Monday, December 8, 2025

बठिंडा में हुई राज्य स्तरीय कन्वेंशन का संदेश:

 बठिंडा में हुई राज्य स्तरीय कन्वेंशन का संदेश:

- तीव्र भूमि सुधारों की मांग को ले लामबंद हों खेत मजदूर और किसान

- जमीन प्राप्ति और सुरक्षा के लिए संघर्षों के साझा आधार को सुदृढ़ किया जाए



 पंजाब खेत मजदूर यूनियन और लोक मोर्चा पंजाब द्वारा  29 अगस्त को बठिंडा में भूमि प्राप्ति और सुरक्षा के मुद्दों पर एक राज्य स्तरीय कन्वेंशन आयोजित की गई और इन मुद्दों पर किसानों और खेत मजदूरों को लामबंद करने के लिए राज्य में "फिर से करो भूमि वितरण" नामक एक लामबंदी अभियान शुरू किया गया। अनाज मंडी में एकत्र हुए इस सम्मेलन में दोनों संगठनों के सक्रिय कार्यकर्ता, संघर्षशील किसान कार्यकर्ता और नेता भी शामिल हुए।

इस सम्मेलन को दिल्ली से पहुंचे जम्हूरी अधिकारों की एक प्रमुख कार्यकर्ता डॉ नवशरण ने विशेष रूप से संबोधित किया। उन्होंने कहा कि देश की सरकारें भूमि सुधारों के ज़रिए ज़मीनों की अन्यायपूर्ण रूप से नाबराबर मलकियत को ख़त्म करने के औपचारिक एजेंडे को तो बहुत पहले ही छोड़ चुकी हैं और इसके उलट, ज़मींदारों के साथ-साथ अब कॉर्पोरेट घराने भी विशाल भूखंडों की मलकियत के ज़रिए नए ज़मींदारों के रूप में उभर रहे हैं। उन्होंने किसानों की ज़मीनों को कंपनियों को सौंपने के लिए देश भर में किए जा रहे हमले के पैमाने और गंभीरता पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि कैसे देश और राज्यों की सरकारें साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारोबार के लिए भूमि बैंक बनाने की योजना बना रही हैं और पंजाब की लैंड पूलिंग नीति भी इसी लैंड बैंक नीति का एक हिस्सा थी। उन्होंने कहा कि लोगों के जीवन की बेहतरी के लिए, कंपनियों को ज़मीन सौंपने के बजाय, भूमि सुधारों के ज़रिए खेतिहर मज़दूरों और ग़रीब किसानों को ज़मीन का मालिकाना हक़ देने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने के लिए देश में भूमि सुधार बेहद ज़रूरी हैं। उन्होंने भूमि के न्यायपूर्ण बटवारे और किसानों की जमीनों पर हो रहे हमलों से सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण और बुनियादी मुद्दों को लोगों के बीच लामबंदी का मुद्दा बनाने के लिए दोनों संगठनों के प्रयासों का स्वागत किया।

पंजाब खेत मज़दूर यूनियन के राज्य सचिव लछमन सिंह सेवेवाला, लोक मोर्चा पंजाब के राज्य सचिव जगमेल सिंह के अलावा प्रमुख किसान नेता सुखदेव सिंह कोकरी कलां ने भी सम्मेलन को संबोधित किया। नेताओं ने लोगों से आह्वान किया कि वे तीब्र भूमि सुधारों को लागू करके खेत मजदूरों और भूमिहीन किसानों को भूमि और कृषि उपकरणों का मालिक बनाने के मूल मुद्दे पर लामबंद हों और इससे संबंधित मांगों, जैसे: भूमि हदबंदी अधिनियम को सख्ती से लागू करना, जमींदारों के लिए अतिरिक्त भूमि रखने का रास्ता बंद करना, सभी परिवारों को भूमि उपलब्ध कराने के लिए जरूरत के अनुसार भूमि सीमांकन को तर्कसंगत बनाना, साहूकारों की लूट को खत्म करना, सरकारी नजूल और बेनामी जमीनों को खेत मजदूरों और भूमिहीन किसानों के लिए आरक्षित करना और बड़ी कंपनियों को उनके हस्तांतरण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना, आबादकार किसानों को भूमि का मालिकाना हक देना और पूर्व और वर्तमान जमींदारों द्वारा बटाईदार किसानों की जमीनों को जब्त करने के कदमों को रोकना इत्यादि के लिए संगठित हों और संघर्षों के मैदान में उतरें। वक्ताओं ने इन मांगों के समाधान को एक वैकल्पिक जनहितैषी विकास मॉडल से भी जोड़ा और इन कदमों को जनहितैषी विकास का रास्ता अपनाने की दिशा में बुनियादी कदम बताया। कृषि क्षेत्र से सामंती शोषण के खात्मे के साथ-साथ साम्राज्यवादी शोषण के खात्मे की आवश्यकता को भी उभरा गया। इन मांगों को हासिल करने के लिए साधारण औपचारिक संघर्षों से आगे बढ़कर, उग्र जनसंघर्षों की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।

खेत मजदूर प्रवक्ता ने जहाँ जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव की परिघटना को भूमि के स्वामित्व के अभाव से जोड़ा, वहीं किसान नेता ने किसानों की भूमि पर हो रहे हमलों से सुरक्षा और जमीन प्राप्ति के संघर्षों में खेत मजदूरों और किसानों की एकजुटता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने जाति के आधार पर ज़मींदारों द्वारा किसानों को खेत मज़दूरों के ख़िलाफ़ लामबंद करने के कू-चलन को परास्त कर देने तथा किसानों और खेत मज़दूरों के, जमीनों पर हो रहे हमलों से सुरक्षा और जमीन प्राप्ति के साझा हितों को आगे बढ़ाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने जातिगत अहंकार को सिरे से नकारते हुए इसे किसान-खेत मज़दूर एकता में एक बड़ी बाधा बताया। उन्होंने तथाकथित निचली जातियों के लोगों की महान श्रमिकों के रूप में सराहना की। लोक मोर्चा पंजाब के प्रवक्ता ने पंजाब में ज़मीन प्राप्ति के लिए उठ रही आवाज़ और खेत मज़दूरों में ज़मीन के अधिकारों के लिए तीब्र हो रही मांग का ज़िक्र किया और संगरूर में खेत मज़दूरों द्वारा ज़मीनों पर अपने अधिकार जताने के घटनाक्रम को इस तीब्र हो रही मांग की अभिव्यक्ति के तौर पर एक शुभ संकेत बताया।

 

पंजाब खेत मजदूर यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष ज़ोरा सिंह नसराली की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन के दौरान संयुक्त रूप से घोषणा की गई कि इन मुद्दों पर अगले महीने पंजाब के विभिन्न इलाकों में सम्मेलन और जन-प्रदर्शन आयोजित किए जाएँगे। सम्मेलन के दौरान एक विशेष प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें मांग की गई कि लैंड पूलिंग नीति के रद्द होने के बाद अब पंजाब सरकार द्वारा वैकल्पिक तरीकों से पंचायती ज़मीनों के अधिग्रहण के लिए अपनाए जा रहे कदमों को तुरंत रोका जाए और पंचायती ज़मीनें बेचने के प्रस्ताव पारित करने के जो निर्देश दिए जा रहे हैं उन्हें तुरंत वापस लिया जाए। इसके साथ ही, सम्मेलन में राज्य में बाढ़ की गंभीर स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई और बाढ़ से प्रभावित लोगों के साथ अपनी सहानुभूति व्यक्त की गई। उन्होंने सरकार से माँग की कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के लिए युद्धस्तर पर राहत कार्य चलाए जाएँ और सरकारी खजाने से पुनर्वास व मुआवज़े के लिए तुरंत कदम उठाए जाएँ। संगठनों ने सभी जन-पक्षधर संगठनों और जन-पक्षधर ताकतों से बाढ़ प्रभावित लोगों की हर संभव मदद के लिए आगे आने का आह्वान किया। सम्मेलन के अंत में एक प्रतीकात्मक मार्च भी निकाला गया, जिसमें इन माँगों को लेकर ज़ोरदार नारेबाज़ी की गई।

सम्मेलन के आयोजक नेताओं ने कहा कि आज के सम्मेलन में हुई चर्चाओं को अगले महीने तक खेत मज़दूर बस्तियों और ग़रीब व भूमिहीन किसानों तक पहुँचाया जाएगा और उन्हें इन मुद्दों पर लामबंद करते हुए ज़ोरदार संघर्षों की नींव रखने के लिए प्रेरित किया जाएगा। दोनों संगठनों ने इन मुद्दों पर चर्चा करते हुए एक पुस्तिका भी प्रकाशित की है, जिसे आने वाले दिनों में अभियान के दौरान गाँवों में वितरित किया जाएगा।

इस सम्मेलन का मुख्य संदेश भूमि पुनर्वितरण के सवाल और उससे जुड़े मुद्दों के साथ-साथ, इन मुद्दों को अपनी जमीनों पर हो रहे हमलों से सुरक्षा  के लिए संघर्षरत किसान आंदोलन के सरोकारों से जोड़ना था। जमीनों की सुरक्षा और जमीन प्राप्ति के सरोकारों के बीच आने वाली जातिगत बाधा को एक सही वर्गीय दृष्टिकोण से संबोधित होने का संदेश भी उभारा गया। इस प्रकार, इस सम्मेलन के द्वारा, एक क्रांतिकारी भूमि आंदोलन के निर्माण के लिए आवश्यक सही दिशा को उजागर किया गया। आशा है कि इस दिशा के अनुरूप लामबंदी, राज्य में भूमि मुद्दे को आवश्यक सही संघर्ष चौखटे में उभारने का साधन बनेगी।

 

शहीद भगत सिंह के इंकलाब के नारे की गूंज बुलंद करो

 शहीद भगत सिंह के इंकलाब के नारे की गूंज बुलंद करो



 

हमारी धरती के लोग सदियों से राजाओं, नवाबों, सामंतों, ज़मींदारों और विदेशी आक्रांताओं के शोषण से पीड़ित रहे हैं। सत्रहवीं शताब्दी में इस धरती पर ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के आगमन ने इस शोषण को कई गुना बढ़ा दिया था। इस शोषण से मुक्ति पाने के लिए लोग बार-बार उठ खड़े हुए और आज़ादी के लिए संघर्ष किया। लेकिन ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के विरुद्ध हमारे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन की यात्रा अपने अंदर अत्यंत जटिलताएं समाए हुए थी। परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण की दो शताब्दियों बीत जाने के बाद भी और विभिन्न स्थानों पर विद्रोहों की लम्बी श्रृंखला जारी रहने के बावजूद भी, हमारा स्वतंत्रता आंदोलन ब्रिटिश साम्राज्यवादियों पर करारा प्रहार करने में कमज़ोर रहा। इन जटिलताओं में एक यह थी कि जनता की क्रांतिकारी शक्तियों के कमज़ोर होने के कारण, लुटेरे दलाल वर्ग (जिनकी नुमाइंदगी नेहरू, गांधी, जिन्ना, पटेल इत्यादि करते थे) राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व के केंद्र की भूमिका संभाल चुके थे और जनता की विशुद्ध राष्ट्रीय भावनाओं को नपुंसक कार्रवाइयों के बवंडर में उलझाए रखने में कामयाब हो रहे थे। एक और बाधा यह थी कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्षरत शक्तियों के एक बड़े हिस्से को प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्यों के प्रति ही अस्पष्टता थी।

आज़ादी के नक्श धुंधले थे। साम्राज्यवादी लूट और सामंती लूट के गहरे सबंध और इस गठबंधन को आज़ादी आंदोलन के साझा चोट लक्ष्य के रूप में चिन्हित करने में अनुभवहीनता थी। सभी जनशक्तियाँ और यहाँ तक कि पिछली सदी के दुसरे दशक में अस्तित्व में आई कम्युनिस्ट पार्टी भी साम्राज्यवादी लूट और सामंती लूट की इस बग़लगीर जोड़ी के वास्तविक चरित्र और इस से मुक्ति का एक स्पष्ट लक्ष्य उभार पाने में बेहद अक्षम सिद्ध हो रही थी। इस लूट से मुक्ति के लिए जनक्रांति का संदेश भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अज्ञात था। ऐसे समय में, भगत सिंह और उनके साथियों ने अपने बलिदान से क्रांति के संदेश को सींचा और उसे देश की फ़िजा में गूंजाया। फाँसी के फंदे की ओर निडरता से बढ़ते युवाओं के मुख से इस देश की जनता ने 'इंकलाब ज़िंदाबाद' और 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' का पैगाम सुना। इन वीर योद्धाओं द्वारा न्यायालयों में दी गई तकरीरों, सार्वजनिक हुए लेखों और जेल से लिखे गए पत्रों के ज़रिये जनता को यह ज्ञात हुआ कि भारतीय जनता को गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए इस धरती पर क्रांति आवश्यक है। "एक ऐसी क्रांति जिसका तात्पर्य है - प्रत्यक्ष अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था को बदला जाए। क्रांति, जिसका मतलब सिर्फ़ शासकों का बदलना नहीं बल्कि एक बिल्कुल नए ढाँचे और एक नई शासन व्यवस्था की स्थापना है। जिसका मतलब है वो आज़ादी जिसमें इंसान द्वारा इंसान का शोषण नामुमकिन हो जाएगा।"

