अमेरिकी साम्राज्यवादी हमला
और ईरानी राष्ट्रीय प्रतिरोध
ईरान पर अमेरिकी इज़रायली हमले को 12 दिन हो
चुके हैं। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर की
जा रही
भारी बमबारी में 1348 ईरानी लोग मारे जा चुके हैं और 17,000 से अधिक घायल हुए हैं। एक स्कूल पर अमेरिकी हमले में लगभग 175 लड़कियों के मारे जाने से दुनिया भर के लोगों में शोक की
लहर फैल
गई। ईरान की ओर से
प्रत्युत्तर में आस
पास के
पड़ोसी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले किए जा रहे
हैं और
इज़राइल के अंदर भी लगातार हमले किये जा रहे
हैं। अमेरिकी हमलों से ईरान में लाखों लोग उजड़ गए हैं। लेबनान में, इज़राइल द्वारा किए जा
रहे हमलों के चलते वहाँ 10 लाख लोग
विस्थापित हुए हैं। 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका द्वारा शुरू की गई
हवाई बमबारी अब मध्य पूर्व क्षेत्र में पूरी तरह युद्ध जैसी स्थिति में बदल
चुकी है। ईरान द्वारा जवाबी कार्रवाई में समुद्री मार्ग हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद
कर देने से एशिया के देशों को तेल और
गैस की
आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो रही है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखना शुरू हो गया
है। ऐसी
स्थिति में पूरे विश्व में इस
युद्ध के प्रभाव दिखाई दे रहे
हैं।
ईरान पर आक्रमण का बहाना:
अमेरिकी इज़रायली आक्रमणकारियों की तरफ
से पिछले कई महीनों से ईरान पर हमले की तैयारी की जा रही
थी। फिर
ईरान के साथ
बातचीत की प्रक्रिया शुरू की गई
और इसके तीन दौर चल
चुके थे। अब
तीसरे दौर की
बातचीत जारी थी। वार्ता में मध्यस्थता कर रहे
ओमान की तरफ
से कहा
गया कि
बातचीत के तहत
समझौता होने के करीब था, लेकिन बीच में
ही अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमला बोल दिया, जिसका ईरान ने कड़ा
जवाब देना शुरू कर दिया।
पिछले कुछ महीनों से अमेरिका ईरान की सैन्य घेराबंदी कर रहा
था। उसके निकट समुद्र में अमेरिका का विशाल युद्धपोत “इब्राहिम लिंकन” तैनात कर दिया गया और बाद
में एक
और परमाणु हथियार क्षमता से लैस
बेड़ा भी वहीं ला खड़ा कर दिया गया। पड़ोसी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी
सैनिक बल बढ़ाकर, उनकी सक्रियता तेज कर
दी गई
और ईरान पर बातचीत के नाम
पर दबाव बना कर अपनी शर्तें मनवाने की योजना बनाई गई। अमेरिका मांग कर रहा
था कि
ईरान अपना परमाणु बम बनाने का कार्यक्रम छोड़ दे, परमाणु कार्यक्रम को उसकी निगरानी में लाया जाए और यूरेनियम संवर्धन बंद किया जाए। बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम बंद किया जाए और ईरान की तरफ से
हिज़्बुल्लाह, हमास और हाउती विद्रोहियों जैसी अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोधी प्रतिरोध शक्तियों की मदद
बंद की
जाए। ईरान परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम पर बातचीत करने के लिए
तैयार हो चुका था, लेकिन बाकी मुद्दों पर बातचीत को स्वीकार नहीं कर रहा
था। इज़राइल तो इससे भी आगे
बढ़कर ईरान को पूरी तरह निरस्त्र करने की मांग कर रहा था।
ईरान ने परमाणु बम बनाने संबंधी अमेरिकी दावों को हमेशा खारिज किया है और
अपने यूरेनियम संवर्धन के उद्देश्य को ऊर्जा आवश्यकताओं का कार्यक्रम बताया है। वैसे भी, परमाणु बम बनाने के लिए ईरान को यूरेनियम को 90 प्रतिशत तक संवर्धित करना होगा, जबकि ईरान के पास
अभी अधिकतम 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम है। ओमान के विदेश मंत्री हमद अल
बुसैदी के अनुसार, इस दौर की
बातचीत में भी
