Saturday, April 11, 2026

भारतीय मंडी पर अमेरिकी साम्राज्यवादी कब्जे का फ़रमान

 भारतअमेरिका व्यापार समझौता

भारतीय मंडी पर अमेरिकी साम्राज्यवादी कब्जे का फ़रमान

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       शीरीन



गत वर्ष जनवरी महीने में जब ट्रंप ने दोबारा राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी, तो मोदी सबसे पहले उसे बधाई देने जा पहुँचा था। अपने इसप्यारे मित्रके लिए वह देश में स्थापित किये जाने वाले परमाणु संयंत्रों में अमेरिकी कंपनियों को जवाबदेही से पूर्ण छूट देने जैसे कुछ नजराने भी साथ लेकर गया था। लेकिन उसके बाद के समय में इसप्यारे मित्रने यह दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी किमेरे खास मित्र’, ‘मेरे दोस्त मोदीजैसे खिताबों के लिफाफे के नीचे दरअसल उनका रिश्ता मालिक और सेवक जैसा है और उसे मोदी द्वारा देश में लोगों के सामने मारे गए दमगजों, उसकी ‘56 इंच की छाती’, एकप्रभुत्व-सम्पन्नदेश केशक्तिशालीनेता के रूप में पेश होने की ज़रूरतों और उसकी वोटगिनतियों की रत्ती भर परवाह नहीं है। 

बीते कुछ महीनों का समय विशेष तौर पर भारत कीस्वायत्तताकी वास्तविक हालत दिखाने वाला दौर रहा है। इन महीनों के दौरान ट्रंप की तरफ से भारतपाक पर दवाब डाल कर करवाई गई युद्धबंदी के 100 से अधिक बार किए गए दावे, भारत पर थोपी गई 50 प्रतिशत टैरिफ पाबंदियाँ, रूस से तेल की खरीद बंद करने के आदेश, वेनेज़ुएला - जिससे पहले तेल लेने से भारत को रोका गया था, अब वहीं से तेल लेने के जारी किए गए निर्देश, ईरान के साथ अरबों रुपये के निवेश वाले संयुक्त चाबहार प्रोजेक्ट पर अमेरिका के निर्देशों के तहत कार्रवाई रोकने की प्रक्रिया और अमेरिका के साथ उसके दबाव में चलाई गई व्यापार वार्ता इत्यादि बहुत कुछ ऐसा था, जिसने भारतीय हुक्मरानों को बारबार अपमान के कड़वे घूँट पीने के लिए मजबूर किया। इस पूरे घटनाक्रम ने जनता की आँखों से ओझल, बंद कमरा बैठकों के ज़रिए साम्राज्य के सामने नाचने की भारतीय हुकूमत की योजनाओं को नाकाम करके यह नाच खुले मंच पर ला दिया है।

इस संदर्भ में भारतअमेरिका व्यापार वार्ता, जो अब अपने अंतिम चरण में है और जिसके बारे में एक संयुक्त बयान जारी किया जा चुका है, जनहित और राष्ट्रीय मानसम्मान का पूरी तरह त्याग करके की जा रही साम्राज्यवादी चाकरी की सबसे प्रत्यक्ष मिसाल बनकर सामने आई है। भारतीय उपभोक्ताओं, किसानों, उद्योगपतियों और व्यापारियों पर इस समझौते के पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा से पहले, अब अंतिम रूप ले रही इस व्यापार वार्ता की कुछ नुमायान विशेषताओं पर चर्चा ज़रूरी है।

