राष्ट्रद्रोही
संधियों के
प्रतिफल:
परमाणु
ऊर्जा कानून
संशोधन की
तैयारी
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पिछले महीने की गई अमेरिका और फ्रांस की यात्रा का उद्देश्य इन साम्राज्यवादी देशों के हितों के साथ भारत की अनरूपता को और गहरा करना था, तथा विशेष रूप से नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ट्रम्प का नज़रे करम हासिल करना था। इस कृपा दृष्टि को प्राप्त करने के लिए दिए गए नज़रानों में से एक महत्वपूर्ण नज़राना है फ्रांसीसी और अमेरिकी कंपनियों को बिना किसी जवाबदेही के भारत में परमाणु रिएक्टर संचालित करने की अनुमति देना।
इस संबंध में भारत सरकार ने अपनी स्थापित निति को पूरी तरह से पलटते हुए 'परमाणु दुर्घटना दायित्व अधिनियम 2010' और 'परमाणु ऊर्जा अधिनियम 1962' में संशोधन करने का निर्णय लिया है। परमाणु दुर्घटना दायित्व अधिनियम 2010 की धारा 17ए में परमाणु दुर्घटना की स्थिति में परमाणु सामग्री के आपूर्तिकर्ताओं की जिम्मेदारी निर्धारित की गई है। यह खंड 2012 में तब लाया गया था जब लोगों ने इन परमाणु रिएक्टरों का कड़ा विरोध किया था और इनसे जुड़े खतरों पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई थी। भोपाल गैस त्रासदी और जापान के फुकुशिमा में परमाणु रिसाव की घटना के उदाहरण इस खंड को सम्मिलित करने के लिए संदर्भ बने थे। महाराष्ट्र के जैतापुर में, जहां 2009 में फ्रांसीसी कंपनी ‘इलेक्ट्रिसिटी डी फ्रांस’
के साथ 6 परमाणु रिएक्टर स्थापित करने का समझौता हुआ था, वह अपार प्राकृतिक विविधता वाला क्षेत्र था और इस रिएक्टर से इस पर मंडरा रहे विनाश का खतरा अखबारों में चर्चा का विषय बना था। सभी कानूनों को दरकिनार कर आनन-फानन में इस कंपनी को दी गई मंजूरी भी उस समय चर्चा में आई थी। यहां सरकार ने ब्रिटिशकालीन भूमि अधिग्रहण कानून का इस्तेमाल कर लोगों से 2,300 एकड़ जमीन जबरन छीन ली थी जिस के खिलाफ लोगों ने जोरदार संघर्ष किया था। इसी प्रकार, 2012 में अमेरिकी वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक कंपनी के साथ आंध्र प्रदेश के कोवाडा में छह परमाणु रिएक्टर स्थापित करने के समझौते को भी श्रीकाकुलम के लोगों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। उस समय विपक्ष में बैठी भाजपा ने भी यूपीए सरकार पर विदेशी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के आरोप लगाए थे और इस धारा को शामिल करने पर जोर दिया था। इन कानूनों ने तब से
इन
विदेशी अवसरवादी कंपनियों के नाक में दम कर रखा था, जो परमाणु संयंत्रों में मशीनरी, प्रौद्योगिकी और कच्चे माल का आयात कर भारी मुनाफा कमाना चाहती थीं, लेकिन इन संयंत्रों से जुड़े भयंकर खतरों की जवाबदेही से पूरी तरह बचना चाहती थीं। परमाणु दुर्घटना की स्थिति में इन कम्पनियों द्वारा कोई भी जिम्मेदारी लेने से इंकार करने के कारण ये परमाणु परियोजनाएं पिछले 15 वर्षों से बंद पड़ी थी। इन्हें पुनः शुरू करने के लिए साम्राज्यवादी देशों का भारत पर
भारी
दबाव था।
परमाणु प्रौद्योगिकी और उपकरणों का क्षेत्र बड़ी साम्राज्यवादी कंपनियों के पूर्ण एकाधिकार और अत्यधिक आकर्षक कमाई वाला क्षेत्र है। वास्तव में, साम्राज्यवादी एकाधिकार के आधार पर होने वाले भारी मुनाफे की चाहत ने ही दुनिया के सामने परमाणु ऊर्जा को सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जल विद्युत के मुकाबले एक विकल्प के रूप में पेश किया है। जबकि वास्तविकता यह है कि परमाणु ऊर्जा इन प्राकृतिक संसाधनों की तुलना में अत्यंत महंगी तकनीक और लागत पर आधारित है। इससे जुड़े जोखिम भी बहुत बड़े और भयानक हैं। लेकिन इन बातों की परवाह किए बिना, इन साम्राज्यवादी कंपनियों ने अपने मुनाफों के लिए गरीब देशों पर इस तकनीक का इस्तेमाल करने का दबाव बनाया है। 2008 में भारत की मनमोहन सिंह सरकार द्वारा सभी कानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार कर हस्ताक्षरित परमाणु समझौता भी इसी दबाव का परिणाम था फिर साम्राज्यवादी कंपनियों के हितों को ध्यान में रखते हुए 2010 में यू पी ए सरकार द्वारा परमाणु दुर्घटनाओं से संबंधित एक विशेष कानून पारित किया गया, जो परमाणु दुर्घटनाओं से संबंधित पिछले कानूनों और अदालती फैसलों को कमजोर करता था तथा कंपनियों की जवाबदेही
