैं। लोगों की अदालत में भी बेपर्दा करना है।
-ये सब शैतान हैं। अली बाबा के चालीस चोर हैं। जन-विरोधी हैं। दम्भी और फरेबी हैं। झूठ बोलने और कुफर तोलने से शर्माते नहीं हैं। कई बार समझौते करते हैं और वादे तोड़ देते हैं। अब दबाव बना है तो कुछ ढीले पड़े हैं। पीछे हटे हैं।
-परन्तु यह घाग सियासतदान हैं। हालात सम्भालने में तेज-तरार हैं। इनके पास पैसा और सरकारी ताकत है। चालें चलने से बाज नहीं आऐंगे। यह दोबारा सम्भलने की, उठने की, ताकत पकडऩे की कोशिश करेंगे और पलटवार करने के लिए फन उठाते रहेंगे।
-संघर्ष की जरूरतों के प्रति सक्रियता दिखाओ। विभिन्न तरीकों-रूपों द्वारा संघर्ष-सरगर्मी जारी रखो। चलते रहो। चलते रहने से ही सफर मुकम्मल होना है, मंजिल मिलनी है। दोषियों को सजाएं मिलनी हैं।      (तिथि: 5 दिसम्बर, 2012)



आओ सोचें! हम बलत्कार में कैसे हिस्सेदार बनते हैं
जब मैं ये पंक्तियां लिख रही हूं, तो कुछ दिन पहले चलती बस में एक युवा यूवती के साथ हुए सामूहिक बलात्कार विरूद्ध सम्पूर्ण तथा देश के अन्य हिस्सों में रोष-प्रदर्शन हो रहे हैं। लोग बड़ी गिनती में आ रहे हैं। इनमें नौजवान भी हैं, बुजुर्ग भी, मर्द भी औरतें भी, अमीर भी गरीब भी- तथा वे गुस्से से भरे हुए हैं। वे चाहते हैं कि बलात्कारी पकड़े जाएँ। उन्हें सबक सिखाया जाए। कई लोगों का सुझाव है कि उन्हें फांसी देनी चाहिए या नपुंसक बना दिए जाने चाहिए। साथ ही ये विचार भी है कि राजसत्ता हरकत में आए, असरदार कानून बनाए, तेज रफतार अदालतें कायम करे, पुलिस के तौर तरीकों को और दुरूस्त करे तथा और भी काफी कुछ किया जाए। मथूरा बलात्कार केस के पश्चात् इतने विशाल स्तर पर रोष-प्रदर्शन कभी नहीं हुए। भिन्नता यह है कि उस समय मुख्य रूप से औरतों के समूह रोष-प्रदर्शन करते थे, परन्तु अब हो रहे रोष-प्रदर्शनों में भाग लेने वालों की विविधता है। दु:ख की बात है कि कई बार ऐसी घटना के बाद ही जनता की चेतना जागृत होती है तथा लोग ये महसूस करते हैं कि बलात्कार तथा लैंगिक हमले केवल 'औरत मसले नहीं हैं। ये गहरी बसी हुई हिंसा के प्रतीक हैं, जो हमारे समाज की औरतें तथा अन्य दर-किनार किये हुए लोग प्रतिदिन झेलते हैं।.......
.........''बलात्कारों की घटनाएँ काफी बड़ी गिनती में गिरफ्तारी दौरान घटनी हैं। इनमें से कितनी ही घटनाओं में स्वयं पुलिस वाले शामिल होते हैं। मथूरा के साथ बलात्कार दो पुलिस कर्मियों द्वारा किए गए थे। रामीजा बाई के साथ पुलिस थाने के भीतर पुलिस कर्मियों द्वारा बलात्कार हुआ था। सुमन रानी भी पुलिस कर्मियों द्वारा ही बलात्कार का शिकार बनाई गई थी।’’......
''वास्तव में पुलिस कार्यवाई मांगों में से एक मांग है। फिर भी केस दर्ज करने अथवा छानबीन करने में पुलिस का रिकार्ड किसी चर्चा के लायक नहीं है। एक ताजा टैलीविजन वार्ता दौरान स्वयं एक पुलिस अफसर ने इस हकीकत की तरफ इशारा किया। उसने कहा, ''आखिर पुलिस वाले भी उसी मिट्टी के बने हुए हैं, जिस मिट्टी के लोगों ने पिछले सप्ताह नौजवान युवती के साथ बलात्कार किया। हम उनके एक दम तथा चमत्कारी ढंग से बदल जाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं।’’ इस बात से मुझे एक स्थानक समाचार-पत्रिका द्वारा कुछ समय पुर्व ही किये गए एक अध्ययन की याद आ गई। ये अध्ययन बलात्कार संबंधी दिल्ली के उच्च पुलिस अधिकारियों के रवैये के बारे में था। उनमें से लगभग 90 फीसदी की सोच यह थी कि बलात्कार की शिकार औरतें इस लायक हैं। किसी का कहना था, उसने स्वयं बलात्कार को बुलावा दिया, कोई कहता था कि वो औरत अकेली बाहर क्यों गई या उसने किसी विशेष फैशन का पहनावा क्यों पहना। ये बात बहुत अजीब लगती है कि औरतों के जिस्म ऐसी प्रतिक्रियाओं का कारण समझे जाते हैं। ये क्यों नहीं सोचा जाता कि समस्या देखने वालों की नजरों की है। ये स्वाभाविक क्यों समझा जाता है कि औरतों का सिर्फ दिन के उजाले में ही बाहर निकलना उचित्त है, रात को बाहर निकलना उचित्त नहीं है?
वकील तथा जज भी रोष प्रदर्शन में शामिल हुए हैं। ये अच्छा ही है क्योंकि रोष-प्रदर्शन में जितनी विविधता होगी असर उतना ही अधिक होगा। फिर भी ये वकील ही हैं, जो बलात्कारियों को बरी करवाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। ये जज ही हैं जो ऐसे बहानों की आड़ में बलात्कारियों को रियायतें देते हैं कि वे अभी नौजवान है और उनके सामने सारी उर्म पड़ी है। क्या औरतों की जिन्दगी की कोई कीमत नहीं है?
और अब जरा हमारे राजनैतिज्ञों की ओर भी नजर डाली जाए। हमें ये पूछना पड़ेगा कि कितने राजनीतिज्ञों पर बलात्कारों के केस बने हुए हैं या दोष लगे हुए हैं। शायद हमें ये भी पूछना पड़ेगा कि कोई भी ऐसा सवाल क्यों नहीं पूछ रहा। और यहाँ पर एक चुना हुआ राजनेता भी है। अगली बार प्रधानमंत्री पद का दावेदार, ऐसा आदमी जिसके शासन में गुजरात में मुसलमान औरतों के साथ न सिर्फ बड़े पैमाने पर बलात्कार हुए, बल्कि उन्हें भयानक हिंसा का शिकार भी बनाया गया। ये कैसे होता है कि हम मीडिया वाले, पत्रकार- जो इस राजनेना की सफलता का गुणगान करते हैं, ये सवाल तक नहीं उठा सकते विशेषकर इस समय कि उसने लड़ाई के हथियार के रूप में बलात्कार को क्यों उत्साहित किया तथा मान्यता दी। उसने भी आगे हमें ये प्रश्न करना चाहिए कि यदि राजनेता सचमुच ही इस मसले पर गंभीरता से सोचते है तो वे रोष-प्रदर्शन करने वालों के साथ सड़कों पर क्यों नहीं उतरते। जब अन्ना हजारे ने उपवास रखा था तो कोई दिन ऐसा नहीं होता था जब कोई राजनेता उसे न मिलने गया हो। ये भला मानस अब कहां है?
