दिशा की तलाश में किसान आक्रोश
- माझा से मालवा तक फैलीं तरंगें
- खेत मज़दूरों की कदम ताल-नए खून का संचार
- व्यापक हमदर्दी व हिमायत-शहरों के भीतर तक फैलाव
- आत्म निर्भर जनतक शक्ति का नज़ारा-राजनीतिक पार्टियाँ हाशिये पर
विशेष फील्ड रिर्पोट
1 अक्तूबर, 2015
पिछले 14 दिनों से बठिंडा में चल रहे किसान मजदूर धरने की गूँज संपूर्ण पंजाब में सुनाई
दे रही है। किसानों मजदूरों का बठिंडा की सडकों पर प्रवाहित हो रहा आक्रोश बादल
सरकार के पसीने छुटा रहा है। जन उभार के समक्ष सरकार हड़बड़ाई हुई नजर आ रही है।
प्रैस तथा सोशल मीडिया कपास की बर्बादी तथा मुआवजे के अधिकार के लिए किसान मज़दूर
संघर्ष छाया हुआ है। कपास पट्टी में यह घर घर का मुद्दा बना हुआ है। चूल्हों से
लेकर चैराहों तक बठिंडा मोर्चे की चर्चा है। लोगों की नजरें मोर्चे पर लगी हुई
हैं। मोर्चे दौरान नौजवान किसान की आत्महत्या ने प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति के मन
में रोष उत्पन्न किया है। बादल सरकार पुनः आम जनता के निशाने पर आ गई है।
मालवा से उठी किसान मजदूर आक्रोश
की तपिश को झेलना बादल सरकार के लिए मुश्किल पड़ रहा है। अकाली नेता बलविंदर सिंह
भूंदड़ को बठिंडा किसान मेले में तीखे आक्रोश का सामना करना पड़ा है। किसानों ने
उसे खरी खरी सुनाईं। उसे भाषण दिये बगैर भागना पड़ा है। लोगों का गुस्सा बाद में पंडाल
पर निकला है। गोनियाना के गांव में घूमती हरसिमरत कौर बादल को खेत मजदूर औरतें
काली झंडियां दिखाने की तैयारी में थी।
हरसिमरत को मार्ग बदलकर कच्चे रास्ते में से गुज़रना पड़ा है। 10 करोड़ की राशि जारी करके चुप्पी धारण करने वाली सरकार को 600 करोड की राशि जारी करने का ऐलान करना पड़ा है तथा जल्द से जल्द राशि वितरण के
बयान जारी करने पड़े हंै।
किसान संघर्ष के दबाव ने बादल
सरकार का जन विरोधी चरित्र बेनकाब कर दिया है। पहले सरकार कितनी देर तक प्राकृतिक
आपदा कह कर इससे टलती रही। परन्तु बठिंडा से उभरती आक्रोश की ललकार के सामने
हड़बड़ाए कृषि मंत्री तथा कृषि विभाग की सभी चालें उल्टी पड़ रही हैं। लोगों के
दबाव तथा प्रैस में प्रतिदिन हो रहे खुलासों ने यह तथ्य स्थापित कर दिया कि यह
प्राकृतिक आपदा नहीं है, अपितु बादल सरकार की आपदा है जिसने
कपास की फसल तबाह की है। नकली बीज तथा कीटनाशकों के स्कैंडलों की परतों के खुलासे
प्रतिदिन हो रहे हैं। एक दूसरे पर दोष लगाते मंत्री तथा कृषि विभाग का निर्देशक एक
दूसरे के कच्चे चिट्ठे खोलने में लगे हुए हैं। ये हकीकत स्थापित हो रही है कि
कंपनियों ने अंधाधुंद मुनाफे कमाये हैं, अफसरशाही तथा नेताओं ने दलालियां
निगली हैं तथा खामियाज़ा आम जनता ने भुगता है।
इस संघर्ष की जोरदार गूँज का कारण
किसानों मजदूरों के जीवन में हुई बड़ी हलचल है। पहले से ही कंगाली में धकेले गए किसानों तथा खेत मजदूरों की हालत
इस फसल की बर्बादी के कारण और भी दयनीय हो गई है। कजऱ्ों के ब्याज से त्रस्त गरीब
किसानांे तथा खेत मज़दूरों की यह हालत कजऱ्े की दलदल में और गहरे धँस जाने का
कारण बनने जा रही है। महँगे दामों पर ठेके पर ली गईं जमीनों की भारी धन राशियाँ
उतारनी मुश्किल हो रही हैं तथा आगे चलकर गेहूँ की बीजाई का भी कोई जुगाड़ नहीं हों
रहा। पैसे वापसी की उम्मीद न होने के कारण आढतिए (कमिशन एजेंट) भी कजेऱ् देने से टल रहे हैं।
कपास के सफाए ने खेत मजदूरों के रोजगार का भी सफाया कर दिया है।
ऐसी परिस्थिति ने किसानों मज़दूरों
में भारी हलचल पैदा की है। किसान जनता में फैली बेचैनी तथा गुस्से को संगठित किसान
शक्ति का सहारा मिल गया है। अपनी शक्ति के बल पर कुछ प्राप्त हो सकने की उम्मीद