इस व्यापार समझौते से संबंधित चली पूरी बातचीत का एक खास लक्षण यह है कि इसे भारतीय जनता से पूरी तरह गुप्त रख कर चलाने की कोशिश की गई। अंतरिम समझौते की रूपरेखा के संबंध में व्हाइट हाउस की ओर से संयुक्त बयान जारी करने से पहले किसी भी तरह का आधिकारिक बयान जारी करने से बचा गया है। यह तथ्य अपनेआप में ही इसके जनविरोधी चरित्र को बेनकाब करता है। महीनों तक भारतीय जनता और प्रेस को जो भी थोड़ीबहुत जानकारी मिली, वह अमेरिकी प्रतिनिधियों के बयानों के आधार पर ही मिलती रही है। अभी तक भी स्थिति यह है कि इस समझौते का पूरा विवरण सामने नहीं आया है और सिर्फ कुछ-एक क्षेत्रों के बारे में ही निश्चित तौर पर कुछ कहा जा सकता है। इसमें दर्ज कई धाराएँ स्पष्ट नहीं हैं और कई शब्दों के ज़रिए बातों को छिपाए रखने की गुंजाइश छोड़ी गई है। भले ही यह उपलब्ध जानकारी अभी आंशिक ही है, लेकिन यह भी जनता पर पड़ने वाली गंभीर मार को दिखाने के लिए पर्याप्त है। समझौते का पूरा विवरण सामने आने पर और भी बहुतसी बातें सामने आएँगी।

इस व्यापार वार्ता की एक विशेषता यह है कि यह भारतीय जनता के प्रतिनिधियों और अमेरिकी जनता के प्रतिनिधियों के बीच चली व्यापार वार्ता नहीं है। यह एक साम्राज्यवादी सरगने और एक दलाल पूंजी का प्रतिनिधित्व करने वाली हुक्मरान टोली के बीच चली बातचीत है। भारतीय हुकूमत की ओर से इस बातचीत का वास्तविक अभिप्राय सिर्फ इतनी गुंजाइश टटोलने में है कि अपने लोगों के हितों से की गई गद्दारी के बदले साम्राज्य यहाँ के दलाल पूँजीपतियों को अपनी मंडियों में कारोबार करने की कितनी रियायत देता है।

इस बातचीत की एक और विशेषता यह है कि इसे अमेरिका द्वारा खुल्लम-खुल्ला दबाव के बल पर करवाया गया है। इसी वजह से इस समझौता वार्ता के दोनों मुल्कों के लोगों की ज़रूरतों को संबोधित होने या साझा जनहितों के आधार पर चलने का तो चौखटा ही गायब है। असल में तो इसके लिएवार्ताशब्द भी ठीक नहीं बैठता। यह अमेरिकी आदेशों की एक श्रृंखला है जिन्हें भारतीय हुकूमत ने चुपचाप माना है। यह ऐसी वार्ता है जिसमें भारत की भूमिका तो बस भारतीय बड़ी पूँजी के लिए कुछ रियायतें हासिल करने के लिए गिड़गिड़ाने और अपनी राजनीतिक ज़रूरतों के चलते कुछ क्षेत्रों को फिलहाल छोड़ देने की मिन्नतें करने तक ही सीमित रही, जिन्हें काफी हद तक अनसुना कर दिया गया।

इस व्यापार वार्ता की एक विशेषता यह भी है कि यह बहुत ही प्रत्यक्ष रूप में असमान है। इसमें भारत की ओर से तो अधिकांश मामलों में पूरी तरह टैरिफ और नॉनटैरिफ पाबंदियाँ हटाई जानी हैं, जबकि अमेरिका की ओर से अभी भी ज़्यादातर भारतीय निर्यातों पर 18 प्रतिशत टैक्स लगाया जाएगा। उल्लेखनीय है कि ट्रंप द्वारा टैरिफ युद्ध शुरू करने से पहले भारतीय निर्यातों पर औसत टैरिफ 2.5 प्रतिशत के आसपास चला रहा था। लेकिन इन टैरिफों को पहले के स्तर पर लाना भी इस वार्ता का मुद्दा नहीं बनाया गया।

इस व्यापार वार्ता की यह भी विशेषता है कि जिन टैरिफों को आधार बनाकर मोदी सरकार ने ये शर्तें मानने की शीघ्रता दिखाई, उनकी वैधता को तो अमेरिका के भीतर से भी चुनौती मिल रही है। सिर्फ आम लोग ही नहीं, वहाँ की अदालतों ने भी इसका विरोध किया है और एक बार तो ट्रंप के मनमाने टैरिफ थोपने पर अंकुश लगाए हैं, और अब वह इन्हें लागू करने के वैकल्पिक तरीके खोज रहा है। लेकिन मोदी सरकार इसके बावजूद इस समझौते को मक़ाम तक पहुँचाने के लिए उतावली है। अमेरिकी अदालतों द्वारा ट्रंप के टैरिफों के फैसले को रद्द कर दिए जाने के बाद इस समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिका जा रहा भारतीय प्रतिनिधिमंडल बिलकुल मौके पर ही रुक गया। उनके बयान के मुताबिक़ यह अमेरिका की सहमति से ही किया गया है।