बलात्कार सभी जगह होता है। ये घरों में होता है, परिवारों में होता है, आस-पड़ोस में होता है, पुलिस थानों में होता है, कस्बों तथा शहरों में होता है, गांवों में होता है। समाज में हो रहे परिवर्तन के साथ साथ बलात्कार की घटनाओं में बढ़ौतरी हो रही है। जैसे जैसे समाज में औरतों की भुमिका बदल रही है, जैसे जैसे अर्थिक गिरावट आती है तथा कमाई का भाग सिकुड़ता है, ये घटनाएं बढ़ती हैं क्योंकि बलात्कार इन सब के साथ जुड़ा हुआ है। उसी प्रकार जैसे ये अभिन्न रूप में तथा मूल रूप में औरतों के प्रति तिरस्कार बल्कि नफरत के साथ जुड़ा हुआ है। तिरस्कार तथा नफरत जो भ्रूण हत्या के माध्यम से खुलकर प्रकट होती है। मामूली मलहम-पट्टी जैसे हल इतने व्यापक अपराध का जवाब नहीं हो सकते।
बेशक रोष महत्वपुर्ण है। ये समाज की आत्मा को झिंझोड़ता है, ये लोगों को परिवर्तन के समीप लाता है। इसके परिणामस्वरूप वे स्वयं को परिवर्तन के भागीदार महसूस करते हैं। ये भी काफी सम्भावित है कि रोष की मौजूदा प्रवाह का कुछ न कुछ नतीजा निकले। शायद इतना ही कि तेज-रफतार अदालतें कायम कर दी जाएँ। परन्तु भविष्य का मार्ग भी महत्वपूर्ण है। हमें स्वयं से सवाल पूछने की जरूरत है, जब मणिपुर या कश्मीर में तायनात फौज बलात्कार करती है, क्या हम इसी प्रकार रोष प्रकट करते हैं, आम तौर पर नहीं, क्योंकि देशभक्ति आ टप्कती है। 90वें के अन्त में कोनान पोशपुरा में हुई घटना को याद करो जब राजस्थान राईफलज ने 30 से अधिक औरतों के साथ बलात्कार किया। यहां तक कि हमारे खुले विचारों वाले पत्रकारों को भी ये यकीन नहीं आया कि ऐसा हो सकता है, कि फौज ऐसा कर सकती है। फिर भी कोनान-पोशपुरा के लोगों को सब कुझ याद है। आज भी इस क्षेत्र की औरतों की शादी मुश्किल है क्योंकि बलात्कार की शर्मिन्दगी की उम्र लम्बी होती है। क्या हम ऐसे ही गुस्से में आते यदि बलात्कार की घटना दिल्ली के समीप किसी छोटे कस्बे में घटती तथा पीडि़त कोई दलित औरत होती। क्या आपको खैर-लांजी याद है? वो बलात्कार जो एक मां और बेटी के साथ हुआ वहशी, हिंसक तथा घिनौना बलात्कार जिस के बाद दोनों को कत्ल कर दिया गया। इस घटना ने हमें इस प्रकार क्यों नहीं झिंजोड़ा, जिस प्रकार इस ताजा घटना ने झिंझोड़ा है।
बलात्कार के विरोध में सामूहिक रूप में आवाज उठाना महत्वपूर्ण है। परन्तु बलातकार ऐसी शय नहीं है, जो स्वयं ही घटित हो जाए। ये समाज में बसी उस लगातार हिंसा का अंग है, जो प्रतिदिन औरतों को निशाना बनाती है।.....
ये महत्वपूर्ण है यदि हम औरतों के लिए सामूहिक रूप में आवाज उठाते हैं। परन्तु आओ हम फिक्रमंद हो कि ये आवाज सभी औरतों के लिए उठे, हम आवाज बुलन्द करें ताकि कोई भी औरत लैंगिक हिंसा का शिकार न हो। वे गरीब हो या अमीर, शहरी हो या देहाती, दलित हो, मुस्लिम या हिन्दू या और कोई भी भविष्च में किसी के साथ भी ऐसा न हो। हम आवाज उठाएँ ताकि कोई भी आदमी ये मानकर न चल सके कि प्रबन्ध की वजह के कारण तथा लोगों की मानसिकता के कारण वो आसानी से बलात्कार के बाद बच सकता है तथा आओ हम ये आवाज मर्दों के लिए भी उठाएँ, लिंग भिन्नता से ऊपर उठकर उठाएँ, उन गरीबों के लिए उठाएँ तथा उन सबके लिए उठाएँ जो नाजायज हिंसा का निशाना बनते हैं। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली में बलात्कार का शिकार हुई नौजवान युवती के साथ उसका दोस्त भी था, जो हिंसा का निशाना बनाया गया तथा मौत के करीब पहुंचा दिया गया। हमें उसके बारे में भी बात करनी चाहिए।
('दा हिन्दू में से धन्यवाद सहित -संक्षिप्त रूप)



(बलात्कार पुर्णत: सैक्स का मामला नहीं है। ये ताकत के इस्तेमाल, हिंसा, धौंस तथा तौहीन का मामला है। बलात्कार की घटनाओं को मर्दों के काम-वेग को नियत्रित करने के मामले तक संकुचित रूप में देखना बेअसर साबित होगा, क्योंकि ऐसी सोच बलात्कार के बारे में बहुत खोखली तथा अधूरी समझ को व्यक्त करती है।)
-अनूप सुरेन्द्रनाथ की 'दा हिन्दू में टिप्पणी



दामिनी मौत से नहीं हारी
-नवजोत
दिल्ली की गैंग बलात्कार तथा वहशी दरिन्दगी की शिकार लड़की 'दामिनी की आज सुबह मौत हो गई है। भिन्न भिन्न टी.वी. चैनलों द्वारा इस लड़की के बेहद दु:खदायी अंत को एक बड़ी सु$र्खी के साथ दिखाया जा रहा है, ''दामिनी मौत से हार गई है... आखिर जिन्दगी मौत से हार गई है’’ आदि आदि। परन्तु 'दामिनी शासकों तथा उनके उस प्रतिक्रियावादी सामाजिक-प्रबन्ध से हार गई है, जो प्रतिदिन हजारों दामिनी जैसी मासूम जिन्दगीयों को निगल जाता है। जहाँ हजारों, दो साल की बच्चियों से लेकर 70 साल तक की औरतें बलात्कार का शिकार होती है, बहुतों को बेदर्दी के साथ मौत के घाट उतार दिया जाता है, जहां महिलाओं को थानों में जलील किया जाता है, थानों में बलात्कार का शिकार बनाया जाता है, जहाँ देश के तथाकथित रक्षक-दस्तों (नीम-फौजी दलों तथा फौज) द्वारा महिलाओं के साथ बलात्कार तथा बहशीपन का नंगा-नाच किया जाता है, जहां छत्तीसगढ़ की एक अध्यापिका सोनी शोरी को ऐसी दरिन्दगी का शिकार बनाया जाता है, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता तथा ऐसी दरिन्दगी का शिकार बनाने वाले पुलिस अफसर को राष्ट्रपति पुरस्कार से सन्मानित किया जाता है, जहां जम्मू-कशमीर तथा उत्तर-पूर्व क्षेत्र में तायनात नीम-फौजी तथा सुरक्षा बलों के बलात्कारी और कातिल अफसरों के सिर पर शासकों द्वारा अफसपा जैसे काले कानून की छत्रछाया है, जहां हजारों मासूम जिन्दगियां दहेज तथा सामाजिक हिंसा की बलि चढ़ जाती हैं, जहां हजारों लड़कियों को इस संसार में आँखें खोलने से पहले ही मार दिया जाता है, जहां देश की लाखों बेटियों को देह-व्यापार के गहरे दलदल में धकेल दिया जाता है आदि आदि। कड़वा सच्च यह है कि इस देश में कोख से लेकर जीवन के अंत तक प्रत्येक औरत धक्केशाही, शोषण, जलालत, अत्याचार तथा दानवी हिंसा की छाया में सांस लेती है।
