ईरान पर आक्रमण — अमेरिकी-इज़रायली हुक्मरानों
से बगलगीर मोदी सरकार
ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली आक्रमण के संधर्व में भारत की मोदी सरकार का व्यवहार पूरी तरह साम्राज्यवादी चाकरी भरा है और देश के लोगों के हितों के अनुरूप होने की बजाय अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सेवादारों वाला है। यह मज़लूम और पीड़ित मुल्क के साथ खड़े होने की बजाय जंगबाज़ों के साथ खड़ा होने वाला है। मोदी सरकार ने ईरान पर अन्यायपूर्ण हमले की निंदा तो क्या करनी थी, उसने ईरान के सुप्रीम लीडर ख़ामेनेई के कत्ल की निंदा तक भी नहीं की और मुल्क के अंदर ईरानी दूतावास जाकर औपचारिक अफ़सोस जताने में भी पांच दिन लगा दिए, जैसे कि अमेरिकी और इज़रायली हुक्मरानों से अनुमति का इंतज़ार किया जा रहा हो। ईरान पर हमलों के दौरान अमेरिका ने भारत और श्रीलंका के नजदीक सागर में एक ईरानी समुद्री सैन्य जहाज़ डुबोकर ईरान के दर्जनों नाविक मार डाले, तो भारतीय हाकिम इसकी ज़ुबानी निंदा भी नहीं कर पाए। हालाँकि यह जहाज़ विशाखापट्टनम में हुए संयुक्त अभ्यास के बाद ईरान वापस जा रहा था। भारत से वापस जा रहा होने के कारण इस पर सख़्त प्रतिक्रिया देना भारत का कर्तव्य था, पर अमेरिकी साम्राज्यवादी चाकरी में डूबे भारतीय हाकिम चुप्पी साध गए। दूसरी तरफ मोदी सरकार ने, ईरान द्वारा की गई जवाबी प्रतिक्रिया के दौरान पड़ोसी अरब मुल्कों में अमेरिकी फौजी अड्डों पर किए हमलों की झट-पट निंदा कर दी। मोदी सरकार की यह पोजीशन भारतीय हाकिमों की पुरानी आधिकारिक पोजीशनों के भी विपरीत है। यह अमेरिकी-इज़रायली गुट के बगलगीर होने की अपनाई गई पहुंच के मुताबिक है।
मोदी ने ईरान पर हमले से ठीक पहले इज़रायल का दौरा किया और अगले ही दिन ईरान पर हवाई हमले शुरू हो गए। इस तरह मोदी इज़रायल में नेतन्याहू के साथ तब बगलगीर हो रहा था जब ईरान की घेराबंदी की जा रही थी और यह तय ही था कि ईरान पर हमला किया जाना है। ऐसे वक़्त में मोदी के दौरे ने एक तरह से इज़रायल के हमलावर रुख में भारत की हामी बनाई है और इसे सरपरस्ती दी है। इज़रायल का यह दौरा किसी मुल्क के औपचारिक दौरे जैसा नहीं था, बल्कि फ़लस्तीनी लोगों के सालों से किये जा रहे लगातार नरसंहार के बाद किया जा रहा यह दौरा इज़रायल के ज़ुल्मों के लिए उसकी पीठ थपथपाने जैसा था। जब इज़रायल दुनिया भर में अलग-थलग होने का सामना कर रहा है और इज़रायली प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय अदालत द्वारा दोषी करार दे दिया गया है, उसके गिरफ़्तारी के वारंट जारी कर दिए गए हैं और कई मुल्कों ने उसे अपने देशों में आने पर पाबंदियाँ लगा दी हैं, तो ऐसे मौके पर मोदी ने इज़रायली राज और नेतन्याहू की गंभीर अलगाव की स्थिति की काट करने की कोशिश की है और उसके साथ अपनत्व ज़ाहिर करके उसे अंतरराष्ट्रीय हिमायत देने की कोशिश की है। इस तरह मोदी सीधे तौर पर इस हमले में अमेरिकी-इज़रायली जंगबाज़ों के साथ खड़ा दिखाई दिया है।
ईरान पर आक्रमण का विरोध करना, न
सिर्फ़ इसलिए आवश्यक है कि यह अमेरिकी साम्राज्यवादी लूट और दबिश की ज़रूरतों में से किया गया अन्यायपूर्ण हमला है, उसकी सत्ता को उलटने की योजनाओं के तहत किया गया है, बल्कि यह इसलिए भी जरूरी है कि इस क्षेत्र में लगभग 80 लाख भारतीय मज़दूर मौजूद हैं। खाड़ी देशों में हो रहे जंगी हमलों के कारण उनकी ज़िंदगियाँ खतरे में हैं और उजाड़े की मार तले हैं। यह इसलिए भी आवश्यक है कि ईरान पर हमले का मतलब है भारत की तेल और गैस सप्लाई का प्रभवित होना। स्ट्रेट ऑफ़ हरमुज़ के रास्ते भारत को तेल और गैस का