ईरान परमाणु बम न बनाने और परमाणु सामग्री इकट्ठा न करने पर सहमत था। उन्होंने कहा, “यदि वास्तव में यही उद्देश्य था, तो हम
इसे हल
करने के काफी नजदीक पहुंच चुके थे।” उनके ऐसा कहने के कुछ ही
घंटों बाद ईरान पर हवाई हमले शुरू कर दिए
गए, जिनमें देश के
शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को निशाना बनाया गया। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता ख़ामेनेई और अन्य उच्चस्तरीय सैन्य नेतृत्व मारा गया।
यह
तथ्य भी दिलचस्प है कि 2015 में ओबामा प्रशासन द्वारा ईरान के साथ
किए गए
परमाणु समझौते को ट्रंप ने अपनी पिछली सत्ता अवधि में, अर्थात 2018 में, एकतरफा ढंग से
रद्द कर दिया था। हालाँकि 2015 के उस
समझौते के तहत
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर सीमाएँ लगाई गई थीं
और बदले में उस पर
लगी कुछ
आर्थिक पाबंदियाँ हटाई गई थीं। ईरान इस समझौते का पालन करता रहा था
और इस
पालन पर संयुक्त राष्ट्र ने भी
संतोष व्यक्त किया था। ट्रंप द्वारा अमेरिका को एकतरफा तौर पर इस
समझौते से बाहर निकाल लिया गया और
फिर से
ईरान पर कड़ी आर्थिक पाबंदियाँ थोप दीं। इसका कारण भी ईरान पर हमले के लिए
उसकी घेराबंदी का बहाना गढ़ना था, क्योंकि समझौता रहते यह बहाना बनाना मुश्किल था। उसके बाद ईरान ने फिर
से यूरेनियम संवर्धन शुरू कर दिया। इसी दौरान इज़राइल ने ईरान के भीतर कई जासूसी अभियान चलाए और ईरान के कई परमाणु वैज्ञानिकों की हत्याएँ की गईं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह
दिखाया कि अमेरिका और इज़राइल के हमले के लिए परमाणु हथियार तो सिर्फ बहाना हैं, जबकि असली उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन करना है।
वास्तविक उद्देश्य:
ईरान पर किए गए
हमले का वास्तविक मकसद वहाँ की वर्तमान सत्ता को उखाड़कर अपनी कठपुतली सरकार स्थापित करना है, ताकि पश्चिमी एशिया के इस
क्षेत्र में अमेरिकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को कोई
चुनौती न दे
सके और
उसके लुटेरे साम्राज्यवादी हित सुरक्षित रह सकें। इस क्षेत्र में तेल और
प्राकृतिक गैस के
बड़े ऊर्जा भंडार हैं और
अमेरिका इन्हीं भंडारों के नियंत्रण के बल पर
दुनिया में साम्राज्यवादी महाशक्ति के रूप
में अपनी शीर्ष आर्थिक हैसियत बनाए रखे हुए
है। बाकी अरब देशों की सरकारें सामान्यतः अमेरिकी पिट्ठू शासन हैं, जो तेल
की लूट
में हिस्सा लेकर अमेरिकी सेवा बजाती हैं। ये हकूमतें कई रूपों में अमेरिकी कृपा पर निर्भर हैं, जबकि इन देशों में अमेरिका एक लुटेरी साम्राज्यवादी ताकत के रूप
में बदनाम है। इसी क्षेत्र के ऐसे विशेष महत्व के कारण ही दुसरे विश्वयुद्ध के बाद
यहाँ यहूदियों का इज़राइल नामक देश बसाया गया। अमेरिकी और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक योजनाओं के तहत, दुनिया भर में
यहूदियों के प्रति उठी सहानुभूति की लहर
का लाभ
उठाकर यहां फिलिस्तीन की धरती पर इज़राइल राज्य स्थापित कर दिया और फिलिस्तीनियों को बेघर बे वतन बनाकर उन पर उजाड़े की त्रासदी थोप दी
गई। इज़राइली राज अत्यंत प्रतिक्रियावादी शासन है और
सीधे सीधे अमेरिका पर निर्भर है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद
एक साम्राज्यवादी शक्ति के रूप
में ब्रिटेन के कमजोर पड़ जाने और अमेरिका के महा
साम्राज्यवादी शक्ति के रूप
में उभरने के बाद इसकी लगाम अमेरिका के हाथ
में आ गई। तब
से अरब
जगत में
इज़राइल अमेरिकी सैन्य चौकी के रूप
में काम
करता है और
अरब देशों पर दबदबे
का प्रमुख अमेरिकी हथियार बना हुआ
है। फिलिस्तीनी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष तब से
लगातार जारी है और
अरब जगत