इन सभी विशेषताओं के साथ अंतिम रूप ले रही इस व्यापार वार्ता के हमारे लोगों पर बहुत गंभीर और बहुआयामी असर पड़ने वाले हैं।

भारतीय कृषिबाज़ार खोल दिया गया है:

मोदी और उसके मंत्रियों की ओर से भारतीय किसानों के हित सुरक्षित रखने के किये जा रहे बड़ेबड़े दावों के बीच भारत की कृषिमंडी को अमेरिका की साम्राज्यवादी लूट के लिए खोल दिया गया है। भारत और अमेरिका द्वारा दिए गए संयुक्त बयान में साफ कहा गया है कि अमेरिकी खाद्य और कृषि वस्तुओं की एक बड़ी रेंज के लिए भारत टैरिफ खत्म करेगा या घटाएगा। जिन अमेरिकी कृषिवस्तुओं पर टैरिफ शून्य किया गया है, वे हैं: लाल ज्वार, जौ, मक्का की भूसी, दालें, सोयाबीन तेल, अरबी, केले और अन्य ताज़े फल, फलों से तैयार माल, सब्जियों का रस और जड़ें, मटर और चने की फलियाँ, सूखी फलियाँ, अनाज, कृषिबीज और अन्य उत्पाद। कृषिबीजों में राई, ओट्स, मक्का, सोयाबीन, सूरजमुखी, जीरा, सौंफ, धनिया आदि के बीज शामिल हैं। इसके अलावा खीरे, फूलों और फलों के बीज भी इसमें शामिल हैं। अनाज में क्याक्या शामिल है, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। व्हाइट हाउस द्वारा जारी पहले बयान के बाद अनाज और दालों के इसमें शामिल होने पर देश के भीतर काफ़ी विरोध सामने आया। इसके कुछ दिनों बाद जब इसका संशोधित रूप जारी किया गया, तो उसमें से दालों और अनाज शब्द गायब कर दिए गए। अब ये शायदअन्य उत्पादोंके व्यापक दायरे में शुमार हैं। इनअन्य उत्पादोंकी इस अप्रत्यक्ष और व्यापक परिभाषा में अभी क्याक्या शामिल है और आगे क्याक्या शामिल किया जाएगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

जिन कृषिउत्पादों पर टैक्स कम किये गए हैं, उनमें शामिल हैं: खली, जैतून का तेल, गुलदाउदी से बना प्राकृतिक कीटनाशक (पाइरेथ्रम), पौधों के हिस्से आदि। कुछ कृषिउत्पादों के लिए कोटा तय किया गया है, जिनमें सूखे मेवे जैसे छिलकों वाले बादाम, अखरोट, पिस्ता और दालें शामिल हैं। कुछ कृषिउत्पाद ऐसे भी हैं जिन पर अमेरिकी आयात पर टैक्स 10 सालों में चरणबद्ध तरीके से घटाया जाएगा। इनमें शामिल हैं: नारियल तेल, अरंडी का तेल, वनस्पति तेल, पौधे और पौधों के हिस्से।

कुल मिलाकर भारत की कृषिमंडी बड़े पैमाने पर अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल दी गई है और इन उत्पादों से भारतीय किसानों को बड़ा नुक्सान होने वाला है। सबसे बड़ा प्रहार सोयाबीन, मक्का, फलों और सूखे मेवों, दालों और सब्जियों के उत्पादकों पर होगा। कश्मीर और हिमाचल के सेब उत्पादक पहले ही ऐसे समझौतों की गंभीर मार झेल रहे हैं। अमेरिका में खेती बड़े पैमाने पर होती है और वहाँ सरकार किसानों को बहुत बड़ी सब्सिडियाँ देती है। हर किसान को लगभग 65 लाख रुपये सालाना सब्सिडी मिलती है। इसके मुकाबले भारत में मुख्यतः छोटी जोतों पर खेती होती है और किसान हर तरह की सुविधाओं से वंचित हैं। इस कारण उनकी फसलें किसी भी हालत में अमेरिकी फसलों का मुकाबला नहीं कर सकतीं। अब तक इन्हीं सुरक्षा दीवारों के सहारे वे मुकम्मल तबाही से बचे हुए थे। अब इस कदम ने पहले से ही गहरे कृषिसंकट के शिकार भारतीय किसानों को खेतीपेशा से बेदखल करने की प्रक्रिया को और तेज कर देना है। कृषिअर्थव्यवस्था हमारे देश की अर्थव्यवस्था का केन्द्रीय स्तंभ है। कृषिसंकट पहले ही देश की समूची अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। अब इस संकट की मार कई गुना बढ़ने वाली है।

