जियोंद से उठी किसान ललकार - हमारे दुश्मन कॉर्पोरेट और जमींदार
जियोंद में हुआ किसानों का अभूतपूर्व
जमाव, भूमि अधिकारों के लिए चली आ रही संघर्षमय विरासत के वर्तमान युग का एक गौरवशाली अध्याय है। जमींदारों से कृषि भूमि के मालिकाना अधिकार प्राप्त करने के संघर्षों की इस विरासत में, साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के युग
में कॉरपोरेट्स से भूमि की रक्षा का सवाल भी उठाया गया। इस सभा में किसानों की जमीनों पर दोनों तरफ से हो रहे हमलों पर चर्चा हुई तथा जमीनों की रक्षा तथा भूमिहीनों को जमीन आवंटन करवाने के लिए संघर्ष का झंडा बुलंद करने की घोषणाएं की गईं।
जियोंद में लोगों का यह
जमावड़ा जागरूक कृषक जनता की ज्वलंत सरोकारों का इश्तिहार हो चमक रहा है। भूमि संग्राम कॉन्फ्रेंस ने सही रूप से निशानदेही की है कि किसानों की जमीनों को दोनों ओर से खतरे में है। एक तरफ वैश्विक साम्राज्यवादी कम्पनियां और देशी कॉरपोरेट घराने कई वर्षों से फसलों पर नियंत्रण के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं। खाद्य पदार्थों के व्यापार में बड़े मुनाफों की उम्मीदें कर रही ये दानवीय पूंजीवादी कम्पनियां फसलों पर पूर्ण नियंत्रण के लिए बड़े-बड़े भूखंडों पर भी कब्जा करना चाहती हैं। इसके लिए नई-नई योजनाएं
लाई जा रही हैं। इन परिस्थितियों में पुराने जमींदार भी जमीनों पर अपना अधिकार जता रहे हैं। काश्तकार और आबादकार किसानों से जमीनें हड़पने के प्रयास होते आ रहे हैं। पूरा राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा इन जमींदारों की सेवा में पहले की तरह ही हाजिर है। साम्राज्यवादी आर्थिक सुधारों के आक्रमण की बदौलत बढ़ते कर्ज के बोझ के कारण जमीनें किसानों के हाथों से निकल कर साहूकारों तथा नये उभरते जमींदारों के पास जा रही हैं। कंपनियों को भी अनुबंध खेती के लिए बड़े भूमिधारक जमींदारों की जरूरत होती है, जिनसे अनुबंध पर फसल
उगाना लाभदायक व्यवसाय बनता है। यह पूरी प्रक्रिया विभिन्न तरीकों से किसानों के हाथों से जमीन छिनकर जमींदारों और बड़े भू-स्वामियों के पास
जाने की साधन प्रक्रिया बन गई है। बड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण कर कम्पनियों को दे देने के हमले का सामना तो पहले ही कई वर्षों से होता आ रहा था। जियोंद में हुई सभा ने दोनों तरफ से हो रहे हमलों पर चर्चा की है और इसके खिलाफ एक दृढ़ और भीषण लड़ाई की आवश्यकता को उभारा है। सम्मेलन के मंच से आह्वान किया गया कि 15 मार्च तक ऐसे विविध मुद्दों की जांच कर उन्हें संगठन के समक्ष लाया जाए ताकि इस संघर्ष को और अधिक विस्तारित किया जा सके तथा भूमि अधिकारों पर हमलों के खिलाफ मजबूत एकता बनाकर संघर्ष को आगे बढ़ाया जा सके। सभी ग्राम इकाइयों को भूमि स्वामित्व के मुद्दों पर ठोस रूप में रिपोर्ट तैयार कर संगठन की राज्य समिति के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है।
मंच पर खेत
मजदूर संगठनों के नेताओं के भाषणों में खेत मजदूरों के भूमि अधिकारों के साथ-साथ गरीब और भूमिहीन
किसानों के हितों की बात गूंजी। जमीनों पर हमलों के इस दौर में खेतिहर मजदूरों के जमीनों पर अधिकार की चर्चा बहुत महत्वपूर्ण है। इस चर्चा ने सही सवाल उठाया है कि कृषि भूमि किन लोगों के पास होनी चाहिए। सरकारी एवं पंचायती जमीनें तथा विभिन्न प्रकार की साझा स्वामित्व वाली भूमि पर गरीब किसानों और खेत मजदूरों की साझा अधिकार जतलाई के लिए संघर्ष का आह्वान किया गया है। चांदभान (जैतो) के मजदूरों पर हुए अत्याचार की निंदा करते हुए मजदूरों के पक्ष में खड़े होने का ऐलान कर जहां ऊंची जाति के धनाढ्य चौधरियों के जातिगत अत्याचार के खिलाफ इन्साफ के लिए डटे रहने की दृढ़ता जाहिर की गई, वहीं जातिगत मतभेदों को खत्म
कर किसानों व खेत मजदूरों में एकता का आह्वान भी किया गया।
अन्य मेहनतकश तबकों के संगठनों
की उपस्थिति ने एक साझा जन संघर्ष आंदोलन के हो रहे विकास की परिकल्पना प्रस्तुत की है। कॉन्फ्रेंस में कर्मचारियों, ठेका श्रमिकों और अन्य लोकतांत्रिक तबकों की उपस्थिति ने एक साझा दुश्मन के खिलाफ साझा जनांदोलन की उज्ज्वल संभावनाओं को दर्शाया है। इन विभिन्न वर्गों के वक्ताओं ने कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट हमले के साथ-साथ रोजगार, शिक्षा,
स्वास्थ्य व अन्य आवश्यक क्षेत्रों में साम्राज्यवादी कंपनियों के शोषण व वर्चस्व के मुद्दे को उठाया। साझा दुश्मनों और साझा मुद्दों की आवाज बुलंद हुई। भारी संख्या में लोगों की उपस्थिति ने इन सरोकारों के लोगों की चेतना में अंतर्निहित होने और इन के पूर्ती माध्यम के रूप में, संघर्ष ही एक
मात्र
रास्ता,
होने की स्थापति की है, जिसके जरिए आने वाले समय में बड़े संघर्षों के निर्माण
की संभावनाएं रोशन हुई हैं।
भूमि संग्राम कॉन्फ्रेंस न केबल
कृषि भूमि को हमलों से बचाने के लिए संघर्ष का ऐलान ही थी, बल्कि यह पंजाब
के जागरूक मेहनतकश लोगों द्वारा संघर्षों के माध्यम से भविष्य तलाश रही आशाओं की अभिव्यक्ति भी थी।
(संपादक की फेसबुक पोस्ट)

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