कम
करता था। 1986 में भोपाल गैस त्रासदी के बाद दिल्ली गैस लीक मामले में अपना फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संबंधित कंपनियां दुर्घटना के पीड़ितों के प्रति जवाबदेही
और
नुकसान के लिए पूरी तरह उत्तरदायी हैं। लेकिन 2010 के इस कानून के माध्यम से ऐसी देनदारी को निर्माता और आपूर्तिकर्ता कंपनियों की बजाय संयंत्र के संचालक तक सीमित कर दिया गया तथा वित्तीय देनदारी को अधिकतम 1,500 करोड़ रुपये तक सीमित कर दिया गया। जबकि पिछले परमाणु दुर्घटनाओं के अनुभव से पता चलता है कि ऐसी दुर्घटनाओं में वित्तीय नुकसान लगभग 50 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचता रहा है। लेकिन पहले कानूनों को कमजोर कर दिए जाने के बावजूद, कम्पनियों अभी भी पूर्णतः दायित्व मुक्त नहीं की गई थी। इसके बाद, जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, 2012 में जनता के दबाव के चलते जो धारा जोड़ी गई, उसमें यह प्रावधान था कि यदि दुर्घटना मशीनरी की आपूर्ति या उसके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दोष या घटिया सेवा से संबंधित थी, तो संयंत्र संचालक, पीड़ितों को दिए जाने वाले मुआवजे की लागत आपूर्तिकर्ता से वसूल सकता था। इसलिए, कानूनों को कमजोर कर दिए जाने के बावजूद, ऐसे खंडों की निरंतर उपस्थिति इन कंपनियों के मुनाफे में बाधा बन रही थी, और भारत सरकार पर इस बाधा को हटाने के लिए लगातार दबाव डाला जा रहा था।
यू. पी. ए. सरकार के दौरान परमाणु दुर्घटनाओं के लिए जवाबदेही संबंधी कानून को कमजोर करने का पाखंडपूर्ण विरोध करने वाली भाजपा ने अपनी सरकार के दौरान वही कदम और अधिक तत्परता से उठाने शुरू कर दिए हैं। 2015 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान, भारतीय विदेश मंत्रालय ने संकेत दिया था कि आपूर्तिकर्ता के साथ अनुबंध के आधार पर दायित्व खंड को हटाया जा सकता है। लेकिन साम्राज्यवादी कम्पनियां परोक्ष रूप में किये जा रहे वादों की जगह सभी वित्तीय और कानूनी दायित्वों से पूर्णत: छूट चाहती थीं। इसीलिए मोदी सरकार अब कंपनियों को जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त करने के लिए कदम उठाने जा रही है। साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा अतीत में भी इस मसले पर शासक वर्गीय राजनीति की मुख्य पार्टियों के ध्रुवीकरण पर जोर दिया गया है। भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत एरिक गार्सेटी के अनुसार, वे परमाणु ऊर्जा से संबंधित कानूनों में संशोधन के बारे में सत्तारूढ़ दल और विपक्ष दोनों के साथ बातचीत करते रहे हैं।
भारतीय
जनता के
लिए भयानक
खतरे की घंटी:
इन कानूनों में संशोधन साम्राज्यवादी कंपनियों के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि इसके बिना उन्होंने पिछले 15 वर्षों से परमाणु रिएक्टरों का संचालन न करने का फैसला किया। इसका कारण यह है कि ये कंपनियां जानती हैं कि इन रिएक्टरों के संचालन में गंभीर जोखिम शामिल हैं। आज तक हुई सभी परमाणु दुर्घटनाएं किसी न किसी डिजाइन दोष के कारण हुई हैं। फुकुशिमा में हुई परमाणु दुर्घटना रिएक्टर में जिस दोष के कारण हुई उसके बारे में अमेरिकी परमाणु ऊर्जा आयोग के एक अधिकारी ने पहले ही बता दिया था। उनके अनुसार, रिएक्टर डिजाइनर द्वारा प्रयुक्त डेटा दुर्घटना की स्थितियों पर लागू होने योग्य नहीं था। उसके अनुसार ऐसे डिजाइनों का उपयोग परमाणु संयंत्रों के निर्माण परमिट स्वीकार करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन रिएक्टरों को डिजाइन करने वाली अमेरिकी जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी ने इन चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया और परिणामस्वरूप फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना घटित हो गई। चूंकि जापान में यह साम्राज्यवादी कंपनी किसी भी जवाबदेही कानून या दायित्व से मुक्त होकर काम कर रही थी, इसलिए उसे फुकुशिमा दुर्घटना हानिपूर्ति के लिए कुछ भी देने की जरूरत