ब्रिटिश हुकूमत ने फ़िज़ा में इस पैगाम को फैलाने वाली साँसों को तो चाहे दबा दिया, लेकिन 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' के नारे की गूँज उठती रही, लोगों के कानों तक पहुँचती रही और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और उनके ख़िदमतगारों के दिलों में दहशत पैदा करती रही। इन्हीं शब्दों की रोशनी में आगे के सालों में इस धरती पर तिभागा और तेलंगाना जैसे विद्रोह भड़क उठे और मज़दूरों की विशाल संघर्ष लहरें उठी। महान नौसैनिक विद्रोह के दौरान, यह नारा कराची और बम्बई की दीवारों पर चमक उठा तथा लोगों और विद्रोही सैनिकों के होठों पर गूंज उठा, जिसने ब्रिटिश उपनिवेशवादियों को यहाँ से भागने पर मजबूर कर दिया था।

1947 में सत्ता परिवर्तन द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन की पीठ में खंजर घोंपा गया। इस दंभी खेल के ज़रिये लोगों के समक्ष एक बड़े बदलाव का भ्रम पैदा कर, साम्राज्यवादियों के उत्तराधिकारी भारतीय शासकों द्वारा इन शब्दों को ही अप्रासंगिक कर देने की ख्वाइशें पाल लीं गई। लेकिन इस परिवर्तन के साथ, न तो लोगों का संताप समाप्त हुआ, न ही लूट के खिलाफ संघर्ष समाप्त हुआ, न ही इन शब्दों का संदर्भ समाप्त हुआ। इन शब्दों की गूंज 1947 के बाद भी शासकों को आतंकित करती आ रही है। श्रीकाकुलम, नक्सलबाड़ी से लेकर बस्तर तक, ये शब्द बार-बार बुलंद होते रहे हैं। साम्राज्यवादी शोषण के इजहारों के विरुद्ध जन संघर्षों में यह प्रतिध्वनि जीवंत रही और जन संघर्षों को रौशनी और गति प्रदान करती रही। जैसे-जैसे नव-उपनिवेशवाद और सामंतवाद के संयुक्त शोषण के पाश की जकड़न हमारी धरती के लोगों पर कसती जा रही, इन शब्दों को प्रतिध्वनित करने की आवश्यकता और उनके वास्तविक अर्थ को पहचानने की चाह तीव्र होती जा रही है।

भगत सिंह ने एक मुल्क के हाथों दुसरे मुल्क के शोषण के खात्मे की जो बात की थी, आज हमारे देश के मेहनतकश लोग उसी शोषण के असंख्य रूपों के शिकार हैं। साम्राज्यवादी शोषण ने हमारे देश के हर क्षेत्र में कैंसर की तरह गहरी जड़ें जमा ली हैं। कृषि, उद्योग, सेवा, बाजार, प्राकृतिक संसाधन आदि हर क्षेत्र से धन और श्रम का साम्राज्यवादी शोषण हमारी अर्थव्यवस्था को बेदम बना रहा है। एक देश के हाथों दुसरे देश का यह साम्राज्यवादी शोषण न केवल संसाधनों की जब्ती के माध्यम से, बल्कि अपनी मर्जी की नीतियों और कानूनों को हमारी जनता पर थोपने के माध्यम से भी प्रकट हो रहा है। क्रांति इस शोषण के पूर्ण उन्मूलन की घोषणा है। हर क्षेत्र में हमारी राष्ट्रीय संपत्ति को निचोड़ रही विदेशी कंपनियों का निष्कासन और जब्ती नव-जम्हूरी क्रांति के प्रमुख कार्यों में से एक है। साम्राज्यवादी शोषण की इस रक्त-चूसने वाली जोंक को अपनी देह से हटाकर ही हमारे देश की अर्थव्यवस्था अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है, फल-फूल सकती है और अपने लोगों के लिए समृद्धि का सबब बन सकती है।

इसी प्रकार, हमारे देश में सदियों से चला आ रहा परिसंपत्तियों का अत्यधिक असमान विभाजन और उससे उत्पन्न सामंती शोषण भी क्रांति के माध्यम से ही समाप्त होगा। संपत्ति के इस ग़ैर-बराबरी वाले विभाजन के उन्मूलन ने ही मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के आधार को नष्ट करना है। सदियों से मुट्ठी भर लोग अत्यधिक संसाधनों की मिल्कियत के बल पर उच्च हैसियत और प्रतिष्ठा का आनंद लेते आ रहे है। इसके विपरीत, अपने श्रम से इस समाज को गति देने वाले लोग संसाधनहीन चले आ रहे हैं और हर कदम पर खुद को दीन, कमजोर और असहाय महसूस करते आ रहे हैं। ये लोग जीवन में पैर पैर पर धक्के खाने और संसाधनों पर मलकियत जमाए रखने वालों की मिन्नत मोहताजी को मजबूर होते रहे हैं। भूमि के असमान वितरण को समाप्त कर, मेहनतकशों को भूमि और संपत्ति का स्वामित्व देना क्रांति का दूसरा प्रमुख कार्य है। भूमि, औजारों और संसाधनों पर लोगों का समान स्वामित्व वह आधार तैयार करता है जिसके माध्यम से मोहताजी को तोड़ा जा सकता है और लोगों के गौरव-प्रतिष्ठा को बहाल किया जा सकता है।

क्रांति के माध्यम से भूमि और संसाधनों का इस तरह हुआ पुनर्वितरण लाखों लोगों के लिए रोजगार का आधार बनता है। भूमि की उपलब्धता से न केवल कृषि क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलेगा, बल्कि इसके साथ ही अनेक अन्य क्षेत्रों में भी रोजगार के अनंत अवसर सृजित होंगे। क्रांति से सृजित जनपक्षधर समाज में ही उद्योग, सेवा एवं अन्य क्षेत्रों में ऐसी नीतियाँ लागू की जा सकेंगी, जिनका उद्देश्य बेकार पड़ी श्रमशक्ति को अधिकतम रोजगार प्रदान करना होगा, न कि साम्राज्यवादी मुनाफों की आवश्यकताओं के अनुसार अंधाधुंध मशीनीकरण जैसी कार्यप्रणाली को लागू करना। इस प्रकार, क्रांति ने  वह आधार तैयार करना है जिस के ज़रिये सभी के लिए रोजगार का लक्ष्य वास्तविक रूप से प्राप्त किया जा सकेगा।

भगत सिंह और उनके साथियों ने कहा था कि क्रांति वह करिश्मा है जिसे प्रकृति भी पसंद करती है। क्रांति के माध्यम से ही प्रकृति न्याय के सिद्धांत को लागू किया जा सकता है। हमारे देश के लोगों को कदम कदम पर अनेकों भेदभावों का सामना करना पड़ता है। क्रांति उन सभी भेदभावों का उन्मूलन करेगी। मुट्ठी भर लोगों की समृद्धि की रक्षा करने वाली वर्तमान व्यवस्था बहुसंख्यक मेहनतकश जनता की बदहाली और उत्पीड़न के सहारे ही चल रही है। इसीलिए इस अन्याय को सुनिश्चित करने के लिए उत्पीड़न, भेदभाव, दमन इस व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं। यह व्यवस्था लोगों के बीच छोटे-मोटे मतभेदों की रेखाओं को गहरा करके, मेहनतकश लोगों को भ्रमित और विभाजित करती है। इसी वजह से, तथाकथित आज़ादी और जम्हूरियत के दशकों बाद भी लिंग, नस्ल, धर्म, जाति, क़ौमियत आदि के आधार पर भेदभाव जारी रह रहे हैं। क्रांति ने ऐसे सभी भेदभावों के उन्मूलन की नींव रखनी है। इन मतभेदों को बढ़ावा देने वाली ताकतें क्रांति की कट्टर दुश्मन हैं। ऐसी सभी ताकतों को नष्ट कर, क्रांति प्रकृति विस्तार में सम्मिलित सभी मनुष्यों के लिए समानता की वाहक बनेगी।

हमारे देश में, लाभ-लोलुप साम्राज्यवादी व्यवस्था ने न केवल मानव श्रम और पृथ्वी के संसाधनों का शोषण किया है, बल्कि यह मुनाफे के लिए प्राकृतिक पर्यावरण को भी नष्ट कर रही है। लाभ की इसी हवस के कारण ही धरती से कई प्रकार की वनस्पतियाँ, जनजातियाँ और नस्लें विनष्ट हो गई हैं। अनेकों जगहों पर बाढ़, सूखा और आपदाएँ, मुनाफों की इसी लालसा का परिणाम हैं। मुनाफे की इस हवस ने इस धरती पर लाखों दुर्घटनाओं को जन्म दिया है और अनगिनत मानव जीवन की बलि ली है। क्रांति के ज़रिये ही मुट्ठी भर लोगों के मुनाफों हेतु प्रकृति से छेड़छाड़ के प्रयासों पर अंकुश लगाया जा सकता है। हमारे प्राकृतिक पर्यावरण को विनाश से बचाया जा सकता है और उसे लंबे समय तक रहने योग्य रखा जा सकता है।

साम्राज्यवादी ग़लबा और भारतीय शासकों की निरंकुश, विस्तारवादी और अल्पसंख्यक-विरोधी निति  मिलकर भारत में अनेकों भाषाओं, संस्कृतियों और क़ौमियतों को कुचलते आए हैं। कश्मीर जैसी क़ौमियतें दशकों से निरंकुश और दमनकारी शासन से पीड़ित हैं। हमारी भूमि के लोग पश्चिमी संस्कृति के दबदबे तले रह रहे हैं। उन पर थोपी गई विदेशी भाषा उनकी मौलिकता की बलि ले रही है और वे अपनी मातृभाषा से दूर होने के लिए अभिशप्त हैं। इस ग़लबे के कारण हमारी अनेकों भाषाएँ हजारों शब्द खो चुकी हैं और पतन की ओर अग्रसर हैं। क्रांति के ज़रिये ही इस राष्ट्रीय उत्पीड़न से मुक्ति हासिल होगी। हमारी मातृभाषाओं और संस्कृति को फिर से खिलने का अवसर मिलेगा।

हमारे देश में सामंतवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी क्रांति ने वह नींव रखनी है जिस पर भगत सिंह द्वारा परिकल्पित समाजवादी समाज का निर्माण किया जाएगा। वह समाजवादी व्यवस्था जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को पूरी तरह समाप्त करेगी। उस समाज में वह भौतिक आधार निर्मित होगा जिससे मानव शक्ति के हाथों को काम करने के साधन उपलब्ध होंगे, वह सामाजिक आधार निर्मित होगा जहाँ मनुष्य रोजी-रोटी की चिंताओं से मुक्त हो, वह बौद्धिक आधार निर्मित होगा यहां असंख्य मानव मस्तिष्क दो वक्त की रोटी के बंधनों से मुक्त हो मौलिक विचारों के रचयिता बनते हैं, वह सांस्कृतिक आधार निर्मित होगा यहां मनुष्य खुदगर्ज़ी से ऊपर उठकर इस समाज की भलाई के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है। यही एकमात्र मार्ग है जिस पर चल कर मानव समाज एकजुट होकर और पूरी क्षमता के साथ समस्त मानव जाति की समृद्धि के लिए दृढ़ उद्यम करता है।

इस प्रकार, आज भी भगत सिंह द्वारा बुलंद किया गया क्रांति का मार्ग ही भारत की मेहनतकश जनता की वास्तविक स्वतंत्रता का एकमात्र मार्ग है। इस मार्ग पर चलकर ही सभी प्रकार के शोषण की बेड़ियाँ तोड़ी जा सकती हैं और सदियों से उत्पीड़ित मेहनतकश जनता सही मायनों में जिंदगी जी सकती है। इसी मार्ग पर दीन-हीन का गौरव और निर्बल का बल निहित है। समय, भगत सिंह द्वारा गूँजऐ गए 'इंकलाब ज़िंदाबाद' के नारे को उसी साहस, दृढ़ निश्चय, विश्वास और जज़्बे के साथ बुलंद किये जाने की प्रतीक्षा कर रहा है।


 

पर्यावरण का नाश करने वाले व्यावसायिक प्रोजेक्टों के खिलाफ जाग्रित और संघर्षरत लोग

 पर्यावरण का नाश करने वाले व्यावसायिक प्रोजेक्टों के खिलाफ जाग्रित और संघर्षरत लोग

ला-मिसाल संगठित विरोध के करिश्मे

प्रोजेक्ट रोक दिए गए!