की विभिन्न प्रतिरोध शक्तियाँ इस जद्दोजहद का समर्थन करती रही हैं। ईरानी राज्य भी इस
संघर्ष की हमायत करता है और
फिलिस्तीनी राष्ट्रीय प्रतिरोध शक्तियों को सहायता भी प्रदान करता है। इस
पूरे क्षेत्र में अब
केवल ईरान ही ऐसा
राज्य बचा है
जो अमेरिकी साम्राज्यवादी दबाव के आगे
झुकने से इनकार करता चला आ रहा है।
पहले सीरिया भी अमेरिकी साम्राज्यवादी योजना में फिट
नहीं बैठता था, पर असद
हकूमत के उल्ट जाने के बाद
बड़े क्षेत्रीय राज्य के रूप
में अमेरिका के लिए तात्कालिक मुख्य चुनौती ईरान ही बना
रह रहा
है। इसके अलावा, ईरान के पास
अपने स्वयं के विशाल तेल भंडार हैं और
ये अमेरिकी नियंत्रण से बाहर हैं। ईरान अपने तेल का
व्यापार डॉलर में करने से इनकारी है। तेल
का व्यापार डॉलर में होने के कारण डॉलर की विश्व स्तरीय माँग ऊँची रहती है और
इस तरह
वह मजबूत मुद्रा बना रहता है। दूसरे अरब देश
यह व्यापार डॉलर में करते हैं, जबकि ईरान ऐसा नहीं करता और वह
डॉलर से बाहर व्यापार करने वाले देशों में अगुआ है तथा इस
रुझान को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
यह भी
अमेरिका को गवारा नहीं है।
इसी
परिप्रेक्ष्य में ईरान इज़राइल टकराव 1979 से चल
रहा है, जब ईरान में अमेरिकी पिट्ठू शाह रज़ा पहलवी की हुकूमत को उखाड़कर ‘इस्लामी क्रांति’ के नाम
पर नया
राज्य कायम हुआ था।
इस ‘इस्लामी क्रांति’ में जनता की अमेरिकी साम्राज्य विरोधी तीखी भावनाएँ थीं और
शाह की
पिट्ठू सरकार तथा अमेरिकी साम्राज्य की लूट
और दमन
के खिलाफ प्रचंड रोष था।
इन्हीं हालातों में शाह
का तख्ता पलटकर यह मौजूदा शासन बना और
तब से
ही यह
इज़राइल और अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए
चुनौती बना हुआ
है। इन
दोनों देशों ने यहाँ सत्ता परिवर्तन की अनेक कोशिशें की हैं। पाँच वर्ष पहले ईरान के जनरल क़ासिम सुलेमानी की भी
अमेरिका ने मिसाइल मार कर हत्या कर दी थी
जब वह
इराक में थे।
इस क्षेत्र में ईरान के बढ़ते सैन्य प्रभाव में जनरल क़ासिम सुलेमानी की निर्णायक भूमिका थी और
वह अमेरिकी विरोधी प्रतिरोध शक्तियों के साथ
ईरान के प्रभावी तालमेल की अहम
कड़ी था। ईरान के भीतर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी आई
ए और
इज़राइली एजेंसी मोसाद का व्यापक नेटवर्क सक्रिय है और
इन्होंने कई बार
ईरानी नेतृत्व को खत्म कर, अपने एजेंटों के जरिए सरकार का तख्ता पलटकर, अपना कठपुतली शासन स्थापित करने की मुहिमें नियोजित करने की कोशिशें की, लेकिन ये प्रयास नाकाम रहे। इसी वर्ष की शुरुआत में ईरान में सत्ता विरोधी प्रदर्शनों की एक
लहर उठी, जिसमें अमेरिकी और इज़राइली एजेंसियों की भूमिका भी मानी जा रही
है। इन
बड़े विरोध प्रदर्शनों का मूल
कारण तो ईरानी लोगों के मसले थे, जो बढ़ती महँगाई के कारण बेहद तीखे हो गए।
ईरानी शासन ने कहा
था कि
बढ़ती महँगाई का मुख्य कारण अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध हैं। ईरानी सरकार ने इन
प्रदर्शनों को बल
प्रयोग से कुचल दिया।
अब
भी अमेरिका और इज़राइल की ओर
से भले
ही बहाना परमाणु बम बनाने से रोकने का लगाया गया हो, पर वास्तविक उद्देश्य खुलकर घोषित किया जा रहा
है। हवाई बमबारी से शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर सत्ता परिवर्तन की योजना बनाई गई थी।
अमेरिका यहाँ ऐसी हकूमत चाहता है जिस
के जरिये वह न सिर्फ ईरान के तेल
की मनवांछित लूट कर सके, बल्कि एक और
कठपुतली हकूमत के जरिये मध्य पूर्व में अपनी रणनीतिक योजना लागू कर सके; यानी इज़राइल के क्षेत्रीय विस्तार की चुनौती को खत्म कर सके
और अरब
जगत में
अमेरिकी साम्राज्य विरोधी प्रतिरोध शक्तियों को मिल
