Friday, November 6, 2015

1) पंजाब में किसान खेत-मज़दूर संघर्ष का लहराता परचम

जनता को बाँटने के शासक वर्गीय षड्यंत्र के बावजूद


पंजाब में किसान खेत-मज़दूर संघर्ष का लहराता परचम

-संवाददाता

फसल बर्बादी के मुआवज़े के हक़ तथा बासमती खरीद जैसे मुद्दों को लेकर किसान मज़दूर जनता संघर्ष के मैदान में डटी हुई है। लगभग दो महीनों से शुरू हुआ आंदोलन पंजाब की जुझार किसान लहर की मज़बूत व लड़ाकू रिवायतें स्थापित कर रहा है। 12 अक्तूबर को बादल हुकूमत के साथ हुई बातचीत के दौरान कुछ छोटी माँगों को छोड़ कर अहम व तात्कालिक मुद्दों का कोई भी निपटारा नहीं हुआ था। किसान संगठनों ने पिछले 6 दिनों से चल रहे रेल रोको ऐक्शन की जगह संघर्ष का रूप बदलते हुए अकाली मंत्रियों तथा विधायकों के आवासांे  का 23 अक्तूबर को घिराव करने का आह्वान किया तथा गाँवों में प्रवेश पर भी ऐसे घिराव तथा विरोध प्रदर्शनों की चेतावनी दी। रेल रोको के आखिरी दिन रेलवे लाईनों पर जमी हुई किसान एकत्रताओं में विचार चर्चाओं के बाद संघर्ष का रूप बदलने का कदम उठाया गया। इस दिन तक विभिन्न जगहों पर 25,000 किसान रेल मार्गों पर जमे हुए थे। इससे किसान जनता के आक्रोष तथा लामबंदी की संगठित कोशिशों का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह ऐलान अभी हुआ ही था कि किसान मज़दूर संघर्ष के समक्ष बड़ी चुनौती आन पड़ी। 12 अक्तूबर को बरगाड़ी गाँव (फरीदकोट) में गुरू ग्रंथ साहिब का अपमान होने के समाचारों द्वारा सांप्रदायिक ताकतों तथा शासक वर्गीय हिस्सों ने सांप्रदायिक माहौल बनाना शुरू कर दिया। लोगों की भावनाओं से खेल कर पंजाब को सांप्रदायिकता की आग में झोंक देने की कोशिशें उभर आईं तथा पिछले महीनों के दौरान उभर रहे जनतक मुद्दों खास कर किसान मज़दूर मुद्दों को हाशिए पर धकेलने के काले मनसूबे प्रकट हए। भाईचारे की सांझ पर खतरा मंडराने लगा तथा लोगों का ध्यान भटकाने का खतरा उत्पन्न हो गया। ऐसे माहौल के दौरान जुझारू किसान संगठन बी.के.यू. एकता (उग्राहां) ने स्थिति की गंभीरता पर तुरंत सक्रियता दिखाते हुए ज़ोरदार हस्तक्षेप किया। संघर्ष एकता, भाईचारे की सांझ तथा समुदायक सद्भावना कायम रखने तथा शासकों की लोगों को बाँटने की चालों को समझकर पछाड़ने का आह्वान करता बयान जारी हुआ। एक इश्तिहार 25,000 की गिनती में पंजाब के गाँवांे मंे दीवारों पर प्रदर्शित किया गया। बीते डेढ़ महीने के थका देने वाले धरनों की निरंतर व्यस्तता की परवाह ना करते हुए किसान काफिले सड़कों पर कूद पड़े। सांप्रदायिकता द्वारा वातावरण प्रदूशित करने की कोशिशों के दौरान सांप्रदायिक अमन तथा वर्गीय एकता कायम रखने के आह्वान बुलंद हुए। जगह-जगह पर सद्भावना मार्च निकाले गए। बठिंडा जि़ले में नौजवान भारत सभा तथा बी.के.यू. उग्राहां द्वारा 5 ब्लाक केंद्रों पर सद्भावना मार्च किए गए। बाद में विभिन्न गाँवों में भी यह सिलसिला जारी रहा। बरनाला, निहाल सिंह वाला (मोगा), मानसा, रामपुरा, लंबी (मुक्तसर), सुनाम (संगरूर) आदि लगभग 40-50 स्थानों पर ऐसे मार्चों द्वारा शासक वर्गीय काले मनसूबे उजागर किए गए। बी.के.यू. एकता ( उग्राहां ) ने इस साहसी पैंतड़े पर मैदान में कूद कर ऐसी ही भावना रखने वाले अन्य सामाजिक हिस्सों के लिए ऐसी सरगर्मी कर पाना आसान बना दिया। भाईचारे की सांझ को खंडित करने के प्रयत्नों के दौरान एकता तथा शांति कायम रखने का आह्वान ही पंजाब में प्रभावी रूप में सुनाई दिया। ऐसी सरगर्मी ने संपूर्ण माहौल पर अपनी छाप छोड़ी।
संघर्ष के मार्ग पर डटे रहने के इस संदेश को किसान जनता का पुुरज़ोर समर्थन मिला। 24 अक्तूबर के समाचार पत्रों में एक बार फिर किसान मुद्दों पर संघर्ष की चर्चा ने सुखर््िायों में स्थान ग्रहण किया। इस व्यापक ऐक्शन को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था। शासक वर्गीय तथा सांप्रदायिक ताकतों के सांप्रदायिक खेल के दौरान ही 23 अक्तूबर को अलग-अलग स्थानों से हज़ारों किसानों ने मंत्रियों तथा संसदीय सचिवों के घरों की तरफ कूच किया। समाचार-पत्र पंजाबी ट्रिब्यून ने अपने मुख्य पन्ने के शिखर पर प्रकाशित खबर में बतायाः ‘‘ पंजाब की 8 किसान तथा 4 मज़दूर संगठनों की तरफ से मुख्य मंत्री, मंत्रियों, मुख्य संसदीय सचिवों तथा विधायकों के घरों के घिराव करने की योजना को पुलिस ने नाकाम करने की कोशिश की परन्तु किसान दर्जन से ज़्यादा मंत्रियों तथा मुख्य संसदीय सचिवों के घरांे या घरों को जाते सड़क मार्गों को घेरने में कामयाब रहे। किसानों मज़दूरों को रोका गया। उन्होंने वहीं पर सड़क मार्गों पर धरने लगा दिए‘‘। यह ऐक्शन इसे नाकाम बनाने के लिए पुलिस गिरफ्तारियां तथा रूकावटों के बड़े सिलसिले के बावजूद हुआ। किसान मज़दूर जनता के बढ़ते रोष को प्रकट करता यह ऐक्शन काम के सीज़न में होने की वजह से विशेष महत्व रखता है। इसका महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि इसने शासकों द्वारा लोगों के असल मुद्दों को धूल में मिलाने के षड्यंत्रों को नाकाम करके किसानों मज़दूरों के असली मुद्दों की गूँज ऊँची की है। सांप्रदायिक सोच को निरुत्साहित करने व मेहनतकश लोगों की वर्गीय एकता को बचाने तथा संघर्ष को आगे ले जाने के पक्ष से भी इस ऐक्शन के दौरान हुई लामबंदी का महत्व और भी बढ़ जाता है।