हमारे देश के शासकों द्वारा मुल्क पर थोपे गए साम्राज्यवादी निर्देशित नकली 'विकास मॉडल' के विभिन्न प्रभावों के खिलाफ जनता की चेतना अंगड़ाई ले रही है। आर्थिक लूट के मुद्दों के साथ-साथ इस मॉडल द्वारा फैलाया जा रहा जनसंहारक पर्यावरण विनाश भी अब लोगों के सरोकार के दायरे में आ रहा है। खासकर पिछले दो-ढाई दशकों से प्रदेश में फैल रही गंभीर बीमारियों के संकट की जड़ के रूप में भी इस व्यवस्था द्वारा अब तक लाई गई/लाई जा रही जनविरोधी व पर्यावरण-विरोधी लूटेरियों नीतियों की चर्चा होने लगी है। यह शुभ संकेत ही है कि लोग, लग चुके या लगने जा रहे इन जनसंहारक प्रोजेक्टों का विरोध करने के लिए खुद ब खुद सामने आ रहे हैं।

दो वर्ष पहले ज़ीरा शराब फैक्ट्री द्वारा बर्बाद किए जा रहे जल स्रोतों के खिलाफ उस इलाके के लोगों ने लंबे समय तक संघर्ष का मोर्चा मज़बूती से संभाले रखा। सरकारी समर्थन और सभी राजनीतिक पार्टियों द्वारा फैक्ट्री के पक्ष में मौन सहमति के बावजूद, जनसंघर्ष के कारण फैक्ट्री को बंद करने पर मजबूर होना पड़ा। बुद्धा नाले के प्रदूषण के खिलाफ भी हाल के समय में लोगों का बड़ा आक्रोश फूटा, जो आज भी अलग-अलग रूपों में जारी है। इसी प्रकार बठिंडा जिले के कमालू गाँव में टायर जलाकर तेल बनाने वाली फैक्ट्री के विरोध में इलाक़े के गाँवों का आंदोलन पिछले दो महीनों से प्रशासन की सख्ती के बावजूद जारी है। पिछले दो माह में सरकार द्वारा प्रस्तावित रुचिरा पेपर मिल (चमकौर साहिब) और जेएसडब्ल्यू सीमेंट फैक्ट्री तलवंडी आकलियां (मानसा) के खिलाफ स्थानीय निवासियों द्वारा पर्यावरण प्रेमियों की मदद से महत्वपूर्ण सरगर्मी की गई है। फैक्ट्रियों को स्थापित करने के लिए रखी गई जनसुनवाई के दौरान, फैक्ट्री प्रबंधकों और प्रशासन को स्थानीय लोगों ने इन प्रोजेक्टों को जनविरोधी व पर्यावरण-विरोधी सिद्ध करते हुए निरुत्तर कर दिया। यहाँ हम इन दोनों फैक्ट्रियों के खिलाफ हुई जनसुनवाई की संक्षिप्त रिपोर्ट पेश कर रहे हैं।

चमकौर साहिब के इलाके में प्रस्तावित रुचिरा पेपर मिल लगाने का फैसला अकाली दल बादल की सरकार (2012-17) के दौरान हुआ था। कांग्रेस सरकार द्वारा इस फैक्ट्री के लिए दो गाँवों की पंचायती ज़मीन को अवैध तरीके से डमी बोली लगाकर बेच दी गई। वर्तमान 'आप' सरकार ने इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाते हुए गलत तथ्यों के आधार पर आनन-फानन में एन ओ सी जारी कर दीं। यह सब कुछ जनविरोध से डरते हुए पर्दे के पीछे छिपकर किया गया। 29 मार्च को इस फैक्ट्री की जनसुनवाई के बारे में अखबारी विज्ञापन से लोगों को प्रोजेक्ट की जानकारी मिली। 30 अप्रैल को सुनवाई की तारीख तय हुई। 7 अप्रैल को कंपनी द्वारा अधिग्रहीत ज़मीन पर अपना दफ़्तर बनाने की कोशिश की गई, जिसे लोगों ने विरोध कर रोक दिया। जनसुनवाई और फैक्ट्री की स्थापना को रोकने के लिए "चमकौर साहिब मोर्चा" नामक एक समिति बनाई गई, जिसे आगे विभिन्न टीमों में बांट दिया गया। समिति की टीमों ने विभिन्न स्रोतों से आंकड़े इकट्ठा करने के इलावा पहले से लगी पेपर मिलों के इलाकों का दौरा करके इन मिलों के कारण वहाँ के पर्यावरण पर पड़े प्रभावों की रिपोर्टें संकलित कीं। एक टीम ने विभिन्न गाँवों में जाकर लोगों को जागरूक करते हुए जनसुनवाई के दौरान लामबंद करने के किये पूरा जोर लगाया।

30 अप्रैल को जनसुनवाई शुरू होने पर, लोगों ने 'पर्यावरण रिपोर्ट' (Environment Impact Report), जो कानूनी रूप से सुनवाई से एक माह पूर्व आम जनता को उपलब्ध करवाई जानी चाहिए, जारी न करने पर ज़ोरदार आपत्ति जताई। जनसुनवाई इसी रिपोर्ट के आधार पर होनी चाहिए थी, लेकिन प्रशासन और कंपनी अधिकारी इसी तरह 'जनसुनवाई' करवाए जाने पर जोर डालते रहे। जनता के ज़ोरदार विरोध के कारण, प्रशासन को कार्रवाई रजिस्टर में दर्ज करना पड़ा कि यह सुनवाई बिना रिपोर्ट दिए की जा रही है। लोगों ने आपत्ति जताई कि कंपनी से आधा किलोमीटर दूर नीलो नहर और कुछ ही मीटर दूर बुद्धा दरिया है। एक ड्रेन अधिग्रहित ज़मीन के बीच से निकलती है। कानूनी रूप से इतने जल स्रोतों के नज़दीक फैक्ट्री नहीं लग सकती, तो एन ओ सी किस आधार पर दी गई? सरहिंद नहर से फैक्ट्री के लिए रोजाना 1 करोड़ 57 लाख लीटर पानी लिया जाएगा, इससे जल संकट पैदा होगा। फैक्ट्री से निकलने वाले मानव उपयोग के लिए अयोग्य पानी के पुन: उपयोग की कोई योजना नहीं है, क्योंकि यहां की ज़मीन 'सेम' है, जिससे खेती के लिए इस पानी का उपयोग असंभव है। कंपनी को इतने पानी के उपयोग के लिए 3000 एकड़ ज़मीन चाहिए, पर उनके पास सिर्फ 43 एकड़ है। ऐसे में प्रदूषित पानी या तो भूमि जल को गंदा करेगा या बुद्धा नाले से सतलुज को प्रदूषित करेगा। यह डी कैटेगरी की सबसे अधिक प्रदूषित फैक्ट्री मानी जाती है, जो मनुष्यों और पर्यावरण के लिए अत्यंत ख़तरनाक है। जहां कहीं भी पेपर मिलें चल रही हैं, वहां के लोग काला पीलिया, पोलियो, मंदबुद्धिता, बांझपन, कैंसर, और चमड़ी रोगों से पीड़ित हैं। लोगों ने अपने तर्कों के जरिये यह आपत्ति भी जताई कि कंपनी की रिपोर्ट को प्रदूषण बोर्ड के अधिकारियों द्वारा बिना जांच के ही कंपनी के पक्ष में उसी तरह स्वीकार कर लिया जाता है। जनता के तथ्यपूर्ण तर्कों के आगे निरुत्तर हुआ प्रशासन बार-बार लोगों पर अपनी झुंझलाहट ज़ाहिर कर रहा था।जनता के कड़े विरोध और दवाब के कारण, सुनवाई के अंत में प्रशासन को मौखिक वोटिंग करवानी पड़ी जिसमें कंपनी के कर्मचारियों को छोड़कर सभी लोगों ने फैक्ट्री लगाने के विरोध में असहमति दिखाई। इस तरह जनता ने अपनी चेतना और एकता के बल पर इस जनसुनवाई में सामूहिक रज़ा  लागू करते हुए इस जनविरोधी प्रोजेक्ट को खारिज करवा दिया। जनता के विरोध की अभिव्यक्ति इतनी प्रबल थी कि प्रशासन अगले कदम उठाने से चुप्पी साध गया।

तलवंडी साबो पावर लिमिटेड थर्मल प्लांट के नज़दीक गाँव तलवंडी अकलियां, ज़िला मानसा में प्रस्तावित सीमेंट फैक्ट्री का भी लोगों ने इसी तरह विरोध लामबंद किया। यहाँ कंपनी ने चुपचाप 45 एकड़ ज़मीन खरीद तो ली, लेकिन इस ज़मीन को जी टी रोड से जोड़ने के लिए और जमीन खरीदने के लिए किये जा रहे प्रयासों के समय गाँव वालों को फैक्ट्री की भनक लग गई। उसी दिन से ही गाँववाले फैक्ट्री न लगने देने के लिए सक्रिय हो गए। गांव के युवाओं की कमेटी जो दिल्ली किसान संघर्ष के दौरान सक्रिय रही थी, ने फिर से संगठित हो मोर्चा संभाल लिया। इस कमेटी ने आसपास के गाँवों के लोगों और पंचायतों लामबंद करना शुरू कर दिया। साथ ही चमकौर साहिब मोर्चा, ज़ीरा फैक्ट्री विरोध मोर्चा और अन्य पर्यावरण प्रेमियों के साथ सम्पर्क कर, इस फैक्ट्री के लोगों और पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी हासिल की। फैक्ट्री स्थापना के खिलाफ इलाक़े की पंचायतों के प्रस्ताव पारित करवा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपे गए। मजदूरों और किसानों की यूनियनों से भी संघर्ष में साथ देने की अपील की गई। 14 जुलाई को होने वाली जनसुनवाई से एक दिन पहले, गाँववासियों ने विभिन्न पहलुओं को कवर करती एक प्रश्नावली तैयार की और जनसुनवाई के दौरान डटकर खड़ने का संकल्प दोहराया। चमकौर साहिब में हुई पिछली किरकिरी के कारण पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस बार ' पर्यावरण प्रभाव रिपोर्ट' (EIR) सुनवाई से एक महीना पहले जारी कर दी। सुनवाई के दिन समस्त गाँव परिवारों सहित एकजुट होकर सभा में शामिल हुआ। जनसुनवाई में सबसे पहले कंपनी ने कहा कि सिर्फ प्रभावित लोगों को ही बोलने दिया जाए, लेकिन लोगों की एकजुटता के चलते किसी को भी आपत्ति दर्ज कराने का हक लागू करवा लिया गया। कंपनी की रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों की धज्जियां उड़ाते हुए लोगों ने आपत्ति जताई कि थर्मल प्लांट के प्रदूषण से पहले ही गंभीर रोगों की चपेट में आ चुके लोगों के हालात इस फैक्ट्री के लगने से और भी दयनीय हो जाएंगे। कंपनी के बड़े पैमाने पर रोज़गार देने के दावों की फूंक निकालते हुए लोगों ने साबित कर दिया कि स्थायी रोजगार केवल 240 लोगों को मिलेगा, और उसमे भी स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने का कोई प्रावधान नहीं है। इलाके में हवा की गुणवत्ता माप 126 है, जबकि 100 के ऊपर, ऐसी रेड कैटेगरी की फैक्ट्री कानूनन नहीं लग सकती। फैक्ट्री लगने पर रोज़ाना आने वाले 1500 ट्रकों की पार्किंग के लिए कंपनी के पास न तो कोई योजना है, न ही जगह। 2011 की जनगणना के आधार पर रिपोर्ट में क्षेत्र को पिछड़ा हुआ बताकर, फैक्ट्री द्वारा 'जनकल्याण योजनाओं' के सहारे इलाके के विकास का दावा किया गया था, पर लोगों ने पिछले डेढ़ दशक में थर्मल द्वारा प्रदान किए गए "विकास की बरकतों" की तफ़सील पेश करते हुए इस दावे को पूरी तरह नकार दिया। सुनवाई में उपस्थित प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की ज़ीरा शराब फैक्ट्री संघर्ष के समय निभाई पक्षपाती भूमिका को भी लोगों ने सार्वजनिक रूप से उजागर किया। सुनवाई के अंत में हुई ज़ुबानी वोटिंग में वहां उपस्थित लोगों ने एकमत से फैक्ट्री लगाने के विरोध में वोटिंग की। इस प्रकार यह जनसुनवाई भी सरकारी और कारपोरेट कंपनियों के कागज़ी छल-प्रपंच और जनविरोधी इरादों के खिलाफ जनता के सामूहिक विरोध का इज़हार बन गई।