जाग उठी है तथा अब इन उम्मीदों को हकीकत में बदलने के लिए संघर्ष का अखाड़ा
प्रज्ज्वलित हो उठा है। ग्रामीण मेहनतकश जनता के संघर्ष का तात्कालिक मुद्दा भले
तबाह हुई कपास का मुआवजा प्राप्त करना है, परन्तु आक्रोश का यह केवल तात्कालिक कारण है। बादल सरकार द्वारा अब तक अपनाया
गया किसान व खेत मजदूर दुश्मन व्यावहार इसका मूल कारण है। इस सरकार द्वारा अपनाईं
गईं साम्राज्यवादी कंपनियों तथा लुटेरे सूदखोर कमीशन एजेंटों की पक्षधर तथा
जनविरोधी नीतियों से मेहनती जनता विशेषकर ग्रामीण जनता में तीव्र बेचैनी पैदा हुई
है। कृषकों की आत्महत्याएँ इसको शीर्षतम् रूप में प्रकट करती है। इस समय भी इस
मुद्दे पर बादल सरकार अपने चरित्र अनुसार ही चली है। नुक्सान संबंधी विशेष
गिरदावरी ( सर्वेक्षण ) के आदेश देकर टाईम पास किया है। कृषि
विभाग नुक्सान को संकुचित रूप मंे पेश कर रहा है। प्रति एकड़ के हिसाब से केवल आठ
हज़ार मुआवजा देना ही माना गया है, वह भी आगे कई भागों में विभक्त
किया जा रहा है। बर्बाद फसलें उन्हें माना जा रहा है जिन पर किसानों ने हल चला दिए
हैं। ऐसी स्थिति के चलते ही 17-17 रु. के सरकार द्वारा वितरित किये जा रहे चैकों ने सरकार का बुरी तरह से जुलूस
निकाल दिया है तथा जन आक्रोश को बढ़ाया है।
असरदार प्रचार तथा लामबंदी अभियान
फसल बर्बादी से उत्पन्न चिंता तथा
परेशानियों में घिरी जनता के किसान संघर्ष में कूद पड़ने में किसान संगठनों द्वारा
चलाए गए प्रचार अभियान की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह केवल स्वतःसिद्ध लामबंदी नहीं
है, अपितु चेतन तथा अनुभवी किसान
जुझारांे द्वारा चलाए असरदार प्रचार अभियान का नतीजा है। इस प्रकार के प्रचार को
जोरदार अनुक्रिया मिलने का कारण हालात में मौजूद है।
कपास की तबाही से किसान जनता में
हलचल अगस्त के अंत से ही श्शुरू हो गई थी। भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां) द्वारा आत्महत्याओं के मुद्दे पर
दिए गए पाँच दिन के जि़ला स्तरीय धरनों के अंतिम दिनों में पीडित किसान भी धरनों
में पहुँचे थे। बर्बादी से पीडि़त जनता के गुस्से की झलकें मिल गईं थीं। 31 अगस्त को 8 किसान संगठनों की सांझी सभा में 10 सितंबर को बठिंडा में विशाल प्रदर्शन का प्रोग्राम रखा था। बर्बाद हुई फसल का
पूर्ण रूप में सर्वेक्षण करवाने, नुक्सान का मुआवजा प्रति एकड़ 40,000 रु. किसानों को देने, रोजगार उजाड़े की पूर्ति के रूप में प्रति खेत मजदूर परिवार को 20,000 देने, दोषी बहुराष्ट्रीय कंपनियों, डीलरों तथा कृषि विभाग के अधिकारियों को सख्त सजाएं देने जैसी मांगों को लेकर
जोरदार प्रचार तथा लामबंदी अभियान चलाया गया। कपास पट््टी में विशाल जनतक आधार
वाले संगठन बी.के.यू. उग्राहां द्वारा कपास वाले
क्षेत्रों में विशेष रूप से टीमें तैनात की गईं। प्रत्येक गांव तक पहुँचने के
प्रयत्न किए गए। लंबी, संगत, मुक्तसर, गिदड़बाहा, मलोट, बुढलाडा, मौड़, तलवंडी आदि ब्लाकोें में विशेष रूप
से तैनात टीमों ने गांव-गांव तक पहुँच कर रैलीयां, सभाएं तथा आह्वान मोर्चों का सिलसिला चलाया। यह प्रभावपूर्ण प्रचार का परिणाम
ही था कि लोगों के मनों में ये मसला प्राकृतिक आपदा न रहकर सरकारी आपदा के रूप में
स्थापित हुआ। बड़ी कीटनाशक दवाई कंपनियों तथा सरकार के गठजोड़ को प्रदर्शित किया
गया। जनता के दुश्मन सामने दिखने लगे। मुआवजे़ के अधिकार की न्यायसंगतता के लिए
बड़े धन कुबेरों को दिए जाते गफ्फों, कर छूट तथा अन्य रियायतों की
तथ्यों समेत जानकारी दी गई। इसने मुआवजा प्राप्ति की तीव्र इच्छा को और प्रचंड
किया। किसान टीमें खेत मजदूर जनता में पहुँची तथा उन्हें मुआवजा प्राप्ति के
