मुख्यमंत्री पंजाब, किसान संगठनों पर आगबबूला क्यों!
पावेल कुस्सा:
भगवंत मान सरकार ने पंजाब के किसान संगठनों द्वारा आयोजित चंडीगढ़ धरने को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, यहां तक कि हकूमत राजधानी में विरोध प्रदर्शन करने के साधारण लोकतांत्रिक अधिकार को भी कुचलने पर आमादा हो गई। पिछली सरकारों की भांति ग्रिफ्तारियों, छापेमारी और सड़क अवरोधों का दमन चक्र चलाया गया। पंजाब सरकार से संबंधित कई जायज मांगों को लेकर लगाए जाने वाले धरने के दबाव के चलते मुख्यमंत्री भगवंत मान ने संगठनों को बैठक का समय तो दिया, लेकिन मांगों का कोई संतोषजनक समाधान निकाले बिना बैठक के बीच में ही उन्होंने किसान नेताओं पर धरना रद्द करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। किसान नेतृत्व द्वारा इस अनुचित दबाव की परवाह ना किये जाने से बौखलाए मुख्यमंत्री अपनी सत्ता की ताकत दिखाने पर आमादा हो गए और किसान नेताओं को धरना देने की चुनौती देकर बैठक से चले गए। फिर विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए तमाम पुलिस मशीनरी झोंक दी गई और साथ ही किसान संगठनों के खिलाफ दुष्प्रचार का अभियान शुरू कर दिया गया। मुख्यमंत्री ने ना सिर्फ इस साधारण विरोध प्रदर्शन को सड़क जाम करने की कार्रवाई बताकर सफेद झूठ बोला बल्कि किसान संगठनों द्वारा किए जा रहे संघर्ष पर कड़ी नाराजगी भी व्यक्त की। साधारण मुद्दों पर अनावश्यक विरोध प्रदर्शन के आरोपों से लेकर इन संगठनों की विरोध गतिविधियों को पंजाब के विकास में बाधा और समानांतर सरकार चलाने का प्रयास करार दे दिया गया, जिसे उन्होंने किसी भी हालत में बर्दाश्त ना करने का एलान भी कर दिया। मीडिया के सामने उन्होंने किसान संगठनों की मांगों को केंद्र से संबंधित बताते हुए उन्हें हल करने की अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश की। आखिरकार भगवंत मान सरकार ने पूरा जोर लगाकर किसानों को चंडीगढ़ धरने पर जाने से रोक दिया। गिरफ्तारियों और पुलिस नाकाबंदी के बावजूद किसान अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए। पुलिस द्वारा सड़कों पर बैरिकेड्स लगाए जाने के बावजूद,
सड़कों को अवरुद्ध न करके तथा सड़कों के किनारे धरना-प्रदर्शन करके किसान नेतृत्व ने सरकार के संभावित दुष्प्रचार अभियान को विफल कर दिया।
पंजाब सरकार और उसके मुखिया के व्यवहार में यह परिवर्तन कोई अचानक और अप्रत्याशित घटना नहीं है, न ही यह प्रशासनिक अनुभव की कमी का मामला है। न ही यह मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत प्रतिकर्म का मामला है। किसान संगठनों की संगठित ताकत और संघर्षों से बौखलाई पंजाब सरकार की ओर से यह उस तरह की प्रतिक्रियावादी प्रतिक्रिया है, जो पंजाब में जोंक विकास मॉडल को लागू करने की कोशिश करने वाली कोई भी सरकार दे सकती है। पिछली सरकारें भी यही करती रही हैं। इस लोकतंत्र की वास्तविकता यह है कि जनविरोधी कानूनों के माध्यम से लोगों के संघर्ष के अधिकार को बिना हिचकिचाहट छीन लिया जाता है। यहां तक कि बिना किसी कानून के भी विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं। राज्य मशीनरी तुरन्त अपने दमनकारी दांत दिखाने लगती है। यह लोगों के संघर्ष के अधिकार को कुचलने का एक पहले से चला आ रहा अलोकतांत्रिक
व्यवहार है, जिसे अब भगवंत मान लागू कर रहे हैं। देश के बाकी हिस्सों की तरह पंजाब में भी शोषक वर्गों और साम्राज्यवादी पूंजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए नीतियां बनाई और लागू की जा रही हैं। इन जनविरोधी नीतियों ने राज्य के समस्त श्रमिक वर्ग के जीवन में भारी उथल-पुथल मचा दी है जिस से विरोध और अशांति फैल रही है। राज्य में कृषि संकट गहराता जा रहा है, रोजगारोन्मुखी लघु उद्योग नष्ट हो रहे हैं तथा सरकारी सेवाओं के निजीकरण के कारण शिक्षा,