अन्य शासक वर्गीय पार्टियों की तरह पंजाब सरकार द्वारा लागू किया जा रहा कारपोरेटी विकास मॉडल ही पंजाब के जल संसाधनों को ज़हरीला बना रहा है। पंजाब सरकार की बड़े उद्योगपतियों के हितों को पूरा करने वाली और जनविरोधी भूमिका इन प्रोजेक्ट्स की सेवा में खुलकर सामने आती है। इस गंभीर मुद्दे पर जनता का लामबंद होना और विरोध करना एक सकारात्मक घटनाक्रम है।जन-पक्षधर जम्हूरी और क्रांतिकारी शक्तियों द्वारा इसे प्रोत्साहित करने की जरूरत है। जनता के पर्यावरणीय सरोकारों को लोगों के वर्गीय-तब्काती संघर्षों के साथ जोड़ने के लिए प्रयास जुटाने की जरूरत है, क्योंकि इस तरह की लामबन्दियों और विरोध सरगर्मियों में मौकापरस्त सियासतदानों की मौजूदगी इन्हें पथभृष्ट कर निहित स्वार्थों की बली चढ़ा दिए जाने के खतरे समाए होती है। जनविरोधी औद्योगिक प्रोजेक्टों के विरोध में जनता की स्वतःस्फूर्त सक्रियता एक सकारात्मक घटनाक्रम है, लेकिन सत्ता के लिए लालायित मौकापरस्त सियासतदानों की उपस्थिति इस स्वतःस्फूर्त सक्रियता को निहित स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने का साधन बन सकती है। प्रवासी श्रमिकों के खिलाफ ज़हर उगलने वाले हिस्सों की मौजूदगी से इस विरोध का दायरा संकुचित होने के साथ-साथ इस आंदोलन को मेहनतकश जनता में फूट डालने के औजार की तरह इस्तेमाल कर लिए जाने का खतरा भी बना रहता है। प्रस्तावित फैक्ट्री विरोधी संघर्ष में थर्मल मजदूरों के संगठन की भागीदारी एक सकारात्मक घटनाक्रम है।

पर्यावरण प्रदूषण से सबंधित इन औद्योगिक प्रोजेक्ट विरोधी सरगर्मियों को साम्राज्यवादी निर्देशित विकास मॉडल के चौखटे में संबोधित होने की जरूरत है। इस मुद्दे पर लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप, पर्यावरण को संरक्षित करने वाली और सघन श्रम शक्ति को रोजगार मुहैया करवाने वाले छोटे उद्योग लगाने की मांग उभारे जाने की जरूरत है। लेकिन ऐसा करते समय औद्योगिकीकरण का विरोध करने के आख्यान की अभिव्यक्ति से बचना चाहिए। जन-विरोधी औद्योगिक प्रोजेक्टों का विरोध करते हुए, इसे पंजाब बनाम प्रवासी के आख्यान में परिवर्तित होने से रोकने के लिए सतर्क रहने की जरूरत है। हकूमतों को असली दोषी के तौर पर कठघरे में लाए जाने की जरूरत है। जन-केन्द्रित औद्योगिक मॉडल विकसित करने के लिए बड़े कारोबारियों और पूंजीपतियों पर टैक्स लगाकर, पर्यावरण को संरक्षित रखने वाली तकनीक आधारित उद्योगों का विस्तार करने की मांग उभारे जाने की जरूरत है। जन-हितैषी जम्हूरी और जनोन्मुखी शक्तियों को उपरोक्त चौखटे के अनुसार विरोध आंदोलनों को दिशा, मार्गदर्शन और नेतृत्व देने के लिए संघर्षरत हिस्सों के साथ गहराई से जुड़ना ज़रूरी है। ऐसी लामबंदियों को, सही चौखटे और धर्मनिरपेक्ष जम्हूरी आधार के बिना, वोट की राजनीति करने वाले नेताओं के स्वार्थी मंसूबों, कट्टरपंथी तत्वों की घुसपैठ, क्षेत्रीय संकीर्णता और निहित तब्काती हितों जैसी अलामतों का खतरा बना रहता है। क्रांतिकारी जनहितैषी और जम्हूरी शक्तियों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे इन लामबंदियों व संघर्षों को ऐसे खतरों से बचाएं और सही दिशा में आगे बढ़ाएं।

 पत्रकारों पर देशद्रोह के मुकदमे

कश्मीर समस्या और इसके इतिहास पर लिखी पुस्तकों पर प्रतिबंध

प्रेस स्वतंत्रता के जम्हूरी अधिकार को कुचलने के मोदी सरकार के हमले लगातार जारी हैं। पिछले अगस्त असम पुलिस ने 'द वायर' न्यूज़ समूह से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन और करण थापर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की कुख्यात धारा 152 के तहत देशद्रोह के दो मामले दर्ज किए। असम पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर और जारी किये गए समनों में इन दोनों पत्रकारों पर देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खतरे में डालने के आरोप लगाए गए हैं। लेकिन वास्तव में इन पत्रकारों का अपराध क्या है? दरअसल इन पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा 'द वायर' में भारत के एक नौसेना अधिकारी शिव कुमार द्वारा इंडोनेशिया में एक समारोह में दी गई जानकारी के बारे में खबर प्रकाशित करने के कारण दर्ज किया गया है। इस खबर में दी गई जानकारी के अनुसार उस अधिकारी ने बालाकोट घटना के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सैन्य झड़पों के दौरान भारत के राफेल जेट गिराए जाने का कारण भारतीय राजनीतिक नेतृत्व द्वारा सेना पर लगाई गई पाबंदियों और दबाव को बताया था।

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में दिए गए इस बयान ने मोदी सरकार के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी, जो लंबे समय से उपरोक्त झड़पों में हुए भारतीय नुकसान के तथ्यों को छिपाती आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा बार-बार भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रोकने के बारे में दिए गए बयानों से घिरी मोदी सरकार के लिए यह खबर एक और झटका थी। इसने भारत के दूतावास सहित राजनीतिक नेतृत्व को इस बयान से पीछा छुड़ाने के लिए जोर-शोर से जुटने को मजबूर कर दिया। दूसरी ओर, 'द वायर' न्यूज़ समूह, जो अपनी स्वतंत्र पत्रकारिता के कारण मोदी सरकार के लिए सिरदर्द बना हुआ था, उसे सबक सिखाने के लिए सरकार ने इस मौके का इस्तेमाल किया और दोनों वरिष्ठ पत्रकारों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया।

यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि इन पत्रकारों के खिलाफ यह मामला असम में दर्ज किया गया, जो आजकल भाजपा के सांप्रदायिक एजेंडे और विभाजनकारी राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है। इससे भी आगे बढ़ते हुए इस बदले की कार्रवाई को अंजाम देने के लिए असम पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की परवाह करने की जहमत भी नहीं उठाई। उल्लेखनीय है कि इन पत्रकारों के खिलाफ पहली एफआईआर दर्ज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाने के आदेश जारी किए थे।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए असम पुलिस ने नए समन जारी कर दिए, जिनके बारे में बाद में पता चला कि पत्रकारों के खिलाफ यह मुकदमा तीन महीने पहले ही दर्ज कर लिया गया था, लेकिन इसे बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को दरकिनार करने के लिए फिर से सक्रिय किया गया। पत्रकार समूहों और जम्हूरी अधिकार संगठनों ने सरकार के इस दमनकारी कदम की निंदा करते हुए न केवल इन पत्रकारों के खिलाफ मामले रद्द करने की मांग की, बल्कि भारतीय दंड संहिता की धारा 152 को रद्द करने की भी मांग की, जो औपनिवेशिक काल की धारा 124 का ही बदला हुआ रूप है। जम्हूरी लोगों के विरोध और सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई कानूनी रोक के चलते, अभी तक इन पत्रकारों की गिरफ्तारी तो नहीं हुई, लेकिन असम पुलिस द्वारा दर्ज किए गए मुकदमे जस के तस हैं, जिसके कारण गिरफ्तारी का खतरा अब भी बना हुआ है।

मोदी सरकार और असम पुलिस के इन कदमों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि बालाकोट हमले के बाद हुई सैन्य झड़पों के बारे में भारतीय सरकार न केवल अहम तथ्य छिपा रही है, बल्कि ऐसे तथ्यों को प्रकाशित करने वाले स्वतंत्र पत्रकारों को दमन का चुनिंदा निशाना बनाकर उनकी जुबान बंदी के लिए हर हथकंडा अपना रही है। 

सरकारी दमन के जरिए लेखकों की आवाज को दबाने की दूसरी कार्रवाई जम्मू-कश्मीर में प्रतिष्ठित और सुप्रसिद्ध लेखकों की कश्मीर समस्या और इसके इतिहास पर विश्व भर में मशहूर 25 किताबों पर प्रतिबंध लगाने का कदम है। इस संबंध में जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा द्वारा हस्ताक्षरित आदेश, कश्मीर के मुख्य सचिव द्वारा अगस्त महीने के पहले सप्ताह में जारी किए गए। इनमें कहा गया है कि ये किताबें कश्मीर समस्या के बारे में गलत प्रचार करती हैं और जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा देती हैं। आदेशों में आगे कहा गया है कि "यह साहित्य युवाओं की मानसिकता को आंतरिक रूप से प्रभावित करते हुए असंतोष, अत्याचार और आतंकवादी नायकत्व को बढ़ावा देता है। यह साहित्य कई तरीकों से कश्मीर के युवाओं को कट्टरपंथ की ओर ले जाता है, इस में ऐतिहासिक तथ्यों की तोड़-मरोड़ कर आतंकवादियों का महिमामंडन, सुरक्षा बलों की बदनामी, धार्मिक कट्टरता और अतार्किकता को बढ़ावा दिया गया है, और इस तरह यह युवाओं को हिंसा और आतंकवाद के रास्ते पर ले जाता है।"

उल्लेखनीय है कि प्रतिबंधित सभी पुस्तकें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लेखकों द्वारा गहन ऐतिहासिक और तथ्यात्मक जानकारी के आधार पर लिखी गई हैं, जिन्हें कश्मीर समस्या पर प्रामाणिक और मान्यता प्राप्त किताबों के रूप में विश्व स्तर पर स्वीकृति प्राप्त है। इन किताबों को पेंगुइन, हार्पर एंड कॉलिन्स और रटलेज जैसे विश्व प्रसिद्ध प्रकाशन समूहों द्वारा प्रकाशित किया गया है। प्रतिबंधित पुस्तकों में प्रसिद्ध संवैधानिक विशेषज्ञ ए.जी. नूरानी की किताब 'कश्मीर मसला 1947 से 2012', सुमंत्रा बोस की किताब 'चौराहे पर खड़ा कश्मीर', मानवाधिकार कार्यकर्ता अनुराधा भसीन की किताब 'एक तोड़ा-मरोड़ा राज्य: धारा 370 के खात्मे के बाद कश्मीर की अनकही कहानी', और अरुंधति रॉय की किताब 'आजादी' आदि शामिल हैं। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय लेखकों में पिओट्र बल्सेरोविक्ज और अग्निएस्का कुजवेस्का की किताब 'कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन', क्रिस्टोफर स्नेडन की किताब 'आजाद कश्मीर' और डेविड देवदास की किताब 'भविष्य की तलाश में: कश्मीर की कहानी' आदि शामिल हैं। 

मोदी सरकार द्वारा इन ऐतिहासिक और मानवाधिकार उल्लंघनों के संधर्व में लिखी तथ्यात्मक किताबों पर प्रतिबंध लगाना भारतीय हकूमत द्वारा कश्मीरी कौम पर ढाए जा रहे अमानवीय दमन और कश्मीरी क़ौमियत की आजादी की लड़ाई के ऐतिहासिक तथ्यों को दबाने का अगला कदम है। धारा 370 के खात्मे के बाद भारतीय राज ने कश्मीर में दमन का नया इतिहास रचा है। कश्मीरी लोगों के संघर्ष को कमजोर करने के लिए पत्रकारों को जेल में डालने, हजारों युवाओं को बंद करने जैसे हर दमनकारी हथकंडे अपनाए गए हैं। कश्मीर से संबंधित किताबों पर प्रतिबंध इस तरह के दमनकारी कदमों की ही अगली कड़ी है जो मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर लेखकों, साहित्यकारों और पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज को कुचलने की लम्बी श्रृंखला का हिस्सा है।

इस तरह के दमनकारी माहौल में जम्हूरी और क्रांतिकारी शक्तियों के लिए अपनी आवाज को बुलंद करने और सरकार के नृशंस कदमों के खिलाफ डटकर आवाज बुलंद करने की और भी ज्यादा आवश्यकता है। पत्रकार करण थापर और सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ दर्ज मुकदमों की निंदा करते हुए भारतीय एडिटर्स गिल्ड ने इन शब्दों में चेतावनी दी है: "गिल्ड इस मौके पर अपने साथी पत्रकारों को यह याद दिलाना जरूरी समझता है कि वे बिना डर और भय के अपने पेशे के प्रति जिम्मेदारी निभाने के महत्व को याद रखें। ईमानदार पत्रकारिता कभी भी अपराध नहीं होती।" आज जम्हूरी और जनपक्षधर शक्तियों को भी इसी तरह निडरता के साथ अपनी आवाज बुलंद करते रहने की जरूरत है।


 

निरंकुश भारतीय शासन के अधीन केंद्र-प्रदेश संबंधों के मुद्दे के बारे में दृष्टिकोण का सवाल

 निरंकुश भारतीय शासन के अधीन केंद्र-प्रदेश संबंधों के मुद्दे के बारे में दृष्टिकोण का सवाल




 