बड़ा हिस्सा आता है और उसे बंद कर देने से इस सप्लाई में विघ्न पड़ना शुरू भी हो चुका है। दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ गई हैं और देश में रसोई गैस की किल्लत का संकट भी शुरू हो गया है। लोगों को महंगाई समेत कई नई मुश्किलों का सामना करने पर मजबूर होना पड़ेगा। ईरान भारत का पुराना और परंपरागत व्यापारिक सम्बंधों वाला पड़ोसी मुल्क है। इस क्षेत्र में यह ऊर्जा ज़रूरतों, व्यापार और कई अन्य तरीकों से भारत के साथ जुड़ा हुआ है। लेकिन फिर भी अमेरिकी घुड़की के कारण पिछले कई वर्षों से साझा तौर पर विकसित की जा रही चाबहार बंदरगाह को भी भारत ने विराम लगा दिया है, जबकि व्यापार के नज़रिए से यह भारत के लिए एक बहुत ही अहम प्रोजेक्ट बनता था। इसी तरह भारत ने 2019 में अमेरिकी हिदायतों के चलते ईरान से तेल लेना बंद कर दिया था। इस तेल का भुगतान डॉलर में करने की भी ज़रूरत नहीं थी, पर मोदी सरकार ने तब भी राष्ट्रीय हितों की बजाय अमेरिकी साम्राज्यवादी ज़रूरतों की ताबेदारी को ज़रूरी समझा।
भारतीय हुक्मरानों ने पिछले समय से अमेरिकी-इज़रायली जुंडली के साथ टोचन होने का रास्ता पकड़ा हुआ है। बदनाम और दहशतगर्द इज़रायली राज के साथ खास तौर पर नज़दीकियां बनाई गई हैं। मोदी राज तो इस मामले में और भी ज्यादा सक्रिय रहा है। आर एस एस भी ज़ायनवादी राज्य की धारणा से प्रेरणा लेकर मुल्क में हिंदू राज्य बनाने का आह्वान करती रही है। इसी विरासत पर पहरा देते हुए मोदी सरकार इज़रायली राज के साथ आर्थिक और सैन्य क्षेत्रों में नज़दीकी संबंध विकसित कर रही है। मोदी सरकार इस राज्य से लोगों की जासूसी के तरीके और तकनीक हासिल कर रही है। बदनाम इज़रायली जासूसी एजेंसी मोसाद से भारतीय पुलिस और अन्य अधिकारियों को ट्रेनिंग करवाई जाती है। भारतीय दलाल पूंजीपति और मोदी के खासम-खास अडानी द्वारा इज़रायल को ड्रोन बनाकर दिए जा रहे हैं। यह अडानी और इज़रायली कंपनी का संयुक्त कारोबार है। इस तरह गाज़ा के बच्चों के रक्तपात में अडानी और मोदी के हाथ भी रंगे हुए हैं। अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद और फिर इज़रायल द्वारा गाज़ा पर बरसाए कहर के दौरान भारतीय शासक इज़रायल में मज़दूरों की कमी पूरी करने के लिए यहाँ से मज़दूर भेजने के लिए भी आगे आए। पहले इज़रायल की स्थापना के दशकों बाद भी भारतीय राज ने इज़रायल को मान्यता नहीं दी थी। 90 के दशक से इज़रायल के साथ संबंधों का सिलसिला शुरू हुआ और इस सदी में तेज़ी से आगे बढ़ा। इसी कारण अब भारतीय हाकिम फ़लस्तीनी अभियान की हिमायत के औपचारिक पैंतरे को भी छोड़ चुके हैं।
भारतीय राज इस शताब्दी के शुरू से अमेरिकी साम्राज्य की युद्धनीतिक योजनाओं के साथ टोचन हो कर चलने के रास्ते पर है। उसकी विश्व युद्धनीतिक ज़रूरतों की पूर्ति के लिए हर तरह पेश हो रहा है और उससे भारतीय उपमहाद्वीप क्षेत्र के थानेदार होने वाली हैसियत हासिल करने की अपेक्षा करता है। यह हैसियत अमेरिकी साम्राज्यवादी सरपरस्ती में बन सकती है। यह अलग मामला है कि इस तरह टोचन हो कर चलने का नतीजा अब ट्रंप द्वारा कई मामलों में भारतीय हुक्मरानों की बाँह मरोड़ दिए जाने की सुविधा के रूप में भी सामने आ
रहा है। रूस से तेल न
खरीदने के हुक्मों और भारत पर एकपक्षीय व्यापार समझौता थोपने की अपमानजनक धक्कड़ कार्रवाई के रूप में सामने आ
रहा है। भारतीय हुक्मरानों की अमेरिकी साम्राज्य के प्रति दिन-प्रतिदिन बढ़ती दासता की प्रविर्ती, भारतीय हाकिम जमातों द्वारा स्वतंत्र विदेश नीति के पुराने दावों को आधिकारिक तौर पर त्यागने जैसी है। यही नीति मध्य पूर्व की अमेरिकी सैन्य चौकी इज़रायल के साथ नज़दीकी की वजह भी है।
