भूमि की सुरक्षा और प्राप्ति के अधिकार के लिए संघर्ष
गांव जियोंद (बठिंडा) में पूर्व मुजारा (बटाईदार) काश्तकारों की भूमि पर हमले और उसके जबरदस्त जन प्रतिरोध ने भूमि अधिकारों के मुद्दे को फिर से उभार दिया है और इसे पंजाब के जन संघर्षों में अग्रणी स्थान पर ला खड़ा किया है। विशेषकर राज्य की किसान लहर में फसलों के उचित मूल्य और सरकारी खरीद के मुद्दों को लेकर लामबंदी के दौरान, भूमि सुरक्षा और प्राप्ति के मुद्दे भी उभर कर सामने आए हैं, जो समग्र रूप से किसान आंदोलन को और अधिक तीव्रता और गहराई प्रदान करेंगे।
जियोंद में मुजारे (बटाईदार) किसानों की जमीनों को ज़मींदारों से बचाने का यह मुद्दा और इससे संबंधित जन-प्रतिरोध का यह दृश्य तब सामने आया है, जब एम एस पी की कानूनी गारंटी के मुद्दे पर संघर्ष चल रहा है। कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष के बाद किसान संगठन एम एस पी की
कानूनी
गारंटी की मांग को लेकर लगातार संघर्ष बनाए हुए हैं। संयुक्त किसान मंचों की ओर से लगातार विरोध प्रदर्शन किए जाते रहे हैं। शंभू और खनौरी बॉर्डर पर लगातार धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और इन विरोध प्रदर्शनों से दिल्ली की ओर कूच करना चाहते किसानों पर सरकार दमन भी कर रही है। संयुक्त किसान मोर्चा ने बड़ी जनसभाएं और कई विरोध प्रदर्शन आयोजित किए हैं। एम एस पी की मांग को लेकर चल रही लामबंदी के बीच नई कृषि विपणन नीति बनाने के लिए राज्यों को नीति मसौदा भेजा गया है। इस मसौदे के जरिए केंद्र सरकार ने एक बार फिर कृषि फसलें कंपनियों को लुटाने की अपनी मंशा जाहिर की है, जिसके लिए तीन कृषि कानून लाए गए थे। राज्यों से एक ऐसी कृषि नीति बनाने के लिए कहा गया है जो सरकारी खरीद मंडियों को खत्म कर यह मंडी निजी कंपनियों को सौंपने के निर्देश देती हो। इस नये हमले से किसानों की फसलें कॉरपोरेट व्यापारियों द्वारा कौड़िओं के दाम लूटी जाएंगी, जिस के परिणामस्वरूप
किसानों
पर कर्ज का बोझ बढ़ने की प्रक्रिया और तेज हो जाएगी। गरीब किसानों की जमीनें के बिकने और धनी किसानों के हाथों में केंद्रित होने की पहले से चल रही प्रक्रिया और जोर पकड़ लेगी।
हरित क्रांति के जरिये होने वाले साम्राज्यवादी शोषण ने इस प्रक्रिया को पहले ही शुरू कर रखा है, भूमिहीन किसानों की संख्या बढ़ रही है जो अन्य विकल्पों के अभाव में कृषि क्षेत्र में ही फंसे रह रहे हैं। इस प्रकार, फसलों पर यह साम्राज्यवादी हमला किसानों के लिए भूमि की कमी को और बढ़ाएगा तथा भूमि स्वामित्व अधिकारों के मुद्दे को सामने लाएगा। स्थानीय जमींदार और साहूकार भूमि हड़पने का हमला तेज करने वाले हैं, तथा किसानों के साथ टकराव भी तेज होने वाला है। भू-माफिया भी सक्रिय हो रहा है और जमीन हड़पने की होड़ तेज हो रही है। एक तरह से जमीन लूटपाट जैसी स्थिति बन रही है। साम्राज्यवादी कम्पनियों के लिए फसल हड़पने का एक प्रमुख तरीका अनुबंध खेती पद्धति है, जिसके तहत वे किसानों से सस्ती दरों पर वांछित फसलें प्राप्त करने की ताक में हैं। अनुबंध खेती के लिए भी उन्हें बड़ी जोत वाले किसानों की जरूरत होती है, इस तरह
स्थानीय
साहूकारों
और जमींदारों की बढ़ती हुई भूमि जोतें ही उन कंपनियों की जरूरत है। ये स्थानीय जमींदार और साहूकार कम्पनियों की मध्यस्थता कर गरीब किसानों का शोषण करवाने के साधन बन जाते हैं। यहां एक ओर वैश्विक कृषि निगम मुख्य रूप से फसल व्यापार पर हावी होने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वे भूमि पर प्रत्यक्ष नियंत्रण की नीति भी अपना रहे हैं। इन कंपनियों ने दुनिया भर के अविकसित और गरीब देशों में बड़े सौदे किए हैं और बड़ी मात्रा में जमीन का अधिग्रहण किया है। अपनी औद्योगिक