भारत की वर्तमान तथाकथित एकता और अखंडता की रूप रेखा ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा गढ़ी गई है। 1935 के अधिनियम के माध्यम से  इसे एक संवैधानिक जामा भी उन्होंने ही पहनाया था। क़ौमियतों के साथ निरंकुश भारतीय शासन का थोपा हुआ वर्तमान रिश्ता ब्रिटिश भारत की विरासत है। कुछ क़ौमियतों के मामले में, यह अपेक्षाकृत प्रत्यक्ष औपनिवेशिक साम्राज्यवादी सैन्य विजयों का प्रतिबिंब है। इन क्षेत्रों में क़ौमी उत्पीड़न के विरुद्ध भावनाओं का पक्ष अपेक्षाकृत प्रचंड नज़र आता है।

भारतीय निरंकुशता का अग्रणी वर्ग बहुराष्ट्रीय दलाल पूंजीवाद है। यह किसी एक क़ौमियत के प्रभुत्व वाली राज्य-व्यवस्था नहीं है। बहुराष्ट्रीय देश होते हुए भी, क़ौमी सवाल के आंतरिक विस्तार की दृष्टि से भारत क्रान्ति-पूर्व रूस से भिन्न है।

बहुक़ौमी भारतीय राज्य न तो क़ौमियतों का स्वैच्छिक संघ है और न ही संघीय शासन। इसका संविधान कभी भी क़ौमियतों की स्वायत्तता का प्रतिनिधि नहीं रहा है। इसके प्रावधानों और शक्तियों का विभाजन शुरू से ही केंद्र के पक्ष में रहा है। इसलिए, हम निरंकुश भारतीय राज्य की शक्तियों के निरंतर जारी रह रहे केंद्रीकरण को प्रदेशों की स्वायत्तता का क्षरण नहीं मानते, जैसा कि संपादक-कॉमरेड कहते हैं, बल्कि निरंकुश राज्य के अधीन केंद्र की सत्ता को और मज़बूत करने वाला बताते हैं और इसका विरोध करते हैं।

वास्तव में भारतीय दलाल पूंजीवाद के लिए एक मज़बूत केंद्र की आवश्यकता की भावना को तीव्र करने में तेलंगाना के क्रांतिकारी कृषि सशस्त्र संघर्ष और अन्य संघर्षों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का मानना था कि यदि इस संघर्ष को वापस न लिया गया होता, तो भारतीय राज्य सत्ता के लिए इसे दबाना-कुचलना संभव नहीं होता। इस प्रकार तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष ने नए भारतीय राज्य के लिए एक मज़बूत केंद्र बनाए जाने हेतु एक बड़े सबक की भूमिका निभाई। "शक्तिशाली केंद्र" का विचार क़ौमियतों के प्राकृतिक संसाधनों की साम्राज्यवादी और दलाल पूंजी द्वारा लूट की सुरक्षा सुनिश्चित करने की नीति का हिस्सा था, जिस का वादा 1948 की औद्योगिक नीति में  किया गया था। बाद में, नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम के सशस्त्र कृषि क्रांतिकारी संघर्षों (और क़ौमियतों के सशस्त्र संघर्षों की भी) की चुनौतियों ने भारतीय शासक वर्गों की "मज़बूत केंद्र" बनाने की धुन को और भी तीब्र कर दिया। क्षेत्रीय स्तर के शासक वर्गीय राजनीतिक दलों द्वारा राज्य सत्ता के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र, उसके शस्त्रीकरण के केंद्रीकरण को सामान्यतः स्वीकृति ही किया गया है। क़ौमियतों की धरती पर साम्राज्यवादी और दलाल पूंजी द्वारा जल, जंगल, ज़मीनों की लूटपाट सुनिश्चित करने और बड़े ज़मींदारों के हितों की रक्षा के लिए यह आवश्यक है।

आपातकाल के दौर ने भी भारतीय शासक वर्ग और जनता के बीच अंतर्विरोधों (और शासक वर्ग के आपसी अंतर्विरोधों) से निपटने के लिए केंद्र की शक्तियों के महत्व को प्रतिबिंबित किया। इसकी पृष्ठभूमि में हुक्मरानों के लिए एक तीखा सिरदर्द बना सत्तर के दशक का जन बेचैनी का कारक काम कर रहा था। 1980 के चुनावों के दौरान इंदिरा कांग्रेस ने भारतीय राज्य की स्थिरता और मज़बूत केंद्र के नारे के साथ शासक वर्गों का समर्थन हासिल किया। पंजाब में प्रतिक्रियावादी आतंकवाद के दौर में केंद्रीय कार्यपालिका की अधिकार शक्ति का उपयोग कर, राष्ट्रपति शासन लगाने, दमनकारी केंद्रीय कानून लागू करने और प्रांतीय पुलिस की कमान केंद्रीय सुरक्षा बलों को सौंपने जैसे कदमों को शासक वर्गों के एक बड़े हिस्से का समर्थन भी "मज़बूत केंद्र" के बारे में आम सहमति को दर्शाता था। इस आम सहमति की पुष्टि मनमोहन सिंह के "सबसे बड़े आंतरिक खतरे" के आख्यान से जुड़ कर भी हुई। सलवा जुडूम और फिर ऑपरेशन ग्रीन हंट के घटनाक्रम के सबंध में भी हुई। आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर केंद्र का नियंत्रण बढ़ाने के भाजपा सरकार के कदमों ने भी यही दर्शाया है। इस मामले में, शासक वर्गीय दलों के मतभेदों में एतराज किसी मज़बूत केंद्र को लेकर नहीं हैं। ये शिकायतें मज़बूत केंद्र की शक्तियों के "बढ़े" इस्तेमाल और आपसी झगड़ों-मुकाबलेबाजी में उनके इस्तेमाल के विरोध तक सीमित हैं। इस आपसी खींचतान का स्वरूप भी अवसरवादी है और "मज़बूत केंद्र" की ड्राइविंग सीट के नियंत्रण या उससे उनकी दूरी पर निर्भर करता है। तथाकथित क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक व्यवहार भी अक्सर मज़बूत केंद्र की कुर्सी से निहित स्वार्थों के पूरा होने की संभावनाओं से तय होता है। ये दल सिर्फ़ इस मायने में "क्षेत्रीय" हैं कि उनके राजनीतिक फेफड़ों के लिए वोट बैंक के ऑक्सीजन सिलेंडर स्थानीय हैं। उनकी सीमित पहुँच आमतौर पर स्थानीय राजकीय संसाधनों तक ही होती है। वे केंद्रीय कुर्सी के लिए किसी न किसी "राष्ट्रीय" पार्टी का समर्थन करने के बदले में स्थानीय राजकीय संसाधनों के मलाईदार हिस्से का एक बड़ा भाग अपने लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं। इस मलाईदार हिस्से के लिए प्रतिस्पर्धा करते हुए, वे एक उपयुक्त केंद्रीय "बॉस" की छत्रछाया के लिए भी प्रतिस्पर्धा करते हैं। इस तरह यह पहलू क्षेत्रीय और "राष्ट्रीय" दलों के बीच बदलते परस्पर विरोधी गठबंधनों के सूत्र की भूमिका निभाता है।

मुल्क के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल समय-समय पर संविधान के अनुच्छेद 356 का दंश झेलने वालों और लाभार्थियों में शरीक रहे हैं। इसलिए, "केंद्र" की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस खंड का विरोध कभी भी बड़बड़ाहट से आगे नहीं बढ़ा। अक्सर यह टंटा-तकरार सह-प्रतिद्वंद्वियों द्वारा इसके "दुरुपयोग" तक ही सीमित रही है। कारण यह है कि यह खंड क्षेत्रीय शासक वर्गीय दलों सहित सभी के काम आ जाती है। क्षेत्रीय दलों को स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों की सरकारों को उखाड़ फेंकने के लिए इस अनुच्छेद से लैस केंद्रीय आकाओं की मदद की ज़रूरत होती है।

हम जनता के नज़रिए से अनुच्छेद 356 का विरोध करते हैं। हम इसे निरस्त करने के पक्षधर हैं। जनता का सबसे बड़ा सरोकार यह है कि यह अनुच्छेद कानून-व्यवस्था के नाम पर केंद्र की दमनकारी शक्ति का जनता पर सीधा इस्तेमाल करने का ज़रिया बनता है। यह जनता पर हमला करने के मामले में प्रांतीय सरकारों की हिचकचाहट के अंश को दरकिनार करने का ज़रिया बनती है।

आजकल चर्चित "डबल इंजन" सरकार का मोदी ढाँचा मूलतः कोई नई बात नहीं है। इसी ढाँचे को लागू करने की इंदिरा मार्का कार्य-प्रणाली ने अकालियों को न चाहते हुए भी धर्म युद्ध मोर्चा शुरू करने पर मजबूर कर दिया था। आपसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के एक खूनी दौर के बाद, राजीव लोंगोवाल समझौते के परिणामस्वरूप केंद्र और पंजाब में एक "डबल इंजन" सरकार का गठन हुआ। समझौता यह था कि अब दूसरा "इंजन" कांग्रेस नहीं, बल्कि शिरोमणि अकाली दल होगा। लेकिन क्षेत्रीय अकाली पार्टी की आंतरिक कलह ने इस विशेष "डबल इंजन" व्यवस्था का काम तमाम कर दिया। केंद्र और राज्यों में बदलते  "इंजनों" के इस सिलसिले ने एक अरसा पश्चात् भाजपा-अकाली दल "डबल इंजन" का रूप ले लिया। "इंजन" बदली के इस सिलसिले के दौरान, पंजाबी क़ौमियत का मुद्दा महज़ दांव-पेंच का खेल बनकर रह गया। पंजाबी क़ौमियत की अर्थव्यवस्था की लगाम विश्व बैंक के हाथों में रही। विश्व बैंक के पर्यवेक्षक चंडीगढ़ में पंजाब के अलग-अलग विभागों को नीतिगत निर्देश देते रहे। इसका अहम दस्तावेज़ी प्रमाण विश्व बैंक की वह कुख्यात निर्देश-नुमा रिपोर्ट थी जो 21वीं सदी की शुरुआत में पंजाब सरकार के 29 विभागों के लिए जारी की गई थी। हमने सवाल उठाया था कि हमारी राजधानी से विश्व बैंक को दफ़ा करने की ज़रूरत का पंजाबी क़ौमियत के हितैषियों के एजेंडे में  क्या स्थान है?!

वैश्वीकरण की साम्राज्यवादी नीतियों के सुनिश्चित क्रियान्वयन के लिए निरंकुश राज के अधीन केंद्र की अधिकारशाही का इस्तेमाल और उसकी  मज़बूती विश्व व्यापार संगठन के दिशा-निर्देशों के अनुपालन का ही एक हिस्सा है। इस अनुपालन की अभिव्यक्ति तीन कृषि कानूनों, बिजली अधिनियम 2003 और कई अन्य कानूनों के ज़रिए हुई है। यह साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के क्रियान्वयन की क़ानूनी गारंटी का तथ्य है। तथाकथित नई आर्थिक नीतियों के पक्ष में, राज्य की सक्रिय भूमिका को एक तयशुदा दिशा में निर्देशित करने का तथ्य।

लेकिन इस प्रक्रिया का एक पूरक पक्ष भी है। यह विनियमन से मुक्ति, नियंत्रण से मुक्ति और सार्वजनिक संपत्ति से मुक्ति का पक्ष है। यह पक्ष भी विश्व व्यापार संगठन के दिशानिर्देशों का हिस्सा है।

हम इस बात के प्रति सजग हैं कि वैश्वीकरण के संरक्षक के रूप में केंद्र को मज़बूत करने का विरोध, कॉर्पोरेट अधिकारशाही के पक्ष में राज्य के क़ानूनी राजदंड को त्यागने का समर्थन न बन जाए। केंद्र की जगह साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सीधे नियंत्रण का हथियार न बने। केंद्र द्वारा प्रांतों पर नियमों के बंधनों को ढीला करने की प्रक्रिया, बड़े व्यवसायों के लिए हकूमति नियमों से मुक्ति की नीचे की तरफ जाती सीढ़ी का पहला डंडा न बन जाए।

हम पूंजीपतियों को आठ घंटे की दिहाड़ी के कानून से मुक्त करके उसे बारह घंटे करने के राज्यों के अधिकार का समर्थन नहीं कर सकते। हम उद्योगपतियों को श्रम कानूनों से छूट देने के अधिकार का समर्थन नहीं कर सकते। न ही हम जल, ज़मीन और जंगल पर अधिकारों के संबंध में जन दबाव में बनाए गए केंद्रीय कानूनों या प्रावधानों को लागू करने में राज्यों की मनमानी - मालकी का समर्थन कर सकते हैं। (ऐसे मामलों में, "केंद्र" द्वारा राज्यों पर नियंत्रण में स्वैच्छिक कमी की झलक मिलती है)।

