जियोंद: पुलिस दमन और उसका अनुकरणीय जन‑प्रतिरोध
– पावेल कुस्सा
बठिंडा ज़िले का गाँव जियोंद एक बार फिर सुर्खियों में है। साल भर से ज़मीनों की रक्षा के लिए डटे पूर्व बटाईदार किसानों का संघर्ष फिर से राज्य के संघर्ष‑दृश्य पर उभर आया है। वैसे तो जियोंद के किसानों का यह संघर्ष कई सालों से स्थानीय स्तर पर लड़ा जा रहा था, लेकिन जनवरी 2025 में यह राज्य‑स्तर पर सामने। इसकी माँगों के लिए राज्य स्तर पर लामबंदी भी की गई थी। तब से अब तक यह सख्तजान संघर्ष लगातार जारी है; लेकिन इस बार शासकीय दमन और संगठित किसान शक्ति के दृढ़निश्चयी प्रतिरोध तथा उस के बल पर हासिल हुई रिहाई ने विशेष तौर पर लोगों का ध्यान खींचा।
इस दफा मसला दो स्थानीय किसान नेताओं की रिहाई के लिए चल रहे संघर्ष‑एक्शनों का था। बलदेव सिंह चाओके और शगनदीप सिंह जियोंद को गत वर्ष 5 अप्रैल को आदर्श स्कूल चाओके के शिक्षकों पर हुए दमन के दौरान पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। आदर्श स्कूल चाओके के शिक्षकों के संघर्ष को किसान संगठन की ओर से डटकर समर्थन दिया जा रहा था। गिरफ्तारी के बाद अन्य स्थानीय नेताओं/कार्यकर्ताओं को चाओके वाले केस में ज़मानत मिल गई, जबकि इन दो नेताओं को जियोंद संघर्ष‑एक्शन के दौरान बनाए गए केसों में ज़मानत देने से इनकार कर दिया गया। जियोंद के भूमि संघर्ष के दौरान हुए पुलिस दमन के सामने डटकर खड़े रहने वाले इन नेताओं को जेल में ठूँसकर, संघर्षरत किसानों के बीच दहशत फैलाने और उन्हें हतोत्साहित करने की मंशा पाली जा रही थी। इन नेताओं को जेल में क़ैद रखना, वस्तुत: जियोंद में भूमि अधिकारों के लिए जूझते किसानों की संगठित ताकत को अशक्त करने का प्रयास था।
इन दोनों नेताओं की रिहाई के लिए बी.के.यू. एकता (उगराहाँ) की ओर से लगातार आवाज़ उठाई जा रही थी और अलग‑अलग प्रकार के जन‑एक्शन किए गए थे। अन्य मुद्दों पर हुए एक्शनों में भी यह माँग बार‑बार उठाई जाती रही, लेकिन सरकार का रुख़ जेलों और केसों के ज़ोर पर जियोंद के संघर्ष को दबाने और किसान प्रतिरोध की दृढ़ भावना को कमजोर करने का था। सरकार की तरफ़ से भले ही ज़ुबानी तौर पर रिहाई का भरोसा दिया जाता रहा, लेकिन व्यवहार में न
सिर्फ़ इस माँग को नज़रअंदाज़ किया जा रहा था, बल्कि हकूमत के असली इरादे अदालत के रवैये से साफ़ झलक रहे थे। ज़मानत देने से इनकार करते समय न्यायाधीश की गैर‑औपचारिक टिप्पणियों में इन नेताओं के रिहा होकर फिर संघर्ष का झंडा बुलंद करने की “चिंता” व्यक्त की गई; इससे साफ़ था कि अदालत पूरी तरह सरकारी दमन‑नीति की ही लाइन पर चल रही थी और खुले तौर पर संघर्ष का झंडा बुलंद करने के हक को क़ानूनी ओट के सहारे कुचल रही थी।