मुख्य मंत्री के बादल गाँव के आवास का घिराव होने से बचाने के लिए 21 पुलिस नाके लगाए गए जिनमें सैंकड़ों पुलिस कर्मी  तैनात किए गए। सुबह से ही किसान-मज़दूर नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को छापेमारी द्वारा गिरफ्तार किया गया। परन्तु फिर भी 3 विभिन्न दिशाओं से काफिले बादल गाँव की तरफ चल पड़े तथा रास्ते में रोके जाने पर सड़क यातायात जाम करके वहीं धरने पर बैठ गए। स्थिति को बयान करते हुए एक समाचार पत्र ने लिखाः
‘‘किसान मज़दूर कारकुन बादल गाँव की तरफ उमड़े.... कल शाम से लेकर आज पूरे दिन पुलिस तथा जासूसी तंत्र के पसीने छूटते रहे। पूरी रात किसान मज़दूर कारकुनों की गिरफ्तारी के लिए छापामारी के ज़ोरदार सिलसिले के बाद आज सुबह से ही लंबी कस्बा ऐसे नज़र आ रहा था मानो यह ख़ाकी वर्दी पहने पुलिस लश्करों के पहरे दरमयान एक किला हो। लंबी में दाखिल होने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पुलिस तलाशी ले रही थी। इसके बावजूद किसान-मज़दूर मुख्य मंत्री के गाँव बादल की उत्तर दिशा में दोपहर एक बजे के करीब संगठित हो गए। जब यह बादल गाँव की तरफ कूच करने लगे तो भारी सुरक्षा बलों ने इन आंदोलनकारियों को लंबी गिदड़बाहा मार्ग पर घेर कर रोक लिया। दूसरी तरफ मंडी डबवाली की तरफ से किसान-मज़दूरों को मिट्ठड़ी-सिंहेवाला मार्ग पर रोक लिया। क्रोध में आए भूमि पुत्र सड़क मार्ग पर धरना लगा कर बैठ गए और तीखी धूप में सरकार के खिलाफ नारे लगाने लगे। संघर्षकारियों में औरतों की भारी संख्या थी‘‘
विभिन्न स्थानों के संवाददाताओं की तरफ से ऐसी कितनी ही रिपोर्टें समाचार पत्रों में प्रकाशित हुईं। पंजाबी ट्रिब्यून तथा अन्य समाचार-पत्रों के मुख्य पृष्ठों की र्शीष सुखर््िायों में बताया गया कि मोगा में कृषि मंत्री तोता सिंह, संगरूर में परमिंदर सिंह ढींडसा, पटियाला में सुरजीत सिंह रखड़ा, अमृतसर मंे बिक्रम सिंह मजीठिया, तरनतारन में आदेशप्रताप सिंह कैरों, जालंधर में अजीत सिंह कुहाड़, मानसा में चतिंन सिंह समाओं तथा प्रेम मित्तल  के घरों पर किसान एवं मज़दूर प्रदर्शनकारियों के आक्रोश की गूँज सुनाई दी। मुक्तसर जि़ले में मुख्य मंत्री प्रकाश सिंह बादल के गाँव की तरफ जा रहे किसान काफिले को सिद्धेवाल गाँव में पुलिस ने रोका तो वहीं पर सड़क मार्ग जाम हो गया। इसी तरह बठिंडा-बादल सड़क मार्ग नंदगढ़ में जाम हो गया। बठिंडा-भगता सड़क मार्ग मंत्री सिकंदर सिंह मलूका के घर की तरफ बढ़ रहे किसानों ने पुलिस के रोके जाने पर कोठा गुरू में सड़क जाम किया। गुरदासपुर में बब्बेहाली के घर की तरफ जा रहे काफिले ने सड़क मार्ग जाम किया। होशियारपुर जि़ले के टांडा कस्बे में रविंद्र रसूलपूर के घर के सामने सड़क मार्ग जाम हुआ। पठानकोट में दिनेश सिंह बब्बू के बंगले के सामने प्रदर्शनकारियों को रोके जाने पर सड़क मार्ग का घिराव किया गया।
 पंजाब भर में 900 मज़दूर किसान गिरफ्तार किए गए। इसकी प्रतिक्रिया में घिराव का समय बढ़ा दिया गया। आंदोलनकारी जगह-जगह जमे रहे। घिराव अनिश्चित काल के लिए जारी रखने की चेतावनी के बाद गिरफ्तार किसानों मज़दूरों को छोड़ दिया गया। इस तनातनी की वजह से घिराव पहले ऐलान के मुताबिक दोपहर 3 बजे समाप्त होने की बजाय शाम तक जारी रहे।
26 अक्तूबर को किसान मज़दूर संगठनों की मीटिंग में निर्णय किया गया कि अकाली विधायकों तथा मंत्रियों के गाँव में प्रवेश करने पर विरोध प्रदर्शन किए जाऐंगे तथा जन लामबंदी जारी रखी जाएगी। बासमती की खरीद तथा मुल्य गिरावट राहत की विशेष माँग को लेकर मोगा व अमृतसर में डी.सी. दफ्तरों के आगे 4 से 6 नवंबर तक तीन दिवसीय धरने दिए जाऐंगे। इस प्रकार बादल हुकूमत के खिलाफ प्रचंड हो रहा किसान मज़दूर आक्रोष अपना दबाव बनाना जारी रखेगा। पंजाब में लोगों को बाँटने तथा भटकाने की शासक वर्गीय सियासत के प्रतिरोध में किसानों खेत-मज़दूरों के संघर्ष ने महत्वपूर्ण अंश के तौर पर स्थान ग्रहण कर लिया है। ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल किसान संघर्ष के तीव्र क्षेत्र बठिंडा में पहले से तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार शिरोमणि अकाली दल के पूर्व प्रमुख की पुण्यतिथि समारोह में भाग लेने की हिम्मत नहीं कर सके।