स्वास्थ्य और परिवहन जैसी लागतें आसमान छू रही हैं। बजट प्रावधान आम जनता की बजाय जोकों के मुनाफों के हित में मोड़ दिए गए हैं और यहां तक कि लोगों के अल्प मुआवजे के अधिकार भी छीने जा रहे हैं। स्थायी रोजगार का स्थान अनिश्चित एवं कम वेतन वाले रोजगार ने ले लिया है। इन कठिन परिस्थितियों के चलते जनता का ध्यान वैध सार्वजनिक मुद्दों की ओर आकर्षित हो रहा है। लोगों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है तथा संगठित होकर संघर्ष करने की प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है। विकल्प की तलाश भी तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी की सरकार का गठन भी इसी तलाश की एक अभिव्यक्ति थी। अब जबकि तीन सालों में ही इस की असलियत सामने आ गई है तो यह सरकार भी लोगों के गुस्से के निशाने पर आ रही है। मोदी सरकार के साथ-साथ इसकी विश्वसनीयता भी कम हो रही है और नतीजतन इस के खिलाफ नए-नए संघर्ष उतपन हो रहे हैं। ये जन संघर्ष उन नीतियों को चुनौती दे रहे हैं, उनके क्रियान्वयन में बाधा डाल रहे हैं जिन्हें मान सरकार लागू करना चाहती है। जनविरोध के कारण 93 विधायकों वाली स्थिर सरकार को भी मनमानी करने में दिक्क़त आ रही है। सरकार की स्थिरता हल्के में ही डगमगा जाती है। राज्य में लोगों द्वारा लोकतांत्रिक अधिकारों की दावेदारी जोरों पर है।
राज्य में जोर पकड़ रही संघर्ष प्रवृत्ति के बीच, पंजाब के किसान संगठन आम तौर पर लोकतांत्रिक आधार पर संगठित जनशक्ति के अगुआ के रूप में उभरे हैं। सभी वर्गों के संगठनों में किसान वर्ग के संगठन मुक़ाबलतन व्यापक जनाधार और सुदृढ़ ढांचा रखते हैं तथा राज्य की किसान लहर अन्य वर्गों के तुलनात्मक व्यापक तथा मजबूत जुझारू लहर है। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष ने किसान संगठनों की प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी की है और किसानों के भीतर संगठित होने और संघर्ष करने की प्रवृत्ति को और बल मिला है। किसान संगठनों को व्यापक सामाजिक मान्यता प्राप्त हुई है, जिस की बदौलत समाज के अन्य वर्गों के संघर्षों के लिए भी सहायक और रचनात्मक माहौल त्यार हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में ये संगठन, विकास के नाम पर जबरन लागू किये जा प्रोजेक्टों के खिलाफ संघर्षों में सबसे आगे रहे हैं और सरकार द्वारा लागू की जा रही लुटेरी योजनाओं के लिए बड़ी बाधा बन गए हैं। जीरा शराब फैक्टरी,
भारत माला परियोजना के लिए अधिग्रहित की जा रही भूमि के उचित मुआवजे,
गैस पाइप लाइन जैसी कंपनियों की परियोजनाओं के अवांछित विस्तार से सबंधित लोगों के अधिकारों से जुड़ी चिंताओं को संबोधित हुए हैं तथा संघर्ष किये हैं। जन संघर्षों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपनी मर्जी से और अपने तरीके से लूट के पंजे नहीं फैला पा रही और उन्हें भी जन संघर्षों से पैदा होने वाले व्यवधानों का सामना करना पड़ रहा है।
किसान संगठनों के खिलाफ व्यक्त हुआ आक्रोश, मान सरकार की बौखलाहट का नतीजा है जो विरोध प्रदर्शनों के फैलने के परिणाम स्वरूप इस सरकार को हो रही है। शुरुआती दौर में भर्मित करने,
विश्वस्त करने और झाँसे में लेने जैसे तीर अब समाप्त हो चुके हैं और अन्तः जायज मांगों के लिए संघर्ष तेज हो रहे हैं। सरकार के पास इन मुद्दों को हल करने के लिए न तो कोई नीति है और न ही कोई इरादा। ये सभी मुद्दे तथाकथित विकास मॉडल का परिणाम हैं, जिसे यह सरकार भी उसी उत्साह के साथ लागू कर रही है। इस स्थिति में पंजाब सरकार के पास एकमात्र विकल्प यही है कि वह लोगों के संघर्षों को कुचलने की नीति अपनाए और इन संघर्षों की अगुआई करने वाली संगठित किसान शक्ति को दबाने की कोशिश करे और संघर्ष के रास्ते को अवरुद्ध करे। ऐसा करने हेतु भगवंत मान सरकार ने भी केंद्र की मोदी सरकार की तरह किसान संगठनों के खिलाफ भड़काऊ आख्यान/नैरेटिव फैलाने की कोशिश की है और बिना वजह धरना-प्रदर्शन करने,