इन हालात में आख़िरकार बी.के.यू. एकता (उगराहाँ) द्वारा इन नेताओं की रिहाई के लिए 6 फ़रवरी को बठिंडा सचिवालय का घेराव करने का एलान किया गया। पंजाब सरकार ने धरना देने का अधिकार छीनने के लिए पूरे पंजाब में छापों और गिरफ्तारियों की मुहिम चला दी। पंजाब में अलग‑अलग स्थानों पर जमा हुए किसानों ने धरने दिए। म्हेलां चौक (संगरूर) के धरने से पुलिस ने पूर्व-नियोजित योजना के तहत नेताओं को गिरफ्तार किया और विशेष रूप से दमन का शिकार बनाया; स्थानीय नेताओं को थाने ले जाकर बुरी तरह पीटा गया। इस एक्शन के बाद सरकार द्वारा किसान नेताओं को ज़मानत दिलवा देने का वादा किया गया। लेकिन पहले दिए गए भरोसों के हश्र को देखते हुए संगठन ने दबाव बनाए रखने के लिए 18 फ़रवरी को फिर से बठिंडा में धरना देने का एलान किया। यह भी साफ़ कर दिया गया कि सरकार की ओर से अगली तारीख पर ज़मानत करवा देने के पक्के भरोसे के चलते इस बार सचिवालय‑घेराव नहीं, केवल एक दिन का धरना होगा। फिर भी पंजाब सरकार ने जन‑संघर्षों को कुचलने की अपनी दमनकारी नीति जारी रखते हुए इस धरने को भी रोकने के लिए कदम उठाए। एक बार फिर गिरफ्तारियों और छापों का दौर चला दिया गया और अलग‑अलग जगहों पर जमा हुए किसानों को बठिंडा पहुँचने से रोकने के लिए सख़्त नाकेबंदी की गई। इसी बीच, गाँव जियोंद में जमा हुए बठिंडा ज़िले के किसानों पर पुलिस ने गाँव में घुसकर बेरहमी से दमन करना शुरू कर दिया। जबकि किसान अभी सिर्फ़ गाँव के भीतर ही इकट्ठे ही हो रहे थे, वे बठिंडा की तरफ़ निकले भी नहीं थे; पर सरकार की नीयत किसानों की बेरहमी से पिटाई कर जियोंद में दहशत फैलाने, संगठित किसान‑शक्ति को पस्त करने और लोगों से संघर्ष के अधिकार से तौबा करवाने की थी।पुलिस द्वारा गाँव के अंदर अंधाधुंध आँसू‑गैस के गोले दागने से लेकर घरों की छतों पर चढ़कर लोगों पर पत्थर बरसाने तक दमन के हर हथकंडे अपनाए गए। बठिंडा की एस.एस.पी. ज्योति यादव स्वयं डंडा हाथ में लेकर पुलिस दमन की अगुवाई करती दिखी; उसके इशारे पर ही एक किसान कार्यकर्ता की टांग जानबूझकर बुरी तरह तोड़ी गई तथा कई अन्य किसान भी घायल कर दिए गए। लेकिन पुलिस का यह दमन न
तो गाँव के बाशिंदों को डरा सका और न
ही वहां जमा हुए किसानों को। लोगों द्वारा किया गया मुकाबला स्वतः संगठित किसान शक्ति के दम‑ख़म का ज़बरदस्त प्रदर्शन बनकर सामने आया। अपनी रक्षा के लिए लोगों ने पुलिस दमन का डट कर मुकाबला किया, मुँहतोड़ जवाब दिया। जनता के जवाबी मुकाबले से पुलिसकर्मी दहशत में आ
गए; कई पुलिस मुलाज़िम घबराकर लोगों के घरों में छिपते देखे गए और कई महिला पुलिसकर्मियों ने तो घरों की औरतों से वर्दी बदलकर, साधारण कपड़े पहनकर बच निकलने की गुहार लगाई। जनता पर खूँनी धावा बोलकर मौजूदा हकूमत ने जियोंद के भूमि संघर्ष को बिखेर कर कुचल देने की मंशा पाली थी, लेकिन जियोंद में संगठित किसान‑शक्ति द्वारा किए गए इस दृढ़ निश्चय कड़े मुकाबले ने न
सिर्फ़ इन मंसूबों को मिट्टी में मिला दिया बल्कि जूझ-लड़ने के इरादों को और भी प्रचंड कर दिया; दहशत की जगह धड़ल्ले और हौसले का पसराव हो गया। जन‑शक्ति के इस जलवे के आगे घबराई ज़ालिम पुलिस को लोगों ने अपनी आँखों से देखा और अपनी एकता की ताकत की एक और अनुभूति को अनुभव किया। लोगों द्वारा पुलिस दमन के किये जा रहे शानदार मुकाबले के दरमियान ही दोनों नेताओं को ज़मानत मिलने की ख़बर पहुँची, जिसने पुलिस दमन से भिड़ती किसान‑शक्ति के मन में जीत का एहसास भर दिया। बाद में दोनों नेताओं को किसान काफिलों द्वारा विजयी नारों और ललकारों की गूँज के बीच गाँव वापस लाया गया।