(सुखऱ् लीह के आगामी अंक के लिए रिपोर्ट का एक भाग)

2) किसान आक्रोश का सेंक व संकेत



किसान आक्रोश का सेंक व संकेत

13 अक्तूबर, 2015

जैसे कि उम्मीद थी किसानों खेत मज़दूरों तथा सरकार के दरमयान बातचीत विफल रही। मुआवज़े के संबंध में मात्र एक नई बात कपास से संबंिधत किसानों के लिए ऐलान की गई मुआवज़ा राशि के 10 प्रतिशत के बराबर रकम खेत मज़दूरों के लिए राहत फंड के तौर पर जारी करने का सरकारी ऐलान है। यह किसानों व खेत मज़दूरों के सांझे दबाव का परिणाम है। बातचीत के दौरान यह मुद्दा विशेष रूप में उभरकर चर्चा में आया। यह बात किसानों व खेत मज़दूरों के आपसी संबंधों की सांझ तथा भरोसे की भावना को बढाने की दृष्टि से अहम भूमिका निभाएगी।
लेकिन कपास के मुआवज़े में कोई बढौतरी नहीं की गई। बासमती के संबंध में भी किसी राहत का ऐलान नहीं हुआ। सरकार का जवाब बड़ा साफ है। इसमें भविष्य का संकेत भी है कि मज़दूरों किसानों के लिए सरकारों के खजाने खाली ही रहेंगे। किसानों खेत मज़दूरों ने संघर्ष वापसी की सरकारी अपील जायज़ तौर पर ठुकरा दिया है और लंबे रेल जाम की उलझनों को देखते हुए वे एक बार तत्काल संघर्ष का रूप बदल रहे हैं। दोनों सत्तारूढ पार्टियाँ संघर्ष की इस तात्कालिक व तीखी धार के निशाने पर हैं। आगामी दिनों में संघर्ष के दांव पेच व ठोस रूप कुछ भी हों, परन्तु शासक आक्रोश से भरी जनता के राजनीतिक हल्लेे व जुझारू ऐक्शनों के सुमेल के आगामी दौर से मुक्त नहीं है।
मौजूदा हालात के मद्देनज़र संघर्ष, खास कर रेल जाम के बेमिसाल ऐक्शन की राजनीतिक प्राप्ति बहुत अहम है। भूमि पुत्रोें की हालत देश में गंभीर चर्चा का विषय बनी हुई है। किसान आक्रोश की स्पष्ट गूँज देश विदेश में सुनाई पड़ी है। किसानों खेत मज़दूरों की मंदी हालत तथा आत्महत्याओं के राजनीतिक मुजरिमों के तौर पर शासक बेनकाब हुए हैं। पत्थर दिल जन-दुश्मन रवैया प्रदर्शित हुआ है। मुनाफाखोर कीटनाशक साम्राज्यवादी कंपनियों के साथ शासकों के संबंध का चाकर चरित्र खुल कर सामने आया है। इसे ढ़कने के लिए खेतीबाड़ी विभाग के निर्देशक तथा उसके जोड़ीदारों को गिरफ्तार करने तक जाना पड़ा है।सत्तारूढ पार्टी के महत्वपूर्ण नेताओं तथा नकली किसान लीडरों ने इस संघर्ष को सामाजिक शांति भंग करने व हिंसा भड़काने वाला कहा है। परन्तु वे जनमत को प्रभावित करने में नाकाम रहे। साथ में इन लीडरों को पर्याप्त फिटकारें भी पड़ीं। इस संघर्ष ने प्रांत में संकीर्ण शासक वर्गीय सियासत के डेरा सच्चा सौदा जैसे मुद्दों को एक बार तो दरकिनार कर दिया है।
सबसे अहम बात यह है कि अब तक के संघर्ष के अनुभव ने यह बात अच्छी तरह से उभार दी है कि किसान जनता का पाला कैसे दुश्मन से पड़ा है तथा अधिकारों की लड़ाई कैसी ताकत, तैयारी एवं इरादे की मांग करती है। रेल रोको ऐक्शन दौरान राज सत्ता किसानों पर खूनी हिंसक हमला बोलने की तैयारी करती नज़र आई है। राजनीतिक नेताओं, नकली किसान लीडरों तथा रेलवे के उच्च अधिकारियों के बयानों द्वारा ऐसे हमले का माहौल बनाने की कोशिश की गई। भारी पुलिस लश्करों को तैयार बर तैयार रखा गया। यह बात अलग है कि कितने ही दिन जन-आक्रोश का वेग शासकों के काले एवं खूनी इरादे के लिए रूकावट बना रहा। उन्हें बातचीत का ढोंग रचना पड़ा। परन्तु आखिर में यह ढोंग जन-दुश्मन नीयत तथा नीति का इश्तिहार हो गुज़रा है। दूसरी तरफ लामबंदी के घेरे में हो रही वृद्धि ने बहुत सारे नए जुझार कार्यकर्ताओं के आगमन ने, शासकीय रवैये  तथा चरित्र के अनुभव ने, जमा हुए आक्रोष तथा तेज़ हुई समझ ने किसान लीडरशिप के लिए ऐसी सामग्री उपलब्द्ध करवा दी है जिसके बल पर बेहतर ज़ोर आज़माइश के अगले दौर में जाया जा सकता है। किसान शक्ति एक बार रेलवे लाइनों से उठकर अगले फिटकार व ललकार हल्ले के लिए गाँवों की तरफ रूख़ कर रही है। संघर्ष के अगले बड़े ऐक्शन की दस्तक 23 अक्तूबर को सत्तारूढ पार्टियांे के मंत्रियों तथा विधायकों के बंगलों पर होगी। हालत का संकेत यही है कि शासको के लिए किसान आक्रोश का सियासी सेंक बढ़ता जाएगा। इस प्रक्रिया में संगठित किसान शक्ति में और अधिक निखार आने की संभावनाएँ मौजूद हंै।

(सुखऱ् लीह (पंजाबी) अक्तूबर सपलीमेंट 2015 की संपादकीय)