भारत सरकार इस पूरे समय यह झूठ बोलती रही है कि कृषिउत्पादों और किसानों के हितों के मामले में कोई समझौता नहीं किया गया, जबकि अमेरिकी बयान और दावे बारबार हकीक़त उजागर करते रहे हैं। संयुक्त बयान में भी साफ तौर पर कहा गया है कि अमेरिकी खाद्यपदार्थों और कृषिउत्पादों के लिए भारत टैरिफ रियायतें दे रहा है। अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिन्स ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा है कि भारत और अमेरिका के बीच हुए समझौते के नतीजे के तौर परभारत की बहुत बड़ी मंडी में अमेरिकी कृषिवस्तुएँ जाएँगी और ग्रामीण अमेरिका में नकद पैसा आएगा।

इंडियन एक्सप्रेस द्वारा पूछे गए एक और सवाल के जवाब में रोलिन्स ने कहा किभारत, अमेरिकी कृषिमाल को लेने की बहुत महत्वपूर्ण क्षमता रखता है। ऊँचे टैरिफ, अनुचित गैरटैरिफ पाबंदियाँ और अन्य रुकावटों ने अमेरिकी उत्पादों को रोके रखा हुआ था। इन रुकावटों में कमी आने से और भारत में खुली सब्सिडियाँ देने के कार्यक्रम में सुधार हो जाने से अमेरिकी किसानों, पशुपालकों और उत्पादकों के लिए बराबरी का खेल मैदान हासिल हो जाएगा। इससे आने वाले समय में आपसी लाभदायक और संतुलित व्यापार चल पड़ेगा।यानी इस व्यापार समझौते के माध्यम से भारत ने सिर्फ अमेरिकी कृषिउत्पादों से पाबंदियाँ ही नहीं हटाईं, बल्कि अपने किसानों की सब्सिडियाँ बंद करने का भरोसा भी अमेरिका को दिलाया है, ताकि सस्ता यूरिया या पीएम किसान योजना के तहत मिलने वाले 6000 रुपये का इंतजार करते भारतीय किसानों की ये सब्सिडियाँ भी बंद करके उन्हें 65 लाख रुपये की सब्सिडी लेने वाले अमेरिका के बड़े किसानों के साथबराबरी के स्तर पर मुकाबलेमें उतारा जा सके।

कृषि क्षेत्र में अमेरिका की सब्सिडी वाली फसलें आने से क्या हो सकता है, इसका अनुभव तो हाल के समय में मौजूद है। पिछले साल अमेरिकी दबाव में आकर भारत सरकार ने कपास की ड्यूटी घटाकर 11 प्रतिशत कर दी। यह छूट सिर्फ सितंबर से दिसंबर महीनों के लिए दी गई थी। इस दौरान सस्ती अमेरिकी कपास की तीन करोड़ गांठें भारतीय बाजार में गईं और भारतीय कपास के दाम प्रति क्विंटल 1000 से 1500 रुपये तक गिर गए।

