जनता को बाँटने के शासक वर्गीय षड्यंत्र के बावजूद
पंजाब में किसान खेत-मज़दूर संघर्ष का लहराता परचम
-संवाददाता
फसल बर्बादी के मुआवज़े के हक़ तथा
बासमती खरीद जैसे मुद्दों को लेकर किसान मज़दूर जनता संघर्ष के मैदान में डटी हुई
है। लगभग दो महीनों से शुरू हुआ आंदोलन पंजाब की जुझार किसान लहर की मज़बूत व
लड़ाकू रिवायतें स्थापित कर रहा है। 12 अक्तूबर को बादल हुकूमत के साथ हुई
बातचीत के दौरान कुछ छोटी माँगों को छोड़ कर अहम व तात्कालिक मुद्दों का कोई भी
निपटारा नहीं हुआ था। किसान संगठनों ने पिछले 6 दिनों से चल रहे रेल रोको ऐक्शन की जगह संघर्ष का रूप बदलते हुए अकाली
मंत्रियों तथा विधायकों के आवासांे का 23 अक्तूबर को घिराव करने का आह्वान किया तथा गाँवों में प्रवेश पर भी ऐसे घिराव
तथा विरोध प्रदर्शनों की चेतावनी दी। रेल रोको के आखिरी दिन रेलवे लाईनों पर जमी
हुई किसान एकत्रताओं में विचार चर्चाओं के बाद संघर्ष का रूप बदलने का कदम उठाया
गया। इस दिन तक विभिन्न जगहों पर 25,000 किसान रेल
मार्गों पर जमे हुए थे। इससे किसान जनता के आक्रोष तथा लामबंदी की संगठित कोशिशों
का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह ऐलान अभी हुआ ही था कि किसान
मज़दूर संघर्ष के समक्ष बड़ी चुनौती आन पड़ी। 12 अक्तूबर को बरगाड़ी गाँव (फरीदकोट) में गुरू ग्रंथ साहिब का अपमान होने के समाचारों द्वारा सांप्रदायिक ताकतों
तथा शासक वर्गीय हिस्सों ने सांप्रदायिक माहौल बनाना शुरू कर दिया। लोगों की
भावनाओं से खेल कर पंजाब को सांप्रदायिकता की आग में झोंक देने की कोशिशें उभर आईं
तथा पिछले महीनों के दौरान उभर रहे जनतक मुद्दों खास कर किसान मज़दूर मुद्दों को
हाशिए पर धकेलने के काले मनसूबे प्रकट हए। भाईचारे की सांझ पर खतरा मंडराने लगा
तथा लोगों का ध्यान भटकाने का खतरा उत्पन्न हो गया। ऐसे माहौल के दौरान जुझारू
किसान संगठन बी.के.यू. एकता (उग्राहां) ने स्थिति की गंभीरता पर तुरंत सक्रियता
दिखाते हुए ज़ोरदार हस्तक्षेप किया। संघर्ष एकता, भाईचारे की सांझ तथा समुदायक सद्भावना कायम रखने तथा शासकों की लोगों को
बाँटने की चालों को समझकर पछाड़ने का आह्वान करता बयान जारी हुआ। एक इश्तिहार 25,000 की गिनती में पंजाब के गाँवांे मंे दीवारों पर प्रदर्शित किया गया। बीते डेढ़
महीने के थका देने वाले धरनों की निरंतर व्यस्तता की परवाह ना करते हुए किसान
काफिले सड़कों पर कूद पड़े। सांप्रदायिकता द्वारा वातावरण प्रदूशित करने की
कोशिशों के दौरान सांप्रदायिक अमन तथा वर्गीय एकता कायम रखने के आह्वान बुलंद हुए।
जगह-जगह पर सद्भावना मार्च निकाले गए।
बठिंडा जि़ले में नौजवान भारत सभा तथा बी.के.यू. उग्राहां द्वारा 5 ब्लाक केंद्रों पर सद्भावना मार्च
किए गए। बाद में विभिन्न गाँवों में भी यह सिलसिला जारी रहा। बरनाला, निहाल सिंह वाला (मोगा), मानसा, रामपुरा, लंबी (मुक्तसर), सुनाम (संगरूर) आदि लगभग 40-50 स्थानों पर ऐसे
मार्चों द्वारा शासक वर्गीय काले मनसूबे उजागर किए गए। बी.के.यू. एकता ( उग्राहां ) ने इस साहसी पैंतड़े पर मैदान में कूद कर ऐसी ही भावना रखने वाले अन्य सामाजिक