3) बठिंडा किसान मोर्चा के अंग-संग



दिशा की तलाश में किसान आक्रोश

- माझा से मालवा तक फैलीं तरंगें

- खेत मज़दूरों की कदम ताल-नए खून का संचार

- व्यापक हमदर्दी व हिमायत-शहरों के भीतर तक फैलाव

- आत्म निर्भर जनतक शक्ति का नज़ारा-राजनीतिक पार्टियाँ हाशिये पर

विशेष फील्ड रिर्पोट

1 अक्तूबर, 2015

पिछले 14 दिनों से बठिंडा में चल रहे किसान मजदूर धरने की गूँज संपूर्ण पंजाब में सुनाई दे रही है। किसानों मजदूरों का बठिंडा की सडकों पर प्रवाहित हो रहा आक्रोश बादल सरकार के पसीने छुटा रहा है। जन उभार के समक्ष सरकार हड़बड़ाई हुई नजर आ रही है। प्रैस तथा सोशल मीडिया कपास की बर्बादी तथा मुआवजे के अधिकार के लिए किसान मज़दूर संघर्ष छाया हुआ है। कपास पट्टी में यह घर घर का मुद्दा बना हुआ है। चूल्हों से लेकर चैराहों तक बठिंडा मोर्चे की चर्चा है। लोगों की नजरें मोर्चे पर लगी हुई हैं। मोर्चे दौरान नौजवान किसान की आत्महत्या ने प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति के मन में रोष उत्पन्न किया है। बादल सरकार पुनः आम जनता के निशाने पर आ गई है।
मालवा से उठी किसान मजदूर आक्रोश की तपिश को झेलना बादल सरकार के लिए मुश्किल पड़ रहा है। अकाली नेता बलविंदर सिंह भूंदड़ को बठिंडा किसान मेले में तीखे आक्रोश का सामना करना पड़ा है। किसानों ने उसे खरी खरी सुनाईं। उसे भाषण दिये बगैर भागना पड़ा है। लोगों का गुस्सा बाद में पंडाल पर निकला है। गोनियाना के गांव में घूमती हरसिमरत कौर बादल को खेत मजदूर औरतें काली झंडियां दिखाने की तैयारी  में थी। हरसिमरत को मार्ग बदलकर कच्चे रास्ते में से गुज़रना पड़ा है। 10 करोड़ की राशि जारी करके चुप्पी धारण करने वाली सरकार को 600 करोड की राशि जारी करने का ऐलान करना पड़ा है तथा जल्द से जल्द राशि वितरण के बयान जारी करने पड़े हंै।
किसान संघर्ष के दबाव ने बादल सरकार का जन विरोधी चरित्र बेनकाब कर दिया है। पहले सरकार कितनी देर तक प्राकृतिक आपदा कह कर इससे टलती रही। परन्तु बठिंडा से उभरती आक्रोश की ललकार के सामने हड़बड़ाए कृषि मंत्री तथा कृषि विभाग की सभी चालें उल्टी पड़ रही हैं। लोगों के दबाव तथा प्रैस में प्रतिदिन हो रहे खुलासों ने यह तथ्य स्थापित कर दिया कि यह प्राकृतिक आपदा नहीं है, अपितु बादल सरकार की आपदा है जिसने कपास की फसल तबाह की है। नकली बीज तथा कीटनाशकों के स्कैंडलों की परतों के खुलासे प्रतिदिन हो रहे हैं। एक दूसरे पर दोष लगाते मंत्री तथा कृषि विभाग का निर्देशक एक दूसरे के कच्चे चिट्ठे खोलने में लगे हुए हैं। ये हकीकत स्थापित हो रही है कि कंपनियों ने अंधाधुंद मुनाफे कमाये हैं, अफसरशाही तथा नेताओं ने दलालियां निगली हैं तथा खामियाज़ा आम जनता ने भुगता है।
इस संघर्ष की जोरदार गूँज का कारण किसानों मजदूरों के जीवन में हुई बड़ी हलचल है। पहले से ही कंगाली  में धकेले गए किसानों तथा खेत मजदूरों की हालत इस फसल की बर्बादी के कारण और भी दयनीय हो गई है। कजऱ्ों के ब्याज से त्रस्त गरीब किसानांे तथा खेत मज़दूरों की यह हालत कजऱ्े की दलदल में और गहरे धँस जाने का कारण बनने जा रही है। महँगे दामों पर ठेके पर ली गईं जमीनों की भारी धन राशियाँ उतारनी मुश्किल हो रही हैं तथा आगे चलकर गेहूँ की बीजाई का भी कोई जुगाड़ नहीं हों रहा। पैसे वापसी की उम्मीद न होने के कारण आढतिए (कमिशन एजेंट) भी कजेऱ् देने से टल रहे हैं। कपास के सफाए ने खेत मजदूरों के रोजगार का भी सफाया कर दिया है।
ऐसी परिस्थिति ने किसानों मज़दूरों में भारी हलचल पैदा की है। किसान जनता में फैली बेचैनी तथा गुस्से को संगठित किसान शक्ति का सहारा मिल गया है। अपनी शक्ति के बल पर कुछ प्राप्त हो सकने की उम्मीद जाग उठी है तथा अब इन उम्मीदों को हकीकत में बदलने के लिए संघर्ष का अखाड़ा प्रज्ज्वलित हो उठा है। ग्रामीण मेहनतकश जनता के संघर्ष का तात्कालिक मुद्दा भले तबाह हुई कपास  का मुआवजा प्राप्त करना है, परन्तु आक्रोश का यह केवल तात्कालिक कारण है। बादल सरकार द्वारा अब तक अपनाया गया किसान व खेत मजदूर दुश्मन व्यावहार इसका मूल कारण है। इस सरकार द्वारा अपनाईं गईं साम्राज्यवादी कंपनियों तथा लुटेरे सूदखोर कमीशन एजेंटों की पक्षधर तथा जनविरोधी नीतियों से मेहनती जनता विशेषकर ग्रामीण जनता में तीव्र बेचैनी पैदा हुई है। कृषकों की आत्महत्याएँ इसको शीर्षतम् रूप में प्रकट करती है। इस समय भी इस मुद्दे पर बादल सरकार अपने चरित्र अनुसार ही चली है। नुक्सान संबंधी विशेष गिरदावरी ( सर्वेक्षण ) के  आदेश देकर टाईम पास किया है। कृषि विभाग नुक्सान को संकुचित रूप मंे पेश कर रहा है। प्रति एकड़ के हिसाब से केवल आठ हज़ार मुआवजा देना ही माना गया है, वह भी आगे कई भागों में विभक्त किया जा रहा है। बर्बाद फसलें उन्हें माना जा रहा है जिन पर किसानों ने हल चला दिए हैं। ऐसी स्थिति के चलते ही 17-17 रु. के सरकार द्वारा वितरित किये जा रहे चैकों ने सरकार का बुरी तरह से जुलूस निकाल दिया है तथा जन आक्रोश को बढ़ाया है।

असरदार प्रचार तथा लामबंदी अभियान

फसल बर्बादी से उत्पन्न चिंता तथा परेशानियों में घिरी जनता के किसान संघर्ष में कूद पड़ने में किसान संगठनों द्वारा चलाए गए प्रचार अभियान की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह केवल स्वतःसिद्ध लामबंदी नहीं है, अपितु चेतन तथा अनुभवी किसान जुझारांे द्वारा चलाए असरदार प्रचार अभियान का नतीजा है। इस प्रकार के प्रचार को जोरदार अनुक्रिया मिलने का कारण हालात में मौजूद है।
कपास की तबाही से किसान जनता में हलचल अगस्त के अंत से ही श्शुरू हो गई थी। भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां) द्वारा आत्महत्याओं के मुद्दे पर दिए गए पाँच दिन के जि़ला स्तरीय धरनों के अंतिम दिनों में पीडित किसान भी धरनों में पहुँचे थे। बर्बादी से पीडि़त जनता के गुस्से की झलकें मिल गईं थीं। 31 अगस्त को 8 किसान संगठनों की सांझी सभा में 10 सितंबर को बठिंडा में विशाल प्रदर्शन का प्रोग्राम रखा था। बर्बाद हुई फसल का पूर्ण रूप में सर्वेक्षण करवाने, नुक्सान का मुआवजा प्रति एकड़ 40,000 रु. किसानों को देने, रोजगार उजाड़े की पूर्ति के रूप में प्रति खेत मजदूर परिवार को 20,000 देने, दोषी बहुराष्ट्रीय कंपनियों, डीलरों तथा कृषि विभाग के अधिकारियों को सख्त सजाएं देने जैसी मांगों को लेकर जोरदार प्रचार तथा लामबंदी अभियान चलाया गया। कपास पट््टी में विशाल जनतक आधार वाले संगठन बी.के.यू. उग्राहां द्वारा कपास वाले क्षेत्रों में विशेष रूप से टीमें तैनात की गईं। प्रत्येक गांव तक पहुँचने के प्रयत्न किए गए। लंबी, संगत, मुक्तसर, गिदड़बाहा, मलोट, बुढलाडा, मौड़, तलवंडी आदि ब्लाकोें में विशेष रूप से तैनात टीमों ने गांव-गांव तक पहुँच कर रैलीयां, सभाएं तथा आह्वान मोर्चों का सिलसिला चलाया। यह प्रभावपूर्ण प्रचार का परिणाम ही था कि लोगों के मनों में ये मसला प्राकृतिक आपदा न रहकर सरकारी आपदा के रूप में स्थापित हुआ। बड़ी कीटनाशक दवाई कंपनियों तथा सरकार के गठजोड़ को प्रदर्शित किया गया। जनता के दुश्मन सामने दिखने लगे। मुआवजे़ के अधिकार की न्यायसंगतता के लिए बड़े धन कुबेरों को दिए जाते गफ्फों, कर छूट तथा अन्य रियायतों की तथ्यों समेत जानकारी दी गई। इसने मुआवजा प्राप्ति की तीव्र इच्छा को और प्रचंड किया। किसान टीमें खेत मजदूर जनता में पहुँची तथा उन्हें मुआवजा प्राप्ति के संघर्ष के लिए प्रेरित किया। खेत मजदूर जनता में भी उम्मीद जगी। गोबिंदपुरा भूमि संघर्ष के समय खेत मज़दूरों को मिले मुआवजे की प्राप्ति को विशेष रुप से उभारा गया।
इस प्रकार व्यापाक गहरे प्रचार ने बेबसी तथा चिंता को आक्रोश और गुस्से में ढाल दिया। लड़ने के तीव्र इच्छा पैदा कर दी तथा संघर्ष का मार्ग तैयार कर दिया। 10 सितंबर को बठिंडा में विशाल एकत्रता हुई तथा माँगें न माने जाने पर 17 सितंबर से अनिश्चित कालीन मोर्चे का ऐलान किया गया। ये प्रचार लामबंदी अभियान इन दिनों के दौरान भी जारी रहा तथा 17 सितंबर से मिनी सचिवालय के सामने मुख्य मार्ग का एक भाग रोककर पक्का धरना शुरू हो गया।