''जहां प्रत्योक महिला दामिनी है’’
''यहां 2 साल की आयू से लेकर हर आयू की महिला दामिनी है।’’ दिल्ली के जंतर-मंतर पर छत्तीसगढ़ से रोष प्रकट करने आई एक लड़की के ये शब्द सोलह आने सच्च है। उसने कहा कि जब हम दिन के समय भी घर से निकलती हैं, तो ऐसा लगता है कि कोई पीछे आ रहा है। थानों में शिकायत करने के लिए जाने से डर लगता है। सब जानते हैं कि वहां क्या होता है।  एक महिला ने कहा कि यह राजनैतिक नेता जो अब दामिनी की मौत पर मगरमच्छ के आँसू बहा रहे हैं, सभी कुछ दिनों बाद चुप कर जाऐंगे, उन्होंने कुछ नहीं करना। बंबई की एक महिला ने कहा कि हालत यह है कि हमें अपनी बच्चियों की सुरक्षा का मामला खाए जा रहा है, उन्हें घर से बाहर भेजते हुए डर लगता है, यही डर लगा रहता है कि पता नहीं बे सुरक्षित घर लौटेंगी या नहीं, करें तो हम क्या करें......।
अत: दामिनी मामला भारत में औरतों पर दिन-प्रतिदिन हो रहे भयानक तथा हिंसक जुलम के एक घिनौने नमूने के रूप में उभरकर आया है, जिससे जुड़कर देशभर में औरतों की इजत-आबरू, स्वाभिमान तथा जीने के अधिकार की रक्षा का मामला इतने जोरदार ढंग से तथा व्यापक स्तर पर उभर कर सामने आया है। ये बात जोरदार रूप में उभरी है कि औरतें न दिल्ली में सुरक्षित हैं, ना ही किसी और शहर या कस्बे में सुरक्षित हैं। वे न पंजाब के पटियाला या फरीदकोट में सुरिक्षत हैं। वे देश के किसी भी कोने में सुरक्षित नहीं है। यह घिनौनी प्रक्रिया (Phenomenon) इतनी खौफनाक रूप तथा व्यापक आकार धारण कर चुकी है कि ये समाज में, विशेषकर शहरी तथा ग्रामीण मेहनतकश जनसमूहों में दहल और दहशत बिठाने का माध्यम बन गया है। यदि कोई लड़की समाज के बिगड़े बदमाशों या शासकों की सरपरस्ती वाले गैंग-सदस्यों की हवस के सम्मुख आत्म-समर्पण करने से इन्कार करती है तथा सिर ऊँचा करके चलने की कोशिश करती है, तो उसे जबरदस्ती अगवा करके बलात्कार का शिकार बनाया जाता है, तथा उसका कत्ल तक कर दिया जाता है। यदि लड़की के मां-बाप या भाई-बहन उसकी रक्षा करने की कोशिश करते हैं तो उनकी मार-पीट करने तथा कत्ल तक की नौबत आ जाती है। ऐसी घटनाएं रोज अखबारों की सुिर्खयां बनती है।
आधिकारिक संघर्षों (कशमीर, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र तथा आदिवासी क्षेत्रों में) के मार्ग पर चल रहे लोगों को सबक सिखाने तथा खौ$फ पैदा करने के लिए पुलिस, नीम-फौजी बलों तथा फौज द्वारा औरतों के विरुद्ध इस घिनौने हथियार को पहले भी इस्तेमाल किया जाता था तथा आज भी इसका खुलकर प्रयोग हो रहा है। भारतीय राजसत्ता के ये वर्दीधारी बलात्कारी भेडि़ए न सिर्फ कानून सें ऊँचे हैं, बल्कि उनके इन कुकर्मों को कानूनी समर्थन प्राप्त है। इसलिए, आज औरतों पर हिंसा तथा जुल्म और उनकी सुरक्षा का मामला देशभर में लोकतांत्रिक सामाजिक मुद्दे के रूप में उभर आया। ये मुद्दा मध्य-वर्गीय जन-समूदायों, मेहनतकश लोगों तथा न्याय पसन्द क्षेत्रों के पीड़ादायक तथा बहुत ही चुभने वाले सरोकार का मामला बन गया है। पंजाब में श्रुति और फिर अमृतसर में थानेदार के कत्ल के मामले तथा उसके बाद पटियाला जिले के गांव बादशाहपुर की लड़की के साथ होने वाले बलात्कार की घिनौनी घटना के साथ जुड़ कर भी इस मुद्दे की चुभन तथा लोक-सरोकार की झलकें सामने आई थीं। अब दामिनी मामले के साथ जुड़कर इस मुद्दे की चुभन तथा प्रसार की देश-व्यापी झलक सामने आई है।
सामाजिक-सांस्कृतिक पतन तथा संकट का इजहार
वास्तव में, दिल्ली में घटित इस कांड ने देश में महिलाओं के प्रति फलफूल रही आपराधिक मर्द प्रवृति की खूंखार क्रूरता और भयानकता तथा औरतों के सिर पर मंडराते खौफनाक असुरक्षा के मामले को ही उभार कर सामने नहीं लाया, इसने देशभर में फल-फूल रहे तथा खतरनाक रूप धारण कर रहे सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदूषण तथा पतन की ओर भी संकेत किया है। क्योंकि महिलाओं के साथ जो कुछ भी घटित हो रहा है, ये समाज में हो रही अपनी आप में कोई एक-अकेली तथा अलग किस्म की प्रक्रिया नहीं है। ये समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष के पतन तथा गलने-सडऩे की हद तक पहुँच रही बड़ी प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, ये प्रक्रिया देश के दिन-प्रतिदिन गहरे हो रहे तथा फल-फूल रहे सामाजिक-सांस्कृतिक संकट को प्रकट करता है।