हिस्सों के लिए ऐसी सरगर्मी कर पाना आसान बना दिया। भाईचारे की सांझ को खंडित करने
के प्रयत्नों के दौरान एकता तथा शांति कायम रखने का आह्वान ही पंजाब में प्रभावी
रूप में सुनाई दिया। ऐसी सरगर्मी ने संपूर्ण माहौल पर अपनी छाप छोड़ी।
संघर्ष के मार्ग पर डटे रहने के इस
संदेश को किसान जनता का पुुरज़ोर समर्थन मिला। 24 अक्तूबर के समाचार पत्रों में एक बार फिर किसान मुद्दों पर संघर्ष की चर्चा ने
सुखर््िायों में स्थान ग्रहण किया। इस व्यापक ऐक्शन को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल
था। शासक वर्गीय तथा सांप्रदायिक ताकतों के सांप्रदायिक खेल के दौरान ही 23 अक्तूबर को अलग-अलग स्थानों से हज़ारों किसानों ने
मंत्रियों तथा संसदीय सचिवों के घरों की तरफ कूच किया। समाचार-पत्र पंजाबी ट्रिब्यून ने अपने मुख्य पन्ने के शिखर पर प्रकाशित खबर में
बतायाः ‘‘ पंजाब की 8 किसान तथा 4 मज़दूर संगठनों की तरफ से मुख्य
मंत्री, मंत्रियों, मुख्य संसदीय सचिवों तथा विधायकों के घरों के घिराव करने की योजना को पुलिस ने
नाकाम करने की कोशिश की परन्तु किसान दर्जन से ज़्यादा मंत्रियों तथा मुख्य संसदीय
सचिवों के घरांे या घरों को जाते सड़क मार्गों को घेरने में कामयाब रहे। किसानों
मज़दूरों को रोका गया। उन्होंने वहीं पर सड़क मार्गों पर धरने लगा दिए‘‘। यह ऐक्शन इसे नाकाम बनाने के लिए पुलिस गिरफ्तारियां तथा रूकावटों के बड़े
सिलसिले के बावजूद हुआ। किसान मज़दूर जनता के बढ़ते रोष को प्रकट करता यह ऐक्शन
काम के सीज़न में होने की वजह से विशेष महत्व रखता है। इसका महत्व और भी बढ़ जाता
है क्योंकि इसने शासकों द्वारा लोगों के असल मुद्दों को धूल में मिलाने के
षड्यंत्रों को नाकाम करके किसानों मज़दूरों के असली मुद्दों की गूँज ऊँची की है।
सांप्रदायिक सोच को निरुत्साहित करने व मेहनतकश लोगों की वर्गीय एकता को बचाने तथा
संघर्ष को आगे ले जाने के पक्ष से भी इस ऐक्शन के दौरान हुई लामबंदी का महत्व और
भी बढ़ जाता है।
मुख्य मंत्री के बादल गाँव के आवास
का घिराव होने से बचाने के लिए 21 पुलिस नाके लगाए गए जिनमें
सैंकड़ों पुलिस कर्मी तैनात किए गए। सुबह
से ही किसान-मज़दूर नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को
छापेमारी द्वारा गिरफ्तार किया गया। परन्तु फिर भी 3 विभिन्न दिशाओं से काफिले बादल गाँव की तरफ चल पड़े तथा रास्ते में रोके जाने
पर सड़क यातायात जाम करके वहीं धरने पर बैठ गए। स्थिति को बयान करते हुए एक समाचार
पत्र ने लिखाः
‘‘किसान मज़दूर कारकुन बादल गाँव की
तरफ उमड़े.... कल शाम से लेकर
आज पूरे दिन पुलिस तथा जासूसी तंत्र के पसीने छूटते रहे। पूरी रात किसान मज़दूर
कारकुनों की गिरफ्तारी के लिए छापामारी के ज़ोरदार सिलसिले के बाद आज सुबह से ही
लंबी कस्बा ऐसे नज़र आ रहा था मानो यह ख़ाकी वर्दी पहने पुलिस लश्करों के पहरे
दरमयान एक किला हो। लंबी में दाखिल होने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पुलिस तलाशी ले
रही थी। इसके बावजूद किसान-मज़दूर मुख्य मंत्री के गाँव बादल
की उत्तर दिशा में दोपहर एक बजे के करीब संगठित हो गए। जब यह बादल गाँव की तरफ कूच