संघर्ष के लिए प्रेरित किया। खेत मजदूर जनता में भी उम्मीद जगी। गोबिंदपुरा भूमि
संघर्ष के समय खेत मज़दूरों को मिले मुआवजे की प्राप्ति को विशेष रुप से उभारा
गया।
इस प्रकार व्यापाक गहरे प्रचार ने
बेबसी तथा चिंता को आक्रोश और गुस्से में ढाल दिया। लड़ने के तीव्र इच्छा पैदा कर
दी तथा संघर्ष का मार्ग तैयार कर दिया। 10 सितंबर को बठिंडा में विशाल एकत्रता हुई तथा माँगें न माने जाने पर 17 सितंबर से अनिश्चित कालीन मोर्चे का ऐलान किया गया। ये प्रचार लामबंदी अभियान
इन दिनों के दौरान भी जारी रहा तथा 17 सितंबर से मिनी सचिवालय के सामने
मुख्य मार्ग का एक भाग रोककर पक्का धरना शुरू हो गया।
लगातार प्रदर्शन
प्रदर्शन दौरान भी गाँवों में
लामबंदी तथा प्रचार का कार्य जारी रखा गया। विशेषकर बी.के.यू. एकता उग्राहां की 4-5 टीमें प्रतिदिन बठिंडा जिले तथा
अन्य समीपवर्ती क्षेत्रों में जाकर लोगों
को प्रदर्शन में शामिल होने की प्रेरणा
देती रहीं। गिनती दिन प्रतिदिन बढती गई जिसमें नौजवान गिनती में शामिल थे। 20 तारीख को कृषि विभाग के दफ्तर की ओर किया गया विशाल रोष प्रदर्शन बेमिसाल था।
सड़कों पर लोगों का मानो सैलाब चल पड़ा था । नौजवानांे का जोश देखते ही बनता था।
पुल पर चढ़ते जोश से भरपूर जनसमूह की तस्वीरें अब तक भी सोशल मीडिया पर छाई हुई
हैं।
इतनी जोरदार लामबंदी के बाद सरकार
घबरा गई, शहर में मार्च करने पर रोकें थोप
दीं। आक्रोश से भरे नौजवान पुलिस से दो-दो हाथ करने को तत्पर हों गए।
पेड़ों की टहनियाँ तोड़ लीं। किसान नेताओं तथा बुद्धिमान कार्यकर्ताओं के जोरदार
प्रयासों से नौजवानों को बड़ी मुश्किल से ही रोका गया, फिर भी एक झड़प हो गई। परन्तु नेताओं तथा अनुभवी कार्यकर्ताआंे के योग्य दिशा
निर्देश ने पुलिस को मार पीट करने का मौका देने से बचा लिया। नौजवानों के ज़ोर
आज़माईश के मूड़ तथा इरादे को देखकर पुलिस कर्मचारियों के रंग उड़े हुए नज़र आए
तथा पुलिस में नई भर्ती की गई लड़कियां ऐसी स्थिति में उन्हें आगे कर देने के लिए
अफसरों को कोसती नज़र आईं।
बादल सरकार ने बाहर से आए काफिलों
को रस्ते में ही रोक कर तथा शहर में मार्च करने वालों पर पाबंदी लगा कर संघर्ष के
अधिकार को छीनने का प्रयास किया। एक दो स्थानों पर किसानों की गिरफ्तारियां भी
कीं। परन्तु अधिक समय तक उन्हें अन्दर न रख सकी। मानसा से आते काफिले को भाई देसा
गाँव के पास, बरनाला के काफिले को तपा के पास
तथा निहाल सिंह वाला के काफिले को दीना के पास आदि स्थानों पर रोक लिया गया। इस पर
वहीं पर ही सड़कें जाम करके पक्के धरने शुरू कर दिए गए। बठिंडा शहर में आती बसों
की तलाशी, किसानों के यातायात साधनों के नंबर
नोट करने जैसी धमकाने वाली कारवाईयाँ नाकाम साबित हुईं तथा एकत्रता लगातार बढती ही
गई। तीन अन्य स्थानों पर प्रदर्शन शुरू
होने पर भी बठिंडा मोर्चा में लोगों की गिनती कम नहीं हुई। शहर में प्रदर्शन करने
पर लगी पाबंदियों को सुबह के समय आने वाले काफिलों द्वारा प्रदर्शनों का सिलसिला
चलाकर तोड़ दिया गया। शहर की भिन्न-भिन्न दिशाओं से आने वाले काफिले
मार्च करके धरने में पहुँचने लगे। ये प्रतिदिन का सिलसिला बन गया। ऐसे प्रदर्शनों
तथा लोगों के जुझारू मूड़ को देखकर एक पत्रकार भी जोश में आ गया तथा नारों का जवाब
देने लगा। साथ खड़े फोटोग्राफर को कहने लगा, ‘‘अब कैसे रोकेंगे‘‘। इससे जनता के आक्रोश तथा जज़्बे
का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
व्यापक जन-समर्थन
प्रदर्शन में सीधे-सीधे भाग लेने के अतिरिक्त विभन्न रूपों में व्यापक जन समर्थन प्राप्त हुआ है।
गाँवों से धड़ाधड़ क्विंटलों के हिसाब में आटा,चीनी, दूध तथा अन्य राशन पहुँच रहा है।