एवं वाणिज्यिक परियोजनाओं, कृषि एवं कृषि-संबंधी व्यवसायों तथा अन्य वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए वांछित भूमि पर नियंत्रण करने की नीति के तहत ही साम्राज्यवादियों ने हमारे जैसे पिछड़े देशों में भूमि बैंक बनाने की नीति शुरू की है, ताकि वे अपने उद्देश्यों के लिए, जब चाहें, जहां चाहें, जितनी चाहें उतनी भूमि अधिग्रहित कर सकें। सरकार साम्राज्यवादियों और पूंजीपतियों के हितों के लिए भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण करने जा रही है, ताकि भूमि स्वामित्व की तस्वीर स्पष्ट हो और व्यापारियों के लिए इसे देखना और छान-बीन करना आसान हो। साथ की साथ इस डिजिटलीकरण का प्रयोजन, विवादित और उचित स्वामित्व दस्तावेजों के बिना भूमि पर खेती कर रहे किसानों की भूमि, बैंक में शामिल करना और कंपनियों को व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सौंपना भी हैं। इस संबंध में, पहला हमला विभिन्न प्रकार की सार्वजनक स्वामित्व वाली भूमि पर होगा, जिस पर भूमिहीन समुदाय अपने अधिकारों का दावा जतलाते रहे हैं। जैसे पंचायत, शामलात और नजूल श्रेणी की भूमि। इस प्रकार भूमि पर संभावित हमले का यह एक और पहलू है, जिसमें भूमि के सीधे कम्पनियों के हाथों में चले जाने का खतरा दिखाई दे रहा है। इस किस्म का हमला भी भूमि अधिकारों के मुद्दे को उभरने जा रहा है।
भूमि अधिकारों पर हमले का एक अन्य रूप जियोंद गांव में उभरे मुद्दे जैसा है, जहां जमींदार और भू-माफिया पूर्व बटाईदार किसानों और आबादकार किसानों की जमीनों पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। पूर्व पैप्सू क्षेत्र की पटियाला रियासत के इस गांव में उस दौर के भूस्वामी/जमींदार, राज्य में अपनी पहले से ही स्थापित
हैसियत
और कानूनी खामियों का फायदा उठाकर जमीनों पर मालिकाना हक का दावा कर रहे हैं। पैप्सू मुजारा संघर्ष के जोर पर हासिल किये मालिकाना हक को भी कानूनी खामियों की आड़ में चुनौती दी जा रही है। यहां तक कि
अदालतें
भी इसमें शामिल हैं। न्यायालयों में भी जमींदारों की दबदबे वाली स्थिति शाक्ष्य है तथा भारतीय राज्य में जमींदारों की हैसियत की भी पुष्टि हो रही है। यह मुद्दा केवल जियोंद गांव तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पैप्सू क्षेत्र के कई गांवों में ऐसे मुद्दे मौजूद हैं, जहां किसानों पर भूमि निष्कासन का खतरा मंडरा रहा है और एक तरह से उनके मालिकाना हक छीने जा रहे हैं। इसी प्रकार, राज्य में आबादकार किसानों के मालिकाना हक का मुद्दा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसके लिए संघर्ष करते हुए किसान नेता साधु सिंह तख्तूपुरा शहीद हो गए। लंबे समय से जमीन पर खेती कर रहे किसानों को सरकारों द्वारा मालिकाना हक से वंचित रखा जा रहा है और इस बीच भू-माफिया इन जमीनों पर कब्जा करने के लिए प्रयासरत है और हमले कर रहा है। स्थानीय राजनेताओं, पुलिस, साहूकारों और गुंडों का गठबंधन इन जमीनों पर नजर रखे हुए है और विभिन्न क्षेत्रों में इस तरह के हमलों के मुद्दे उठते रहते हैं। ऐसी भूमि की सुरक्षा और स्वामित्व अधिकारों का प्राप्ति किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