ये सामाजिक-सांस्कृतिक संकट न स्वयं पैदा हुआ है तथा न ही स्वयं फैल रहा है। ये देश के साम्राज्यवादियों के तलवे चाटने वाले शासकों द्वारा पैदा किया गया है तथा इनके द्वारा ही इसके और प्रदूषण तथा पतन को हवा दी जा रही है। वैसे तो साम्राज्यवादी-सामन्ती लूट तथा दबाव का शिकार होने के कारण देश हमेशा ही आर्थिक, राजनैतिक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संकट का शिकार रहा है। ये आर्थिक, राजनैतिक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संकट देश के निजाम का एक आधारभूत लक्षण है। ये सर्व-व्यापी संकट दिन-प्रतिदिन गंभीर होता आया है। परन्तु पिछले दो दशकों के दौरान प्रतिक्रियावादी शासकों द्वारा साम्राज्यवादी-निर्देशित नीतियों को देश पर थोपने के कारण इस संकट ने और भी विस्तृत रूप धारण करना शुरू कर दिया है। शासकों द्वारा एक तरफ तो कमाई करने वाले लोगों को रोजी-रोटी तथा कमाई के साधनों से वंचित करने तथा देश की धन-दौलत को देसी-विदेशी कॉरपोरेट घरानों को सौंपने के लिए अपना हमलावर हल्ला आगे बढ़ाया जा रहा है, दूसरी तरफ, इस हल्ले के लिए रास्ता आसान करने के लिए तथाकथित लोकतांत्र के नामाधीन लोगों को संगठित होने तथा संघर्ष करने की पहले ही मामूली आजादी पर हमला करना शुरू किया हुआ है। इस लूट तथा अत्याचार के दो-धारी हमले के अंग के रूप में शासकों द्वारा देश के समाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र को भी लपेटे में लिया हुआ है। उनके द्वारा एक हाथ से कॉरपोरेट थैलीशाहों की खपतकारी मण्डी को प्रोत्साहन देने तथा दूसरे हाथ से लोगों से साकारात्मक नैतिक-मुल्यों से वंचित करने के लिए टी.वी. चैनलों, पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, शिक्षा-संस्थानों तथा फिल्मों-नाटकों आदि के माध्यम से पतित साम्राज्यवादी तथा सामन्ती संस्कृति की बौछार की जा रही है। इस प्रकार, आदमी-औरत के प्राकृतिक सामाजिक रिश्ते को प्रदूषित करने, औरत के जिस्म का व्यापारीकरण करने, उन्हें मात्र कामुक तथा मर्द का मनोरंजन करने वाले खिलौने के रूप में पेश करने, मर्दों की तथाकथित स्वाभाविक हमलावर प्रवृति को उभारना, अपराधिक प्रवृति को हवा देना, व्यक्तिवादी प्रवृति को आदर्शरूप बनाकर तथा संवेदनशीलता को खोखला करने के लिए जोरदार प्रयत्न किया जा रहा है। जो कुछ लोगों, विशेषकर नौजवानों को ''खाओ, पीओ, ऐश करो’’ के बैनर तले एक-दूसरे को कुचलकर आगे निकलने की अंधी दौड़ में खींचने के माध्यम से किया जा रहा है।
साम्राज्यवादी डकैतों तथा उनके तलवे चाटने वाले शासकों द्वारा एक तरफ नौजवानों के सामने ये लुभावना बैनर लहराया जा रहा है, दूसरी तरफ लोगों की रोजी-रोटी तथा कमेटी के साधनों पर झपटा मारा जा रहा है। लाखों, करोड़ों कमाई करने वाले हाथों, विशेषकर नौजवानों को बेरोजगारी तथा अनिश्चितता और काले भविष्य की ओर धकेले जा रहे लोगों तथा नौजवानों के ये काफिले साम्राज्वादियों तथा देसी शासकों के विरुद्ध बेचैनी तथा गुस्से के लावे का एक पहाड़ बनते हैं, जिसने देर-सवेर फटना ही फटना है। उपरोक्त बैनर की ओट में शासकों द्वारा लोगों तथा नौजवानों की इस बेचैनी को भटकाया तथा कुमार्ग पर डाला जा रहा है। अपनी इस प्रतिक्रियावादी जन-दुश्मन खेल में वे तात्कालिक तौर पर काफी हद तक कामयाब भी हो रहे हैं।
समाज-विरोधी गतिविधियों को
शासकों की हिमायत व छत्रछाया
उनके इस जन-विरोधी खेल का ही नतीजा है कि आज समाज में दिन-दिहाड़े लूट-मार, चोरियां-डकैतियां, स्मगलिंग, माफिया सरगर्मीयां, मारधाड़, कत्ल, औरतों के साथ छेड़छाड़, अगवा, बलात्कार आदि समाज-विरोधी घटनाओं का सिलसिला खतरनाक रूप धारण करता जा रहा है। इन घटनाओं को अंजाम देने वाले गिरोहों में बड़ी गिनती को मौकाप्रस्त राजनैतिक नेताओं/पार्टियों, बड़े धनवानों, पुलिस अफसरों तथा प्रशासनिक अधिकारियों की प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष सरपरस्ती हासिल है। इस प्रकार, इन भटके हुए तथा कुमार्ग पर चले हुए व्यक्तियों तथा नौजवानों को ये मैकापरस्त राजनेता तथा बड़ी अफसरशाही अपनी गोद में लेते हैं, इनकी समाज-विरोधी तथा आपराधिक गतिविधियों को छत्रछापा प्रदान करते हैं तथा इन गिरोहों को कमाई करने वाले लोगों के दहलाने तथा अपनी सामाजिक-राजनैतिक सरदारी के औजारों के रूप में बरतते हैं। इससे आगे, इनको न्यायसंगत जन-संघर्षों के विरुद्ध प्रयोग में लाए जाने वाले फाशी गिरोहों के रूप में पालन-पोषण का भी उद्देश्य लेकर चलते हैं। आज उपरोक्त जिक्र के अधीन समाज विरोधी तथा आपराधिक गतिविधियों का विकराल रूप धारण कर रहा ये सिलसिला केवल ियों में ही नहीं, सम्पूर्ण समाज में खौफ, असुरक्षा तथा बेबसी के आलम के प्रसार की वजह बन रहा है। आज हालात यह है कि प्रत्येक व्यकित, प्रत्योक ी तथा प्रत्येक शहरी इस खौ$फ, असुरक्षा तथा बेबसी के साए में दिन काट रहा है। असंगठित होने के कारण मुसीबत के समय उनका हाथ पकडऩे वाला कोई नजर नहीं आता। न पुलिस, न ऐस.डी.ऐम., न डी.सी., न ऐम.ऐल.