Monday, March 31, 2025

जियोंद: जमीनों की रक्षा के लिए डटे किसान

 
जियोंद: जमीनों की रक्षा के लिए डटे
किसान



जियोंद गांव में जमींदारों, प्रशासन और अदालत के जोर पर 20 जनवरी को जमीनों पर काब्ज होने के मंशे से किया गया हमला कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। जमींदार पहले भी इस कब्जे के लिए कई हथकंडे अपना चुके हैं। इन्हीं विभिन्न तरीकों में से, वर्ष 2021 में एक तरीका भू-माफिया (गैंगस्टर तत्वों) का उपयोग था। जमींदारों द्वारा एक साजिश के तहत भूमि का एक टुकड़ा भू-माफिया को बेच दिया गया तांकि गुंडों द्वारा बटाईदार किसानों से जमीन का कब्जा छीन लिया जाए। ये तत्व बड़ी संख्या में हथियारों से लैस होकर जमीन पर कब्जा करने के लिए पहुंच भी गए थे। तब भी भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहां) के सहयोग से ग्रामीणों ने अतिक्रमण के प्रयास को विफल कर दिया था और भू-माफियाओं को अपना सामान छोड़कर भागना पड़ा था, हालांकि उस समय हुए संघर्ष में ब्लॉक स्तरीय किसान नेता समेत कई किसान गंभीर रूप से घायल भी हो गए थे।

लेकिन इस बार भूमि पर हमला सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय की आड़ और दुष्प्रेरणा से किया गया। यद्पि जमींदार भूमि हड़पने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करते रहे थे, वहीं दूसरी तरफ उनके द्वारा अदालती और कानूनी कार्रवाई भी एक लम्बे समय से चलाई जा रही थी। देश की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में जमींदारों की हैसियत और वर्चस्व का प्रभाव, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन जमींदारों के पक्ष में दिए गए निर्णयों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही व्यवस्था, जो जमींदारों के पक्ष में निर्णय देते समय उदार हो जाती है, जब मजदूर वर्ग के पक्ष में न्याय देने की बात आती है तो आंखें मूंद लेती है। इसी के चलते अदालत ने फैसला सुना दिया कि बटाईदार किसानो द्वारा काश्त की जा रही भूमि के 1/3 हिस्से के मालिक जमींदार हैं और इस लिए लगभग 715 एकड़ भूमि  को चिन्हित कर जमींदारों को कब्जा देने की प्रक्रिया शुरू की जाए। 30 जनवरी तक जमीनों की निशानदेही की प्रक्रिया पूरी करने के आदेश दिए गए थे।

अदालत के अन्यायपूर्ण आदेशों को लागू करने के लिए पंजाब सरकार अपनी पूरी मशीनरी के साथ आनन फानन में तैयार हो गई। नौकरशाही और प्रशासन, जो दशकों से बटाईदार किसानों के पक्ष में कानूनी संशोधनों और सरकारी आदेशों के कार्यान्वयन को लटकाता और उलझाता रहा था, मुजारे किसानों के अधिकारों का अतिक्रमण करने के लिए पूरी तरह स्क्र्य हो गया। संघर्षरत बटाईदार किसानों के अधिकारों पर झपटने के साथ-साथ इस क्षेत्र की संगठित किसान शक्ति को कुचलने के इरादे भी सरकार के षड़यंत्र मे शामिल थे। पिछले कुछ महीनों के दौरान ही संगठित किसान शक्ति के कारण सरकार की कई तथाकथित विकास योजनाएं क्रियान्वित नहीं हो पाई थी। धान ख़रीददारी से भागने, भारत माला परियोजना के तहत तुच्छ मुआवजा देकर किसानों की जमीने अधिग्रहीत करने, मामूली मुआवजा देकर गैस पाइपलाइन बिछाने जैसी परियोजनाओं को किसानों की संगठित ताकत के जोर क्रियान्वित होने नहीं दिया गया था। कॉरपोरेट घरानों की सेवक पंजाब सरकार बल प्रयोग से भी यह कार्य पूरा करने में असमर्थ रही। अपने न्यायोचित अधिकारों के लिए जनता का बढ़ता प्रभाव सरकार की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहा था। वह इस पर झपटने के लिए उपयुक्त अवसर की तलाश में थी।