बठिंडा के समीपवर्ती गाँव जस्सी पौ वाली की जनता ने क्विंटलों में आटा अपने गाँव
के गुरुद्वारे में रख लिया है। प्रतिदिन सुबह के समय दर्जनों महिलाएँ लंगर तैयार
करती हैं जो कि 8 बजे तक प्रदर्शन स्थल पर पहुँचाया
जा रहा है। गाँवों से स्वैच्छित रूप में ही फंड इकट्ठा हो रहा है। कभी कोई गाँव
चावलों के कड़ाहे भेज रहा है तो कोई प्रसाद से भरे देगचे। अधिक से अधिक राशन भेजने
का मुकाबला हो रहा है। लंगर 24 घंटे चलता है तथा सैंकड़ों वर्कर
लंगर के इंतजाम में जुटे रहते हैं। ऐसा माहौल प्रदर्शन में भाग लेने वालों में और
उत्साह भरता है। गाँवों के उत्साह से भरे नौजवानों की टोलियाँ मंच के पास आ कर
किसी भी वस्तु की कमी न होने देने के भरोसे देतीं हैं, जो चाहिए हाजि़र करने के ऐलान करते हैं। जनता रिश्तेदारियों में फोन करके
मोर्चे के दर्शन करने जाने के संदेश भेज रही है। यह माहौल लोगों की गहरी शमूलियत
का परिणाम है। संकटग्रस्त किसान जनता के लिए जीवन यापन का तात्कलिक साधन जुटाने की
लड़ाई में कूद पड़ने का परिणाम है। इतनी विशाल लामबंदी तथा लडाकू आक्रोश ने अन्य
समुदायों को अपने धरने की तरफ खींचा है। सक्रिय अध्यापक संगठनों के दर्जनों
कार्यकर्ता अक्सर धरने में आते है, फंड देते है। ऐसा करने के लिए इन
संगठनों की लीडरशिप द्वारा कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ती। विभन्न मुलाजि़म संगठनों
ने फंड भेजे हैं तथा हर प्रकार की मदद की पेशकश की है। ये माहौल समुदायों में दूरी
कम हो जाने को प्रकट करता है। सरकार द्वारा लूटे जाने तथा प्रताडि़त किए हुए
विभन्न समुदायों में सरकार को हड़बड़ाहट में डालने वाले जुझार समुदाय के प्रति
हार्दिक सत्कार प्रकट हुआ है तथा सरकार की नाक में दम करने वाले की इच्छा रखने
वाले जुझार कार्यकर्ताओं में ऐसी आशाएँ साकार हो सकने की उम्मीदें प्रकट हुई हैं।
इसमें जुझार संगठनों विशेषकर बी.के.यू. उग्राहां द्वारा विभन्न समुदायों
की समय समय पर निःस्वार्थ भावना से समर्थन की छाप भी है।
अब 8 किसान संगठनों द्वारा माझा तथा दुआबा क्षेत्र में गर्माए हुए बासमती तथा गन्ने
के मुद्दों को भी साथ लेकर एक तारीख से सारे जिलों में पक्के धरने आरंभ होने जा
रहे हैं। जबकि संगरूर, बरनाला तथा मानसा में पहले से ही
आरंभ हो चुके हैं। माँगें न मानने की हालत में रेल तथा सड़कें जाम करने की चेतावनी
दी जा चुकी है।
10 करोड़ से 600 करोड़ मुआवजे का ऐलान करवाना इस संघर्ष की आंशिक प्राप्ति है, पूर्णतः जीत अभी बाकी है। परन्तु इससे बड़ी प्राप्तियां हो चुकी हैं तथा
लगातार हों रही हैं। बादल सरकार का जन-दुश्मन चेहरा पूर्ण रूप में उभार
दिया गया है। किसानों तथा खेत मजदूरों की परस्पर साँझ और अधिक गहरी हो रही है।
संगठित किसान शक्ति और विस्तृत हो रही है। जनता के हकीकी मुद्दे शासक वर्ग की
राजनीति की भेंट नहीं चढने दिए जा रहे, साम्प्रदायिकता तथा फूट डालने वाली
राजनीति की चालों से ऊपर उठकर वर्गीय मुद्दे उभर रहे हैं। शासक वर्गीय मौकाप्रस्त
वोट पार्टियांे की जगह जुझार जनतक संगठनों के प्लेटफार्म का महत्व उभर कर दिखाई
देने लगा। बादल सरकार पूरी तरह बचाव के पैंतड़े अपना रही है। अवसरवादी राजनीतिक
पार्टियां भी संघर्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में नाकाम रही हैं। संघर्ष के
प्रचंड होने से किसान मजदूर लहर की झोली और भी प्राप्तियांे से भरेगी तथा शासकों
से भारी कीमत वसूल की जाएगी।
कपास पट्टी में आत्महत्याएँ तथा
संघर्ष का रूझान आपसी मुकाबला करते नज़र आ रहे हैं। प्रत्येक संघर्ष आत्महत्याओं
से पीडि़त मेहनतकश जनता में एक आशा जगाता है। मौजूदा कपास संघर्ष की भी इस पक्ष से