ए./मंत्री तथा न ही समाज के स्वयमेव ही बने हुए कोई और चौधरी या सरदार/सब इन अपराधी गिरोहों के पालनहार हैं तथा उनकी पीठ थपथपाते हैं। नोट करने वाली बात ये है कि ये लूट-मार, बलात्कार, मारपीट जैसी समाज-विरोधी सरगर्मीयां स्वाभाविक रूप में भी सिर उठाती रहती हैं, परन्तू ये इक्का-दुक्का, बिखरी तथा क्षणिक घटनाओं तक सीमित रहती हैं तथा दबती-उठती रहती हैं। ये तब तक एक बाकायदा संगठित व्यापक तथा चिर-स्थाई सिलसिले का रूप धारण नहीं कर सकती, जब तक इन को शासकीय समर्थन तथा सरप्रस्ती हासिल नहीं होती। सरप्रस्ती प्राप्त गिरोहों की मारधाड़ तथा दरिन्दगी के शिकार निहत्थे व्यक्तियों, औरतों, बच्चों, मजलूमों के हक में हमदर्दी का नारा फिर कौन लगाए? ले देकर रह जाते हैं, साधारण लोग, कमाई करने वाले लोग, शासकों के सताए लोग। इस मारधाड़ तथा दरिन्दगी को देखकर उनकी आत्मा कांप उठती है, हृदय उद्विग्न हो जाता है, एक टीस उठती है तथा वे इसके विरोध में उठ-खड़े हो जाने को बेचैन हो जाते हैं। कई स्थानों पर ये टीस (पीड़ा की आवाज) एक बेबसी के तले दबी रह जाती है, कई स्थानों पर ये विरोध तथा रोष के भिन्न-भिन्न रूप बनकर फूट पड़ती है। कई स्थानों पर जागृत जमीर वाले लोक-पक्षीय नेतायों तथा क्रांतिकारी शक्तियों के कन्धे मिलाने से ये जुझारू तथा असरदार संघर्ष का रूप धारण कर जाती है। दिल्ली में घटित इस दर्दनाक घटना समेत पंजाब में औरतों के साथ हो रही धक्केशाही तथा बलात्कार की घटनाओं में जनतक विरोध तथा रोष के उपरोक्त अंशों का जोरदार इजहार हुआ है। विशेषकर दिल्ली की घटना के समय स्वाभाविक विरोध तथा रोष के लावे का खुलकर प्रदर्शन हुआ है।
असुरक्षा भावना तथा गुस्से का इजहार
इतने बड़े स्तर पर लोगों, विशेषकर नौजवान विद्यार्थीयों द्वारा, दिल्ली में घटित इस जालिमाना घटना के विरुद्ध सड़कों पर उतर आने ने ये दर्शाया है कि उनके भीतर शासकों द्वारा प्रतिक्रियावादी सामाजिक-सांस्कृतिक हमले के परिणाम स्वरूप फल-फूल रहे सामाजिक-सांस्कृतिक पतन तथा दुर्गन्ध तथा असुरक्षा के बढ़ रहे अहसास का ही इजहार नहीं हुआ, बल्कि देश की पुलिस, प्रशासन और मौकाप्रस्त राजनेताओं के प्रति तीव्र विरोध तथा अविश्वास का भी इजहार हुआ है।  इसके साथ ही नये आर्थिक हल्ले के फलस्वरूप दिन-प्रतिदिन बढ़ रही रोजी-रोटी तथा रोजगार की असुरक्षा ने उपरोक्त आक्रोश की लपटों को हवा देने की भूमिका निभाई है।
ये देश व्यापी जनतक प्रतिक्रम तथा नौजवानों-विद्यार्थीयों का ये प्रतिक्रम इस बात का संकेत है कि चाहे शासकों द्वारा नौजवानों में संवेदनशीलता को मारने, निराशामयी रूचियों, व्यक्तिवादी हमलावर तथा हिंसक प्रवृत्तियों का संचार करने के लिए पतित साम्राज्यवादी-सामन्ती सांस्कृतिक हल्ला आरंभ किया हुआ है तथा ये नैजवानों के काफी हिस्से को थोड़े-बहुत रूप में प्रभावित भी कर रहा है, परन्तु इसके बावजूद, इस हल्ले के सामने आ रहे समाज-विरोधी तथा घातक असर नौजवान वर्ग के कोरे तथा संवेदनशील मनों को ठेस पहुँचा रहे हैं। उनके भीतर पीड़ा और चुभन पैदा कर रहे हैं, तथा बढ़ा रहे हैं और परिणास्वरूप तीव्र विरोध, बेचैनी तथा गुस्से को बढ़ावा दे रहे हैं।  नौजवानों-विद्यार्थीयों में इस विरोध तथा गुस्से का जमा हो रहा लावा निर्मित-दिशा में निकास के लिए करवटें ले रहा है तथा अग्रसर हो रहा है। दामिनी मामले में नौजवानों-विद्यार्थीयों का इतनी-बड़ी गिनती में सड़कों पर आना, उनमें जमा हो रहे इस लावे का ही एक उभरा हुआ इजहार है, जिसमें भविष्य की इन्कलाबी नौजवान-विद्याथी लहर का मसाला तैयार होने की काफी संभावनाएँ पड़ी हैं।
शासकों का दो-धारी पैंतड़ा
देश के साम्रज्यवादी-चापलूस शासक इस संभावी खतरे से बेखबर नहीं है। इस कारण शासकों द्वारा एक तरफ लोगों को चिकनी-चुपड़ी बातों द्वारा बहला-फुसलाकर तथा दूसरी तरफ जनतक प्रतिक्रम को सख्ती से अपने द्वारा बनाई गई लक्षमण रेखा में सीमित रखने के लिए तैयारियां करने का पैंतड़ा अपनाया गया। एक तरफ राष्ट्रपति से लेकर तथाकथित गृह मंत्री, दिल्ली की मुख्य मंत्री तथा अन्य मौकाप्रस्त पार्टियों के नेताओं द्वारा इस घटना पर मगरमच्छ के आँसू बहाने का नाटक खे लतेे हुए, जनतक रोष को ठण्डा करने के प्रयास किए गए। दोषियों को स$ख्त से स$ख्त सजाएँ देने तथा भविष्य में ऐसी घटनाएँ होने से रोकने के लिए मौजूदा कानून को शोधित करके और कठोर बनाने का पैंतड़ा उभारकर मामले को महज एक कानूनी समस्या के रूप में पेश करने पर जोर लगाया गया। इस प्रकार देश में सामाजिक-सांस्कृतिक गन्दगी फैलाने की अपनी जिम्मेदारी से बरी होने, जनता के आक्रोश को समस्या के वास्तविक कारणों से भटकाने तथा कानूनी नुक्ते के रास्ते खारिज करने की चाल चली गई। दूसरी तरफ जनतक विरोध तथा रोष के अपने द्वारा बनाई गई तथाकथित लोकतांत्रिक लक्षमण रेखा में सीमित रखने तथा इनमें से बाहर जाने की सूरत में लाठी से निपटने की तैयारियां की गईं। दिल्ली तथा और कई जगहों पर धारा-144 ठोसी गई। कई गाडिय़ां तथा स्टेशन बन्द किये गए, लोगों में डर बिठाने के लिए पुलिस द्वारा फ्लैग मार्च किए गए। मीडिया द्वारा ये शोर मचाया गया कि जनतक विरोध को हिंसा पर उतारू समाज-विरोधी अनसरों द्वारा अगवा करने की कोशिशें हो रही है। इस प्रकार, जनता को संघर्ष से पीछे हटने की एक छिपी हुई धमकी भी दी गई। इंडिया गेट के पास प्रदर्शन कर रहे नौजवानों-विद्यार्थीयों तथा लोगों पर लाठीचार्ज किया गया, पानी की बौछार की गई तथा जोर-जबरदस्ती से संघर्ष को दबाने का ढंग भी अपनाया गया। परन्तु शकित प्रयोग की इस कार्यवाई ने संघर्ष के मार्ग पर चली जनता के इरादों को और दृढ़ बनाने तथा जनतक आक्रोश को और प्रज्वलित करने की भूमिका निभाई।