नहीं पड़ी। थ्री माइल आइलैंड में परमाणु दुर्घटना के दौरान अमेरिकी सरकार ने भी नोट किया था कि पहले हुई एक दुर्घटना के दौरान आपूर्तिकर्ता को डिजाइन संबंधी दोष का पता चल गया था। कंपनी के एक इंजीनियर ने भी इस संबंध में कड़े शब्दों में निर्देश जारी करने की मांग की थी। लेकिन आपूर्तिकर्ता ने ऐसा नहीं किया और दूसरी बड़ी दुर्घटना घटने दी। भारत में स्थापित किये जाने वाले ए पी 1000 रिएक्टरों के संबंध में वेस्टिंगहाउस कंपनी दावा कर रही है कि इनसे बड़े पैमाने पर विकिरण रिसाव पांच लाख वर्षों में केवल एक बार होता है और ये अब उपयोग के लिए सुरक्षित हैं। लेकिन कंपनी को स्वयं इन दावों पर भरोसा नहीं है और इसलिए वह दुर्घटना के लिए कोई जिम्मेदारी लेने से इनकार कर रही है। वे जानते हैं कि ऐसी दुर्घटना की स्थिति में भारी खर्च शामिल होते हैं। फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना के बाद, जापानी सरकार को मलबा और कचरा हटाने के लिए 20 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करने पड़े। यह कीमत दुर्घटना के पीड़ितों और उनकी भावी पीढ़ियों पर थोपी गई। ऐसे रिएक्टर न केवल मानव और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की दृष्टि से भारतीय लोगों के हितों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी इनके लागत खर्चे और इनसे उत्पादित बिजली के खर्चे पारंपरिक लागत खर्चों से कहीं अधिक है। जो ए. प. रिएक्टर भारत में
लगाए
जाने वाले हैं, अमेरिका में उनका उपयोग इस लिए रोकना पड़ा क्योंकि उन पर भारी खर्च आ रहा था। इसी कारण दक्षिण कैरोलिना में स्थित ये रिएक्टर, जिन पर नौ ट्रिलियन डॉलर खर्च किए जा चुके थे, बीच में ही बंद कर दिए गए हैं। जॉर्जिया में स्थापित दो रिएक्टरों की अनुमानित लागत 1.4 ट्रिलियन डॉलर से 250 प्रतिशत अधिक खर्च करना पड़ा है। भारत जैसे देशों के लिए ये कीमतें विध्वंसकारक होने वाली हैं। इनसे उत्पादित बिजली की लागत भी वर्तमान बिजली दरों से चार से पांच गुना अधिक होगी। परिवहन लागत के बिना भी इस बिजली की कीमत 15 रुपये प्रति यूनिट से अधिक होगी। इस बिजली को लोगों की पहुंच में लाने के लिए यह
कंपनियों
सरकारी सब्सिडी का बड़ा हिस्सा हड़प कर जाएंगी।
इन संयंत्रों से उत्पन्न परमाणु अपशिष्ट और उसका प्रबंधन एक और गंभीर मुद्दा है। फ्रांस जैसे विकसित देशों में भी यह रखरखाव एक बड़ी समस्या बन गई है। हमारे देश में लोगों के जीवन के प्रति पूर्ण उपेक्षा जैसी स्थिति के कारण यह समस्या कहीं अधिक पसार ग्रहण कर जाती है। वैसे भी हमारे देश में सुरक्षा के जो प्रचलित मानक हैं, वह किसी बड़ी दुर्घटना के बिना भी जगह-जगह हादसों को आधार मुहैया करते हैं। जब हमारे सस्ते और अनुबंधित श्रमिकों को इन परमाणु संयंत्रों में काम करना पड़ेगा, तो बिना किसी दुर्घटना के भी उनके परमाणु विकिरण का शिकार बनने की गहरी संभावना बनी रहेगी। तारापुर परमाणु संयंत्र में कार्यरत कर्मचारियों के निर्धारित मानकों से कहीं अधिक रेडियोधर्मी विकिरण के संपर्क में आने के कई मामले सामने आए हैं।
अभी तक परमाणु ऊर्जा अधिनियम के तहत परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में निजी भागीदारी पर रोक थी। अब परमाणु दुर्घटना दायित्व अधिनियम के साथ-साथ निजी कंपनियों के हित में भी इस को संशोधित किया जाएगा। परमाणु सामग्री के उपयोग और निपटान पर सरकारी निगरानी के बावजूद, चूकें होती रहती हैं। लेकिन जब इस क्षेत्र को निजी कंपनियों को सौंप दिया जाएगा, तो लाभ-लोलुप साम्राज्यवादी कंपनियों द्वारा भारतीय लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ किये जाने की कहीं अधिक गुंजाइशें होंगी। इस प्रकार, बड़ी साम्राज्यवादी कंपनियों की निजी संपत्ति बढ़ाने के लिए भारतीय लोगों के जीवन, पर्यावरण और देश के आर्थिक संसाधनों को दांव पर लगाया जा रहा है। यह प्रस्तावित कदम भारतीय शासकों द्वारा जनता के साथ विश्वासघात का एक बड़ा उदाहरण है। इससे जुड़े जोखिम, दिखाई देते जोखिमों से कहीं अधिक हैं। भारत सरकार के इस राष्ट्रविरोधी कदम का कड़ा विरोध किया जाना चाहिए।

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