कश्मीर के सेब उत्पादक भी यह अनुभव झेल चुके हैं। पहले के व्यापार समझौतों के ज़रिए भी ड्यूटीमुक्त सेब भारत में आते रहे हैं और इनके चलते भारतीय सेबों के दाम इतने गिरते रहे कि किसान अपना खर्च भी नहीं निकाल पाए। अब अमेरिका के साथ भी फलों के मामले में यही समझौता हो चुका है और एक बार फिर कश्मीर और हिमाचल के सेब उत्पादक इस असमान मुकाबले में अपनी हार देख रहे हैं। कश्मीर में प्रति हेक्टेयर सात से आठ टन सेब की पैदावार होती है, जबकि अमेरिका जैसे विकसित देशों में यही पैदावार 40 से 70 टन प्रति हेक्टेयर है। कश्मीर और हिमाचल के सेब उत्पादक छोटे स्तर के किसान हैं और यहाँ कृषि तकनीक भी निम्न स्तर की है। वे विकसित देशों का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हैं। खुली मंडी में यहाँ के छोटे किसानों को इन दैत्याकार प्रतिस्पर्धियों के सामने उतार देना, असल में उन्हें इस पेशे से बाहर कर देने का फरमान सुना देना है।

जीनसंपादित फसलों के लिए रास्ता खोल दिया गया है:

अमेरिकी कृषिउत्पादों के भारतीय बाजार में प्रवेश का असर सिर्फ आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिहाज़ से भी बहुत गंभीर है। अमेरिका में अधिकांश कृषिउत्पाद जीनसंपादित (जी एम) हैं, जबकि भारत में इनका इस्तेमाल निषिद्ध है। अब अमेरिका से आने वाले बीजों, पशुचारे, तेल आदि के माध्यम से ये जीनसंपादित उत्पाद हमारी खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करेंगे और हमारे स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालेंगे। वैसे भी कोई बीज या फसल किसी खास पर्यावरण की उपज होती है। बिना ज़रूरी परीक्षण के एक जगह के बीज, पौधों या कृषिउत्पादों को दूसरी जगह प्रयोग करने का मतलब उस पर्यावरण की मौलिकता, वनस्पति और जीवन पर गंभीर चोट पहुँचाना है। जीनसंपादित उत्पाद तो वैसे भी अप्राकृतिक हैं और जिन देशों में वहाँ की फसलों को संशोधित करके ये तैयार किए गए हैं, वहाँ भी इनके दीर्घकालीन असर अभी पूरी तरह सामने आने बाकी हैं। इन अमेरिकी उत्पादों को बिना किसी जाँच और निष्कर्ष के भारत की खाद्य श्रृंखला में घुसा देना लोगों की सेहत और यहाँ के पर्यावरण के साथ एक बड़ा खिलवाड़ साबित हो सकता है।

वैसे भी यह एक बार रास्ता खोल देने का मामला है। एक बार पशुखुराक और तेल आदि के मामले में जीनसंपादित उत्पादों को मंजूरी देकर आगे के लिए अन्य जीनसंपादित उत्पादों के आने की ज़मीन भी तैयार कर ली जाएगी।

गैरकृषि क्षेत्र पर प्रहार:

इस व्यापार वार्ता ने कृषिउत्पादों के साथसाथ अनेकों अन्य वस्तुओं पर भी टैरिफ रुकावटें खत्म की हैं। इस समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक उत्पादों पर टैरिफ खत्म करेगा या कम करेगा। सभी औद्योगिक उत्पादों की श्रेणी में सुई से लेकर जहाज तक सब कुछ आता है। इनमें से बहुत बड़ी संख्या में उत्पादों पर तो पाबंदियाँ पहले ही हटाई जा चुकी हैं, बाकी रहती का भी अब अंतिम क्रियाकर्म कर दिया जाएगा। सभी औद्योगिक उत्पादों में शामिल कुछ वस्तुएँ, जिन्हें अब भारत में शून्य टैरिफ पर बेचा जाएगा, ये हैं: दवाइयाँ, सौंदर्यउत्पाद, जैविक और अजैविक रसायन, कंप्यूटर से संबंधित वस्तुएँ, स्वास्थ्यउपकरण और अन्य।अन्यमें क्याक्या शामिल है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इनके अलावा जिन चीजों पर टैरिफ घटाया गया है, उनमें मादकपेय युक्त उत्पाद शामिल हैं। जिन वस्तुएँ पर अगले 10 सालों में चरणबद्ध तरीके से टैक्स घटाया जाएगा, उनमें चर्बी, हड्डियों से बने उर्वरक, मोमबत्तियाँ, साबुन और क्रीमों में इस्तेमाल होने वाला स्टियरिन, संशोधित स्टार्च, पेप्टोन आदि शामिल हैं।

