मोदी हुकूमत के नए जन-विरोधी कदमों के खिलाफ
एकजुट जन संघर्ष खड़ा करने की जरूरत
मोदी सरकार ने संसद
सत्र में एक बार फिर साम्राज्यवादियों और देश के बड़े पूंजीपतियों के कारोबारों के हित में कानूनों में बदलावों की घोर आंधी सी ला रखी है। बिजली संशोधन बिल 2025 तो अभी पेश होना है, उससे पहले मनरेगा कानून बदलकर रोजगार की इस न्यूनतम सरकारी जिम्मेवारी को खोखला करने और समेटने का रास्ता पकड़ लिया है। परमाणु क्षेत्र में देश के बड़े पूंजीपतियों और साम्राज्यवादी कंपनियों को ऊर्जा प्लांट लगाने की छूट देने वाला नया SHANTI नामक कानून भी लाया गया है। अमेरिका के साथ देशद्रोही व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने की तैयारी है और यह संसद की मंजूरी के बिना ही निपटाया जाएगा। बीज बिल और बीमा क्षेत्र में 100% विदेशी निवेश को मंजूरी समेत कॉर्पोरेट घरानों के कारोबारों को खुली छूट दिए जाने के और भी कई प्रकार के नए कदम सामने आ रहे हैं। संसद में लाए जा रहे ये नए कानून विरोधी पक्ष के रसमी पार्लिमानी विरोध के बीच धड़ाधड़ पास किए जा रहे हैं। मोदी सरकार द्वारा 2014 से अब तक 1577 कानून बदल दिए गए हैं या रद्द कर दिए गए हैं। इन नए कदमों और कानूनों की भरमार इतनी ज्यादा है कि लोगों के लिए तो इनके बारे में जानना ही मुश्किल काम है, यहां तक कि विपक्षी पार्टियों के सांसदों को भी इन्हें पढ़ना-समझना कठिन हो रहा है। सरकारों के पास तो इन कार्यों के लिए हजारों उच्च स्तरीय अधिकारियों की झोंकी हुई टीमें होती हैं जबकि लोगों के पास तो अपने बुद्धिजीवियों की संख्या भी सीमित है। जनपक्षीय ताकतों के लिए तो तेजी से आ रहे इन कदमों और कानूनों का अध्ययन भी एक बड़ा कार्य बन जाता है। इसलिए यह स्थिति जन लहर से जुड़े बुद्धिजीवियों को लोगों के सामने कानूनों की सच्चाई उजागर करने के इस कार्य में हाथ बंटाने के लिए आगे आने का सवाल भी खड़ा करती है।
पंजाब की भगवंत
मान सरकार भी निजीकरण के इसी रास्ते पर चलते हुए सार्वजनिक संपत्तियों को बेचने से लेकर सरकारी अस्पतालों, सरकारी ट्रांसपोर्ट और अन्य क्षेत्रों में कारोबारी कंपनियों के प्रवेश के कदम उठा रही है। अपनी हैसियत के हिसाब से साम्राज्यवादियों और दलाल पूंजीपतियों की सेवा करने के मामले में यह हुकूमत मोदी सरकार से पीछे नहीं है। मोदी सरकार यह हल्ला हिंदुत्वी राज्य बनाने की आड़ में कर रही है तो पंजाब सरकार इन्हीं नीतियों का हमला रंगला पंजाब बनाने जैसे नारों तले लागू कर रही है।
साम्राज्यवादी वैश्वीकरण वाली नीतियों के इन
ताजा कदमों के खिलाफ पंजाब में विभिन्न वर्गों के रोष की
आवाजें उठ रही हैं। इनमें से कुछ कदमों के खिलाफ प्रदेश के जन संगठनों द्वारा साझा रोष एक्शन हो रहे हैं और साझे संघर्ष एक्शन के अगले ऐलान भी हो रहे हैं। हर वर्ग अपने-अपने स्तर पर भी विरोध कर रहा है। यह हमला साधारण रफ्तार वाला नहीं है। लोगों के खिलाफ इसका विस्तार और तीखापन बहुत व्यापक है। देश की हाकिम जमातों की दशकों से चली आ रही स्कीम और इनके साम्राज्यवादी आकाओं की नजरों में धड़ल्ले से कदम उठाने में पिछले समय में रहा ढीलापन इस तेज रफ्तारी की एक वजह बनी हुई है। विश्व साम्राज्यवादी ताकतों का अपना