रही सहायता को समाप्त कर सके, तथा मध्य पूर्व पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर सके। 2023 में हमास के हमले और उसके बाद ढाई
वर्ष तक चले
इज़राइली बारूदी क़हर ने
इस क्षेत्र में फिलिस्तीन के मसले को फिर से
केंद्र में ला
खड़ा किया है। इसी
समय ईरान और इज़राइल के परस्पर विरोध में और
तीखापन आ गया, क्योंकि फिलिस्तीनी जन संघर्ष और अन्य प्रतिरोध शक्तियों को मिल
रही ईरानी सहायता के कारण ईरान, इज़राइल के निशाने पर और ज्यादा आ गया।
ईरान को परमाणु बम न बनाने देने की अमेरिकी धौंस, नंगी गंडागर्दी की नीति पर आधारित है। वह
स्वयं और अन्य साम्राज्यवादी देश तो
परमाणु बम बना
सकते हैं, लेकिन बाकी देशों को वह
यह अधिकार देने से इनकार करते हैं और
उन देशों पर पाबंदियाँ लगाते हैं। यदि साम्राज्यवादी देश परमाणु हथियार रख सकते हैं, तो अन्य क्यों नहीं – यह बहुत ही तार्किक और न्यायोचित सवाल है, लेकिन अमेरिका की नीति ताकत के अहंकार और धौंस पर टिकी हुई है। यह
व्यवहार उसकी लुटेरी साम्राज्यवादी योजनाओं और उद्देश्यों से तय होता है। इराक पर हमले के समय भी
यही तर्क दिया गया था, जबकि इराक में “विनाशकारी हथियारों” की मौजूदगी के बारे में उसका झूठ दुनिया भर में
बेनकाब हो चुका है।
मौजूदा हमला और ईरानी प्रतिरोध:
अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने इस क्षेत्र में पहले भी अनेकों हमले किए
हैं, कई हकूमतों को पलटाया है और इराक अफगानिस्तान
जैसे देशों में बड़े युद्ध अभियान चलाए हैं। ‘अरब स्प्रिंग’ के समय
भी अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने मिस्र, ट्यूनीशिया
और लीबिया जैसे देशों में जनता के उठान का इस्तेमाल कर अपनी ही सेवक लेकिन अप्रासंगिक
हो चुकी सरकारों को हटवाकर नई कठपुतली हुकूमतें कायम की। अमेरिका द्वारा 2001 में अफगानिस्तान पर किए गए हमले के समय से अब
हालात बदल चुके हैं। तब पूरे नाटो खेमे का साथ उसे हासिल था और अफगानिस्तान की तालिबान
हकूमत भी अपेक्षाकृत कमजोर थी। तब 9/11 हमलों
के आरोपियों को पकड़ने का बहाना बनाकर अमेरिका ने हमला किया और दुनिया के सामने इसके
लिए भावनात्मक औचित्य जुटाने की कोशिश की। यह हमला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के
प्रस्तावों की ओट में किया गया था। इसे ओसामा बिन लादेन को पकड़ने की मुहिम और अमेरिका
की “आत्म रक्षा” के अभियान के रूप में पेश किया गया। अमेरिकी नेतृत्व में एक “अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल” बनाया गया था। यह अलग बात है कि 20 साल बाद जब अमेरिका हारकर निकला, तो वही तालिबान फिर से सत्ता में आ गए। 2001 की उस स्थिति में अमेरिकी साम्राज्यवादियों
को दुनिया में अलग-थलग पड़ने की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा
था। 2003 में सद्दाम हुसैन के शासन के समय इराक पर हमले
के दौरान नाटो साम्राज्यवादी खेमे में दरारें जरूर दिखीं, लेकिन अब अमेरिकी की महाशक्ति की हैसियत को उससे कहीं अधिक आघात पहुँच
चुका है। नाटो खेमे से उभर रहे टकराव सामने आ रहे हैं। पहले यूक्रेन और फिर ग्रीनलैंड
के सवाल पर यूरोपीय साम्राज्यवादी शक्तियों का अमेरिका से टकराव जाहिर हो चुका है।
साम्राज्यवादी अंतर विरोध पहले की तुलना में काफी गहरा हो चुका है। रूस के साथ तो मामला
ही अलग है; वह टकराव तो अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो गठजोड़
के भीतर ही दिखाई दे रहा है। अब ईरान पर हमले के समय ब्रिटेन ने पहले अपने एयरबेस का
इस्तेमाल करने देने से इनकार कर दिया, जिस
पर ट्रंप काफी बौखला गया और ब्रिटिश शासकों पर बरस पड़ा। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री केयर