लगातार प्रदर्शन

प्रदर्शन दौरान भी गाँवों में लामबंदी तथा प्रचार का कार्य जारी रखा गया। विशेषकर बी.के.यू. एकता उग्राहां की 4-5 टीमें प्रतिदिन बठिंडा जिले तथा अन्य समीपवर्ती क्षेत्रों  में जाकर लोगों को प्रदर्शन  में शामिल होने की प्रेरणा देती रहीं। गिनती दिन प्रतिदिन बढती गई जिसमें नौजवान गिनती में शामिल थे। 20 तारीख को कृषि विभाग के दफ्तर की ओर किया गया विशाल रोष प्रदर्शन बेमिसाल था। सड़कों पर लोगों का मानो सैलाब चल पड़ा था । नौजवानांे का जोश देखते ही बनता था। पुल पर चढ़ते जोश से भरपूर जनसमूह की तस्वीरें अब तक भी सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं।
इतनी जोरदार लामबंदी के बाद सरकार घबरा गई, शहर में मार्च करने पर रोकें थोप दीं। आक्रोश से भरे नौजवान पुलिस से दो-दो हाथ करने को तत्पर हों गए। पेड़ों की टहनियाँ तोड़ लीं। किसान नेताओं तथा बुद्धिमान कार्यकर्ताओं के जोरदार प्रयासों से नौजवानों को बड़ी मुश्किल से ही रोका गया, फिर भी एक झड़प हो गई। परन्तु नेताओं तथा अनुभवी कार्यकर्ताआंे के योग्य दिशा निर्देश ने पुलिस को मार पीट करने का मौका देने से बचा लिया। नौजवानों के ज़ोर आज़माईश के मूड़ तथा इरादे को देखकर पुलिस कर्मचारियों के रंग उड़े हुए नज़र आए तथा पुलिस में नई भर्ती की गई लड़कियां ऐसी स्थिति में उन्हें आगे कर देने के लिए अफसरों को कोसती नज़र आईं।
बादल सरकार ने बाहर से आए काफिलों को रस्ते में ही रोक कर तथा शहर में मार्च करने वालों पर पाबंदी लगा कर संघर्ष के अधिकार को छीनने का प्रयास किया। एक दो स्थानों पर किसानों की गिरफ्तारियां भी कीं। परन्तु अधिक समय तक उन्हें अन्दर न रख सकी। मानसा से आते काफिले को भाई देसा गाँव के पास, बरनाला के काफिले को तपा के पास तथा निहाल सिंह वाला के काफिले को दीना के पास आदि स्थानों पर रोक लिया गया। इस पर वहीं पर ही सड़कें जाम करके पक्के धरने शुरू कर दिए गए। बठिंडा शहर में आती बसों की तलाशी, किसानों के यातायात साधनों के नंबर नोट करने जैसी धमकाने वाली कारवाईयाँ नाकाम साबित हुईं तथा एकत्रता लगातार बढती ही गई। तीन अन्य स्थानों पर  प्रदर्शन शुरू होने पर भी बठिंडा मोर्चा में लोगों की गिनती कम नहीं हुई। शहर में प्रदर्शन करने पर लगी पाबंदियों को सुबह के समय आने वाले काफिलों द्वारा प्रदर्शनों का सिलसिला चलाकर तोड़ दिया गया। शहर की भिन्न-भिन्न दिशाओं से आने वाले काफिले मार्च करके धरने में पहुँचने लगे। ये प्रतिदिन का सिलसिला बन गया। ऐसे प्रदर्शनों तथा लोगों के जुझारू मूड़ को देखकर एक पत्रकार भी जोश में आ गया तथा नारों का जवाब देने लगा। साथ खड़े फोटोग्राफर को कहने लगा, ‘‘अब कैसे रोकेंगे‘‘। इससे जनता के आक्रोश तथा जज़्बे का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

व्यापक जन-समर्थन

प्रदर्शन में सीधे-सीधे भाग लेने के अतिरिक्त विभन्न रूपों में व्यापक जन समर्थन प्राप्त हुआ है। गाँवों से धड़ाधड़ क्विंटलों के हिसाब में आटा,चीनी, दूध तथा अन्य राशन पहुँच रहा है। बठिंडा के समीपवर्ती गाँव जस्सी पौ वाली की जनता ने क्विंटलों में आटा अपने गाँव के गुरुद्वारे में रख लिया है। प्रतिदिन सुबह के समय दर्जनों महिलाएँ लंगर तैयार करती हैं जो कि 8 बजे तक प्रदर्शन स्थल पर पहुँचाया जा रहा है। गाँवों से स्वैच्छित रूप में ही फंड इकट्ठा हो रहा है। कभी कोई गाँव चावलों के कड़ाहे भेज रहा है तो कोई प्रसाद से भरे देगचे। अधिक से अधिक राशन भेजने का मुकाबला हो रहा है। लंगर 24 घंटे चलता है तथा सैंकड़ों वर्कर लंगर के इंतजाम में जुटे रहते हैं। ऐसा माहौल प्रदर्शन में भाग लेने वालों में और उत्साह भरता है। गाँवों के उत्साह से भरे नौजवानों की टोलियाँ मंच के पास आ कर किसी भी वस्तु की कमी न होने देने के भरोसे देतीं हैं, जो चाहिए हाजि़र करने के ऐलान करते हैं। जनता रिश्तेदारियों में फोन करके मोर्चे के दर्शन करने जाने के संदेश भेज रही है। यह माहौल लोगों की गहरी शमूलियत का परिणाम है। संकटग्रस्त किसान जनता के लिए जीवन यापन का तात्कलिक साधन जुटाने की लड़ाई में कूद पड़ने का परिणाम है। इतनी विशाल लामबंदी तथा लडाकू आक्रोश ने अन्य समुदायों को अपने धरने की तरफ खींचा है। सक्रिय अध्यापक संगठनों के दर्जनों कार्यकर्ता अक्सर धरने में आते है, फंड देते है। ऐसा करने के लिए इन संगठनों की लीडरशिप द्वारा कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ती। विभन्न मुलाजि़म संगठनों ने फंड भेजे हैं तथा हर प्रकार की मदद की पेशकश की है। ये माहौल समुदायों में दूरी कम हो जाने को प्रकट करता है। सरकार द्वारा लूटे जाने तथा प्रताडि़त किए हुए विभन्न समुदायों में सरकार को हड़बड़ाहट में डालने वाले जुझार समुदाय के प्रति हार्दिक सत्कार प्रकट हुआ है तथा सरकार की नाक में दम करने वाले की इच्छा रखने वाले जुझार कार्यकर्ताओं में ऐसी आशाएँ साकार हो सकने की उम्मीदें प्रकट हुई हैं। इसमें जुझार संगठनों विशेषकर बी.के.यू. उग्राहां द्वारा विभन्न समुदायों की समय समय पर निःस्वार्थ भावना से समर्थन की छाप भी है।
अब 8 किसान संगठनों द्वारा माझा तथा दुआबा क्षेत्र में गर्माए हुए बासमती तथा गन्ने के मुद्दों को भी साथ लेकर एक तारीख से सारे जिलों में पक्के धरने आरंभ होने जा रहे हैं। जबकि संगरूर, बरनाला तथा मानसा में पहले से ही आरंभ हो चुके हैं। माँगें न मानने की हालत में रेल तथा सड़कें जाम करने की चेतावनी दी जा चुकी है।
10 करोड़ से 600 करोड़ मुआवजे का ऐलान करवाना इस संघर्ष की आंशिक प्राप्ति है, पूर्णतः जीत अभी बाकी है। परन्तु इससे बड़ी प्राप्तियां हो चुकी हैं तथा लगातार हों रही हैं। बादल सरकार का जन-दुश्मन चेहरा पूर्ण रूप में उभार दिया गया है। किसानों तथा खेत मजदूरों की परस्पर साँझ और अधिक गहरी हो रही है। संगठित किसान शक्ति और विस्तृत हो रही है। जनता के हकीकी मुद्दे शासक वर्ग की राजनीति की भेंट नहीं चढने दिए जा रहे, साम्प्रदायिकता तथा फूट डालने वाली राजनीति की चालों से ऊपर उठकर वर्गीय मुद्दे उभर रहे हैं। शासक वर्गीय मौकाप्रस्त वोट पार्टियांे की जगह जुझार जनतक संगठनों के प्लेटफार्म का महत्व उभर कर दिखाई देने लगा। बादल सरकार पूरी तरह बचाव के पैंतड़े अपना रही है। अवसरवादी राजनीतिक पार्टियां भी संघर्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में नाकाम रही हैं। संघर्ष के प्रचंड होने से किसान मजदूर लहर की झोली और भी प्राप्तियांे से भरेगी तथा शासकों से भारी कीमत वसूल की जाएगी।
कपास पट्टी में आत्महत्याएँ तथा संघर्ष का रूझान आपसी मुकाबला करते नज़र आ रहे हैं। प्रत्येक संघर्ष आत्महत्याओं से पीडि़त मेहनतकश जनता में एक आशा जगाता है। मौजूदा कपास संघर्ष की भी इस पक्ष से महत्वपूर्ण भूमिका है। संघर्ष के आगे बढ़ते कदम उम्मीद बंधाते हंै कि संघर्ष के रूझान प्रबल करने में ये संघर्ष अभी और भूमिका निभाएगा।