वस्तूगत संभावनाओं की तुलना में क्रांतिकारी नेतृत्व की गंभीर सीमितता
शासकों के सभी षडयंत्रों के बावजूद ये दृढ़ तथा विशाल जन-उभार लगभग दस दिन जारी रहा। परन्तु इस उभार में खरी संगठित क्रांतिकारी तथा लोकतांत्रिक जन-शक्तियों का असरदार दखल बहुत ही सीमित रूप में हो पाया है। फलस्वरूप इस संघर्ष को पारंपरिक लक्षमण रेखाओं से बाहर ले जाने की संभावनाओं को साकार करने की भी सीमिताएँ प्रकट हुई हैं। अलग अलग स्थानों पर विशेषकर संघर्ष के प्रमुख केन्द्र में नेतृत्व अनजान गैर-तजुर्बेकार तथा पारंपरिक सोच वाले हिस्सों से भरा हुआ था और इसमें स्वार्थी शासक वर्गीय राजनैतिक हिस्से भी घुसपैठ की कोशिशें कर रहे थे। यही कारण है कि शातिर शासकों को इस संघर्ष की चोट को तथाकथित कानूनी कदमों की मांगों तक सीमित कर देने में कोई बड़ी मुश्किल सामने नहीं आई। उन्होंने पीडि़त लड़की का मुफ्त ईलाज करवाने, मरणोपरांत 35 लाख रुपए मुआवजा देने का ऐलान करने तथा मौजूदा कानूनों में संशोधनों के लिए कमेटी बनाने जैसे कदम लेकर अंतत: इस उभार को शांत करने तथा अपनी इच्छित सीमा में रखने में सफलता प्राप्त की है।
जिस प्रकार दामिनी बलात्कार घटना के विरुद्ध जनतक रोष फूटकर सामने आया है, इसने दर्शाया है कि लोगों, विशेषकर नौजवानों-छात्रों में सामाजिक-सांस्कृतिक पतन के खिलाफ बेचैनी तथा आक्रोश की ज्वाला बढ़ रही है तथा फैल रही है। आक्रोश की यह ज्वाला संगठित संघर्ष के लिए विस्फोटक सामग्री साबित हो सकती है। ऐसी वस्तुगत संभावनाओं का उभरकर दिखाई देना तथा दूसरी तरफ संघर्ष का शासक वर्गीय इच्छाओं की लक्षमण रेखा को पार न कर पाना यही संकेत करता है कि वस्तुगत संभावनाओं को साकार करने के लिए क्रांतिकारी चेतना एवं दखल को गंभीरता से आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
(सुर्ख रेखा, जनवरी-फरवरी 2013 से अनुवादित)

बलात्कार आंधी आक्रोश
-26 दिसम्बर को लुधियाना भाई बाला चौक के शहीद करतार सिंह सराभा पार्क में क्रांतिकारी जनतांत्रिक जन संगठनों के सैंकड़ों कारकुनों द्वारा दिल्ली गैंग रेप अथवा पुलिस दमन के खिलाफ आक्रोशपूर्ण रैली तथा प्रदर्शन
-लुधियाना के विभिन्न केन्द्रों में रोष मार्च, पी.ए.यू. कैंपस के छात्र, छात्राओं कालजों के छात्रों तथा कानवेंट स्कूल के अधियापकों द्वारा प्रदर्शन, बी.ऐस.ऐन.ऐल. कर्मचारीयों की वर्किंग ऐसोसीएशन द्वारा चेयरमैन सुखप्रीत कौर के नेतृत्व में रैली।
-पायल नौजवान भारत सभा की सिहौड़ा इकाई द्वारा 24 दिसम्बर को रोष मार्च तथा रैली।
-भटिण्डा में पी.ऐस.यू. (शहीद रंधावा) के नेतृत्व में सैंकडों छात्राओं की तरफ से शहर की सड़कों पर मार्च।  छात्रों और छात्राओं ने फौजी चौक में मानवीय कड़ी बनाई तथा सिक्षशा शासत्रीयों के फोरम द्वारा रैली तथा जगती हुई मशालें लेकर मार्च।
-30 दिसम्बर को लंबी क्षेत्र में सिंघेवाला, फतूहीवाला गांवों में पंजाब खेत मजदूर यूनियन, भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां) तथा नौजवान भारत सभा के कारकुनों ने सरकारों तथा गुन्डागर्दी के पुतले जलाए।
-5 दिसम्बर को गुरदासपुर जिले के हासापुर गांव में नामालूम व्यक्तियों की तरफ से स्कूल की एक नाबालिग छात्रा का बलात्कार और कत्ल कीए जाने की घटना के तीन हफ्ते बीत जाने के बाद भी दोषियों को गिरफ्तार करने में पुलिस की नाकामी के खिलाफ सैंकडे किसानों और आम लोगों ने 27 दिसम्बर को गुरदासपुर शहर में रोह भरपूर प्रदर्शन किया।
-जमू युनिवर्सिटी और जमू आयुरवैदिक संस्था और खोज केन्द्र समेत अनेकों कालेजों और स्कूल के छात्र, छात्रायों ने, 20 दिसम्बर को दूसरे दिन भी शहर के अनेकों स्थानों पर रैलीयां और मार्च करने के बाद दिल्ली गैंग रेप के दोषियों को सख्त से सख्त सजाएं देने की मांग की। विद्यार्थीयों ने शहर की अनेकों सड़कों पर ट्रैफिक जाम कीए और घन्टों तक आवाजाई को अस्त-विअस्त कर दिया।
-2 जनवरी को जम्मू के वकीलों ने, जिन में बहुत बड़ी संख्या में औरत वकील शामिल थीं, दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ रैली व मार्च किया।
-फरीदकोट, 6 जनवरी- औरतों पर बढ़ रहे जबर और सीधे पूंजी निवेश के खिलाफ लोक मोर्चा पंजाब, इन्कलाबी केन्द्र पंजाब और लोक संगराम मंच की तरफ से जहां गीता भवन में राज्य स्तरीय कनवैनशन की।
-बठिंडा, 5 जनवरी- महिलाओं के हो रहे बलात्कार और कत्ल की घटनाओं के खिलाफ आज यहां रोष प्रदर्शन कीया गया। यहां टीचर्ज होम में हुई रैली में लोक मोर्चा पंजाब के सूबा सचिव जगमेल सिंह ने कहा कि मुल्क के शासकों की तरफ से अशलील सांस्कृति को प्रफुलत कीया जा रहा है। भारतीय किसान यूनियन के आगू शिंगारा सिंह मान ने कहा कि लोगों को पुलिस व सियासतदानों से भले की आस छोड़ कर आप संगठित होना चाहीए। इस रोष मार्च में नौजवान भारत सभा, टैक्नीकल सर्विसिज यूनियन, देहाती मजदूर सभा, डेमोक्रेटिक टीचर्ज फ्रन्ट, ई.टी.टी. अधियापक यूनियन, ऐस.ऐस.ए./रमसा यूनियन, 7654 अधियापक यूनियन, पंजाब खेत मजदूर यूनियन आदि जत्थेबंदियों ने भाग लिया।