महत्वपूर्ण भूमिका है। संघर्ष के आगे बढ़ते कदम उम्मीद बंधाते हंै कि संघर्ष के
रूझान प्रबल करने में ये संघर्ष अभी और भूमिका निभाएगा।
उभरते स्थानीय मुद्दों पर किसान
सक्रियता का तालमेल
पंजाब के 8 किसान संगठनों द्वारा सितंबर महीने दौरान विभिन्न क्षेत्रांे में उभरे हुए
किसान मुद्दों को लेकर सांझे ऐक्शन किए गए हैं। प्रत्येक ऐक्शन में उस क्षेत्र की
उभरी हुई माँगों को प्रमुखता दी गई है। 10 सितंबर को कपास के मुद्दे में से निकलती माँगों को लेकर बठिंडा, 15 सितंबर को हरयाऊँ खुर्द के आबादकारों के मुद्दे पर पटियाला, 21 सितंबर को बासमती धान तथा वर्षा के कारण बर्बाद हुई फसल के मुद्दे को प्रमुखता
देकर अमृतसर तथा गन्ने के बकाये की माँगों को प्रमुखता देकर 24 को जालंधर में विशाल रोष प्रदर्शन किए गए हैं। इन प्रदर्शनों में स्थानीय
मुद्दों को प्रमुखता दी गई है तथा साथ ही कजऱ्ा आत्महत्याओं जैसे मसले भी रखे गए
हैं। इन प्रदर्शनों में भारी गिनती में किसान जनता पहुँची है। इसके बाद 01 अक्तूबर से पंजाब के सारे जि़लों में पक्के धरने श्शुरू किए जा रहे हैं तथा
आगे संघर्ष और तीखा करने की चेतावनी दी जा चुकी है। रेलें तथा सड़कें रोकने का
ऐलान हो चुका है। इसी दौरान ही किसान संघर्ष कमेटी (सतनाम पन्नू) द्वारा बासमती की सरकारी खरीद
करवाने,उचित दाम तय करवाने, भूमि अधिग्रहण कानून में 100 प्रतिशत किसानों की सहमती ज़रूरी
करने पर आबादकारों को स्वामित्व का अधिकार देने जैसी माँगों पर 24 सितंबर को अमृतसर तथा तरनतारन में मुख्य मार्ग जाम करके रोष प्रकट किए गए हैं।
अमृतसर के समीप मानांवाला में जाम रात के 8.30 तक चला। इसके अतिरिक्त गुरदासपुर, फिरोज़पुर, होशियारपुर तथा जालंधर आदि स्थानों पर भी रोष प्रदर्शन किए गए। इन ऐक्शनों के
पश्चात् भले ही सरकार ने धान की सरकारी खरीद करने का श्रोसा दिया है परन्तु उचित
कीमत की माँग अभी भी खड़ी है। बासमती की 1509 तथा 1121 किस्मों का बहुत
निम्न दाम 1500-1600रु. प्रति क्विंटल के हिसाब देकर किसानों कों लूटा जा रहा है। जबकि किसानों की
माँग है कि ये दाम क्रमवार 4500 तथा 5000 रु. तक मिलना चाहिए। इसके अतिरिक्त
बेमौसमी वर्षा के कारण बर्बाद हुई धान की फसल का मुआवज़ा 40,000 रु. प्रति एकड़ देने तथा खरीद के समय
अनावश्यक शर्तें समाप्त करवाने की माँग को शामिल करके 01 अक्तूबर से जिला केंद्रों पर अनिश्चित काल तक के प्रदर्शनों का शुभारंभ किया
जा रहा है।
नौजवान लामबंदी - उभरता हुआ लक्षण
विशाल लामबंदी इस संघर्ष का उभरता
लक्षण है। यूनियन की पहली इकाइयों मे से भी बड़ी लामबंदी है तथा नए गाँव भी बड़ी
गिनती में शामिल हो रहे हैं। नए हिस्सों तक बी.के.यू. एकता ( उग्राहां ) द्वारा विशेष रूप से पहुँच की गई है। वैसे कपास पट्टी में जन आधार वालीं अन्य
यूनियनों ने भी अपनी हैसियत के मुताबिक ज़ोर लगाया है। एक अनुमान अनुसार एकत्रता
में नौजवानों की गिनती 40 प्रतिशत से अधिक है।
इस वक्त हालत यह है कि गाँव-गाँव में इकाइयाँ बनाने के संदेश आ रहे हैं। नौजवानों के समूहों के समूह
नेताओं कार्यकर्ताओं के पास पहुँच रहे हैं। गाँवों मे सभाएँ, रैलियाँ करवाने के आमंत्रण लगातार मिल रहे हैं। नए गाँवों मे से महिलाएँ स्वयं
ही शामिल हो रही हैं। अब इन नए हिस्सों को संगठन में सम्मिलित करने का कार्य सामने
खड़ा है। इन हिस्सों को यूनियन की नीति के साथ लैस करने तथा जुझार किसान चेतना
देने का अगला महत्वपूर्ण कार्य बनता है। इन सब हिस्सों को दायरे में रखने के लिए
किसान-मज़दूर नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को
और अधिक श्शक्ति जुटानी पड़ेगी। यह तभी संभव है यदि उपयुक्त संगठनात्मक तौर तरीकों