उभरते स्थानीय मुद्दों पर किसान सक्रियता का तालमेल

पंजाब के 8 किसान संगठनों द्वारा सितंबर महीने दौरान विभिन्न क्षेत्रांे में उभरे हुए किसान मुद्दों को लेकर सांझे ऐक्शन किए गए हैं। प्रत्येक ऐक्शन में उस क्षेत्र की उभरी हुई माँगों को प्रमुखता दी गई है। 10 सितंबर को कपास के मुद्दे में से निकलती माँगों को लेकर बठिंडा, 15 सितंबर को हरयाऊँ खुर्द के आबादकारों के मुद्दे पर पटियाला, 21 सितंबर को बासमती धान तथा वर्षा के कारण बर्बाद हुई फसल के मुद्दे को प्रमुखता देकर अमृतसर तथा गन्ने के बकाये की माँगों को प्रमुखता देकर 24 को जालंधर में विशाल रोष प्रदर्शन किए गए हैं। इन प्रदर्शनों में स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता दी गई है तथा साथ ही कजऱ्ा आत्महत्याओं जैसे मसले भी रखे गए हैं। इन प्रदर्शनों में भारी गिनती में किसान जनता पहुँची है। इसके बाद 01 अक्तूबर से पंजाब के सारे जि़लों में पक्के धरने श्शुरू किए जा रहे हैं तथा आगे संघर्ष और तीखा करने की चेतावनी दी जा चुकी है। रेलें तथा सड़कें रोकने का ऐलान हो चुका है। इसी दौरान ही किसान संघर्ष कमेटी (सतनाम पन्नू) द्वारा बासमती की सरकारी खरीद करवाने,उचित दाम तय करवाने, भूमि अधिग्रहण कानून में 100 प्रतिशत किसानों की सहमती ज़रूरी करने पर आबादकारों को स्वामित्व का अधिकार देने जैसी माँगों पर 24 सितंबर को अमृतसर तथा तरनतारन में मुख्य मार्ग जाम करके रोष प्रकट किए गए हैं। अमृतसर के समीप मानांवाला में जाम रात के 8.30 तक चला। इसके अतिरिक्त गुरदासपुर, फिरोज़पुर, होशियारपुर तथा जालंधर आदि स्थानों पर भी रोष प्रदर्शन किए गए। इन ऐक्शनों के पश्चात् भले ही सरकार ने धान की सरकारी खरीद करने का श्रोसा दिया है परन्तु उचित कीमत की माँग अभी भी खड़ी है। बासमती की 1509 तथा 1121 किस्मों का बहुत निम्न दाम 1500-1600रु. प्रति क्विंटल के हिसाब देकर किसानों कों लूटा जा रहा है। जबकि किसानों की माँग है कि ये दाम क्रमवार 4500 तथा 5000 रु. तक मिलना चाहिए। इसके अतिरिक्त बेमौसमी वर्षा के कारण बर्बाद हुई धान की फसल का मुआवज़ा 40,000 रु. प्रति एकड़ देने तथा खरीद के समय अनावश्यक शर्तें समाप्त करवाने की माँग को शामिल करके 01 अक्तूबर से जिला केंद्रों पर अनिश्चित काल तक के प्रदर्शनों का शुभारंभ किया जा रहा है।

नौजवान लामबंदी - उभरता हुआ लक्षण

विशाल लामबंदी इस संघर्ष का उभरता लक्षण है। यूनियन की पहली इकाइयों मे से भी बड़ी लामबंदी है तथा नए गाँव भी बड़ी गिनती में शामिल हो रहे हैं। नए हिस्सों तक बी.के.यू. एकता ( उग्राहां ) द्वारा विशेष रूप से पहुँच की गई है। वैसे कपास पट्टी में जन आधार वालीं अन्य यूनियनों ने भी अपनी हैसियत के मुताबिक ज़ोर लगाया है। एक अनुमान अनुसार एकत्रता में नौजवानों की गिनती 40 प्रतिशत से अधिक है।
इस वक्त हालत यह है कि गाँव-गाँव में इकाइयाँ बनाने के संदेश आ रहे हैं। नौजवानों के समूहों के समूह नेताओं कार्यकर्ताओं के पास पहुँच रहे हैं। गाँवों मे सभाएँ, रैलियाँ करवाने के आमंत्रण लगातार मिल रहे हैं। नए गाँवों मे से महिलाएँ स्वयं ही शामिल हो रही हैं। अब इन नए हिस्सों को संगठन में सम्मिलित करने का कार्य सामने खड़ा है। इन हिस्सों को यूनियन की नीति के साथ लैस करने तथा जुझार किसान चेतना देने का अगला महत्वपूर्ण कार्य बनता है। इन सब हिस्सों को दायरे में रखने के लिए किसान-मज़दूर नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को और अधिक श्शक्ति जुटानी पड़ेगी। यह तभी संभव है यदि उपयुक्त संगठनात्मक तौर तरीकों द्वारा लगातार नए नेता कायकर्ता पैदा किए जाएँ। नए नेताओं कार्यकर्ताओं की नई रचना को प्रफुल्लित करने की प्रत्यक्षदर्शी आवश्यक्ता को गंभीरता से संबोधित होने की जरूरत है। ऐसी पहुँच रखने पर ही किसान लहर के घेरे में आ रही नवीन जनता को संभाला जा सकता है, सँवारा जा सकता हैं तथा जुझार किसान लहर के काफिलों को और मज़बूत तथा विशाल किया जा सकता है।
नौजवान हिस्सों की प्रचंड लड़ाकू भावना तथा जोश को इन्कलाबी किसान चेतना का रंग चढाने की आवश्यक्ता है ताकि उन्हें किसान लहर का मज़बूत तथा जानदार अंग बनाया जा सके। नौजवान हिस्से किसान लहर में लड़ाकू ऊर्जा का संचार करने के पक्ष से विशेष महत्व रखते हैं तथा लीडरशिप की निरंतरता बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मौजूदा संघर्ष दौरान नौजवानों के ऐसे लक्षणों ने ही संघर्ष को उभारने में भूमिका निभाई है। इन साकारात्मक लक्षणों को क्रांतिकारी किसान चेतना तथा अनुशासन के सांचे में ढाल कर बड़ी प्राप्तियाँ संभव हैं। ऐसी स्थिति लीडरशिप तथा अनुभवी कार्यकर्ताओं से और शक्ति जुटाने की माँग करती है।