असलियत यह है कि औद्योगिक उत्पादों के क्षेत्र में तो पाबंदियाँ काफी पहले से ही हटाई जा चुकी हैं। इस संधि की मुख्य विशेषता तो इन रुकावटों का कृषि क्षेत्र में भी खत्म किया जाना है। वास्तव में, इन्हीं विदेशी उत्पादों और विदेशी तकनीक ने हमारे औद्योगिक क्षेत्र को बुरी तरह पंगु बनाकर रखा है। अब और अधिक औद्योगिक उत्पादों का बिना टैरिफ के भारतीय बाजार में जाना इसे और ज्यादा जकड़ने वाला है।

रूस से तेल आयात पर पाबंदी:

इस व्यापार वार्ता पर जारी दोनों देशों के संयुक्त बयान के साथ ही ट्रंप के एक विशेष कार्यकारी आदेश के तहत भारत ने रूस से तेल की सीधी या परोक्ष आपूर्ति लेना बंद करने का वादा किया है। इस वादे के बारे में भी लोगों को ट्रंप के बयान से ही पता चला और भारतीय अधिकारियों ने तो इस पर कोई आधिकारिक बयान जारी करना ही बेहतर समझा! ट्रंप ने अपने बयान में कहा, कि चूंकि भारत रूस से तेल की आपूर्ति बंद कर रहा है, इसलिए उस पर रूसी तेल खरीदने की सज़ा के तौर पर लगाए गए 25 प्रतिशत टैक्स वापस लिए जा रहे हैं।

भारत, रूस से सबसे अधिक तेल खरीदने वाले देशों में गिना जाता रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद रियायती कीमतों पर रूस से कच्चा तेल मिलने की वजह से वह चीन के बाद रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बन गया था। अब उसने अपनी रिफाइनरियों को रूस से तेल लेना बंद करने के आदेश दे दिए हैं। पहले किए गए सौदे पूरे हो जाने के बाद कोई नया सौदा नहीं किया जाएगा। अमेरिकी धमकियों के मद्देनज़र हिंदुस्तान पेट्रोलियम, एच एम एल जैसी रिफाइनरियाँ तो पिछले साल से ही रूसी तेल की खरीद बंद कर चुकी थीं, जबकि भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल और रिलायंस अब अपने सौदे समेट रहे हैं।

जुलाई 2024 में भारत अपने कुल तेल का 43 प्रतिशत रूस से ले रहा था। इस व्यापार वार्ता की बदौलत 2026 के जनवरी तक इसे घटाकर 19 प्रतिशत तक लाया गया और अब इसे पूरी तरह बंद किया जाना है। रूस से भारत को तेल काफ़ी सस्ती दरों पर मिल रहा था। इंडिया टुडे की सितंबर 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस से तेल लेने के कारण अपने पहले के तेल बिलों की तुलना में 17 खरब डॉलर की बचत की थी। अब ट्रंप के हुक्मों पर यह सस्ता तेल छोड़कर वह महँगा अमेरिकी तेल खरीदने की तरफ बढ़ रहा है। साम्राज्यवादी सरगना अमेरिका की सेवा में जुटी मोदी सरकार द्वारा यह राष्ट्रीय हितों के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ है।

इस व्यापार संधि को अंतिम रूप देने के दौर में एक और घटनाक्रम यह सामने आया कि अमेरिका ने ईरान से युद्ध छेड़ दिया है और अब उसका मुख्य निशाना ईरान है। ईरान के होर्मुज़ खाड़ी तेल मार्ग पर नियंत्रण के कारण वह तेल व्यापार को प्रभावित करने की पर्याप्त क्षमता रखता है। इस नई जंग में उसे घेरने के उद्देश्य से ट्रंप ने मार्च महीने में भारत को 30 दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की अनुमति दे दी है। इसलिए अब अपने मालिकों के निर्देशों के तहत भारतीय शासक 30 दिन तक रूस से तेल खरीद सकते हैं। लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि अब रूस से यह तेल पहले जैसी रियायती दरों पर नहीं मिलेगा।

अमेरिका ने ऐसी ही सीमित समय के लिए रूस से तेल खरीदने की छूट अन्य देशों को भी दी है। लेकिन साम्राज्य के हुक्म पर कभी मरतीकभी जीती यह चिड़िया इतनी बेशर्म है कि भाजपा इस 30 दिनों की मोहलत को भी मोदी की कूटनीतिक सफलता के रूप में गिना रही है।