पिछले अरसे में राज्यों की तरफ से पूंजी निवेश के लिए साम्राज्यवादी कंपनियों से सीधे सौदेबाजी करने के खुले अधिकारों की मांग की जाती रही है। वैश्वीकरण की साम्राज्यवादी सनक में विनियमन-मुक्ति का विशेष महत्व है। विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की तिकड़ी, राज्यों के साथ सीधे पूँजी निवेश समझौतों के लिए केंद्रीय कानूनों व नियमों के विनियंत्रण का मार्ग प्रशस्ति कर रही है। कुल मिलाकर यह राजकीय नियंत्रण और विनियमन मुक्ति की एक ऊपर से नीचे (केंद्र से राज्यों) की ओर जाती प्रक्रिया है। इसका अभिप्राय व्यवसायों पर राज्यों के नियंत्रण को बढ़ाना नहीं है। यह नियंत्रण मुक्ति और निजीकरण की मंजिल के रास्ते पर एक अस्थायी पड़ाव है। यह न्यूनतम राजकीय हस्तक्षेप और अधिकतम कंपनी नियंत्रण की तरफ जाता मार्ग है। सर्वहारा वर्ग, केंद्रीकरण का विरोध करते हुए, राज्यों की खातिर कंपनी राज की सेवा के लिए खुले अधिकारों का समर्थन नहीं कर सकता। राजकीय शक्तियों के केंद्रीकरण का विरोध करने का आम सर्वहारा पैंतरा, राज्यों को निजीकरण के मार्ग पर प्रतिक्रियावादी नीतिगत कदम उठाने के लिए विस्तृत अधिकार दिए जाने के विरोध के साथ सम्मिलित किया जाना चाहिए।

सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधियों के लिए यह आवश्यक है कि वे सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध अपने पैंतरे का, शत्रु वर्गीय शक्तियों के उद्देश्यों से, मतभेद स्पष्ट रखने पर ज़ोर दें और इस भेद को स्थापित करने का दृष्टिकोण अपना कर चलें। कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी हलकों में इस संबंध में ढीलेपन का तत्व मौजूद है। इस ढीलेपन की अभिव्यक्ति जीएसटी अधिनियम के विरुद्ध प्रतिक्रिया में भी देखी गई थी। इस अधिनियम के जरिये करों में राज्यों की हिस्सेदारी में कटौती और कर नीतियों के मामलों में राज्यों की भूमिका को सीमित करने का पहलू शामिल था और यह जनता के विरोध का भागी था। लेकिन यह जीएसटी हमले का मूल पहलू नहीं था। इस पहलू पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देकर, क्रान्तिकारियों के एक वर्ग  द्वारा मूल पहलू की अनदेखी की गई। यह मूल पहलू अप्रत्यक्ष करों की दिशा में एक बड़ा कदम था। यह कदम साम्राज्यवादी और भारतीय कॉर्पोरेट पूँजी, सूदखोरों, ज़मींदारों आदि को दी जा रही कर रियायतों का पूरक था। यह कर नीति के जन-विरोधी और कॉर्पोरेट-समर्थक पक्ष को धार देने वाला एक अहम कदम था। क्रांतिकारियों के काफी बड़े हिस्से ने जीएसटी मुद्दे के आख्यान में, इस मूलभूत पहलू को केंद्र-राज्य संबंधों के आख्यान के अधीन कर दिया। इस प्रकार, कर नीति के सवाल पर इस साम्राज्यवाद-हतैषी कदमों की देश की जनता और मुल्क की क़ौमियतों के लिए अर्थ-संभावनाओं (संभावित निहितार्थ) की अनदेखी की गई। यदि आज अप्रत्यक्ष कर के रूप में जीएसटी की वापसी की मांग को भुला दिया गया है और इसे इस कर की आय में राज्यों के हिस्से और उससे भी आगे राज्यों के हिस्से के बकाये जारी करवाने तक ही सीमित कर दिया गया है, तो इसमें हमारी क्रांतिकारी बिरादरी की अल्प-सतर्कता का भी योगदान है। तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध संघर्ष के दौरान भी, भारतीय कानूनों को विश्व व्यापार संगठन के आदेशों के अनुरूप ढालने के मूलभूत पहलू को केंद्र-राज्य संबंधों के आख्यान के अधीन करने की धुन सामने आई थी। क्रांतिकारी और साम्यवादी क्रांतिकारी हलकों में भी इस अंश का प्रभाव कुछ हद तक देखा गया। दक्षिणपंथी अभिव्यक्ति वाले इस तरह के पैंतरे बुर्जुआ राष्ट्रवाद और प्रतिक्रियावादी क्षेत्रवाद से मद्धिम विच्छेद को जाहिर करते हैं।

(सुर्ख लीह द्वारा प्रकाशित होने जा रही पुस्तिका

"पंजाबी क़ौमियत का मुद्दा और सुर्ख लीह:

प्रतिबद्ध के फतवों का कच्चापन और हकीकत" से एक अंश)

 

किसानों के प्रचंड रोष का करिश्मा लैंड पूलिंग नीति रद्द

 किसानों के प्रचंड रोष का करिश्मा

लैंड पूलिंग नीति रद्द



पंजाब में देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए लैंड बैंक बना कर देने की सभी सरकारों की संयुक्त परियोजना को किसान जनता की एकजुट शक्ति ने एक वार तो शिकस्त दे दी है। संघर्ष अभी शुरू ही हुआ था कि किसानों के गुस्से के शुरुआती ट्रेलर ने ही 'आप' सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। लोगों में उमड़ रहे गुस्से की सोशल मीडिया पर प्रकट हो रही झलकियों ने ही पंजाब सरकार को कंपकंपी  छेड़ दी। आप सरकार के इस यू-टर्न में कृषि कानूनों के खिलाफ ऐतिहासिक किसान संघर्ष का प्रताप भी शामिल है। जिन किसान नेताओं और किसान संगठनों को मुख्यमंत्री तुछ समझने की चेष्टा कर रहे थे, उन्हें उन्हीं के सामने घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा। आखिरकार लैंड पूल नहीं की जा सकी और मान सरकार का "विकास" का पहिया थम गया!

ज़मीनें हड़पने की इस व्यापक परियोजना को यूं ब्रेक लगा देना कोई साधारण प्राप्ति नहीं है। पंजाब की आप सरकार और उसका दिल्ली नेतृत्व इसे सफल बनाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा था। एक दफा तो पार्टी के पूरे नेतृत्व और सरकार ने जनता को बरगलाने के लिए अपने सारे संसाधन और प्रचार तंत्र पूरी तरह झोंक दिए थे। लेकिन लोगों की ज़मीन पर बोले जा रहे इस प्रत्यक्ष डाके के चलते, लोगों को तमाम कोशिशों के बावजूद भ्रमित कर पाना मुश्किल था।

यह भी एक दिलचस्प हकीकत है कि यह योजना सिर्फ़ आप सरकार की ही नहीं थी। भूमि बैंक बनाकर देने और लुटेरी कंपनियों के धंधों के लिए ज़मीनें पेश करने की यह योजना लगभग डेढ़ दशक से चली आ रही है, लेकिन यह इसलिए परवान नहीं चढ़ पा रही क्योंकि पंजाब के किसान ज़मीनों पर हो रहे हमले को अच्छी तरह पहचान चुके हैं और उसके ख़िलाफ़ जूझते आ रहे हैं। ज़मीनों पर हो रहे हमलों के ख़िलाफ़ किसानों के गुस्से ने तमाम शासक वर्गीय अवसरवादी पार्टियों को यह भी दिखा दिया है कि सत्ता में आने पर भी, अपने साम्राज्यवादी आकाओं से किए गए वादों को पूरा करना अब आसान नहीं रहा। वैसे तो केंद्री स्तर से ही 2013 के भूमि अधिग्रहण क़ानून को बदलने की योजनाएँ बन रही हैं। लेकिन देश में जगह-जगह भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ किसानों का विरोध, मोदी सरकार को इस क़ानून को बदलने से हाथ पीछे खींचने को मजबूर करता चला आ रहा है।

लैंड पूलिंग नीति के ख़िलाफ़ प्रकट हुए किसानों के इस रोष ने दिखा दिया है कि अब कंपनियों को ज़मीनें सौंपना कोई आसान सा काम नहीं है। इसके लिए हकूमत को दूसरे हथकंडे और भ्रामक तरीके ढूँढ़ने होंगे। यूं तो लैंड पूलिंग नीति भी पिछली नीति के मुक़ाबले एक भ्रामक तरीक़ा ही थी। यह तरीका प्रत्यक्ष जबरन भूमि अधिग्रहण से बचने का एक प्रयास भी था और एक तरह से किसानों को धोखे में रखकर उनकी सहमति प्राप्त करने की मंशा थी। लैंड पूलिंग का यह तरीका अन्य राज्यों की सरकारों द्वारा भी अपनाया जा रहा है ताकि 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम की आड़े आ रही कुछ शर्तों को दरकिनार किया जा सके। लेकिन विकसित शहरी सम्पदाओं में प्लॉटों के सब्ज़बाग किसानों को भ्रमित करने के लिए काफी न थे।

संगठित और जागरूक किसानों को यह याद रखना चाहिए कि सरकार ने भले ही संघर्ष के दबाव में यह फैसला बदला है लेकिन उपजाऊ ज़मीनों को जबरन अधिग्रहित करने की नीति नहीं बदली। भूमि बैंक बनाने की परियोजना अभी वहीं की वहीं है और वह भूमि बैंक राज्य के किसानों की ज़मीनों को जबरन छीनकर ही बनाया जाना है। कंपनियों को कारोबार के लिए ज़मीनें सौंपकर विकास करने का मॉडल लागू करने की योजना अभी उसी तरह कायम है और इस योजना के तहत ज़मीनें अधिग्रहित करने के वैकल्पिक रास्ते तलाशे जाएगें। इसलिए, उन वैकल्पिक रास्तों को चिन्हित करने के लिए सतर्कता ज़रूरी है। लैंड पूलिंग नीति के लिए ज़मीनें इकट्ठा करने की एक परियोजना से पीछे हटी सरकार ने शामलात और पंचायती ज़मीनों को बेचने का रास्ता पकड़ लिया है। साथ की साथ यह कदम उठाना दर्शाता है कि ज़मीनों पर हमला कितना गहरा, जोरदार  और व्यापक है और इसका मुक़ाबला करने के लिए संगठित किसान लहर की सूझ-समझदारी और दृढ़ संकल्प की मांग करता है। विश्व साम्राज्यवादी कंपनियों और देश के बड़े पूंजीपतियों द्वारा राज्य में कारोबार करने की पहली शर्त भूमि बैंक है। विभिन्न परियोजनाओं के लिए वांछित ज़मीन के बिना, वे राज्य में आने को तैयार नहीं हैं। इसलिए, किसानों की उपजाऊ ज़मीनों के जबरन अधिग्रहण की नीति को रद्द करवाने के लिए अभी एक लंबे संघर्ष की ज़रूरत है।

ज़मीनों के जबरन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ संघर्षों के दौरान, साम्राज्यवादी कंपनियों और बड़े पूँजीपतियों के हितों की पूर्ति करने वाले विकास के इस पूरे मॉडल पर निशाना साधना ज़रूरी है क्योंकि इस मॉडल को रद्द करवाए बिना ज़मीन बैंक बनाने की योजनाओं को ध्वस्त नहीं किया जा सकता। जनता के विनाश के इस मॉडल को रद्द करवाने तथा कृषि और उद्योग की समानांतर-एकीकृत प्रगति पर आधारित देश के आत्मनिर्भर विकास के जन-हितैषी विकास मॉडल को लागू करवाने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है। वर्तमान जीत से उत्पन्न उत्साह को इस तरह के लक्ष्य निर्धारित करने और उनके लिए संघर्ष करने की प्रेरणा में बदलना होगा।

इस जीत के बाद, समराला में 24 अगस्त को संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा आयोजित विजय रैली में उमड़े जनसैलाब ने एक ओर जहाँ लोगों में जीत के प्रति उत्साह और एकता के हौंसले का परिचय दिया है, वहीं दूसरी ओर मंच से किसान संगठनों के नेताओं द्वारा दिए गए भाषणों में ज़मीनों और कृषि क्षेत्र पर तेज़ होते साम्राज्यवादी हमलों के ख़तरे के प्रति सरोकारों को बहुत ही स्पष्टतया से उजागर किया गया। इस बात पर चौकसी का इजहार भी व्यक्त हुआ कि किसानों की ज़मीनों पर ख़तरा अभी टला नहीं है। मंच से पंजाब में किसान-मज़दूर हितकारी कृषि नीति बनाने और लागू करने की माँग की गई। साथ ही, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले विनाशकारी प्रभावों पर चर्चा हुई और किसानों के लिए विध्वंसकारी इन क़दमों से बाज आने के लिए मोदी सरकार को कड़े शब्दों में ताड़ना की गई। कुल मिलाकर, यह एकत्र्ता संघर्ष की जीत का जश्न मनानें के साथ-साथ इसे और मजबूत करने और इस तरह के तमाम हकूमति हमलों के खिलाफ संघर्ष की आवश्यकता को उजागर करने का एक अवसर बन गई।