द्वारा लगातार नए नेता कायकर्ता पैदा किए जाएँ। नए नेताओं कार्यकर्ताओं की नई रचना
को प्रफुल्लित करने की प्रत्यक्षदर्शी आवश्यक्ता को गंभीरता से संबोधित होने की
जरूरत है। ऐसी पहुँच रखने पर ही किसान लहर के घेरे में आ रही नवीन जनता को संभाला
जा सकता है, सँवारा जा सकता हैं तथा जुझार
किसान लहर के काफिलों को और मज़बूत तथा विशाल किया जा सकता है।
नौजवान हिस्सों की प्रचंड लड़ाकू
भावना तथा जोश को इन्कलाबी किसान चेतना का रंग चढाने की आवश्यक्ता है ताकि उन्हें
किसान लहर का मज़बूत तथा जानदार अंग बनाया जा सके। नौजवान हिस्से किसान लहर में
लड़ाकू ऊर्जा का संचार करने के पक्ष से विशेष महत्व रखते हैं तथा लीडरशिप की
निरंतरता बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मौजूदा संघर्ष दौरान नौजवानों के
ऐसे लक्षणों ने ही संघर्ष को उभारने में भूमिका निभाई है। इन साकारात्मक लक्षणों
को क्रांतिकारी किसान चेतना तथा अनुशासन के सांचे में ढाल कर बड़ी प्राप्तियाँ
संभव हैं। ऐसी स्थिति लीडरशिप तथा अनुभवी कार्यकर्ताओं से और शक्ति जुटाने की माँग
करती है।
कपास तबाही के मुआवज़े से इन्कार
के खिलाफ
खेत मज़दूरों में आक्रोश - अथर््िायाँ जलाईं
खेत मज़दूरों को कपास की तबाही का
मुआवज़ा देने से सरकार के इन्कार के विरोध में पहली अक्तूबर को पंजाब के 7 खेत मज़दूर संगठनों ने विभन्न जि़लों के अनेकों गाँवों में पंजाब सरकार की
अर्थियां जला कर सख्त ऐतराज़ प्रकट किया। अर्थियां जलाने का यह अभियान जारी है।
बठिंडा किसान धरने में भी यह ज़ोरदार माँग उठाई जा रही है कि खेत मज़दूरों को
प्रति परिवार 20,000 रु. मुआवज़ा दिया जाए। इस ऐक्शन द्वारा खेत मज़दूरों ने खुद को मुआवज़ा संघर्ष की
अहम टुकड़ी बनने की तरफ कदम बढाया है। आज अर्थी फूँक प्रदर्शनों में विभिन्न
मज़दूर संगठनों ने सरकार द्वारा फसल के नुक्सान को प्राकृतिक आपदा बताने तथा
मुआवज़े की जारी की तुच्छ राशि से मज़दूरों को उपेक्षित करने की मुज़रिमाना कारवाई
की ज़ोरदार शब्दों में निंदा की गई। उन्होंने ऐलान किए कि आगामी दिनों में अर्थी
फूँक प्रदर्शन जारी रहेंगे और यदि सरकार ने किसानों मज़दूरों की माँगांे को नहीं
माना तो संघर्ष को और भी आगे बढाया जाएगा। ऐक्शन में सात खेत मज़दूर संगठन शामिल
हैं। इनके नाम हैंः पंजाब खेत मज़दूर यूनियन, क्रांतिकारी पंेडू मज़दूर यूनियन, देहाती मज़दूर सभा पंजाब, कुल हिंद खेत मज़दूर यूनियन पंजाब, मज़दूर मुक्ति मोर्चा पंजाब, खेत मज़दूर सभा पंजाब।
किसान मोर्चा के कुछ और पहलू
कठिनाइयाँ व हादसे
मुआवज़ा प्राप्ति के लिए चल रहे
संघर्ष दौरान किसान-मज़दूर जनता को कई हादसों तथा
कठिनाइयों से गुज़रना पड़ा है। जनता की दृढ़ता तथा इरादे की परख हुई है। परन्तु
मामले की तीव्रता के समक्ष,जुझार इरादे तथा योग्य अगुवाई के
सहारे ये सब कठिनाइयाँ पार की गईं हैंः
- पहले दिन 10 सितंबर को पंडाल में अचानक आ घुसे सांड ने लगभग 34-35 मर्द-औरतों को घायल कर दिया, सांड बुरी तरह लोगों को कुचलता हुआ पंडाल में से निकल गया, पर यह हादसा इस विशाल प्रदर्शन में विध्न नहीं डाल सका। कार्यकर्ताओं ने
घायलों को संभाला, सरकारी सहायता नहीं मिली,किंतु धरने में लोग डटे रहे।
- उसी दिन प्रदर्शन में भाग लेने आ
रही जनता का टैंकर पलट गया। घायल प्रदर्शनकारी अस्पताल ले जाने पड़े।
- फिर 19 सितंबर के प्रदर्शन दौरान एक और सांड द्वारा किसान-मज़दूर महिलाएँ जख्मी हो गईं।
- पहले दिन मंदर सिंह की दिल का दौरा
पड़ने से मृत्यु हो गई तथा फिर चुग्घे कलां के नौजवान किसान कुलदीप सिंह ने
आत्महत्या कर ली।
- एक रात प्रदर्शन के समीप ही सड़क