नॉनटैरिफ पाबंदियों का खात्मा:

इस संधि के तहत भारत सिर्फ अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ ही नहीं घटा रहा, बल्कि नॉनटैरिफ पाबंदियाँ भी खत्म कर रहा है। नॉनटैरिफ पाबंदियों में वे सारे कानून, अमल, निरीक्षण आदि शामिल हैं जो विदेशी उत्पादों की जाँचपड़ताल करते हैं। ऐसी ही एक नॉनटैरिफ पाबंदी जीनसंपादित उत्पादों के प्रवेश पर रोक है, जिसके बारे में ऊपर चर्चा हो चुकी है। व्हाइट हाउस द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि भारत अमेरिकी खाद्य और कृषिउत्पादों के मामले में गैरटैरिफ पाबंदियाँ हटाएगा। इस कारण भविष्य में हर तरह के अमेरिकी जीनसंपादित उत्पादों के भारतीय बाजार में प्रवेश का रास्ता तैयार हो चुका है। ऐसी नॉनटैरिफ पाबंदियों में वे सारे उपाय भी शामिल हैं जिनके माध्यम से भारतीय परिस्थितियों के अनुसार किसी वस्तु के उपयोग के मानक तय किए जाते हैं, उसकी मात्रा तय की जाती है, उसके डिज़ाइन को यहाँ की ज़रूरतों के हिसाब से ढाला जाता है। इस संधि के अनुसार अमेरिकी मेडिकल उपकरणों के प्रवेश में लंबे समय से बाधा बने कानूनों और प्रक्रियाओं को खत्म किया जाएगा। अमेरिकी सूचना और संचार तकनीक से संबंधित वस्तुओं के मामले में लाइसेंस हासिल करने के लिए आवश्यक प्रक्रियाओं में ढील दी जाएगी। यह व्यापार वार्ता संपन्न होने के छह महीने के अंदरअंदर सकारात्मक तरीके से यह तय किया जाएगा कि क्या अमेरिका से आने वाली वस्तुओं पर भारत की जगह अमेरिकी मानक स्वीकार किए जा सकते हैं या नहीं। इन पाबंदियों को हटाने का मतलब मोदी सरकार द्वारा साम्राज्य की सेवा में पहले से बदले जा रहे कानूनों को और व्यापक स्तर पर तथा और ज़्यादा तेजी से बदला जाएगा। हर प्रकार के सरकारी नियंत्रण और निगरानी को खत्म किया जाएगा और पहले से ही लंगड़ेलूले तंत्र को दरकिनार कर दिया जाएगा।

अमेरिका द्वारा थोपी गई आयातप्रतिबद्धताएँ:

इस व्यापार संधि के माध्यम से अमेरिका ने अगले पाँच सालों में 500 खरब डॉलर के अमेरिकी ऊर्जाउत्पाद और अन्य वस्तुएँ खरीदने का बोझ भारत के सिर पर डाल दिया है। इन उत्पादों में हवाई जहाज़ और उनके पुर्जे, कीमती धातुएँ, तकनीकी उत्पाद और कोकिंग कोल आदि शामिल हैं। व्हाइट हाउस द्वारा जारी संयुक्त बयान में कहा गया था कि भारत ने 500 खरब डॉलर के इन अमेरिकी उत्पादों को खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है। लेकिन कुछ दिन बादप्रतिबद्धताशब्द कोइरादेसे बदल दिया गया। जो भी हो, अमेरिका ने अपनी तरफ से ऐसी कोई प्रतिबद्धता अथवा इरादा नहीं ज़ाहिर किया कि वह भारत से कितनी कीमत का सामान खरीदेगा। यानी इससाझे हितोंवाले समझौते में यह बँधन भी सिर्फ भारत के लिए ही है।

इस आयात किए जाने वाले अमेरिकी माल में बड़ा हिस्सा अमेरिकी कच्चे तेल का है। वेनेज़ुएला के तेल भंडारों पर कब्जा करने के बाद अमेरिकी कंपनियाँ अब बड़े मुनाफे बटोरने के लिए खरीदार ढूँढ रही हैं और भारत यह महँगा तेल खरीदने के लिए ग्राहकों की कतार में सबसे आगे खड़ा है।