जबकि सरकार की ओर से दोनों नेताओं को ज़मानत देने का निर्णय पहले ही हो चुका था, फिर भी जियोंद में जाकर यूँ साधारण धरना दे रहे किसानों पर धावा बोलना पंजाब सरकार की दमन‑नीति को पूरी तरह बेनकाब करता है। यह हमला संगठित किसान‑शक्ति को कुचलकर जियोंद के किसानों से ज़मीन छीनने की मुहिम को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया था, ज़मीन की रक्षा के लिए डटे जियोंद के किसानों को “सबक सिखाने” के पैंतरे के रूप में किया गया था। इससे भी आगे, अग्रिम मोर्चे पर डटी किसान जथेबंदी बी.के.यू. एकता (उगराहाँ) को कुचलने के मकसद के किया गया था। आम रूप में तो यह पंजाब की पूरी किसान‑लहर के संघर्षों को हकूमती ताकत का सामर्थ्य दिखाने की नीयत से किया गया था। इस दमन ने आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार के जन‑संघर्ष‑विरोधी ज़ालिम रवैये को फिर जनता के सामने ला दिया है और उसकी जन‑दुश्मन ख़सियत का झंडा एक बार फिर लहरा दिया है।
लेकिन सरकार द्वारा किये इस दमन ने न
सिर्फ़ जियोंद के किसानों के रोष और ग़ुस्से को कई गुना बढ़ा दिया, बल्कि इसने पंजाब में आम जम्हूरी चेतना वाले हर इंसाफ पसंद व्यक्ति को झकझोरा और रोष से भर दिया।इसका इज़हार इस दमन की चारों तरफ़ हुई व्यापक निंदा के रूप में हुआ। एस.एस.पी. ज्योति यादव के ज़ालिम रवैये की व्यापक स्तर पर आलोचना हुई। आम जनता से लेकर जन‑जम्हूरी संगठनों और तमाम जन‑पक्षीय ताकतों ने सोशल मीडिया पर भी इस दमन के विरुद्ध ज़ोरदार विरोध प्रकट किया। जनता लामबंद भी हुई। किरती किसान यूनियन ने पंजाब सरकार के पुतले गाँव‑गाँव में जलाए। बठिंडा के डी.सी. कार्यालय के सामने ज़िले के मज़दूर, कर्मचारी और जम्हूरी संगठनों के प्रतिनिधि रोष जता कर आए। इसके बाद इस दमन का जवाब देने के लिए पंजाब की जन‑जम्हूरी धारा के संगठन राज्य‑स्तर पर एकजुट हुए और 6 मार्च को बठिंडा में बड़ा जन‑प्रदर्शन कर पंजाब सरकार की दमन‑नीति को ललकारा और शहर के भीतर आकर धरना देने के अधिकार को व्यावहारिक रूप से लागू करके दिखाया। बठिंडा में जुटा यह जनसमूह कोई साधारण धरना नहीं था; यह लोगों के रोष का तीखा इज़हार करने वाला जमावड़ा था। पुलिस अधिकारियों को ललकारने आया जन‑सैलाब था! यह ललकार किसान नेताओं के गरजते अल्फ़ाज़ों में सुनाई दी, जनता के जवाबों नारों में गूँजी और पूरे कार्यक्रम के जुझारू रंग में प्रकट हुई। पंजाब के कोने‑कोने से कंधों पर झंडे उठाए पहुँचे जत्थों के इरादों में साफ़ नज़र आई। जियोंद में पुलिस दमन के विशेष शिकार बने दोनों नौजवान इस बड़ी जन‑रैली के मंच पर मौजूद थे और उन्होंने संघर्ष का झंडा बुलंद रखने का एलान किया। करीब चार दर्जन जन‑संगठनों के आह्वान पर आए हज़ारों लोगों का सैलाब बठिंडा की सड़कों पर उतरा और लोगों ने अपने‑अपने ढंग से पुलिस को ललकारा। मंच से पंजाब सरकार के दमन की कड़ी निंदा की गई और उसका मुकाबला जनता की एकजुट ताकत से करने का आह्वान किया गया। इन तेवरों और इरादे को भाँपते हुए ही सरकार को रैली के लिए बाकायदा जगह देने और शहर में जुलूस निकालने की अनुमति देने जैसी “कड़वी गोली” निगलनी पड़ी। यह बड़ा जन‑प्रदर्शन जनता के प्रचंड इरादों का ऐलान और हकूमत को मिली मात की गवाही बनकर सामने आया। यह जन‑शक्ति का ही जल्वा था कि पहले बठिंडा प्रशासन ने धरने वाली जगह की सफ़ाई करवाई और फिर बठिंडा पुलिस को भी प्रदर्शन के दौरान लोगों को पानी पिलाने की “सेवा” का पाखंड करने पर मजबूर होना पड़ा।