स्टार्मर ने कहा कि उन्होंने इराक हमले से सबक लिया है और वे इस अमेरिकी हमले में शामिल
नहीं हो रहे। उन्होंने टिप्पणी की कि “हम आसमान
से शासन बदलने में विश्वास नहीं रखते। इस बार ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश इस हमले के प्रोजेक्ट में शामिल नहीं हैं।
हालाँकि उनके साम्राज्यवादी हित भी ईरान के साथ टकराव में हैं, पर अमेरिका के साथ साझा सहमति नहीं बन पा रही। ट्रंप अब नाटो को हॉर्मुज़
जलडमरूमध्य को खुलवाने के लिए साथ आने पर गुहार लगा रहा है। एक तरफ अपने साझेदारों
सहयोगियों के बीच अमेरिका की यह हालत है, दूसरी
ओर दुनिया भर में भी उसके अलग-थलग
पड़ने की स्थिति और गहरी हो गईं है। विशेष रूप से ट्रंप के पिछले वर्ष के अहंकारी रवैये
ने दुनिया भर में अमेरिकी साम्राज्यवाद के धौंसगिरी वाले व्वहार को उजागर कर दिया है।
फिलिस्तीनी जनता के नरसंहार में इज़राइल की पीठ पर खड़े अमेरिकी साम्राज्य को अभी अभी
समूची दुनिया ने देखा है और हज़ारों बच्चों के कातिल के रूप में खून से लथपथ अमेरिकी
साम्राजियों का चेहरा दुनिया के सामने आ चुका है। ऐसे हालत में ईरान पर आक्रमण के लिए
अमेरिकी साम्राज्यवाद को दुनियाभर में किसी भी तरह का समर्थन हासिल नहीं है, और उसके इस तरह अलग- थलग
पड़ने का असर ही है कि पश्चिमी यूरोपीय साम्राज्यवादी देश भी खुले तौर पर उसके साथ खड़े
होने से बच रहे हैं। उन पर “अविश्वसनीय
साझेदार” के रूप में भी अमेरिकी साम्राज्य की छवि का
असर पड़ा है, क्योंकि उनका अनुभव है कि कई मौकों पर अमेरिका
उन्हें अकेला छोड़कर अपनी खाल बचाने भाग खड़ा हुआ है। यूक्रेन युद्ध को खत्म करने और
रूस को रियायतें देने के मुद्दे पर पैदा हुए मतभेद भी इसी प्रकृति के हैं; रूस के प्रति ट्रंप का नरम रुख यूरोपीय शक्तियों को खटक रहा है।
पिछले साल जून में भी अमेरिकी और इज़राइली विमानों से ईरान पर बमबारी
कर उसके परमाणु कार्यक्रम को नष्ट कर देने के दावे किए थे, लेकिन तब न तो ईरान को कोई बड़ा नुकसान पहुँचाया जा सका और न ही उसे
अमेरिका विरोधी प्रतिरोध शक्तियों की मदद करने से रोका जा सका। उलटे, ईरान द्वारा इज़राइल पर दागी गई मिसाइलों ने इज़राइली हाकिमों को वास्तविक
झटका दिया और उनकी घमंड भरी हेंकड़ी को आघात पहुंचाया। ट्रंप ने फिर से उसी परमाणु कार्यक्रम
को नष्ट करने की घोषणा की, जिसे
वह पहले ही अपने
B 2 विमानों से ध्वस्त
करने का दावा कर चुका था।
वार्ता के दौरान अब भी ईरान संभावित अमेरिकी हमले की तैयारी करता रहा
है। ईरान ने अपने देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए इस धौंस भरे हमले का करारा जवाब
दिया है। उसने इस क्षेत्र के अरब देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें
दागकर अमेरिकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को खुली चुनौती दी है। इन हमलों में अमेरिकी सैनिक
मारे गए हैं और आधुनिक सैन्य उपकरणों का भी नुकसान हुआ है। ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों
और आवाज की रफ्तार से भी तेज़ सुपरसोनिक मिसाइलों ने इज़राइल और अमेरिकी ठिकानों पर
गंभीर तबाही मचाई है,
भले ही उनके द्वारा यह नुकसान बहुत कम करके
बताया जा रहा हो। ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों से भयभीत अमेरिका अपना “लिंकन”
युद्धपोत समुद्रों में पीछे हटा चुका है।
हमले से पहले ईरान ने घोषणा की थी कि वह हमले के विरोध में हॉर्मुज़
जलडमरूमध्य को बंद कर देगा, जहाँ
से दुनिया के
25–30 प्रतिशत तेल और गैस
की आपूर्ति गुजरती है। ईरान ने यहाँ से जहाजों के गुजरने पर रोक लगा दी है, जिससे पूरे विश्व में इसके प्रभाव दिखाई देने लगे हैं अमेरिकी साम्राज्यवादी