कुल मिलाकर किसानों की जमीन पर हमला कई दिशाओं से हो रहा है। एक तरफ साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दलाल पूंजीपतियों की नजर जमीनों पर है तो दूसरी तरफ जमींदार और साहूकार जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं। वे किसानों के सिर चढ़े ऋण के जोर भूमि ग्रहण कर रहे हैं, कानूनी खामियों का फायदा उठा रहे हैं, राज्य में अपनी शक्तिशाली स्थिति और प्रभाव का उपयोग कर रहे हैं, तथा सभी प्रकार के अवैध और बलपूर्वक तरीकों से भूमि हड़प रहे हैं। भूमि पर अतिक्रमण के इस दृश्य ने न केवल किसानों की भूमि की सुरक्षा का मुद्दा उभार दिया है, बल्कि गरीब किसानों और खेत मजदूरों के लिए भूमि अधिकार का मुद्दा भी उभारा है। विशेष रूप से, सामुदायिक स्वामित्व वाली भूमि इस हमले की चपेट में सबसे पहले आती है और यही भूमि, भूमिहीन समुदायों की दावा जतलाई का स्वाभाविक केन्द्र बनती है। इन जमीनों पर हक जतलाई का मुद्दा, इस तरह के हमले के संदर्भ में विशेष रूप से उठता है कि इन जमीनों का मालिक कौन हो, यानी क्या इन पर अधिकार दलितों और भूमिहीनों, सीमांत किसानों का हो या फिर जमींदारों, साहूकारों और कंपनियों का। इस संदर्भ में खेत मजदूरों द्वारा इन जमीनों के उपयोग के अधिकार का मुद्दा और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। खेत मजदूर पहले से ही पंचायत की एक तिहाई जमीन पर ठेके पर खेती करने के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं। अब भूमि उपलब्धता अधिकारों पर हमलों के उपरोक्त संदर्भ के बीच, संगरूर जिले में जींद रियासत के राजा की, परन्तु अब बेनामी भूमि पर खेत मजदूरों द्वारा अधिकार जतलाई ने भूमि प्राप्ति के अधिकार
के
इस मुद्दे को एक और नए आयाम में उठा दिया है। खेत मजदूरों की यह अधिकार जतलाई पंचायत की एक तिहाई भूमि पर मौजूदा कानूनी अधिकार के दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जमींदारों की भूमि तक फैल रही है। यह दावा जतलाई, भूमि सुधार के मुद्दे को अधिक दृढ़तापूर्वक उभारने के नुक्ते से महत्वपूर्ण है तथा भूमि सुरक्षा और प्राप्ति के मुद्दे को और अधिक तीव्रता से किसानों और खेत मजदूरों की चेतना का हिस्सा बनाने में
योगदान
दे रही है। यह एक अलग पहलू है कि ऐसे मुद्दों पर खेत मजदूरों और गरीब किसानों की एकजुटता उभरनी चाहिए और जातिगत विरोधाभास को मिटाकर भूमि प्राप्ति और सुरक्षा के लिए साझा संघर्ष खड़ा करने की नीति को समुचित सामरिक सूझबूझ के साथ लागू किया जाए ताकि सामंती वर्ग इन विरोधाभासों का फायदा न उठा सकें।
राज्य के किसान आन्दोलन में भूमि अधिकारों के सुरक्षा और प्राप्ति के मुद्दों का उभरना, ज़रई
क्रांतिकारी
आन्दोलन निर्माण के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण परिघटना है। इसको और अधिक बढ़ाने तथा विस्तार किये जाने की आवश्यकता है। सामंती लूट से जुड़े मुद्दों से जुड़ कर भूमि सुरक्षा
और
प्राप्ति
के मुद्दे, ऐसे मुद्दे हैं जो किसान आंदोलन को और गहरा और मजबूत करेंगे। अब जबकि पिछले कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र पर साम्राज्यवादी लूट के हमले तेज़ हो गये हैं, पंजाब के किसान आन्दोलन में अधिकांश लामबंदी
साम्राज्यवादी लूट
के मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, तथा सामन्ती लूट के विरुद्ध किसान आंदोलन अपेक्षाकृत कमज़ोर रहे हैं, और स्वाभाविक रूप से, इन लामबन्दियों में खेत मजदूरों की भागीदारी भी अपेक्षाकृत कमज़ोर रही है। ये भूमि के अधिकार के मुद्दे हैं जो खेत मजदूर आंदोलन को मजबूत करेंगे और समग्र ज़रई क्रांतिकारी आंदोलन के हिस्से के रूप में खेत मजदूर-किसान एकता को मजबूत करेंगे। साम्राज्यवादी शोषण के खिलाफ चल रहे किसान संघर्षों को भी भूमि अधिकारों के लिए लड़ रहे किसान आंदोलन से और अधिक बल मिलेगा।
भूमि अधिकारों पर हमले के खिलाफ संघर्ष को साम्राज्यवादी शोषण के खिलाफ चल रहे संघर्षों के साथ जोड़ने की जरूरत है ताकि हम सामंतवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी क्रांतिकारी संघर्षों के साथ किसान और खेत मजदूर लहर का निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़ सकें।

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