पुनर्वास और मुआवज़ा अधिकारों के लिए जन-आंदोलन

 बाढ़ की आपदा -

पुनर्वास और मुआवज़ा अधिकारों के लिए

जन-आंदोलन



चंडीगढ़:  5 सितंबर को भारतीय किसान यूनियन (एकता-उग्राहां) द्वारा पंजाब के बाढ़ प्रभावित किसानों और मज़दूरों समेत सभी लोगों के लिए पूर्ण  और पर्याप्त मुआवज़ा और पुनर्वास की मांगों को लेकर अपने सक्रियता क्षेत्र के 16 जिलों में जिला/उप-मंडल अधिकारियों के माध्यम से पंजाब और केंद्र सरकार को ज्ञापन भेजा गया। संगठन के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां और उप-सचिव जगतार सिंह कालाझाड़ द्वारा एक संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से यह जानकारी देते हुए बताया गया कि आज इस मुद्दे पर 14 जिलों में डीसी कार्यालयों और 15वें जिले में 2 उप-मंडल कार्यालयों के सामने विरोध प्रदर्शन करने के बाद अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा गया। इन प्रदर्शनों में महिलाओं और युवाओं सहित बड़ी संख्या में किसानों मज़दूरों ने भाग लिया। संगरूर में अपने संबोधन के दौरान श्री उग्राहां ने आरोप लगाया कि बाढ़ की भविष्यवाणी के बाद भी लोगों को बाढ़ से बचाने के लिए कोई तत्काल प्रबंध नहीं किए गए, बल्कि बाढ़ की चपेट में आ जाने के बाद भी कई दिनों तक किसी भी सरकार ने विस्थापित हुए, मारे गए और फसलों/मकानों/पशुधन आदि का भारी नुकसान झेलने वाले लोगों की खबरसार नहीं ली। बाढ़ के कारण टूटे और टूट रहे बांधों की मरम्मत और बचाव के प्रबंध भी अधिकांश स्थानों पर पीड़ितों की सहायता कर रहे लोगों अथवा खुद  पीड़ितों द्वारा ही किए गए हैं। बाढ़ के कारण उजड़े लोगों के आश्रय, राशन, तिरपाल और पशुओं के लिए चारे आदि के प्रबंध भी शुरुआती दिनों में बड़े पैमाने पर आम लोगों द्वारा ही किए गए, जो लगातार जारी हैं। बाढ़ आपदा का सामना करने के इन राहत कार्यों में युवाओं के जज्बे और उत्साह की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। ज्ञापन में तत्काल राहत की मांगों के संबंध में वक्ताओं ने कहा कि पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड व अन्य स्थानों पर बादल फटने व भारी वर्षा के कारण बड़े पैमाने पर हुए जान-माल, फसलों, मकानों व जमीनों के विनाश को यद्यपि पंजाब सरकार ने देर आए दुरुस्त आए के अनुसार राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है लेकिन केंद्र सरकार द्वारा भी इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाना चाहिए। इस के लिए राष्ट्रीय आपदा निधि जारी कर बड़े पैमाने पर तत्काल राहत कार्यों को आगे बढ़ाया जाए। जिन परिवारों के सदस्यों की जान इस कारण गई है, उन्हें भारी आर्थिक सहायता प्रदान कर सांत्वना दी जाए। पशुधन व अन्य सहायक व्यवसायों का नुकसान, मकानों, फसलों व जमीनों वगैरा का विनाश झेलने वाले लोगों के नुकसान की शत-प्रतिशत भरपाई के लिए पर्याप्त धनराशि तुरंत जारी की जाए। आवश्यक बुनियादी ढाँचे, सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक स्थानों को हुए नुकसान की मरम्मत के लिए भी धनराशि जारी की जानी चाहिए और पानी उतरते ही पुनर्निर्माण कार्य शुरू किये जाने चाहिए। स्वास्थ्य विभाग को वर्षा जल प्रदूषण से उत्पन्न होने वाली और बड़े पैमाने पर फैलने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए उच्च स्तर पर निवारक उपाय करने चाहिए। वर्षा ऋतु से पहले नदियों, नालों, बाँधों और बाढ़ द्वारों आदि की जाँच, सफाई, मरम्मत इत्याद  में की गई घोर लापरवाही भविष्य में नहीं दोहराई जानी चाहिए। ऐसी लापरवाही के दोषी राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें लोगों के जीवन और संपत्ति से खिलवाड़ करने के लिए कड़ी सजा दी जानी चाहिए। पंजाब की नदियों और नहरों के किनारों, बाँधों और बाढ़ द्वारों आदि का सम्पूर्ण ढाँचा पुराना और जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। वर्तमान समय में विकसित हो चुकी नई तकनीक का उपयोग कर इसका पूर्ण नवीनीकरण किया जाना चाहिए। इसके अलावा, नदी और नहर के पानी के संरक्षण और उपयोग तथा इसे हर खेत तक पहुँचाने के लिए उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। अतिरिक्त वर्षा जल के भूमि में पुनर्भरण के लिए, प्रत्येक नदी और नहर के किनारे विभिन्न स्थानों पर कच्चे तल वाले तालाबों में चौड़े और गहरे बोरहोल खोद कर एक नया ढांचा निर्मित किया जाना चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पंजाब और केंद्र सरकारों द्वारा बड़ी बजट राशि आरक्षित की जानी चाहिए। इस प्रकार, बाढ़ की स्थायी रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए और बाढ़ की मार पड़ने पर राहत उपायों के लिए पर्याप्त धनराशि रखी जानी चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग में लगातार वृद्धि, जंगलों और पहाड़ों की बड़े पैमाने पर की जा रही कटाई और पर्यावरण/जलवायु/जल में फैलाया जा रहा प्रदूषण कॉर्पोरेट विकास मॉडल का परिणाम है। बादल फटना, बाढ़ की भीषण मार और तूफानों से होने वाली तबाही जैसी तमाम घटनाएँ प्रकृति के साथ किये जा रहे इसी खिलवाड़ का नतीजा हैं। इसलिए कॉर्पोरेट विकास मॉडल से प्रेरित नीतियों को रद्द किया जाना चाहिए। वक्ताओं ने दावा किया कि भले ही पंजाब सरकार को लैंड पूलिंग नीति के मामले में मुँह की खानी पड़ी है लेकिन साथ ही, वह पंचायती ज़मीनों और अन्य सरकारी ज़मीनों/संपत्तियों को नीलाम करने के रास्ते पर चल पड़ी है। ऐसी सभी संपत्तियाँ लोगों की सेवा, रखरखाव और उपयोग के लिए हैं। इसलिए चेतावनी दी गई कि पंजाब सरकार लोगों की ज़मीनें और संपत्तियाँ छीनने की नीति पर अमल करने से बाज आए, अन्यथा जन-संघर्षों का सामना करने के लिए तैयार रहे। विभिन्न स्थानों पर सभाओं  को संबोधित करने वाले वक्ताओं में राज्यस्तरीय नेता श्री उग्राहां और श्री कालाझार के इलावा संबंधित जिलों के प्रमुख नेता जनक सिंह भुटाल, हरदीप सिंह टल्लेवाल और हरिंदर कौर बिंदु शामिल थे। 

बाढ़ की चपेट में पंजाब : आपदा से जूझते और एक दुसरे का सहारा बनते लोग हुकुमती जवाबदेही और मुआवजा हक का सवाल

 बाढ़ की चपेट में पंजाब :

आपदा से जूझते और एक दुसरे का सहारा बनते लोग

हुकुमती जवाबदेही और मुआवजा हक का सवाल



मानसून के इस सीजन में पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड बाढ़ की भीषण चपेट में आए हुए हैं। भारत - पाक सीमा के दोनों तरफ का पंजाब बाढ़ की भयानक मार झेल रहा है। हमारी तरफ के मौजूदा हालतों की तस्वीर हमारे सामने है और यह काफी गंभीर और व्यापक नुकसान को दर्शा रही है। पहले ब्यास और रावी के पानी ने माझा और दोआबा के साथ-साथ फिरोजपुर-फाजिल्का क्षेत्रों में काफी नुकसान किया और अब सतलुज और घग्गर भी उफान पर हैं। भाखड़ा बांध के फ्लड गेट भी खोले जा रहे हैं। बाकी बांध भी इस समय खतरे के निशान पर बह रहे हैं। रोपड़, लुधियाना, पटियाला और संगरूर क्षेत्रों में भी पानी की मार पड़ने का खतरा बना हुआ है। जलमग्न हो चुके पंजाब में हो रहे नुकसान का अभी से अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। अब तक की रिपोर्टों के अनुसार, बाढ़ से 4.33 लाख एकड़ क्षेत्र प्रभावित हुआ है। इन्हीं अनुमानों के अनुसार भी किसानों की फसलों का लगभग तीन हजार करोड़ का नुकसान हो चूका है। दिहाड़ीदार मजदूरों और अन्य छोटे धंधों वालों की दुश्वारियों का कोई अंदाजा ही नहीं है। अब तक 1400 गांव बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं और यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। राज्य के 3.54 लाख लोग प्रभावित हुए हैं और 32 लोगों की अब तक मृत्यु हो चुकी है। यह तो अभी प्रारंभिक आंकड़े हैं, संकटमय स्थिति की पूरी तस्वीर नहीं है। जो दुश्वारियाँ लोग झेल रहे हैं और जो इस कारण आने वाले समय में झेलनी पड़ेंगी, उनका आकार-विस्तार और गहराई अंदाजों से परे है। यह पंजाब के लोगों के लिए गहरे संकट की घड़ी है, बहुत मुश्किल वक्त है। गरीबी और जीवन-यापन के संकटों में जीवन की गाड़ी खींच रहे मेहनतकश लोगों के लिए यह बहुत बड़ी आपदा है, उनके जीवन में भारी हलचल है। घर उजड़ रहे हैं, दोबारा बसने के लिए सालों-साल लगेंगे। यह दर्द जितना बयान किया जा सके, कम है। जितना बांटा जा सके, कम है। इस समय प्रान्त के लोगों का पहला सरोकार इस आपदा से निपटना है, इससे पार पाना है, इस पर विजय प्राप्त करना है और मानवीय हस्ती की गरिमा को बरकरार रखना है। इस आपदा से निपटना लोगों के लिए प्राथमिक कार्य बन गया है।

इस आपदा से निपटने के लिए लोगों को इस राज-व्यवस्था से भी निपटना होगा, क्योंकि यह महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह राज-व्यवस्था और इसका प्रशासनिक ढांचा ही है, जो बदलते मौसमों को भी आपदाओं में बदल देता है। यह जनविरोधी ढांचा और इसकी अक्षम कारगुजारी है, जो अधिक बारिश को ही बाढ़ में बदल देती है और एक आपदा का भयावह दृश्य रच देती है। लुटेरी जमातों की मुनाफे की लालसा सामान्य मौसमी घटनाओं को भी लोगों के लिए संकट में बदल देती है। मौसम की मार, चाहे वह सूखा हो या बारिश, को कई गुना बढ़ा देती है। इसीलिए पानी की कमी, सूखा और बाढ़ हमारे देश के लोगों की नियति बन गए हैं। ऐसा होने में यहां इस ढांचे की कमजोर बुनियादों और अपर्याप्त ताने-बाने जैसे बुनियादी कारण हैं, वहीं तात्कालिक तौर पर इसमें हकूमतों की लचर कार्यकुशलता, लोगों के प्रति वफादारी का अभाव, विश्वासघात की घोर प्रवृत्ति, कुप्रबंधन, लापरवाही और समग्र रूप से जनविरोधी रवैया भी सम्मिलित है। ये दोनों पहलू मिलकर विशेष मौसमी घटनाओं को आपदाओं में परिवर्तित कर रहे हैं। 

पंजाब में आए मौजूदा बाढ़ों में भी ये दोनों पहलू शामिल हैं। मूल कारण तो धरती पर हो रही मौसमी तब्दीलियां और जोंक विकास मॉडल द्वारा प्रकृति की जा रही तबाही है। पृथ्वी पर हो रही मुनाफाखोर तकनीकी प्रगति ने सहज प्राकृतिक चक्र को भारी नुकसान पहुंचाया है। यह क्षति बहुत व्यापक और गंभीर है। यह विकृत और बेडोल अनियोजित प्रगति धरती पर पर्यावरणीय बदलावों के लिए जिम्मेदार है। ओजोन परत की तबाही, बढ़ता तापमान, सिकुड़ते ग्लेशियर, फैलते समुद्र, ढहते पहाड़, सूखे और तबाही मचाने वाली बाढ़ें इत्यादि तक इन बदलावों की लंबी श्रृंखला है। विश्व पूंजीवाद के फलस्वरूप उतपन इस घटनाक्रम में हमारा देश भी शामिल है। हमारे पड़ोसी राज्यों जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक प्रक्रियाओं के साथ मुनाफामुखी पर्यटन व्यवसायों और मुनाफाखोर औद्योगिक परियोजनाओं के जरिए जमकर खिलवाड़ किया गया है। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, पहाड़ों की तबाही और विनाश ने मिलकर, यहां पड़ने वाली बारिश से होने वाली क्षति को कई गुना बढ़ा दिया है। यहां होने वाली सामान्यतः बारिश भी अब बाढ़ का रूप ले लेती है और यह नीचे की ओर बसे पंजाब में आकर तबाही मचाती है। आगे, पंजाब में भी यही जोंक विकास मॉडल प्राकृतिक चक्र को रौंदे जा रहा है। यहां भी बेतहाशा हो रही खनन गतिविधियों ने नदियों के किनारों को कमजोर कर दिया है। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बुरी तरह प्रभावित कर दिया गया है। नदियों के समग्र प्रवाह क्षेत्र को मुनाफामुखी लालसाओं ने सँकरा कर दिया है और पानी बढ़ने की स्थिति में जब नदी अपने स्वाभाविक प्रवाह क्षेत्र तक फैलती है तो वह नुकसान में बदल जाता है।