इस मार्ग से अपने पिट्ठू देशों के तेल टैंकरों को सुरक्षा देने से पीछे हट गए हैं, क्योंकि ईरानी मिसाइलों के सामने ऐसा करना विनाश को निमंत्रण देने जैसा
है। अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा हवाई बमबारी के ज़रिए नेतृत्व की हत्या कर अपने
एजेंटों के जरिये सत्ता परिवर्तन कराने की योजना फिलहाल तो असफल हो चुकी है। रॉयटर्स
के अनुसार, अमेरिकी और इज़राइली सत्ता के प्रमुख हलके अब
इसे जल्दी पूरा हो जाने वाली योजना नहीं मान रहे। ईरान के नए नेतृत्व ने प्रतिरोध जारी
रखा हुआ है। ईरान में राष्ट्रीय सम्मान और रक्षा का सवाल उभार पर है। लाखों ईरानी लोग
बम बरसाते अमेरिकी इज़राइली विमानों के साये में भी बेखौफ सड़कों पर निकल रहे हैं और
अमेरिकी इज़राइली शासकों को ललकार रहे हैं, जबकि इज़राइल बंकरों में दुबका हुआ है। ईरान के नए सर्वोच्च नेता बने
ख़ामेनेई के पुत्र ने हमले रोकने के लिए अमेरिका से इन शर्तों की मांग की है: ईरान पर हमले तत्काल बंद किए जाएँ, ईरान को हुए नुकसान की भरपाई की जाए और भविष्य के लिए सुरक्षा की गारंटी
दी जाए। ऐसा न करने की स्थिति में उन्होंने घोषणा की है कि अमेरिकी सैन्य अड्डों और
इज़राइल पर हमले जारी रहेंगे और ये हमले तब तक चलते रहेंगे जब तक ये अड्डे नष्ट नहीं
कर दिए जाते। ईरान के लोगों को इस शासन से मुक्ति दिलाने के नाम पर बमबारी करने आया
अमेरिकी साम्राज्य अब खुद आगे युद्ध में उलझते जाने से घबरा रहा है। अमेरिका के भीतर
से हुए विरोध और युद्ध के भारी बजट तथा अपेक्षित लक्ष्य हासिल न होता देख, ट्रंप रोज़ अपने बयान बदल रहा है। पहले दिन उसने ईरानी सत्ता परिवर्तन
को अपना लक्ष्य बताया,
फिर पाँचवें दिन उसने नए ईरानी नेता के चयन
में शामिल होने इच्छा प्रकट की, और फिर
ग्यारहवें दिन उसने घोषणा कर दी कि अमेरिका जीत चुका है और युद्ध जल्द ही समाप्त हो
जाएगा – जबकि उसी समय ईरानी मिसाइलें और ड्रोन अमेरिकी
अड्डों और इज़राइल पर बरस रहे थे। दुनिया की यह बड़ी सैन्य शक्ति ईरानी प्रतिरोध के
सामने मन-वांछित नतीजे हासिल करने में असहाय दिख रही
है। अमेरिकी युद्ध अभियान त्वरित परिणाम हासिल करने की दृष्टि से फिलहाल विफल होता
नजर आ रहा है।
ईरान के इस तरह डटे रहने की स्थिति में अमेरिका के लिए हालात बेहद पेचीदा
हो गए हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद की, चौधराहट
के विस्तार की जरूरत ही अब उलटी पड़ती दिख रही है, यानी उसके पहले से स्थापित वर्चस्व पर ही चोट पहुँचने की स्थिति बन रही
है। सबसे बड़ी चोट तो यह है कि अब यह हकीकत स्थापित हो चुकी है कि मध्य पूर्व के उसके
सैन्य अड्डे सुरक्षित नहीं हैं। इनके असुरक्षित होने की स्पष्ट निशानदेही हो चुकी है, भले ही ईरान युद्ध का अंतिम परिणाम कुछ भी हो। इन अड्डों की धाक कायम
नहीं रह सकी, और यह तथ्य मध्य पूर्व के भविष्य के घटनाक्रम
के लिए दूरगामी महत्व रखता है। यह अमेरिकी साम्राज्य विरोधी प्रतिरोध शक्तियों को उत्साहित
करेगा। फिलिस्तीनी प्रतिरोध शक्तियों के संघर्ष जज्बे को बल मिलेगा। इस क्षेत्र में
इज़राइल की सैन्य श्रेष्ठता की धाक पर भी चोट पहुँची है। इज़राइल पर गिरी मिसाइलों
ने उसकी उत्कृष्ट हवाई रक्षा प्रणाली के “अजेयता” होने के भ्रम को तोड़ दिया है और उसके भी मार तले आ जाने की हकीकत को
उजागर कर दिया है। उसके अजेय सैन्य तकनीकी क्षमता के दावों को गहरी क्षति पहुंची है।
अमेरिकी युद्ध मशीनरी की तुलना में कहीं सस्ते ईरानी ड्रोन अमेरिका को अरबों डॉलर का
नुकसान पहुँचा रहे हैं। कड़ी अमेरिकी पाबंदियों के बावजूद ईरान द्वारा विकसित प्रतिरोधी