-नूरमहल- दोआबा आर्य सीनीयर सैकेंडरी स्कूल में मुल्क व्यापी गुन्डागर्दी के खिलाफ विशाल एकत्रता करने बाद शहर के मुख्य बाजारों और सड़कों पर रोह भरपूर प्रदर्शन किया गया, जिस में आर्य स्कूल, सेंट सोलजर कालेज, कच्चा-पक्का वेहड़ा तथा बालमीक मुहल्ला की औरतों और छात्रायों ने भाग लिया।



''यह निजाम ही औरत-विरोधी तथा जन-विरोधी है’’
-संदीप
दुनिया के ''सब से बड़े लोकतंत्र’’ की राजधानी में 23 वर्षीय छात्रा के साथ हुए गैंगरेप की घटना और उसके पश्चात् लगातार कई दिन जिन्दगी मौत के संघर्ष के बीच जूझ रही उस पीडि़त लड़की की मौत ने जहां इस समाज में औरत की असल, दयनीय, पिसी हुई और दिनों-दिन पतन की ओर बढ़ रही दशा को लोगों के सामने प्रस्तुत किया है, वहीं लोकतंत्र का नकाब पहन कर लूट रही राजसत्ता की नीतियों पर भी प्रशनचिंह्न लगाया है। इस घिनौनी घटना के खिलाफ जन-आक्रोश का उठना जायज एवम् जरूरी है। कई दिनों तक बिना किसी संगठित नेतृत्व की सहायता से विद्यार्थीयों, युवाओं, महिलाओं और आम जनता का दिल्ली के इंडिया गेट के पास किया गया प्रदर्शन और प्रशासन द्वारा प्रदर्शनकारी लोगों के साथ की गई खींचा-तानी, पुलिस कर्मियों द्वारा महिला प्रदर्शनकारियों से गई बदसलूकी, ऐसे अपराधों को जन्म देने वाले मंत्रियों के ऊपरी बयान और पुलिस कांस्टेबल की मृत्यू के बाद इस जन-साधारण के प्रदर्शन को आतंकवादी कार्यवाई की कोशिश का नाम दे कर असल मसले का सच्च प्रकट किया है। पूरे देश में रैलियों, प्रदर्शनों तथा कैन्डल मार्चों द्वारा इस समाज विरोधी जन-सांस्कृति विरोधी कार्यवाई की थू-थू हो रही है। इन कार्यवाईयों ने सरकार को इतना मजबूर जरूर किया है कि सरकार ने इस अपराध के खिलाफ सख्त सजा निर्धारित करने के लिए कमीशन बिठा दिया है। परन्तु यह घटना अन्य बहुत सारे सवालों को जन्म दे गई है।
वास्तव में, मसला सिर्फ दिल्ली में हुई छात्रा के साथ गैंगरेप और उसकी मौत का नहीं है, बल्कि असल मसला ऐसी कार्यवाईयों की व्यापकता की तरफ देखने का है और साथ के साथ इनके कारणों को जांचते हुए जरूरी कार्यवाई करने का भी है। देश की 'रेप कैपीटल बन चुकी दिल्ली में हुई यह घटना अपने प्रकार की अकेली घटना नहीं है, बल्कि देश की राजधानी के आस पास के अन्य प्रांतों में ऐसे अपराधों को सरेआम अंजाम दिया जाता है।
इसके साथ यह बात भी गौर करने वाली है कि यह सब कुछ भारत के किसी एक शहर या किसी एक पार्टी की सरकार तक सीमित नहीं हैं। सच्चाई तो यह है कि ''लोकतांत्रिक और औरत की हमदर्द’’ प्रत्येक पार्टी की सरकार के अधीन हो रहा है। फिर चाहे यह दिल्ली की सरकार हो, हरियाणा की कांग्रेस सरकार हो, पंजाब की अकाली-भाजपा सरकार हो, या उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी वाली सराकर हो। सितम्बर 2012 में अकाली दल से मसर्थन प्राप्त गुन्डों द्वारा फरीदकोट शहर की नाबालिग लड़की को घर से दूसरी बार जबरदस्ती अपहर्ण करने के मसले को लोगों के सामने पेश करने वाले इन्साफपसन्द लोगों एवम् संगठित हिस्सों के खिलाफ पर्चे दर्ज करने की धमकियों जैसी कार्यवाईयों ने पंजाब की अकाली भाजपा सरकार का ''राज नहीं सेवा’’ के माटो की असल औकात जाहिर की है। पटियाला जिले में सामूहिक बलात्कार का शिकार लड़की द्वारा, डेढ़ महीना बीत जाने पर भी इन्साफ न मिलने की वजह से आत्महत्या करने की घटना की फास्ट-ट्रैक अदालतों के पंजाब सरकार के दावों की हवा निकाल दी है। ऐसे ही, बल्कि इस से भी बुरे औरत विरोधी हालात हरियाणा की कांग्रेस सरकार के अधीन है। साल 2011 में बलात्कारों के 733 मामले हुए और पिछले तीन संघर्षों में इन घटनाओं में 35 प्रतिशत वृद्धि हुई। मध्य प्रदेश में तो रोजाना 9 लड़कियां बलात्कार का शिकार होती हैं। जनवरी से अक्तूबर 2012 के बीच मध्य प्रदेश में बलात्कार के 2613 और सामूहिक बलात्कार के 255 मामले सामने आए हैं। ऐसा ही हाल देश के बाकी राज्यों का है। इस दरमियान वोट बटोरू समाजवादी पार्टी वाला उत्तर प्रदेश भी पीछे नहीं ै, जहां बलात्कार एवम् छेडख़ानी के मामले दिन दिहाड़े सरेआम होते हैं। भारत की ''न्याय देने वाली’’ अदालतों में बलात्कार के लटक रहे मामलों में पिछले समय के दौरान 78 से 83 प्रतिशत की बढ़ौतरी हुई है। परन्तु यह तो सिर्फ सरकारी आंकड़े हैं और वह हकीकत है जो लोगों के सामने पहुँच जाती है। बेशक यह भी दिल दहलाने वाला है। परन्तु देश के अधिकतर लोगों की नजरों से ओझल ये हकीकत और भी दिल दहलाने वाली है जिसका शिकार बच्चियां यूवा लड़कियों और महिलाएं प्रतिदिन हो रही हैं। इन घटनाओं की ही एक खतरनाक कड़ी मध्य भारत में चल रहे ऑपरेशन ग्रीन हंट से जुड़ती है। भारत को दुनिया की ''विश्व शक्ति’’ बनाने के लिए खनिज पदार्थों पर पूंजीपतियों का कंट्रोल करने के लिए, वहां के निवासी गरीब आदिवासियों को हथियारों के जोर पर उजाड़ देने की सरकारी कार्यवाईयों का नाम है.... ऑपरेशन ग्रीन हन्ट। जो हर रोज निर्दोष आदिवासियों को फौजी ताकत के बल पर कानूनन कत्ल ही नहीं करता, छोटे छोटे मासूम बच्चों को फौजी-पुलिस अत्याचार का शिकार ही नहीं बनाता, बल्कि इन ''कानून और सुरक्षा के रखवालों’’ को आदिवासी महिलाओं से बलात्कार करने की छूट भी देता है। भारतीय हथियारबद्ध सेना का हर नए दिन हमला, जबरदस्ती