कपास तबाही के मुआवज़े से इन्कार के खिलाफ

खेत मज़दूरों में आक्रोश - अथर््िायाँ जलाईं

खेत मज़दूरों को कपास की तबाही का मुआवज़ा देने से सरकार के इन्कार के विरोध में पहली अक्तूबर को पंजाब के 7 खेत मज़दूर संगठनों ने विभन्न जि़लों के अनेकों गाँवों में पंजाब सरकार की अर्थियां जला कर सख्त ऐतराज़ प्रकट किया। अर्थियां जलाने का यह अभियान जारी है। बठिंडा किसान धरने में भी यह ज़ोरदार माँग उठाई जा रही है कि खेत मज़दूरों को प्रति परिवार 20,000 रु. मुआवज़ा दिया जाए। इस ऐक्शन द्वारा खेत मज़दूरों ने खुद को मुआवज़ा संघर्ष की अहम टुकड़ी बनने की तरफ कदम बढाया है। आज अर्थी फूँक प्रदर्शनों में विभिन्न मज़दूर संगठनों ने सरकार द्वारा फसल के नुक्सान को प्राकृतिक आपदा बताने तथा मुआवज़े की जारी की तुच्छ राशि से मज़दूरों को उपेक्षित करने की मुज़रिमाना कारवाई की ज़ोरदार शब्दों में निंदा की गई। उन्होंने ऐलान किए कि आगामी दिनों में अर्थी फूँक प्रदर्शन जारी रहेंगे और यदि सरकार ने किसानों मज़दूरों की माँगांे को नहीं माना तो संघर्ष को और भी आगे बढाया जाएगा। ऐक्शन में सात खेत मज़दूर संगठन शामिल हैं। इनके नाम हैंः पंजाब खेत मज़दूर यूनियन, क्रांतिकारी पंेडू मज़दूर यूनियन, देहाती मज़दूर सभा पंजाब, कुल हिंद खेत मज़दूर यूनियन पंजाब, मज़दूर मुक्ति मोर्चा पंजाब, खेत मज़दूर सभा पंजाब।

किसान मोर्चा के कुछ और पहलू

कठिनाइयाँ व हादसे

मुआवज़ा प्राप्ति के लिए चल रहे संघर्ष दौरान किसान-मज़दूर जनता को कई हादसों तथा कठिनाइयों से गुज़रना पड़ा है। जनता की दृढ़ता तथा इरादे की परख हुई है। परन्तु मामले की तीव्रता के समक्ष,जुझार इरादे तथा योग्य अगुवाई के सहारे ये सब कठिनाइयाँ पार की गईं हैंः
- पहले दिन 10 सितंबर को पंडाल में अचानक आ घुसे सांड ने लगभग 34-35 मर्द-औरतों को घायल कर दिया, सांड बुरी तरह लोगों को कुचलता हुआ पंडाल में से निकल गया, पर यह हादसा इस विशाल प्रदर्शन में विध्न नहीं डाल सका। कार्यकर्ताओं ने घायलों को संभाला, सरकारी सहायता नहीं मिली,किंतु धरने में लोग डटे रहे।
- उसी दिन प्रदर्शन में भाग लेने आ रही जनता का टैंकर पलट गया। घायल प्रदर्शनकारी अस्पताल ले जाने पड़े।
- फिर 19 सितंबर के प्रदर्शन दौरान एक और सांड द्वारा किसान-मज़दूर महिलाएँ जख्मी हो गईं।
- पहले दिन मंदर सिंह की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई तथा फिर चुग्घे कलां के नौजवान किसान कुलदीप सिंह ने आत्महत्या कर ली।
- एक रात प्रदर्शन के समीप ही सड़क पार कर रहे एक किसान कार्यकर्ता को ट्राले द्वारा टक्कर मार देने के कारण उसकी टांग टूट गई। सैदोके (मोगा) के इस किसान का आॅप्रेशन हुआ है।
- तीर्व धूप तथा वर्षा भी झेली है। नहाने-धोने, बाथरूम व पखाने की व्यवस्था न होने की समस्या का सामना भी किया है।
ऐसे हादसों तथा कठिनाइयों के बावजूद  किसान-मज़दूर जनता के जोश तथा लड़ने के इरादे और प्रचंड होते गए हैं।
किसान संघर्ष को व्यापक जन समर्थन-कुछ झलकें
- मंदिर में चढावा चढाने जा रहे पती-पत्नी को लगा कि मंदिर से ये मोर्चा अधिक पुण्य के योग्य स्थान है। दोनों ने राशन लंगर को दान कर दिया।
- मैडीकल प्रैक्टीशनजऱ्  ऐसोसीएशन द्वारा लगातार मैडीकल कैंप लगाया जा रहा है।
- शहर की विभिन्न संस्थाओं द्वारा सफाई तथा जल की व्यवस्था की पेशकश की गई।
- अलग-अलग अध्यापक संगठनों तथा अन्य कर्मचारी संगठनों के भिन्न-भिन्न जिलों से लगातार फंड की मदद।
- बस अड्डे में ड्राइवरों-कंडक्टरों ने 61,00 रु. फंड इकट्ठा कर के दिया।
- ग्रामीण सहकारी सभाओं के मुलाजि़मों के संगठन द्वारा लगातार केलों का लंगर चलाया जा रहा है तथा फंड की मदद भी की जा रही है। गाँवों में से लामबंदी करने में भी हाथ बटाया जा रहा है।
- गाँवों में यूनियन चुनावों के समय भारी एकत्रताएँ हुईं हैं।
- व्यक्तिगत तौर पर लोगों द्वारा निरंतर रूप में फंड पहुँचाया जा रहा है।
- जमहूरी अधिकार सभा की बठिंडा इकाई द्वारा प्रदर्शनकारियों के लिए पानी, शौचालय, सफाई आदि के प्रबंध की मांग को लेकर एक शिष्टमंडल डी.सी. बठिंडा को मिला। प्रदर्शन के समर्थन में एक हस्त पर्चा बाज़ार में बांटा गया जिसके दौरान दुकानदारों द्वारा प्रदर्शन के प्रति एकता को प्रकट करने की कई झलकें मिलीं।
भगत सिंह के जन्म दिन के मौके पर किसान महिला कार्यकर्ता बाज़ार में बसंती दुपट्टे लेने गईं तो वहां जमहूरी अधिकार सभा द्वारा बांटे गए हस्त पर्चे की चर्चा छिड़ी। नौजवान दुकानदार ने नम आँखों से बताया कि उसके पास हौज़री का स्टाक पड़ा है, जो कि बिक नहीं रहा। अब जब खरीदने वाले ही तबाह हो गए तो हम भी कैसे बचेंगे।उसने कहा कि वो ये हस्तपर्चा अधिक से अधिक दुकानदारों को पढ़ाएगा कि किसानों की माँगें हमारी माँगें हैं, उनका गुज़ारा हमारे करोबार के लिए ज़रूरी है।