जियोंद का भूमि संघर्ष, उस पर हुआ पुलिस दमन और इसके जन‑प्रतिरोध का यह पूरा घटनाक्रम कई पक्षों से विशेष रूप में महत्वपूर्ण है।
सत्ता‑पक्ष की ओर से देखें तो इसने आम आदमी पार्टी सरकार के वास्तविक जन‑दुश्मन चरित्र को आम जनता के बीच बिलकुल नीचे तक उजागर करने का काम किया है; संघर्षों को कुचल देने की उसकी मंशा नश्र की। इन मायनों में यह सरकार फासीवादी हमले पर उतरी मोदी सरकार की दमनकारी नीति से क़दम‑ताल करती दिखाई दी। जोकों से वफ़ादारी निभाने और जन‑विरोधी आर्थिक “सुधारों” को लागू करने की उसकी नीति तीब्रता का यह एक और प्रदर्शन है।
इस जन‑प्रतिरोध ने भगवंत मान सरकार से माकूल राजनीतिक कीमत वसूल की है और उसे हमलावर रुख से रक्षात्मक पैंतरे पर ला खड़ा किया है; बाद में सरकार अपनी छवि को हुए नुक्सान की भरपाई के लिए हताश प्रयास करती नज़र आई। लेकिन इससे भी ज़्यादा अहम यह है कि इसके ज़रिये संगठित किसान‑शक्ति द्वारा किए गए मुकाबले और हकूमति दमन का जवाब देने के लिए अपनाए गए रौद्र जन पैंतरे का उजागर होना। इस टकराव ने दिखाया है कि भूमि अधिकारों के लिए जूझ रही किसानी को क्रांतिकारी दिशा देने वाली अगुवाई ही उसे भिड़ जाने वाली संगठित ताकत में बदल सकती है। भूमि रक्षा संघर्षों की प्रकृति में ही यह निहित है कि यह रक्षा औपचारिक सत्याग्रह संघर्ष शैलियों से नहीं हो सकती; इसके लिए दमन का रौद्र जन‑मुकाबला करने की राह अपनाने की जरूरत पड़ती है। इसके लिए ज़रूरी है कि दुश्मन से जनता के वास्तविक रिश्ते को समझा जाए, ज़ालिम हकूमत के असली चरित्र को पहचाना जाए, लोगों के संगठित होने में चेतना की बुनियादी भूमिका का भान हो और मौजूदा संविधान/क़ानूनों की सीमाओं से आगे बढ़कर संघर्ष करने की अहमियत को समझा जाए। इस चेतना और इरादे के बिना भूमि अधिकारों की रक्षा के संघर्ष न
तो टिक सकते हैं और न
ही आगे बढ़ाए जा सकते हैं। जियोंद में कई सालों से भिड़ रही किसानी को बी.के.यू. एकता (उगराहाँ) की अगुवाई में ऐसी ही दिशा मिली है, जिससे यह एक महत्वपूर्ण लड़ाकू संघर्ष‑केंद्र के रूप में उभारा है।
दो किसान नेताओं की रिहाई के लिए हुआ यह जन‑एक्शन और पुलिस दमन का यह मिसाली प्रतिरोध, भूमि रक्षा के संघर्ष को आगे बढ़ाने की दृष्टि से एक अहम मोड़ साबित हुआ है। दमन के ज़ोर पर संघर्ष तोड़ देना चाहती हकूमत को साफ़ संदेश दिया गया है कि जियोंद में पूर्व जमींदारों के हितों की सेवा में पूर्व बटाईदार किसानों को उजाड़ना इतना आसान नहीं है; इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी। पंजाब की संघर्षशील जन‑लहर जियोंद की किसानी पर होने वाले हर दमन के खिलाफ खड़ी है।
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