अमेरिकी-इज़रायली जंगबाज़ गुट के साथ ऐसी नज़दीकी भारतीय लोगों के हितों के खिलाफ़ है। यह भारतीय दलाल पूंजीपतियों की अपनी गिनतियों और ज़रूरतों के मुताबिक है और राष्ट्रीय हितों की क़ीमत पर है। यह क़ीमत भारतीय लोगों द्वारा चुकाई जा रही है। अमेरिका द्वारा रूस से सस्ता मिलने वाला तेल खरीदने पर पाबंदी और भारत पर थोपा जा रहा व्यापार समझौता तो इसकी ताजातरीन उदाहरण हैं। वैसे अमेरिकी साम्राज्यवादी लूट के पंजे देश की अर्थव्यवस्था पर अपनी जकड़ आए दिन मज़बूत कर रहे हैं और मुल्क के लोगों और प्राकृतिक संसाधनों की अंधी लूट को अंजाम दे रहे हैं। इस नज़दीकी की क़ीमत भारत को पड़ोसी मुल्कों के साथ और विश्व संबंधों के बिगाड़ के रूप में चुकानी पड़ रही है। पैदा हुए इस वैमनस्य में भारतीय हुक्मरानों की अपनी हिंदुत्व राष्ट्रवाद की नीति और अपने विस्तारवादी हितों की भूमिका भी है, जो अमेरिकी सरपरस्ती के तहत आस-पड़ोस में पैर पसारने की लालसा रखते हैं। अमेरिकी साम्राज्य और उससे भी आगे घोर अत्याचारी इज़रायली राज के साथ यह नज़दीकी हमारे मुल्क को दुनिया भर में इनकी लूट-जबर के खिलाफ़ जूझती जनता के निशानों में शुमार करती है। खासकर मध्य पूर्व में जूझ रही क़ौमों और अन्य प्रतिरोध शक्तियों के निशाने पर ले कर आती है। 2008 में हुए मुंबई हमले और 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हमला इसी नज़दीकी के परिणाम हैं। अमेरिकी-इज़रायली गुंडली के साथ ये नजदीकियां भारतीय लोगों को बहुत महँगी पड़ने वाली हैं। मोसाद जैसे बदनाम खुफ़िया जासूसी तंत्रों की मुल्क के अंदर दख़ल-अंदाज़ी, जन संघर्षों के खिलाफ़ ही उपयोग में लाई जाएगी। ऐसी एजेंसियों के साथ भारतीय राज के संबंध लोगों के लिए बढ़ते खतरों की घंटी हैं।
मुल्क में साम्राज्यवादी आर्थिक धावों का विरोध करने वाली सभी जनपक्षी और साम्राज्य-विरोधी ताकतों का यह कर्तव्य है कि वे न
सिर्फ़ ईरान पर अमेरिकी साम्राज्यवादी हमले का विरोध करें, बल्कि भारतीय हुक्मरानों को भी इसका विरोध करने के लिए मजबूर करने हेतु दबाव बनाएँ। अमेरिकी-इज़रायली गुट के साथ खड़े होने से बाज़ आने और ईरान की हिमायत करने के लिए दबाव लामबंद करें। भारत की मोदी सरकार से माँग की जानी चाहिए कि अमेरिकी साम्राज्यवादी युद्धनीतिक योजनाओं का साधन बनने की नीति रद्द की जाए, इज़रायल के साथ सारे संबंध ख़त्म किए जाएँ और मुल्क के अंदर इज़रायली दूतावास बंद किया जाए। अमेरिका के साथ की गई सभी सैन्य संधियाँ रद्द की जाएँ। राष्ट्रय हितों के अनुरूप विदेश नीति अपनाई जाए और साम्राज्यवादी हितों के अनुसार चलने वाली विदेश नीति रद्द की जाए।
भारतीय लोगों को यह दर्शाने-समझाने की ज़रूरत है कि अमेरिकी साम्राज्य अपनी लूटपाट और धौंस हमारे जैसे मुल्कों पर मढ़ने के लिए हर हथकंडा इस्तेमाल कर रहा है। जो शासक यह धौंस और दबाव कबूल नहीं करते और अपने राष्ट्रीय हितों के लिए खड़े हो जाते हैं, उनके साथ ख़ामेनेई और मादुरो वाला सलूक होता है और ईरान की तरह सैन्य हमले होते हैं। जो मोदी, शाह जैसे साम्राज्यवादियों के आगे नतमस्तक हो जाते हैं, वहाँ समझौते-संधियाँ थोपी जाती हैं और कहाँ से क्या खरीदने के बारे में हिदायतें दी जाती हैं। देश को पूरी बेशर्मी से खुल्लम खुल्ला लूटा जाता है। साम्राज्य के साथ भारतीय लोगों और ईरानी लोगों की दुश्मनी साझी है। इसलिए साम्राज्यवाद के खिलाफ़ जूझते हुए ईरान पर साम्राज्यवादी हमले का विरोध करना हमारा कर्तव्य और फ़र्ज़ है।
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(12 मार्च, 2026)