Monday, February 2, 2026

पारित होते कानून - फेल होता दिखावा

         पारित होते कानून - फेल होता दिखावा



भारतीय संसद के शुरुआती दौर में यहां भारी बहस और लंबी विचार-चर्चा के दौर चलते थे। कानूनों के बनने/पारित होने के समय तीखी बहस होती थी। ऐसा नहीं कि यह बहस लोगों के हितों के पक्ष से होती थी। बल्कि यह जोकों के राज की ज़रूरतों के नज़रिए से ही होती थी। यह संस्था देश के अंदर राज कर रही लुटेरी हाकिम जमातों के विभिन्न धड़ों के बीच राज चलाने के फैसलों में आपसी सहमति बनाने का एक चैनल भी बनती थी। इसके ज़रिए विरोधी राजनीतिक धड़ों के सरोकारों को संभव हद तक समाहित करने की कोशिश भी की जाती थी। यह तरीका भारतीय राज के कानून बनाने की ज़रूरतों के अनुसार ही था। यह बहस-विचार जोकों के राज की उस दौर की ज़रूरतों के अनुसार आवश्यक कानूनों की अधिक प्रभावकारी के नज़रिए से की जाती थी और इस को जम्हूरियत के डाले हुए पर्दे की सेवा के लिए इस्तेमाल किया जाता था। क्योंकि वह दौर दुनिया में लोक जम्हूऱियतों  के उभरने और पिछड़े जागीरू तथा साम्राज्यवादी औपनिवेशिक राज्यों को उलटाये जाने का दौर था। उस समय भारतीय हाकिम जमातों को सोवियत यूनियन, चीन और अन्य समाजवादी देशों जैसी जम्हूरियत का दिखावा करना था।

अब के दौर में भारतीय हाकिम जमातों की ज़रूरतें बदल चुकी हैं। अब वे ऐसे दिखावे की ज़्यादा ज़रूरत और दबाव महसूस नहीं कर रहे। साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की नई नीतियों के दौर में इन्हें लागू करने की आक्रामक ललक भी ऐसे दिखावे करने की गुंजाइशों को सीमित कर रही है। बहस-विचार के ऐसे रस्मी दिखावे करने के चक्कर में खड़े होने वाले अड़ंगे अब के दौर की सरकारों को मुआफिक नहीं आते। नई आर्थिक नीतियों को लागू करने पर देश के सारे हाकिम धड़ों की सहमति होने के कारण, भारतीय नियम-कानूनों में तब्दीलियों के मामले पर किसी का कोई हक़ीक़ी मतभेद मौजूद भी नहीं है। मतभेद तो नई नीतियों के इस दौर में सरकारी संपत्तियों और देश के जंगलों, ज़मीनों प्राकृतिक संसाधनों की मची हुई लूट में से अपने चहेतों और कॉरपोरेटों को मलाईदार हिस्से दिलवाने के मसलों पर ही होते हैं। लूट-पाट में हिस्सेदारी को आम तौर पर कैबिनेट फैसलों के ज़रिए ही निपटा लिया जाता है या फिर आवश्यकता पड़ने पर की जाने वाली संसदीय कार्रवाई बिल्कुल ही खानापूर्ति बना दी जाती है।

अब के दौर की बदली हुई ज़रूरतों के चलते सरकार द्वारा उठाए जाने वाले बहुत से कदम तो संसद का रास्ता ही नहीं लेते, बल्कि सीधे कैबिनेट फैसलों के रूप में ही आते हैं। जैसे नई आर्थिक और औद्योगिक नीतियां शुरू करने का यह अमल बिना संसद के ही चला था। अब तक देश के लोगों की किस्मत तय करने वाले कितने ही बड़े फैसले बिना संसद की मंज़ूरी के ही आए हैं। आजकल कितने ही देशों के साथ हो रहे मुक्त व्यापार समझौतों के लिए भी संसद की किसी मंज़ूरी का कोई ज़िक्र नहीं है। भारतीय संसद का संकट इस पहलू से भी प्रकट होता है कि इसकी संसदीय समितियों के पास बिलों की गंभीर विचार-चर्चा के लिए ज़रूरी योग्यता वाले सांसद ही नहीं होते। और ही संसद के अंदर बहस-विचार के दौरान बहुत से सांसद कोई योगदान दे सकने की हालत में होते हैं। यह भारतीय हाकिम जमाती राजनीति की अधोगति का ही एक प्रकटीकरण है कि लुटेरे राज को चलाने की ज़रूरतों को पूरा करने योग्य जन प्रतिनिधियों का अभाव ही होता है और बहुत सारा काम अफसरशाही के ज़रिए होता है।

संसद के अंदर कानूनों को लेकर बहस-विचार की यह त्यागी जा रही दिखावा मात्र प्रकिर्या भी, अंततः भारतीय लोकतंत्र की पर्दादारी के लिए ही नुकसानदेह साबित होगी तथा लोगों को इस संसद की हक़ीक़त को और भी अधिक स्पष्टता के साथ समझने में उपयोगी होगी।

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