किसान आक्रोश का सेंक व संकेत
13 अक्तूबर, 2015
जैसे कि उम्मीद थी किसानों खेत
मज़दूरों तथा सरकार के दरमयान बातचीत विफल रही। मुआवज़े के संबंध में मात्र एक नई
बात कपास से संबंिधत किसानों के लिए ऐलान की गई मुआवज़ा राशि के 10 प्रतिशत के बराबर रकम खेत मज़दूरों के लिए राहत फंड के तौर पर जारी करने का
सरकारी ऐलान है। यह किसानों व खेत मज़दूरों के सांझे दबाव का परिणाम है। बातचीत के
दौरान यह मुद्दा विशेष रूप में उभरकर चर्चा में आया। यह बात किसानों व खेत
मज़दूरों के आपसी संबंधों की सांझ तथा भरोसे की भावना को बढाने की दृष्टि से अहम
भूमिका निभाएगी।
लेकिन कपास के मुआवज़े में कोई
बढौतरी नहीं की गई। बासमती के संबंध में भी किसी राहत का ऐलान नहीं हुआ। सरकार का
जवाब बड़ा साफ है। इसमें भविष्य का संकेत भी है कि मज़दूरों किसानों के लिए
सरकारों के खजाने खाली ही रहेंगे। किसानों खेत मज़दूरों ने संघर्ष वापसी की सरकारी
अपील जायज़ तौर पर ठुकरा दिया है और लंबे रेल जाम की उलझनों को देखते हुए वे एक
बार तत्काल संघर्ष का रूप बदल रहे हैं। दोनों सत्तारूढ पार्टियाँ संघर्ष की इस
तात्कालिक व तीखी धार के निशाने पर हैं। आगामी दिनों में संघर्ष के दांव पेच व ठोस
रूप कुछ भी हों, परन्तु शासक आक्रोश से भरी जनता के
राजनीतिक हल्लेे व जुझारू ऐक्शनों के सुमेल के आगामी दौर से मुक्त नहीं है।
मौजूदा हालात के मद्देनज़र संघर्ष, खास कर रेल जाम के बेमिसाल ऐक्शन की राजनीतिक प्राप्ति बहुत अहम है। भूमि
पुत्रोें की हालत देश में गंभीर चर्चा का विषय बनी हुई है। किसान आक्रोश की स्पष्ट
गूँज देश विदेश में सुनाई पड़ी है। किसानों खेत मज़दूरों की मंदी हालत तथा
आत्महत्याओं के राजनीतिक मुजरिमों के तौर पर शासक बेनकाब हुए हैं। पत्थर दिल जन-दुश्मन रवैया प्रदर्शित हुआ है। मुनाफाखोर कीटनाशक साम्राज्यवादी कंपनियों के
साथ शासकों के संबंध का चाकर चरित्र खुल कर सामने आया है। इसे ढ़कने के लिए
खेतीबाड़ी विभाग के निर्देशक तथा उसके जोड़ीदारों को गिरफ्तार करने तक जाना पड़ा
है।सत्तारूढ पार्टी के महत्वपूर्ण नेताओं तथा नकली किसान लीडरों ने इस संघर्ष को
सामाजिक शांति भंग करने व हिंसा भड़काने वाला कहा है। परन्तु वे जनमत को प्रभावित
करने में नाकाम रहे। साथ में इन लीडरों को पर्याप्त फिटकारें भी पड़ीं। इस संघर्ष
ने प्रांत में संकीर्ण शासक वर्गीय सियासत के डेरा सच्चा सौदा जैसे मुद्दों को एक
बार तो दरकिनार कर दिया है।
सबसे अहम बात यह है कि अब तक के
संघर्ष के अनुभव ने यह बात अच्छी तरह से उभार दी है कि किसान जनता का पाला कैसे
दुश्मन से पड़ा है तथा अधिकारों की लड़ाई कैसी ताकत, तैयारी एवं इरादे की मांग करती है। रेल रोको ऐक्शन दौरान राज सत्ता किसानों पर
खूनी हिंसक हमला बोलने की तैयारी करती नज़र आई है। राजनीतिक नेताओं, नकली किसान लीडरों तथा रेलवे के उच्च अधिकारियों के बयानों द्वारा ऐसे हमले का
माहौल बनाने की कोशिश की गई। भारी पुलिस लश्करों को तैयार बर तैयार रखा गया। यह
बात अलग है कि कितने ही दिन जन-आक्रोश का वेग शासकों के काले एवं
खूनी इरादे के लिए रूकावट बना रहा। उन्हें बातचीत का ढोंग रचना पड़ा। परन्तु आखिर
में यह ढोंग जन-दुश्मन नीयत तथा नीति का इश्तिहार
हो गुज़रा है। दूसरी तरफ लामबंदी के घेरे में हो रही वृद्धि ने बहुत सारे नए जुझार
कार्यकर्ताओं के आगमन ने, शासकीय रवैये तथा चरित्र के अनुभव ने, जमा हुए आक्रोष तथा तेज़ हुई समझ ने किसान लीडरशिप के लिए ऐसी सामग्री
उपलब्द्ध करवा दी है जिसके बल पर बेहतर ज़ोर आज़माइश के अगले दौर में जाया जा सकता
है। किसान शक्ति एक बार रेलवे लाइनों से उठकर अगले फिटकार व ललकार हल्ले के लिए
गाँवों की तरफ रूख़ कर रही है। संघर्ष के अगले बड़े ऐक्शन की दस्तक 23 अक्तूबर को सत्तारूढ पार्टियांे के मंत्रियों तथा विधायकों के बंगलों पर होगी।
हालत का संकेत यही है कि शासको के लिए किसान आक्रोश का सियासी सेंक बढ़ता जाएगा।
इस प्रक्रिया में संगठित किसान शक्ति में और अधिक निखार आने की संभावनाएँ मौजूद
हंै।
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