पार कर रहे एक किसान कार्यकर्ता को ट्राले द्वारा टक्कर मार देने के कारण उसकी
टांग टूट गई। सैदोके (मोगा) के इस किसान का आॅप्रेशन हुआ है।
- तीर्व धूप तथा वर्षा भी झेली है।
नहाने-धोने, बाथरूम व पखाने की व्यवस्था न होने की समस्या का सामना भी किया है।
ऐसे हादसों तथा कठिनाइयों के
बावजूद किसान-मज़दूर जनता के जोश तथा लड़ने के इरादे और प्रचंड होते गए हैं।
किसान संघर्ष को व्यापक जन समर्थन-कुछ झलकें
- मंदिर में चढावा चढाने जा रहे पती-पत्नी को लगा कि मंदिर से ये मोर्चा अधिक पुण्य के योग्य स्थान है। दोनों ने
राशन लंगर को दान कर दिया।
- मैडीकल प्रैक्टीशनजऱ् ऐसोसीएशन द्वारा लगातार मैडीकल कैंप लगाया जा
रहा है।
- शहर की विभिन्न संस्थाओं द्वारा
सफाई तथा जल की व्यवस्था की पेशकश की गई।
- अलग-अलग अध्यापक संगठनों तथा अन्य कर्मचारी संगठनों के भिन्न-भिन्न जिलों से लगातार फंड की मदद।
- बस अड्डे में ड्राइवरों-कंडक्टरों ने 61,00 रु. फंड इकट्ठा कर के दिया।
- ग्रामीण सहकारी सभाओं के
मुलाजि़मों के संगठन द्वारा लगातार केलों का लंगर चलाया जा रहा है तथा फंड की मदद
भी की जा रही है। गाँवों में से लामबंदी करने में भी हाथ बटाया जा रहा है।
- गाँवों में यूनियन चुनावों के समय
भारी एकत्रताएँ हुईं हैं।
- व्यक्तिगत तौर पर लोगों द्वारा
निरंतर रूप में फंड पहुँचाया जा रहा है।
- जमहूरी अधिकार सभा की बठिंडा इकाई
द्वारा प्रदर्शनकारियों के लिए पानी, शौचालय, सफाई आदि के प्रबंध की मांग को लेकर एक शिष्टमंडल डी.सी. बठिंडा को मिला। प्रदर्शन के
समर्थन में एक हस्त पर्चा बाज़ार में बांटा गया जिसके दौरान दुकानदारों द्वारा
प्रदर्शन के प्रति एकता को प्रकट करने की कई झलकें मिलीं।
भगत सिंह के जन्म दिन के मौके पर
किसान महिला कार्यकर्ता बाज़ार में बसंती दुपट्टे लेने गईं तो वहां जमहूरी अधिकार
सभा द्वारा बांटे गए हस्त पर्चे की चर्चा छिड़ी। नौजवान दुकानदार ने नम आँखों से
बताया कि उसके पास हौज़री का स्टाक पड़ा है, जो कि बिक नहीं रहा। अब जब खरीदने वाले ही तबाह हो गए तो हम भी कैसे
बचेंगे।उसने कहा कि वो ये हस्तपर्चा अधिक से अधिक दुकानदारों को पढ़ाएगा कि
किसानों की माँगें हमारी माँगें हैं, उनका गुज़ारा हमारे करोबार के लिए
ज़रूरी है।
नौजवान भारत सभा द्वारा समर्थन
नौजवान भारत सभा द्वारा मौजूदा
किसान संघर्ष को पूरी दृढता के साथ समर्थन दिया गया है। सभा की संगत इलाका कमेटी
ने इस मुद्दे पर प्रचार लामबंदी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिला बठिंडा का
संगत ब्लाॅक फसल की बर्बादीे की बड़ी मार झेल रहा है, जबकि यहां किसान संगठनों का प्रभाव सीमित है तथा संगठित शक्ति कमज़ोर है।
भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां) की कुछ इकाइयाँ हैं। ऐसी हालत में क्रांतिकारी विचारों वाले नौजवानों की टोली
ने अपने प्रभाव तथा कार्यकर्ताओं के माध्यम से व्यापक प्रचार अभियान संगठित करके
बड़ी गिनती में लामबंदी की हैं। पहले 10 सितंबर तथा फिर पक्के धरने, इन दोनों ऐक्शनों की तैयारी मंे नौजवान सभा के कार्यकर्ताआंे ने लगभग 60 गाँवों तक पहुँच की है। दो दिन दर्जनों गाँवों में मोटर साईकिल मार्च किये गए
तथा भारी गिनती में रैलियाँ करवाई गईं तथा बाकी गाँवांे में नुक्कड़ सभाएँ तथा
आह्वान मार्च किये गए। इन गाँवों में सैंकड़ों ने प्रदर्शन के दौरान भाग लिया।शहीद
भगत सिंह के जन्म दिन को समर्पित किये जाने वाले मशाल मार्चों को मुआवज़ा संघर्ष
के लिए लामबंदी का साधन बनाया गया है। लगभग 6 गाँवों में ऐसे मार्च निकाले गए हैं जिनमंे सैंकड़ों नौजवानों ने भाग लिया है।
कुछ गाँवों में सभा की टीम द्वारा नुक्कड़ नाटकों द्वारा लोगों को धरने में शामिल