लड़कियों-औरतों का अपहरण कर लेना, पुछताछ के नाम पर शारीरक मानसिक शोषण करना, कत्ल और बलात्कार की घटनाएँ पुंजीपतियों की सेवा के लिए मध्य भारत में आम घटित हो रही है। परन्तु यह सब घटनाएं भारत की आम जनता की जानकारी में नहीं पहुँच रहीं है। असका कारण यह है कि आम जनता को इस कड़वी सच्चाई से दूर रखा जा रहा है। ऐसी घटनाओं के समाधान के लिए शासक वर्ग और सामन्ती प्रबन्ध के ठेकेदार अपनी चुप्पी भी 'तोड़ते हैं। कभी शासक वर्गों के चौधरी और इनके इशारों पर चलने वाली खाप पंचायतों द्वार छोटी आयू की लड़कियों की शादी की सलाह दी जाती है। अधिक समय तक बाहर निकलने पर पाबन्दी, ढंग के कपड़े पहनने पर विभिन्न प्रकार की पाबन्दियों द्वारा इसका समाधान निकाला जाता है। कभी बिहार के किशमगन्ज जिले के सुन्दरबाड़ी गांव की पंचायत द्वारा लड़कियों और घर की बहुओं द्वारा मोबाईल फोन पर बात करते पकड़े जाने पर भारी जुर्माना लगाकर इसका समाधान ढूँढा जाता है। परन्तु अब सोचने वाली बात यह है कि अगर कोई लड़की या महिला कुदरती तौर पर सुन्दर है, ढंग के कपड़े पहनने जानती है, और यदि वह तकनीकी साधनों का इस्तेमाल करना जानती है, तो यह सब भला बलात्कार की घटनाओं के लिए कैसे जिम्मेदार हो सकता है? आदिवासी इलाकों की महिलाएं तो इस चमक-दमक से कोसों दूर हैं, फिर वहां यह घटनाएं क्यों होती हैं? वास्तव में यदि इन सारी घटनाओं को जोड़ कर देखा जाए, चाहे वह दिल्ली की गैंगरेप की घटना हो, पंजाब की फरीदकोट और पटियाला की घटना हो, हरियाणा और अन्य प्रान्तों की घटनाएं हों, या मध्य प्रदेश में आदिवासी महिलाओं के साथ हो रहा सलूक हो, तो यह बात बहुत स्सष्ट होती है कि यह निजाम प्रबन्ध और पूरे का पूरा ढांचा ही जन-शत्रु और औरत विरोधी है। जहां पुंजीपति दौलतमंदों की चलती है, परन्तु जन साधारण पर गन्दी अश्लील संस्कृति थोप कर असल मसलों से फटकाया जाता है और ऑपरेशन ग्रीन हन्ट का जुल्म शरेआम सरकारी शय पर होता है। जिस से यह बात साफ होती है कि मसला सिर्फ दिल्ली की घटना का नहीं है, बल्कि अन्य राज्यों में हो रही ऐसी घटनाओं का भी है, और मसला उस जन-शत्रु प्रबन्ध का है, जिसमें न तो अधिकार सुरक्षित हैं और न ही आत्म-सम्मान। इस सब बातों के समाधान के लिए सिर्फ एक जगह पर पहुँचकर नजर टिकती है और वह जगह या काम है, वह प्रबन्ध निर्मित करना जो जनता के पक्ष का हो, जिस में शक्ति आम जनता के हाथों में हो। इस पूंजीपति निजाम को नष्ट किए बिना अधिकार, सच्चाई एवम् आत्म-सम्मान सुरक्षित नहीं हो सकता।
फोन: 99889 17191
पी.ऐस.यू. (शहीद रंधावा)
(सुर्ख रेखा, जनवरी-फरवरी 2013 में से अनुवादित)








'चुल्लू भर पानी में डूब जाएं आसाराम
एक तरफ जहां दिल्ली गैंगरेप की भेंट चढ़ी पीडि़ता को इन्साफ दिलाने की मुहिम जोरों पर है। इस बीच आसाराम बापू के विवादास्पद बयान ने हड़कंप मचा दिया है। बापू ने इस वारदात के लिए न सिर्फ दुष्कर्मियों को दोषी बताया बल्कि पीडि़ता को भी समान ठहराया है। उन्होंने कहा कि ताली दोनों हाथों से बजती है। कहीं न कहीं लड़की का ही दोष है, वह चाहती तो उन दोषियों में से किसी को भी भाई कहकर उनके हाथ-पैर जोड़ सकती थी। जिससे उसकी जान बच जाती। आसाराम बापू ने कहा था कि अगर युवती दुष्कर्म करने वालों को अपान भाई कहती, उनके पैर पकड़ती तो वे उसे छोड़ देते। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
दिल्ली के बसंत विहार इलाके में गैंगरेप का शिकार हुई युवती के परिजनों ने कथावाचक आसाराम बापू के बयान पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए उसे अतार्किक बताया है। परिवार को उनसे ऐसी अपेक्षा नहीं थी। हम आसाराम बापू के प्रति काफी श्रद्धा रखते थे और हमारे पास उनके बारे में लिखी गई काफी पुस्तकें भी हैं। अब हम दिल्ली लौटकर उन पुस्तकों को आग के हवाले कर देंगे। दिवंगत युवती के भाई ने बयान को घटिया और निम्र स्तरीय भी कहा।
परिजनों नें कहा कि संतों से इस तरह की वाणी की अपेक्षा नहीं का जा सकती। आसाराम के वक्तय ने उनकी मानसिकता को सार्वजनिक कर दिया है। युवती के पिता ने एक न्यूज चैनल से बातचीत में तो यहां तक कह दिया- आसाराम को चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए।
पीपलज युनियन आफ सिविल लिब्रटीज (पी.यू.सी.ऐल.) की कविता श्रीवास्तव ने कहाा, ''ये बापू आसा राम जैसे लोग हैं जो औरत को दबाए रखना चाहते हैं। मर्द की हमलावर प्रविृती की बजाए वह पीडि़त को दोषी बता रहा है।
-औरतों के अधिकार बारे कारकुनों ने बापू आसाराम खिलाफ कार्यवाई करने की मांग की है।
कौमी मुस्लिम औरत भलाई सभा ने कहा, ''यह बहुत शर्मनाक और खतरनाक है।’’
कानपुर- संत आसाराम बापू के खिलाफ अदालत में मामला दाखिल किया गया है।
"सु$र्ख रेखा" कम्यूनिस्ट क्रांतिकारी पब्लिकेशन है, जो लोगों को सामाजिक क्रांति की जरूरत एवं महत्व के बारे में जागृत करने के लिए सक्रिय है। "सु$र्ख रेखा" इस पब्लिकेशन की तरफ से पंजाबी में निकाली जाने वाली दो मासिक पात्रिका है। इस पैम्फलिट में लिये गए लेख सु$र्ख रेखा के नवम्बर-दिसम्बर 2012 तथा जनवरी-फरवरी 2013 में से अनुवादित किए गए हैं।

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