हथियारों की क्षमता की तस्वीर भी उभर कर सामने आ रही है और इसमें रूस और चीन से खरीदी गई हवाई रक्षा
प्रणालियाँ भी शामिल हैं। वहीं ईरानी ड्रोन का इस्तेमाल रूस, यूक्रेन युद्ध में कर रहा है। इस समय ईरान की नीति इज़राइल और अमेरिकी
सैन्य अड्डों को अधिकतम नुकसान पहुँचाने की है। उसका युद्ध अभियान विकेन्द्रित कार्यप्रणाली
से चल रहा है, यानी सभी प्रांतों में सैन्य इकाइयाँ अपने अपने
स्तर पर क्रियाशील हैं और अपने लक्ष्य तय करके हमले कर रही हैं। केंद्रीय कमान के गैरहाजिर
हो जाने की स्थिति में भी ये हमले जारी रहते हैं और अमेरिका इज़राइल के लिए संभावित
लक्ष्यों का ठीक ठीक अनुमान लगाना कठिन हो रहा है। मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य अड्डों
को इस प्रकार के हमलों की चुनौती पहले कभी नहीं मिली थी, और मौजूदा हमलों को दी जा रही इस चुनौती की, तत्काल परिणामों से आगे बढ़कर गंभीर अर्थ-संभावनाएं हैं।
अमेरिकी पिट्ठू अरब हकूमतें भी फँसी हुई दिखाई देती हैं। एक तरफ इन देशों
की जनता में अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ तीखा रोष और बेचैनी मौजूद है, दूसरी ओर इन देशों के शासक अमेरिकी साम्राज्य के पिट्ठू हैं और उन्होंने
अपने देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे बनाने की सहमति दे रखी है। ईरान द्वारा इन सैन्य
अड्डों पर किए गए हमलों को इन अरब देशों के शासकों को भी मजबूरन हज़म करना पड़ा है।
वे अमेरिका के सेवादार होते हुए भी वह, ईरान
पर सीधी जवाबी सैन्य कार्रवाई करने से कतराते दिखाई पड़ रहे हैं। बहुतों के पास तो वैसी सैन्य क्षमता ही नहीं है, जबकि बाकियों ने भी जनता के दबाव के कारण कोई प्रत्यक्ष सैन्य जवाब देने
की हिम्मत नहीं की,
केवल औपचारिक भर्त्सना तक ही सीमित रहे। अमेरिकी
सैन्य कार्रवाई के लिए अपने हवाई अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति देने में भी हिचकचाहट
दिखाई है। अपने ही देशों में बेहद अलोकप्रिय हो चुकी ये हकूमतें, ईरान के खिलाफ एलानिया हमलावर पैंतरा अपनाने से बचती दिख रही हैं। बहरीन
में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर ईरानी हमले का वहाँ की जनता ने खुशी मनाकर स्वागत किया
और सड़कों पर उतरकर अमेरिका विरोधी नारे लगाए।
बौखलाहट से भरा अमेरिकी साम्राज्य का हमलावर रुख:
दुनिया का यह युद्धबाज़ अमेरिकी साम्राज्य इस समय गहरे संकटों से घिरा
हुआ है। उसकी साम्राज्यवादी महाशक्ति की हैसियत पर गंभीर आघात पड़ना शुरू हो चुका है।
इन संकटों से निकलने के लिए वह और अधिक मंडियों पर कब्जा करने, दुनिया के संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने की बौखलाहट भरी सैन्य मुहिम
पर उतारू है। साझेदार साम्राज्यवादी देशों के साथ उसके लुटेरे हितों का टकराव भी तीखा
हो रहा है। दुनिया में डॉलर में ही व्यापार होने के विकल्प तलाशे जा रहे हैं और ब्रिक्स
जैसे गठजोड़ वैकल्पिक मुद्रा प्रणाली की कोशिश कर रहे हैं। डॉलर की सरदारी को वैकल्पिक
व्यापारिक व्यवस्थाओं के माध्यम से चुनौती देने के प्रयास हो रहे हैं। एक साम्राज्यवादी
शक्ति के रूप में रूस का उभार और चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिकी साम्राज्यवाद की वैश्विक
योजनाओं में बाधा खड़ी कर रहा है। यूक्रेन युद्ध के दौरान भी अमेरिका द्वारा रूस पर
लगाई गई पाबंदियाँ उसे झुका नहीं सकीं और यूक्रेन युद्ध में रूस अपेक्षाकृत मज़बूत
स्थिति में है। अमेरिका उससे सीधे टकराव से बचना चाहता है और यूक्रेन की कीमत पर रूस
से सौदा करने के मूड में है।
अमेरिकी साम्राज्यवाद के नए प्रतिनिधि के रूप में ट्रंप “अमेरिका को फिर से महान बनाने” के नारे के साथ नई युद्ध मुहिमों पर सवार है। हालाँकि उसका चुनावी नारा