इसके अलावा, नदियों के किनारों पर बांधों की रखरखाव, मजबूती और निर्माण किसी भी हकूमत के लिए कोई मुद्दा नहीं होता, क्योंकि इसके लिए सरकारी बजट की जरूरत होती है। बड़ी रकम जुटाने की आवश्यकता पड़ती है यद्पि इन रकमों से कोई सीधा मुनाफा नहीं मिलता। इसलिए नदी के पानी को नियंत्रित करने, संभालने और नियमित प्रवाह में रखने के लिए राज्य में कोई प्रभावी ढांचा नहीं है। जो पुराने डैम बने हैं, बस वही हैं। दशकों से नदियों के पानी को नियंत्रित करके और अधिक उपयोग में लाने के लिए कुछ नहीं किया गया। पंजाब और हरियाणा में पानी के बंटवारे को लेकर ही सियासी खेल खेले जाते रहे हैं, लेकिन नदी के पानी की संभाल करके किसी भी तरह से सिंचाई ढांचे का विस्तार नहीं किया गया। इन परियोजनाओं के निर्माण पर एक पैसा भी खर्च नहीं किया गया। अब न केवल पानी व्यर्थ बह रहा है, बल्कि यह तबाही भी मचा रहा है। नदियों की विनाशकारी मार को काबू करने के लिए वही करने की जरूरत है, जो दुनिया के कई देश कर चुके हैं। वे काफी हद तक बाढ़ों पर काबू पा चुके हैं या उनसे होने वाली क्षति को काफी हद तक सीमित कर चुके हैं। और ऐसा करने के लिए चंद्र भ्रमण तकनीक की भी जरूरत नहीं है। साधारण किस्म के छोटे-छोटे डैम बनाने हैं। हमारे शासकों द्वारा भले ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की बातें की जा रही हों, लेकिन हमारे देश का नाकारा बुनियादी ढांचा पानी के तेज प्रवाहों को भी संभालने और निपटने में सक्षम नहीं है।

तात्कालिक संदर्भ में भी मानसून सीजन के दौरान बाढ़ की संभावना को मद्देनजर रख की जाने वाली तैयारियां अनुपस्थित हैं। मौसमी नालों, नदियों और ड्रेनों की सफाई न करना सहित, सभी इंतजाम गायब हैं। बांधों की सफाई नहीं की गई। इस बार भी भारी बारिश की भविष्यवाणियों के बावजूद सरकार लापरवाह रही। बी.बी.एम.बी. के पानी के मुद्दे पर हरियाणा के साथ टकराव का नाटक करने में व्यस्त रही। इन कुप्रबंधनों में बांधों को जरूरत के अनुसार खाली करने, अतिरिक्त पानी को समायोजित करने की क्षमता बनाने और उच्चतम सीमा तक पानी भरने से बचाने के लिए नियंत्रित मात्रा में पानी को छोड़ते रहने जैसे कदम न उठाना भी शामिल है। ऐसे कदम कुछ हद तक पानी की मार को सीमित करने में भूमिका निभा सकते थे। उल्लेखित गंभीर रूप से अक्षम बुनियादी ढांचे के कारण इन तात्कालिक कदमों की जरूरत कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन ये सभी प्रयास सरकारी बजट की मांग करते हैं, सरकारी खर्च - चेष्टा मांगते हैं, लोगों के प्रति वफादारी मांगते हैं, और राजनीतिक इच्छाशक्ति मांगते हैं। लेकिन सरकारों के पास इनमें से कुछ भी नहीं है। न तो इस ओर ध्यान है, न ही यह हकूमति सरोकार का मुद्दा है। बस सब कुछ 'भगवान के भरोसे' है। बस संकट खड़ा हो जाने पर नौटंकी है, भागदौड़ करने का प्रभाव है, बड़े-बड़े ऐलान हैं, फोटो-शूट हैं। इस मामले में सभी अवसरवादी सत्ताधारी और राजनेता एक-दूसरे से आगे निकल जाने की दौड़ में शमिल हैं। अपने आप को बड़े जन-हतैषी के रूप में पेश करने के लिए उतावले हैं। अपने वोट बैंक सुनिश्चित करने के लिए पानी के पास खड़े होकर, हाथों में रोटियां रखकर खाने का नौटंकी कर रहे हैं। वास्तव में तो वह अपने अवसरवादी व्यवहार की नुमायश ही लगा रहे हैं। हकीकत यह है कि सरकार के पास इस आपदा के समय डूबते लोगों को पानी से निकाल पाने के बहुत ही लचर इंतजाम हैं। सरकारी सहायता बेहद अपर्याप्त है जो लोगों तक राहत पहुंचाने के मामले में बहुत सीमित है। हमेशा की तरह लोग ही लोगों का सहारा बन रहे हैं। पंजाब के अन्य क्षेत्रों से दयालु और हिम्मती लोगों की टोलियां हर तरह की मदद ले बाढ़ प्रभावित इलाकों की ओर जा रही हैं। समाज सेवी संगठन और जन-संगठन सहायता जुटा रहे हैं। सहायता के लिए लोगों को लामबंद कर रहे हैं। पंजाबी कौमियत अपनी मानवीय प्रगतिशील परंपराओं को जीवंत रखे हुए है और इसकी जड़ों को और गहरा कर रही है। हरियाणा के गांवों से भी पंजाबी लोगों के लिए सहायता इकट्ठा करने की वीडियो और खबरें आई हैं। लोगों का भाईचारा उनकी आपसी सांझ को दर्शा रहा है। इसे और मजबूत कर रहा है। यह आपदाओं के समय अपनी मज़बूती दिखा रहा है।

इस आपदा के मौके पर लोगों को खुद आगे आकर पीड़ित लोगों का हाथ मजबूती और दृढ़ता से थामने और हर तरह की सहायता करने की प्रवृत्ति को और बल देने की जरूरत है। ऐसे संकटों के समय क्षेत्रीय, जातिगत, ग्रामीण-शहरी या अन्य प्रकार की तथाकथित विभाजन रेखाएं टूटती हैं और मेहनतकश लोगों की मानवीय, भाईचारक और वर्गीय सांझ गहरी होती है। इसलिए हर तरह के विभाजनों से ऊपर उठकर मेहनतकश लोगों के सांझे भाईचारे को उभारने और इसे और पक्का करने की जरूरत है। लोगों द्वारा अपनी ओर से थोड़ा-थोड़ा जोड़कर भेजी गई सहायता न केवल भौतिक दृष्टि से, बल्कि भाईचारे की मजबूती के दृष्टिकोण से भी मूल्यवान है। यह लोगों की असीमित अव्यत सामर्थ्य को भी उजागर करती है और संकटों से निपटने के लिए लोगों की सामूहिक संगठनात्मक कार्रवाई करने की क्षमता में विश्वास जगाती है। हमेशा की तरह उभर रही इस प्रवृत्ति को और मजबूत करने की जरूरत है। लोकपक्षीय शक्तियों और वर्गीय लोक संगठनों को ऐसे प्रयासों में जोर-शोर से सक्रिय होना चाहिए। लोगों के साझा प्रयास जुटाने की पहल को बढ़ावा देना चाहिए और इस तरह का प्रयास जुटाने के उद्यम में अग्रिम भूमिका निभानी चाहिए।

जन शक्तियों को दोहरी जिम्मेदारी उठानी होगी। जहां एक ओर लोगों को अधिक से अधिक राहत कार्यों के लिए लामबंद और संगठित करने की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर सरकारों की जवाबदेही तय करने और उन्हें कटघरे में खड़ा करने के कार्य की अगुवाई का जिम्मा भी लोकपक्षीय क्रांतिकारी और जनवादी शक्तियों पर है। लोगों द्वारा बाढ़ पीड़ितों की सीधी सहायता में सक्रियता सरकारों को बरी करने का जरिया नहीं बननी चाहिए, बल्कि इसका सरकारों की जवाबदेही तय करने और लोगों के प्रति बनती जिम्मेदारी को निभाने के लिए दबाव डालने की सरगर्मी के साथ समन्वय करना चाहिए। हकूमति अक्षमता और नाकारा कारगुजारी को उजागर किया जाना चाहिए। कड़ी आलोचना की जानी चाहिए और जिम्मेदारी तय कर उचित सजा की मांग की जानी चाहिए।

इस अवसर पर पंजाब और केंद्र सरकारों से यह मांग की जानी चाहिए कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों में तेजी लाई जाए, हर तरह की सहायता के लिए सरकारी तंत्र और ढांचे को सक्रिय किया जाए, राज्य और केंद्र के संसाधनों को बाढ़ की मार झेल रहे लोगों की सहायता के लिए झोंका जाए। हकूमत सक्रिय हो, पानी में फंसे लोगों को बचा रही टोलियों को सरकारी सहायता उपलब्ध करवाए। यह समय सरकारी बजटों पर हक जतलाने का सबसे अहम समय है। इस हक को तत्काल सरकारी सहायता और राहत कार्यों में तेजी लाए जाने के लिए भी जतलाया जाना चाहिए, और साथ ही पुनर्वास के लिए मुआवजा राशि के लिए भी। सरकारी खजाने को लोगों के लिए खोले जाने की मांग करने की जरूरत है लेकिन इसके लिए संघर्ष की जरूरत होगी। पुनर्वास का कार्य कोई साधारण कार्य नहीं है, मामूली और नगण्य राशियों के साथ या आधे-अधूरे वितरण के जरिये आँसू पोंछने जैसी औपचारिक कार्रवाइयों को नामंजूर किये जाने और पुनर्वास के लिए हर पहलू से सहायता की मांग किये जाने की जरूरत है। इसमें घरों, फसलों, पशुओं सहित हुए हर नुकसान के मुआवजे के साथ-साथ कर्ज माफी, ब्याज मुक्त कर्ज, दोबारा बुवाई के लिए सहायता, और खेत मजदूरों तथा अन्य संपत्ति-विहीन वर्गों के लिए गुजारा भत्ता देने, कॉर्पोरेट और अन्य बड़े जोंक लुटेरों पर  प्राकृतिक आपदा विशेष कर लगाने, अडानी/अंबानी, बादल/अमरिंदर जैसे धन कुबेरों से प्राकृतिक आपदा वसूली के जरिये पैसा इक्कठा कर बाढ़ पीड़ितों को देने की मांगें शामिल हैं। भले ही यह अवसर तत्काल राहत कार्यों में जुटने, पुनर्वास में सहयोग करने और साथ ही सरकार पर हर तरह की जिम्मेदारी के लिए दबाव बनाने का है, लेकिन यह अवसर बाढ़ की मार पर काबू पाने से संबंधित महत्वपूर्ण और बुनियादी कदमों को उभारने का भी है। बुनियादी समाधान के इन कदमों में नदियों के प्रवाह को अवैध निर्माणों और अन्य व्यावसायिक बाधाओं से मुक्त रखना, अनावश्यक और विनाशकारी खनन को बंद करना, तटबंधों को मजबूत करना और इसके लिए भारी बजट जुटाना, छोटे बांधों के निर्माण की नीति अपनाना और उनका उचित प्रबंधन करना, राज्य में सिंचाई ढांचे का विस्तार करना, वर्षा जल का संरक्षण और भंडारण करना, प्राकृतिक जल प्रवाह की बहाली करना, प्राकृतिक तालाबों और जलाशयों के माध्यम से भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था करना, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में विनाशकारी तथाकथित विकास परियोजनाओं को रद्द करना, पहाड़ों और जंगलों का संरक्षण करना और अधिक पेड़ लगाने की नीति अपनाना, तथा समग्र रूप से पर्यावरण को नष्ट करने वाले इस जनविरोधी और जोंक हितकारी मॉडल को रद्द करना शामिल है। भले ही इन दिनों ये तात्कालिक संघर्ष के मुद्दे न हों, लेकिन इन मुद्दों का जन चेतना में संचार करना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि बाढ़ रोकने और नदी जल संरक्षण के दृष्टिकोण से इनका बुनियादी महत्व है। ऐसा न करने पर बाढ़ की मार बार-बार पड़ेगी और आने वाले समय में यह और ज़्यादा भीषण होगी। इसलिए, स्थायी रोकथाम के लिए इन मुद्दों को अब उभारना, और फिर इन्हें संघर्ष का मुद्दा बनाने की दिशा में बढ़ना आवश्यक है।

(सुर्ख लीह के सितंबर-अक्टूबर अंक से)