सड़कें जाम करने और लोगों के लिए परेशानियां पैदा करने जैसे भ्रामक तर्कों का इस्तेमाल कर इन्हें अन्य मेहनतकश वर्गों से अलग-थलग करने की शाजिश की है। पंजाब का विदेशी कंपनियों के लिए निवेश का पसंदीदा स्थान ना बन पाने पर व्यक्त की गई चिंता ही वो असल मुद्दा है जिस के चलते भगवंत मान ने अपना गुस्सा और बौखलाहट किसान संगठनों पर व्यक्त किया है।
मान सरकार की नीति भी विदेशी निवेश पर आधारित उसी तथाकथित विकास मॉडल को लागू करने की है जिसने अब तक पंजाब को तबाह किया है तथा श्रमिक वर्ग का जीवन दुश्वार बना दिया है। यह सरकार भी राज्य का विकास केवल देशी-विदेशी कम्पनियों की परियोजनाओं में ही देखती है तथा उनके लिए व्यवधान बनती किसी भी तरह की जायज आवाज को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। यहां तक कि उन्होंने शंभू बॉर्डर जाम से सबन्धित छोटे उद्योगपतियों की चिन्तायों की बजाय बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवादी कंपनी अमेजन का माल आने-जाने में हो रही देरी पर ज्यादा फिक्रमंदी है। अमेज़न का उल्लेख ही सरकार की चिन्तायों की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। इस सरकार के लिए भी पंजाब के विकास का मार्ग विदेशी साम्राज्यवादी पूंजी के आगमन और उनकी बड़ी परियोजनाओं को आकर्षित करने में निहित है। पिछले मुख्यमंत्रियों की तरह भगवंत मान भी सरकार बनने के बाद ऐसे विदेशी पूंजी निवेश के लिए विदेश जाकर साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को न्योता दे कर आए हैं और उन्हें मुनाफों की गारंटी कर के आए हैं। मोदी सरकार की तरह इस सरकार पर भी राज्य की कृषि मंडी को उनके लिए खोले जाने को लेकर साम्राज्यवादी कंपनियों का दबाव है। इसी सहमति के चलते ही पंजाब में नए साइलो गोदाम बनाए जा रहे हैं। यद्यपि भगवंत मान सरकार ने किसान संगठनों के दबाव में विधानसभा में केंद्र सरकार के नीतिगत मसौदे को खारिज कर दिया है, लेकिन उसने अपनी इस ताज़ा बेबसी का गुस्सा दमन चक्र के माध्यम से किसान संगठनों पर निकाल दिया है। उन्होंने व्यक्त कर दिया है कि पंजाब में कॉरपोरेट लूट को दी जा रही चुनौती या लोगों द्वारा सरकार के समक्ष रखी जा रही मांगों से वे कितने कुपित हैं। उन्होंने आक्रामक होते हुए कहा है कि पंजाब धरना-प्रदर्शनों का प्रदेश बनता जा रहा है, इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। साम्राज्यवादी पूंजी निवेश के त्रस्त होने का यह मुद्दा सभी सरकारों द्वारा जनता के खिलाफ इस्तेमाल किया जाने वाला एक वैचारिक हथियार है, जिसके जरिए वे जनता के प्रतिरोध को कुचलने को उचित ठहराते हैं। वे लोगों को हड़ताल, विरोध प्रदर्शन करने से रोकते हैं और कॉरपोरेट्स के लिए हर तरह की लूट का आश्वासन देते हैं।
कुल मिलाकर भगवंत मान द्वारा व्यक्त किया गुस्सा और बौखलाहट तथा किसानों के संघर्ष को दबाने की यह नीति, एक ऐसी सरकार की नीति ही है जो राज्य में लुटेरे वर्गों की सेवा में लगी हुई है और इस का विरोध कर रहे, संगठित हो रहे और अपने अधिकारों की मांग कर रहे लोगों से क्षुब्ध हो कर उनकी आवाज को दबाकर इन शोषक वर्गों की सेवा करना चाहती है। इस सेवा में मामूली व्यवधान भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। लेकिन सभी दमनकारी सरकारों की तरह भगवंत मान सरकार को भी यह भ्रम है कि ऐसा करके वह पंजाब में नई बुलंदियों को अग्रसर जन संघर्षों की लहर को रोक देगी। भगवंत मान सरकार द्वारा लगाए गए ये प्रतिबंध, लोगों के संघर्षों को और अधिक फैलाने तथा मजबूत बनाने का साधन मात्र ही बनेंगे। जैसा कि कॉमरेड हरभजन सोही ने कहा है, "जबर नाकामी और जबर, जब तक ना मिले कब्र"
