Friday, November 6, 2015

6. e) रेल रोको संघर्ष अथवा किसान


रेल रोको संघर्ष ने किसानों को


हमेशा सफलता की पटरी पर चढाया

-पंजाबी ट्रिब्यून-13 अक्तूबर,

जोगिंद्र सिंह मानः

चाहे सात दिनों के बाद रेल पटरियों से किसानों के धरने बिना किसी प्राप्ति के उठा लिए गए हैं परन्तु इससे पहले मालवा पट्टी में जब भी किसान संगठनों ने राज सत्ता के विरूद्ध रेलवे पटरियों पर संघर्ष प्रारंभ किया है तब ही सरकार को इन संगठनों के समक्ष झुकना पड़ा है।
किसान संगठनों ने पंजाब रेल रोको आंदोलन सबसे पहले मालवा पट्टी में 25 जनवरी 2000 को बठिंडा जि़़ले में जेठूके गाँव से शुरू किया था, जब प्रकाश सिंह बादल सरकार के कार्यकाल के दौरान प्राईवेट मिनी बसों द्वारा किलोमीटर के हिसाब से अधिक किराया वसूल किया जाता था। पंजाब सरकार ने जब किसानों की बात को अनसुनी कर दिया तो उन्होंने रेलें रोक दीं। इसके विरोध में पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया तथा बाद में गोली चलाई। उस समय दो खेत मज़दूर गुरमीत सिंह व देसपाल मारे गए। इसके पश्चात् संघर्ष तेज़ होने से सरकार ने किसानी माँगों को स्वीकृति दे दी तथा दो व्यक्तियों की मृत्यु होने पर माफी माँग ली।
इसके पश्चात केंद्र सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा धान का मुल्य पिछले वर्ष की तुलना में 30 रु. घटाने के विरोध में जब पंजाब सरकार तथा मुख्य मंत्री प्रकाश सिंह बादल ने किसानों की बात नहीं सुनी तो उस वक्त 5 किसान संगठनों ने तीन दिनों के लिए पंजाब भर में 29 सितंबर, 2000 को रेलें जाम कर दी थीं। इस से घबराकर केंद्र सरकार को धान का समर्थन मुल्य 30 रु. बढा कर पूरा करना पड़ा था।
2003 को कैप्टन अमरिंदर की सरकार ने खेती मोटरों के बिल शुरू किए। विरोध में किसान संगठनों ने 29 मार्च को मानांवाला गाँव में 24 घंटों के लिए रेलें रोक दीं। उस समय उग्राहां तथा कमलप्रीत पन्नू के नेतृत्व वाले संगठनों की पुलिस से झड़प हो गई। इस दौरान पुलिस द्वारा गोली चलाई गई जिसके परिणामस्वरूप बाकीपुर गाँव का 23 वर्षीय अंगरेज सिंह मारा गया। उसकी मृत्यु के बाद सरकार घबरा गई तथा मुख्य  मंत्री द्वारा लगाए गए खेती मोटरों पर बिल वापिस ले लिए गए।
इसी साल 28 सितंबर 2003 को बठिंडा जि़ले में भाई बखतौर में रेलें रोकी गईं। उस समय  भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहां ) के नेताओं के साथ पंजाब पुलिस की  धरना स्थल पर ही टक्कर हो गई, जिसमें गाँव मौड़ चढ़त सिंह वाला के किसान गुरदेव सिंह की मौत हो गई। इस जगह पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज दौरान किसान नेता सुखदेव सिंह कोकरी कलां की टाँग तोड़ दी गई थी तथा किसान नेता राम सिंह भैणीबाघा समेत दर्जनों किसानों को थाने ले जाकर भारी मारपीट की गई। किसानों ने रेलवे लाईनों पर यह धरना धान का कम मुल्य देने के कारण तीन घंटांे के लिए लगाया था।
साल 2007 में प्रकाश सिंह बादल की सरकार ने जब खेती मोटरों के बिल माफ न किए तो किसानों ने 13 अक्तूबर 2010 को रेल रोको आंदोलन आरंभ कर दिया। रेलवे लाईनों पर यह धरने लगातार 5 दिनों तक चले तथा बाद में सरकार से हुई बातचीत के दौरान सरकार द्वारा किसानों के लिए सहकारी कर्जों के संबंध में यक्मुश्त कजऱ्ा योजना शुरू कर दी तथा मज़दूरों के घरेलू बिजली बिलों में भारी रियायत दे दी गई। इसके बाद 28 अप्रैल 2015 को किसान यूनियन उग्राहां तथा किसान संघर्ष कमेटी ने मानसा, बरनाला तथा अमृतसर में 36 घंटों तक रेलें रोक कर गेहूँ की खरीद में केंद्र सरकार द्वारा फसल के रेट में की गई कटौती का विरोध किया। जिसके बाद सरकार ने पंजाब के किसानांे को देश के अन्य किसानों के बराबर मुल्य दे दिया।
किसानों द्वारा वर्तमान धरने कपास समेत खरीफ़ की अन्य फसलों का मुआवज़ा लेने के लिए राज्य में 13 विभिन्न स्थलों पर दिए गए हैं जो आज सात दिनों बाद उठा लिए गए हैं। चाहे यह धरने आज तक के सबसे  बड़े तथा लंबे चलने वाले बन गए हैं परन्तु इसके परिणाम सीधे किसानों की जीत के रूप में अभी तक सामने नहीं आए हैं।

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