सरकार ने जियोंद गांवों के मुद्दे पर अदालती आदेश को एक उपयुक्त अवसर के रूप में देखा। कानून की सुरक्षात्मक ढाल की आड़ मे, संगठित किसान शक्ति से भिड़ने और उसे कुचलने की सरकार की मंशा स्पष्ट रूप से ज़ाहिर हो रही थी। गांव में निशानदेही करने गए पुलिस अधिकारियों किसान प्रतिनिधिमंडल से मिलते समय डी.सी. बठिंडा के व्यवहार से स्पष्ट था कि सरकार किसी भी झूठे-सच्चे बहाने की आड़ मे  प्रदर्शनकारी किसानों को गैर-जिम्मेदार दंगाई तत्व बताकर दमन करने के लिए आतुर थी।

अदालती आदेशों को लागू करने के एक कदम के रूप में, प्रशासन गांव के कुल रकबे को मापने, उसका सीमांकन करने, उसे चिह्नित करने और फिर स्वामित्व हस्तांतरित करने के लिए पूर्वाभ्यास कर रहा था। 13 और 17 जनवरी को उपरोक्त कदमों को लागू करने के पहले प्रयासों में, गांव के संगठित किसानों के कड़े विरोध के कारण प्रशासन को पीछे हटना पड़ा। जिला अधिकारी इस विफलता से आग बबूला थे। इस बीच, जब किसानों और उनके संगठन बीकेयू एकता (उगराहां) का एक प्रतिनिधिमंडल डी.सी. बठिंडा को मिलने गया तो उन्होंने किसानों के भूमि पर वैध अधिकारों, कानून के जन-हितैषी उपयोग और अदालती फैसलों को लोगों के नज़रिए से संबोधित होने के उचित तर्कों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। प्रतिनिधिमंडल को उत्तर देने में असमर्थ जिला अधिकारी अपनी बात से पीछे हटने के बजाय और भी अधिक असभ्य और कुरख़त होते हुए "रोक कर दिखाने" की चुनौती देने लगा।

तर्कपूर्ण जवाब देने से असमर्थ हुए डी. सी. द्वारा दी गई अहंकारपूर्ण चुनौती को स्वीकार करते हुए किसान वापस लौट आए। संगठन के नेतृत्व में किसानों ने सरकार के हमले का प्रतिरोध करने के लिए गांव में तैयारियां शुरू कर दीं। अपनी जमीनों के लिए मर मिटने के लिए तैयार गांव के  लगभग 250 किसान एकजुट हो गए। 19 जनवरी की रात को संगठन के आह्वान पर जिले के अन्य गांवों के अलावा अन्य जिलों से भी किसान पहुंचने लगे। अगले दिन जब राजस्व विभाग के अधिकारी और पुलिस प्रशासन गांव में पहुंचे, तब तक संगठन की प्रदेश नेतृत्व टीम, बाहरी गांवों से आए किसान सेनानियों और गांव के किसानों का एक सुदृढ़ ढांचा आकार ले चूका था। भूमि अतिक्रमण को रोकने के लिए लगभग 500-700 किसान लड़ाके गांव के अंदर एकत्र हो गए। गांव की ओर जाने वाली सभी सात सड़कों पर अवरोधक लगा दिए गए। संभावित पुलिस दमन का सामना करने के लिए तैयारी की गई। गांव के युवा, किसान, तथा पुलिस के साथ संघर्षों के अनुभवी मेहनतकश किसान सेनानियों और कार्यकर्ताओं का समूह सरकार के दमनकारी हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार था।

20 जनवरी को राजस्व विभाग के अधिकारी भारी पुलिस बल के साथ भूमि सीमांकन के लिए गांव पहुंचे।  पुलस प्रशासन किसानों पर पूरी क्रूरता से अत्यचार कर उन्हें आतंकित करके निरुत्साह करने ले लिए कोई बहाना ढूंढ रहा था। जब राजस्व विभाग के चार अधिकारियों ने गांव के एक तरफ से पैमाइश करना शुरू किया तो किसानों के एक जत्थे ने वहां पहुंच कर इसका विरोध किया। तनावपूर्ण माहौल और पुलिस प्रशासन की अविश्वसनीयता के कारण किसान कार्यकरता सुरक्षा के मद्देनज़र राजस्व अधिकारियों को गांव में ले आए। लेकिन प्रशासन ने इसे अधिकारियों के अपहरण का मुद्दा बनाकर भारी पुलस लाव-लश्कर के साथ गांव पर चढ़ाई कर दी। सड़क पर जा रहे करीब 20 किसानों के एक जत्थे को बहुत बुरी तरह पीटा गया, तीन-चार किसानों का अपहरण कर लिया गया तथा किसानों की ट्रैक्टर-ट्रॉली को अपने कब्जे में ले लिया गया।