दिन-प्रतिदिन गहराता संकट पिछड़े देशों के मेहनतकश लोगों पर लादने की तीब्र ललक भी एक और वजह बनी हुई है। हिंदुत्वी सांप्रदायिक कट्टरवाद और सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के फासीवादी हमलों के जोर पर यह तेज रफ्तार कायम रखी जा रही है। जंगली क्षेत्रों में आदिवासियों की प्रतिरोध लहर और माओवादी क्रांतिकारियों पर गंभीर चोट मारने के बाद केंद्रीय हुकूमत साम्राज्यवादियों और देश के बड़े पूंजीपतियों की वित्तीय पूंजी को मनवांछित ढंग से लूटपाट मचाने का रास्ता ज्यादा भरोसे के साथ साफ करने के कदम उठा रही है। आदिवासी क्षेत्रों में जन-प्रतिरोध को कुचलने के दमनकारी हमलों के जरिए और देश भर के बुद्धिजीवियों तथा जम्हूरी आवाजों की जुबानबंदी के कदमों के जरिए मोदी सरकार विश्व कॉर्पोरेट पूंजी की चहेती बनकर उभर रही है।
इस समय
पंजाब में इन नए कदमों के खिलाफ प्रकट हो रहे रोष को और ऊंचे स्तर पर ले जाने और एकजुट संघर्ष आवाज में बदलने के लिए गंभीर प्रयास जुटाने की जरूरत है। इन कदमों के पीछे काम करती नीतियों की साझा कड़ी को लोगों के सामने पेश करने की जरूरत है। इस समूचे हमले को एक-दूसरे से जुड़ी कड़ियों वाले बहु-पर्ती हमले के रूप में लोगों के सामने पेश करने की जरूरत है। लोगों के रोष को इन आंशिक इजहारों से आगे निजीकरण, व्यापारीकरण, उदारीकरण की नीतियों की ओर लक्ष्यकृत करने की जरूरत है। इन नीतियों को लागू करने का कारण बनते और ताकत देते साम्राज्यवादी दबाव और चोर गुलामी की असलियत को लोगों के सामने उजागर करने की जरूरत है। साम्राज्यवादियों और बड़े पूंजीपतियों, जमींदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करते मौजूदा जन-विरोधी राज्य को लोगों पर कहर बरसाने वाले राज्य के रूप में पेश करने की जरूरत है।
लोगों को यह
दर्शाने की जरूरत है कि अकेले-अकेले कदम या कानून को रद्द कराने की मांग तक सीमित लामबंदी इस भयानक हमले का जवाब नहीं बन सकती। यह बहुत ही कम पड़ती है। इसका प्रभावी जवाब देने के लिए सभी मेहनतकश वर्गों और दबाई गई जमातों का साझा प्रतिरोध जरूरी है। यह साझा प्रतिरोध लोगों की ताकत में सिर्फ मात्रात्मक बढ़ोतरी ही नहीं बनता बल्कि यह लोगों के विरोध की तासीर को भी बदल देता है। यह साझा उद्यम लोगों की प्रतिरोध लहर को और ऊंचे स्तरों पर ले जाता है और आखिर में जनपक्षीय राजनीतिक बदलाव की ओर जाने का रास्ता बनाता है। इसके साथ ही पिछले दशकों के दौरान देश भर में लोगों द्वारा इन नीतियों के खिलाफ हुए प्रतिरोधी संघर्षों का महत्व भी उभारने की जरूरत है। इन जन-प्रतिरोधी संघर्षों द्वारा नीतियों के लागू होने के अमल में खड़े किए गए अवरोधों को जन-संघर्षों की उपलब्धियों के रूप में उभारने और देश के हुक्मरानों की लूटेरी स्कीमों में विघ्न डालने वाली जन सक्रियता के रूप में उभारने की जरूरत है। आदिवासी क्षेत्रों में साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बाधित की गई खदानों और अन्य प्रोजेक्टों से लेकर कितने ही सरकारी संस्थानों और सरकारी कृषि मंडी को बचाने के लिए हुए संघर्षों तक के विशाल प्रतिरोध कैनवस की उपलब्धियों और सीमाओं के अनुभव को लोगों के सामने पेश करने की जरूरत है।
साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के इस
हमले के खिलाफ प्रभावी जन-प्रतिरोध लहर विकसित करने के लिए इन आने वाले कदमों के विरोध तक ही सीमित रहने का सवाल नहीं है बल्कि इन कदमों के मुकाबले लोगों की जिंदगी में वास्तविक राहत और बेहतरी का साधन बनने वाले वैकल्पिक कदमों वाला प्रोग्राम जरूरी है। जिस तथाकथित विकास मॉडल के तहत ये कदम उठाए जा रहे हैं, उस मॉडल को समग्र रूप से चुनौती देने का सवाल है और उस मॉडल के मुकाबले वैकल्पिक जनपक्षीय और देश के संसाधनों पर निर्भर विकास मॉडल को उभारने का सवाल है। पंजाब को विदेशी पूंजी निवेश के लिए आकर्षक जगह के रूप में पेश करने के सभी हाकिम जमाती पार्टियों के साझा नारे पर चोट मारने की जरूरत है। विदेशी और बड़े पूंजीपतियों की पूंजी पंजाब में लाने के लिए गिड़गड़ाते फिरते पंजाब के सियासतदानों को पंजाब-विरोधी सियासतदानों के रूप में दिखाने की जरूरत है और इसी पूंजी निवेश को पंजाब के उजाड़े और तबाही के कारण के रूप में दिखाने की जरूरत है। पूंजी निवेश की इस तृष्णा पर लोगों द्वारा राजनीतिक हमला बोलने की जरूरत है।
लोग अपने-अपने स्तरों पर अपनी
हासिल संगठनात्मक ताकत के अनुसार इन कदमों के खिलाफ विरोध में उतर रहे हैं लेकिन क्रांतिकारी ताकतों का कार्य यह बनता है कि वे इन बिखरे और अव्यवस्थित रोष प्रतिकर्मों को एकजुट विरोध लहर में बदलने के लिए प्रयास जुटाएं। जन-संगठनों के मौजूदा स्तर और आपसी साझ की हकीकत से शुरू करके तालमेल और सहयोग के जरिए साझा संघर्ष विकसित करने की ओर आगे बढ़ने की पहुंच उभारने की जरूरत है। इस नए हमले के मुकाबले जोंकों के खिलाफ जन-संग्राम का वैकल्पिक प्रोग्राम लोगों के सामने पेश करें और इसकी प्राप्ति के लिए दीर्घकालिक खाड़कू जन संघर्षों का रास्ता बुलंद करें। प्रभावी मुकाबले वाले जन संघर्ष केंद्रों को विकसित करने का मार्ग लोगों के सामने उभारें। मौजूदा जन संघर्षों को उस रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए लोगों की चेतना और संगठनात्मक ताकत में मौजूद कमजोरियों को दूर करने के
लिए प्रयासरत हों। इन नए हमले के कदमों के खिलाफ जन संघर्ष की सरगर्मी पर इस वैकल्पिक राजनीतिक प्रोग्राम और लंबे खाड़कू संघर्षों की क्रांतिकारी राजनीति की छाप होना जरूरी है। इस क्रांतिकारी राजनीति के पथ प्रदर्शन के बिना जन-प्रतिरोध की यह सरगर्मी बार-बार उन्हीं रोष प्रदर्शन की दिशाहीन अभिव्यक्तियों में उलझ कर रह जाने के लिए अभिशप्त हो जाएगी। ज्यादा से ज्यादा किसी नए कदम को रद्द करवा लेने तक सीमित रहेगी। लोगों को यह दिखाने की जरूरत है कि रद्द कराए गए कदम फिर किसी नए कानून का रूप धारण कर आ जाते हैं, जैसे कृषि कानूनों के जरिए सरकारी मंडी के खात्मे के कदम पिछले साल नई कृषि मार्केटिंग नीति का रूप धारकर आ गए हैं।
समाज में क्रांतिकारी राजनीतिक बदलाव के लिए
जूझती ताकतों को इस हो रही जन लामबंदी के दौरान यह दायित्व भी निभाना होगा। यह क्रांतिकारी राजनीतिक पथ प्रदर्शन ही इन तात्कालिक हमलावर कदमों के खिलाफ हो रहे रोजमर्रा के संघर्षों को प्रभावी जन-प्रतिरोध में और उससे आगे लोक मुक्ति के मिशन तक पहुंचने वाले संघर्षों में तब्दील कर सकता है।
- सुरख
लीह