होने के लिए प्रेरित किया गया है। आए दिन नए गाँवांे तक पहुँच की जा रही है।
ब्लाॅक मौड़ में भी नौजवान भारत सभा के कार्यकर्ताओं ने लामबंदी में लगभग ऐसी ही
भूमिका निभाई है। इसके अतिरिक्त दर्जर्नों युवा कार्यकर्ताआंे ने सोशल मीडिया पर
इस संघर्ष के पत्रकारों के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई तथा काफी मेहनत जुटा कर
इसका प्रचार प्रसार किया है।
संसदीय पार्टियां तथा किसान संघर्ष
कपास की बर्बादी के मुद्दे पर
किसान मोर्चा के और तीव्र रूप धारण करने के बाद राजनीतिक लाभ लेना चाहती संसदीय
पार्टियों के पल्ले ज़्यादा कुछ नहीं पड़ रहा है। लोगों मंे फैले व्यापक आक्रोश व
साहस के पैंतड़े से आगे बढ़ाए जा रहे संघर्ष का नतीजा है कि इस हालत का सियासी लाभ
प्राप्त करने की औपचारिक कार्यवाइयों का असर बहुत कम दिखाई दिया है। विशाल जनतक
लामबंदी वाले किसान धरने ने असली व नकली के अंतर को पूरी तरह से उभार दिया है।
अकाली दल तथा भाजपा के साथ कांग्रेस पार्टी भी लाचार दिखाई दे रही है तथा इसकी
भरपाई के लिए इसके कुछ लीडर हाथ पैर मार रहे हंै। 30 सितंबर को बठिंडा मंे कांग्रेसी लीडर रवनीत बिट्टू के नेतृत्व में किया गया
मार्च इसी कोशिश में से निकला है। कुछ दिन पहले घुद्दा गाँव में कांग्रेसियों की
जाट-महासभा द्वारा एक सम्मेलन आयोजित
किया गया था। पर उस सम्मेलन में इलाके के किसान नहीं पहुँचे। जाखड़ जैसे नेता अपने
ही सफैदपोश कार्यकर्ताओं की गाडि़यां लाए थे। परन्तु गाँव के पक्के कांग्रेसी
परिवार भी बठिंडा धरने वाली ट्रालियों पर सवार हो गए थे। इस प्रकार कांगे्रसी नेता
घुद्दा में एक फीकी सी कारवाई को ही अंजाम दे सके।
2017 के चुनाव की
तैयारी में जुटी आम आदमी पार्टी ने भी पहले इस मसले पर किसी औपचारिक रैली की
ज़रूरत नहीं समझी। परन्तु मोर्चे के उभार ने उसे भी सोचने के लिए मज़बूर किया।
भगवंत मान मोर्चे के मंच पर आ कर फोटो खिंचवाना चाहता था। परन्तु संगठनांे के
नेताआंे ने उसे ऐसा करने की स्वीकृति नहीं दी। इसलिए वह धरने के नज़दीक नहीं आया।
पटियाला से सांसद धर्मवीर गांधी एक दिन धरना समाप्ति के मौके पर आ गया तथा किसान
नेताआंे व कार्यकर्ताओं के सवालों का सामना न कर पाया और झटपट चला गया।
सब से बुरी युवा कांग्रेस के
राष्ट्रीय प्रधान राजा वडि़ंग के साथ हुई। वह नेताओं से बिना पूछे एकत्रता के
बिल्कुल सामने आ कर बैठ गया। इस पर नेताओं ने उसे एकत्रता के पीछे जा के बैठने को
कहा। जब वह न माना तो वलंटियरों ने उसे उठने के लिए मज़बूर कर दिया तथा वह भी
एकत्रता में पीछे जाकर बैठने की बजाय वहां से चला गया। वहां मौजूद जनसमूह ने ‘चिट्टे बगले नीले मोर वोटां वाले सारे चोर‘ जैसे नारे जोरदार आवाज़ में लगा दिए।
इस प्रकार धरने की अगुवाई करने
वाले संगठनों ने संसदीय पार्टियों के प्रति उचित पहुँच इख्तियार की है। धरने की
स्टेज पर अथवा एकत्रता के सामने आ कर बैठने का मौका देने का अर्थ उन्हें संघर्ष का
सियासी लाभ प्राप्त करने का अवसर देना है तथा धरने की स्टेज को पार्टियों का जमघट
बना कर संघर्ष को पटरी से उतारने के हालात पैदा करना है। इसकी बजाय आम आदमी की तरह
धरने के पीछे जा कर बैठने की अनुमति देना उन परतों के स्तर का ध्यान रखना है जो
अभी संसदीय पार्टियों की भूमिका के बारे में किसी तरह के भ्रम या गलतफहमियों के
शिकार हैं।
पार्टियों द्वारा की जा रहीं
औपचारिक कारवाईयां या बयानबाजि़यां इस संघर्ष के दौरान लोगों के संघर्ष इरादों पर
कोई छाप छोड़ने लायक नहीं हैं। इसीलिए ऐसी सब कारवाईयां लोगों के लिए गैर
प्रासंगिक हैं। यह शासक वर्गीय प्रैस हिस्सों के लिए बड़ी सुुर्खियां मात्र हैं।