घटना की सूचना मिलते ही किसानों के एक बड़े जत्थे ने घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस बल का रास्ता रोक दिया। लाठी-डंडों से लैस किसान और युवा, किसान नेताओं के एक इशारे मात्र पर पुलिस से भिड़ने के लिए तैयार खड़े थे। पुलिस ने किसानों पर राजस्व अधिकारियों का अपहरण करने, पेट्रोल बम का इस्तेमाल करने और पुलिस का रास्ता रोकने का आरोप लगाया। किसान नेताओं ने इन आरोपों को खारिज करते हुए चेतावनी दी कि अगर प्रशासन किसी मनगढ़ंत बहाने को आधार बना कर किसानों पर अत्याचार करना चाहता है तो उसे पहले यही दुस्साहस आजमा लेना चाहिए ताकि इस जोर आज़माइश के बाद ही बाकी मुद्दों पर बात की जाए। किसान नेतृत्व ने साफ़ शब्दों मे कह दिया कि हम अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस का डट कर मुकाबला करेंगे चाहे इसके लिए हमें कितनी भी जानें क्यों कुर्बान करनी पड़ें। नेताओं के ऐसा कहते ही युवा कार्यकरता मुकाबले के लिए तैयार हो आगे बढ़ आए। किसान नेताओं और कृषक जनता के प्रचंड इरादे, मुठभेड़ के लिए उनकी तैयारी और उनके दृढ़ निश्चय को देख प्रशासन को यह आभास हो गया कि भारी पुलिस दल-बल और अत्याचार के जरिए किसानों को आतंकित नहीं किया जा सकता और केवल एक बड़े खूनी मुठभेड़ के बाद ही आगे बड़ा जा सकता है। यह देख-समझ कर प्रशासन पीछे हटने पर मज़बूर हो गया। अपहृत किसान नेताओं को रिहा किया गया। ईंट-पथर से भरी ट्रैक्टर ट्रॉली वापस कर दी गई। किसानों ने गांव के अंदर बैठे राजस्व अधिकारियों को उनके सामान सहित सुरक्षित पुलिस के हवाले कर दिया। राजस्व अधिकारियों ने पुलिस की मौजूदगी में ही किसानों के सम्मानजनक और सत्कारमय व्यवहार के बारे में वीडियो बयान भी रिकॉर्ड करवाए। किसानों के अनुभवी नेतृत्व के मार्गदर्शन में स्व-बलिदान की भावना से संगठित और दृढ़ मुकाबले के लिए तत्पर किसान शक्ति के आगे असहाय प्रशासन को अपने लाव-लश्कर सहित वापस लौटना पड़ा।

इस प्रकार, जमीनों के स्वामित्व और कब्जे के लिए जमींदारों ने व्यवस्था के सभी अंगों को झोंककर, अधिक तैयारी के साथ हमला किया है। जहां न्यायिक प्रणाली ने सामंती हमले को आधार प्रदान किया, वहीं पुलिस और सिवल प्रशासन इस हमले के अगुआ के रूप में सामने आए हैं। लेकिन सामंतवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध लंबे और जुझारू संघर्षों मे संगठित हुई अनुशासित किसान शक्ति के दृढ़ निश्चय ने इस हमले को विफल कर दिया और इस तरह सामंतवाद विरोधी संघर्षों का अगला विजयी अध्याय जियोंद गांव में लिखा गया।

अदालत द्वारा 30 जनवरी की तय की गई समय सीमा और पंजाब सरकार के प्रत्यक्ष रूप मे जमींदारों के समर्थन मे जाने वाले रुख को देखते हुए किसान संगठन ने 30 जनवरी तक गांव में "जमीन बचाओ मोर्चा" लगा दिया। इस मोर्चे में हर रोज अलग-अलग जिलों के किसान शामिल हुए। भारतीय किसान यूनियन डकौंदा (धनेर) और कीर्ति किसान यूनियन ने इस मोर्चे का समर्थन करते हुए इसमें भाग लिया। इस मोर्चे को क्रांतिकारी किसान यूनियन द्वारा भी समर्थन दिया गया। चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान 29 जनवरी को करीब दो दर्जन के करीब किसान, मजदूर, कर्मचारी, ठेका मजदूर, छात्र सांस्कृतिक क्षेत्र के संगठनों ने संयुक्त बैठक कर इस संघर्ष को अपना समर्थन देने की घोषणा की। किसान संगठन द्वारा इस मुद्दे पर 13 फरवरी को राज्य स्तरीय भूमि संघर्ष सम्मेलन आयोजित किया गया। यहां हजारों की संख्या में जुटे किसानों को अपनी जमीनों की रक्षा के लिए अगले लंबे, व्यापक और जुझारू संघर्षों के लिए तैयार रहने का आह्वान किया गया।

                                                                              (सुर्ख लीह  मार्च अप्रैल 2025)

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