करने लगे तो भारी सुरक्षा बलों ने इन आंदोलनकारियों को लंबी गिदड़बाहा मार्ग पर
घेर कर रोक लिया। दूसरी तरफ मंडी डबवाली की तरफ से किसान-मज़दूरों को मिट्ठड़ी-सिंहेवाला मार्ग पर रोक लिया।
क्रोध में आए भूमि पुत्र सड़क मार्ग पर धरना लगा कर बैठ गए और तीखी धूप में सरकार
के खिलाफ नारे लगाने लगे। संघर्षकारियों में औरतों की भारी संख्या थी‘‘।
विभिन्न स्थानों के संवाददाताओं की
तरफ से ऐसी कितनी ही रिपोर्टें समाचार पत्रों में प्रकाशित हुईं। पंजाबी ट्रिब्यून
तथा अन्य समाचार-पत्रों के मुख्य पृष्ठों की र्शीष
सुखर््िायों में बताया गया कि मोगा में कृषि मंत्री तोता सिंह, संगरूर में परमिंदर सिंह ढींडसा, पटियाला में सुरजीत सिंह रखड़ा, अमृतसर मंे बिक्रम सिंह मजीठिया, तरनतारन में आदेशप्रताप सिंह कैरों, जालंधर में अजीत सिंह कुहाड़, मानसा में चतिंन सिंह समाओं तथा
प्रेम मित्तल के घरों पर किसान एवं मज़दूर
प्रदर्शनकारियों के आक्रोश की गूँज सुनाई दी। मुक्तसर जि़ले में मुख्य मंत्री
प्रकाश सिंह बादल के गाँव की तरफ जा रहे किसान काफिले को सिद्धेवाल गाँव में पुलिस
ने रोका तो वहीं पर सड़क मार्ग जाम हो गया। इसी तरह बठिंडा-बादल सड़क मार्ग नंदगढ़ में जाम हो गया। बठिंडा-भगता सड़क मार्ग मंत्री सिकंदर सिंह मलूका के घर की तरफ बढ़ रहे किसानों ने
पुलिस के रोके जाने पर कोठा गुरू में सड़क जाम किया। गुरदासपुर में बब्बेहाली के
घर की तरफ जा रहे काफिले ने सड़क मार्ग जाम किया। होशियारपुर जि़ले के टांडा कस्बे
में रविंद्र रसूलपूर के घर के सामने सड़क मार्ग जाम हुआ। पठानकोट में दिनेश सिंह
बब्बू के बंगले के सामने प्रदर्शनकारियों को रोके जाने पर सड़क मार्ग का घिराव
किया गया।
पंजाब भर में 900 मज़दूर किसान गिरफ्तार किए गए। इसकी प्रतिक्रिया में घिराव का समय बढ़ा दिया
गया। आंदोलनकारी जगह-जगह जमे रहे। घिराव अनिश्चित काल
के लिए जारी रखने की चेतावनी के बाद गिरफ्तार किसानों मज़दूरों को छोड़ दिया गया।
इस तनातनी की वजह से घिराव पहले ऐलान के मुताबिक दोपहर 3 बजे समाप्त होने की बजाय शाम तक जारी रहे।
26 अक्तूबर को किसान मज़दूर संगठनों
की मीटिंग में निर्णय किया गया कि अकाली विधायकों तथा मंत्रियों के गाँव में
प्रवेश करने पर विरोध प्रदर्शन किए जाऐंगे तथा जन लामबंदी जारी रखी जाएगी। बासमती
की खरीद तथा मुल्य गिरावट राहत की विशेष माँग को लेकर मोगा व अमृतसर में डी.सी. दफ्तरों के आगे 4 से 6 नवंबर तक तीन दिवसीय धरने दिए
जाऐंगे। इस प्रकार बादल हुकूमत के खिलाफ प्रचंड हो रहा किसान मज़दूर आक्रोष अपना
दबाव बनाना जारी रखेगा। पंजाब में लोगों को बाँटने तथा भटकाने की शासक वर्गीय
सियासत के प्रतिरोध में किसानों खेत-मज़दूरों के संघर्ष ने महत्वपूर्ण
अंश के तौर पर स्थान ग्रहण कर लिया है। ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह
बादल किसान संघर्ष के तीव्र क्षेत्र बठिंडा में पहले से तयशुदा कार्यक्रम के
अनुसार शिरोमणि अकाली दल के पूर्व प्रमुख की पुण्यतिथि समारोह में भाग लेने की
हिम्मत नहीं कर सके।
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