नौजवान भारत सभा द्वारा समर्थन

नौजवान भारत सभा द्वारा मौजूदा किसान संघर्ष को पूरी दृढता के साथ समर्थन दिया गया है। सभा की संगत इलाका कमेटी ने इस मुद्दे पर प्रचार लामबंदी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिला बठिंडा का संगत ब्लाॅक फसल की बर्बादीे की बड़ी मार झेल रहा है, जबकि यहां किसान संगठनों का प्रभाव सीमित है तथा संगठित शक्ति कमज़ोर है। भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां) की कुछ इकाइयाँ हैं। ऐसी हालत में क्रांतिकारी विचारों वाले नौजवानों की टोली ने अपने प्रभाव तथा कार्यकर्ताओं के माध्यम से व्यापक प्रचार अभियान संगठित करके बड़ी गिनती में लामबंदी की हैं। पहले 10 सितंबर तथा फिर पक्के धरने, इन दोनों ऐक्शनों की तैयारी मंे नौजवान सभा के कार्यकर्ताआंे ने लगभग 60 गाँवों तक पहुँच की है। दो दिन दर्जनों गाँवों में मोटर साईकिल मार्च किये गए तथा भारी गिनती में रैलियाँ करवाई गईं तथा बाकी गाँवांे में नुक्कड़ सभाएँ तथा आह्वान मार्च किये गए। इन गाँवों में सैंकड़ों ने प्रदर्शन के दौरान भाग लिया।शहीद भगत सिंह के जन्म दिन को समर्पित किये जाने वाले मशाल मार्चों को मुआवज़ा संघर्ष के लिए लामबंदी का साधन बनाया गया है। लगभग 6 गाँवों में ऐसे मार्च निकाले गए हैं जिनमंे सैंकड़ों नौजवानों ने भाग लिया है। कुछ गाँवों में सभा की टीम द्वारा नुक्कड़ नाटकों द्वारा लोगों को धरने में शामिल होने के लिए प्रेरित किया गया है। आए दिन नए गाँवांे तक पहुँच की जा रही है। ब्लाॅक मौड़ में भी नौजवान भारत सभा के कार्यकर्ताओं ने लामबंदी में लगभग ऐसी ही भूमिका निभाई है। इसके अतिरिक्त दर्जर्नों युवा कार्यकर्ताआंे ने सोशल मीडिया पर इस संघर्ष के पत्रकारों के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई तथा काफी मेहनत जुटा कर इसका प्रचार प्रसार किया है।

संसदीय पार्टियां तथा किसान संघर्ष

कपास की बर्बादी के मुद्दे पर किसान मोर्चा के और तीव्र रूप धारण करने के बाद राजनीतिक लाभ लेना चाहती संसदीय पार्टियों के पल्ले ज़्यादा कुछ नहीं पड़ रहा है। लोगों मंे फैले व्यापक आक्रोश व साहस के पैंतड़े से आगे बढ़ाए जा रहे संघर्ष का नतीजा है कि इस हालत का सियासी लाभ प्राप्त करने की औपचारिक कार्यवाइयों का असर बहुत कम दिखाई दिया है। विशाल जनतक लामबंदी वाले किसान धरने ने असली व नकली के अंतर को पूरी तरह से उभार दिया है। अकाली दल तथा भाजपा के साथ कांग्रेस पार्टी भी लाचार दिखाई दे रही है तथा इसकी भरपाई के लिए इसके कुछ लीडर हाथ पैर मार रहे हंै। 30 सितंबर को बठिंडा मंे कांग्रेसी लीडर रवनीत बिट्टू के नेतृत्व में किया गया मार्च इसी कोशिश में से निकला है। कुछ दिन पहले घुद्दा गाँव में कांग्रेसियों की जाट-महासभा द्वारा एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। पर उस सम्मेलन में इलाके के किसान नहीं पहुँचे। जाखड़ जैसे नेता अपने ही सफैदपोश कार्यकर्ताओं की गाडि़यां लाए थे। परन्तु गाँव के पक्के कांग्रेसी परिवार भी बठिंडा धरने वाली ट्रालियों पर सवार हो गए थे। इस प्रकार कांगे्रसी नेता घुद्दा में एक फीकी सी कारवाई को ही अंजाम दे सके।
2017 के चुनाव की तैयारी में जुटी आम आदमी पार्टी ने भी पहले इस मसले पर किसी औपचारिक रैली की ज़रूरत नहीं समझी। परन्तु मोर्चे के उभार ने उसे भी सोचने के लिए मज़बूर किया। भगवंत मान मोर्चे के मंच पर आ कर फोटो खिंचवाना चाहता था। परन्तु संगठनांे के नेताआंे ने उसे ऐसा करने की स्वीकृति नहीं दी। इसलिए वह धरने के नज़दीक नहीं आया। पटियाला से सांसद धर्मवीर गांधी एक दिन धरना समाप्ति के मौके पर आ गया तथा किसान नेताआंे व कार्यकर्ताओं के सवालों का सामना न कर पाया और झटपट चला गया।
सब से बुरी युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रधान राजा वडि़ंग के साथ हुई। वह नेताओं से बिना पूछे एकत्रता के बिल्कुल सामने आ कर बैठ गया। इस पर नेताओं ने उसे एकत्रता के पीछे जा के बैठने को कहा। जब वह न माना तो वलंटियरों ने उसे उठने के लिए मज़बूर कर दिया तथा वह भी एकत्रता में पीछे जाकर बैठने की बजाय वहां से चला गया। वहां मौजूद जनसमूह ने चिट्टे बगले नीले मोर वोटां वाले सारे चोरजैसे नारे जोरदार आवाज़ में लगा दिए।
इस प्रकार धरने की अगुवाई करने वाले संगठनों ने संसदीय पार्टियों के प्रति उचित पहुँच इख्तियार की है। धरने की स्टेज पर अथवा एकत्रता के सामने आ कर बैठने का मौका देने का अर्थ उन्हें संघर्ष का सियासी लाभ प्राप्त करने का अवसर देना है तथा धरने की स्टेज को पार्टियों का जमघट बना कर संघर्ष को पटरी से उतारने के हालात पैदा करना है। इसकी बजाय आम आदमी की तरह धरने के पीछे जा कर बैठने की अनुमति देना उन परतों के स्तर का ध्यान रखना है जो अभी संसदीय पार्टियों की भूमिका के बारे में किसी तरह के भ्रम या गलतफहमियों के शिकार हैं।
पार्टियों द्वारा की जा रहीं औपचारिक कारवाईयां या बयानबाजि़यां इस संघर्ष के दौरान लोगों के संघर्ष इरादों पर कोई छाप छोड़ने लायक नहीं हैं। इसीलिए ऐसी सब कारवाईयां लोगों के लिए गैर प्रासंगिक हैं। यह शासक वर्गीय प्रैस हिस्सों के लिए बड़ी सुुर्खियां मात्र हैं।