 

लार टपकाती दलाल पूंजी:

यहां एक ओर यह व्यापारिक संधि भारतीय जनता की ज़िंदगियों को और भी दुश्वार बनाने जा रही है, वहीं भारत की दलाल पूंजी इसमें भारी मुनाफ़ों की झलक देख रही है। यहाँ की बड़ी दलाल पूंजी हमेशा से ही साम्राज्य के साथ मिलकर फलती फूलती रही है। स्वराज और माज़दा, मारुति और सुज़ुकी, वोडाफोन और आइडिया, हीरो और होंडा, अदानी और विलमार, जियो और बी पी, टाटा और स्टारबक्स, वॉलमार्ट और भारती - हमेशा से ही मिलकर भारतीय जनता को लूटते और मुनाफ़े बटोरते आए हैं। अब भी इस संधि के माध्यम से सिर्फ इस दलाल पूँजी और अमेरिकी साम्राज्यवादी कंपनियों की साँठ गाँठ और गहरी होगी, बल्कि इन देसी लुटेरों के लिए भी और बड़े स्तर की लूट के रास्ते खुलेंगे। इस व्यापार समझौते के ज़रिए कमज़ोर किए गए कानूनों, हटाई गई पाबंदियों और ढीला किए गए निगरानी तंत्र का फायदा इन्हें भी मिलेगा। यही वह व्यवसाय हैं जिनके कारोबारों की पहुँच अंतरराष्ट्रीय मंडी तक है और इस संधि के ज़रिए जिन्हें अमेरिका में कम टैरिफों पर माल बेचने की  छूट मिलने जा रही है। इसी कारण कुमारमंगलम बिड़ला (बिड़ला समूह), सुनील भारती मित्तल (भारती समूह), संजीव पुरी (आई टी सी समूह), अजय सिंह (स्पाइस जेट) आदि ने एक स्वर में इस समझौते की प्रशंसा की है। भारत फोर्ज के सी एम डी बाबा कल्याणी ने कहा है कियह समझौता बाज़ी पलट देने वाला है। हम इसे विश्व स्तर पर हमारे विस्तार के अगले चरण के लिए मज़बूत नींव की तरह देखते हैं।

यह समझौता देश के हुक्मरानों द्वारा जनता के साथ की जा रही प्रत्यक्ष गद्दारी है। इस गद्दारी का पर्दाफाश होना चाहिए और जनता के हितों, देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को गंभीर ख़तरे में डालने के लिए हुक्मरानों को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।

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इन दिनों जब अमेरिका की ओर से भारत को 30 दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की इजाज़त दे दी गई है, तो यह चर्चा भी उठी है कि ईरान युद्ध से जुड़े अमेरिकी हितों के अलावा इसके साथ रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के हित भी जुड़े हुए थे और रिलायंस की तरफ से भी यह इजाज़त दिलवाने के लिए पर्दे के पीछे कोशिशें की जा रही थीं। उल्लेखनीय है कि ट्रंप द्वारा रूसी तेल पर लगाई गई पाबंदी के दौरान रिलायंस की तेल की खेपें लंबित पड़ी थीं। भारतीय जनता की तेज़ होती जा रही साम्राज्यवादी लूट के बीच भारतीय बड़ी पूंजी और अमेरिकी साम्राज्य के गहराते रिश्तों के लिहाज़ से यह बात महत्वपूर्ण है। रिलायंस और ट्रंप के बीच बढ़ती नज़दीकी तब भी चर्चा में आई थी जब इसी महीने ट्रंप ने रिलायंस द्वारा टेक्सास में 300 खरब डॉलर की लागत से रिफाइनरी बनाने का एलान किया था और भारत की सबसे बड़ी निजी ऊर्जा कंपनी रिलायंस का इस बहुत बड़े निवेश के लिए धन्यवाद किया था। यह भी उल्लेखनीय है कि ट्रंप द्वारा राष्ट्रपति मादुरो का अपहरण कराकर वेनेज़ुएला के तेल भंडारों पर कब्जा करने के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को भी वेनेज़ुएला में तेल व्यापार का लाइसेंस मिला है।