था कि वह अमेरिका को दुनिया भर के युद्ध पचड़ों से निकाल लेगा, लेकिन सत्ता में आने के एक वर्ष के भीतर ही वह सात देशों पर हमले कर
चुका है। इन हमलों के बिना उसका गुजारा नहीं है, क्योंकि उसकी साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था का संकट उसे इन्हीं रास्तों
से निकास देता दिखाई देता है। भले ही उसका दावा युद्ध रोकने और नोबेल शांति पुरस्कार
पाने का था, लेकिन आखिर में यह सब महज़ प्रचार ही साबित
होना था। ट्रंप अपने खास अंदाज़ में दुनिया में अमेरिकी साम्राज्यवादी धाक जमाने निकला
है। उसने पहले वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति का अपहरण कर वहाँ के तेल भंडारों पर कब्जा
किया। आजकल वह क्यूबा पर दबाव बनाने के लिए उस पर कठोर आर्थिक पाबंदियाँ थोपे हुए है।
जो शासक उसके सामने झुकने को तैयार नहीं होते, उन्हें सत्ता परिवर्तन और सैन्य हमलों के जरिए झुकाने की कोशिश कर रहा
है, जबकि अपनी सेवा बजाने वाली हुक्मरान टोलियों
को चरम तक झुकाकर तरह तरह के व्यापारिक समझौते थोप रहा है। अमेरिकी बाजार तक पहुँच
रोकने के लिए टैरिफ बढ़ाकर दबाव बना रहा है और अपनी शर्तें मनवा रहा है। तेल व्यापार
पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने के लिए हाथ पाँव मार रहा है। ट्रंप हकूमत को देश के भीतर
भी तीखे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उसका अत्यंत दक्षिणपंथी, प्रतिक्रियावादी राजनीतिक पैंतरा अमेरिकी समाज में तीखा ध्रुवीकरण कर
रहा है। एक ओर दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी ताकतें लामबंद होकर ट्रंप के आधार के रूप
में फैल रही हैं,
दूसरी ओर उसके प्रवासी विरोधी रुख और उन पर
दमन के खिलाफ भी तगड़ा विरोध हो रहा है। अब वह एप्सटीन फाइलों के अपराध संबंधी सबूतों
में भी घिरता जा रहा है। ये स्थितियाँ उसे ईरान में लंबा युद्ध उलझाव कायम रखने की
इजाजत नहीं देतीं। अमेरिकी साम्राज्यवादियों की हालत यह है कि वे नए नए कब्जों के लिए
युद्धों के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था की वृद्धि बनाए रखना चाहते हैं, और वही युद्ध उलझाव उलटे उनकी अर्थव्यवस्था के दिवालियेपन का ही कारण
बन जाते हैं। इस युद्ध के पहले छह दिन ही अमेरिका को 11.3 अरब डॉलर में पड़े हैं। यह अमेरिकी साम्राज्य
की संकटग्रस्त विश्व चौधराहट की स्थिति है, जिसे ईरान युद्ध ने और अधिक उजागर कर दिया है। वह आक्रामक है, क्योंकि डूब रहा है! यह उसके
वर्चस्व की चढ़त नहीं
- उसके पतन के संकट
का इज़हार है, और ईरान पर हमला उसी का एक और प्रगटीकरण है।
ईरानी प्रतिरोध अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए भी अप्रत्याशित साबित हुआ है। वर्तमान
स्थिति बेहद नाज़ुक मोड़ पर है। यदि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो भी जाए और वहाँ अमेरिकी
पिट्ठू हकूमत काबिज हो जाए, तो भले
ही अस्थायी रूप से मध्य पूर्व में अमेरिकी प्रभुत्व और वर्चस्व मजबूत हो सकता है, पर यह अंतिम जीत नहीं होगी, क्योंकि जन प्रतिरोध तो अलग अलग रूपों में जारी ही रहेगा। लेकिन यदि
ईरानी प्रतिरोध कायम रहता है और अमेरिकी युद्ध अभियान अपने मनचाहे परिणाम हासिल नहीं
कर पाता, तो यह अमेरिका के लिए घातक अर्थ संभावनाएँ उतपन
करेगा, और इसके, अरब जगत की अमेरिका विरोधी प्रतिरोध शक्तियों के लिए एक बड़ी जीत जैसे
मायने होंगें। अमेरिकी साम्राज्यवादी हमले और ईरानी प्रतिरोध द्वारा फिलहाल इसी बात
का निपटारा होना है।
(13 मार्च, 2026)
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