Thursday, September 25, 2025

भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते के खिलाफ संघर्ष का झंडा थामे सड़कों पर उतरे किसान

        भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते के खिलाफ संघर्ष का झंडा थामे सड़कों पर उतरे किसान




 

13 अगस्त को संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर देश के किसानों द्वारा भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते के खिलाफ उठाई आवाज बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण कार्रवाई थी। कृषक जनता की विशाल भागीदारी वाली यह कार्रवाई, कृषि क्षेत्र पर मंडरा रही  साम्राज्यवादी गिद्धों के हमलों के खिलाफ किसान लहर के तीब्र होते ज्वार की अभिव्यक्ति भी बन गई है। इसके अलावा, किसान संगठनों के एक अन्य साझा मंच, किसान मजदूर मोर्चा ने भी इस व्यापार समझौते के खिलाफ एक्शन किये हैं। कुछ अन्य किसान संगठनों ने भी मोदी सरकार से इस समझौते से दूर रहने की मांग की है। देश के संगठित किसानों की यही आवाज है जो ट्रम्प के सामने दंडवत हो रही मोदी सरकार को डरा रही है और कृषि कानूनों पर हुए संघर्ष की याद दिला रही है। ट्रम्प द्वारा मांगी जा रही मनोवांछित रियायतें देते समय मोदी के हाथ-पाँव फुला रही है। अमेरिकी माल की बाढ़ से कृषि क्षेत्र के और भी गंभीर होने जा रहे संकट की बेचैनी को किसान संगठनों द्वारा संघर्ष के रस्ते ढाल लिए जाने का खतरा मोदी द्वारा  ट्रम्प के आगे साष्टांग नतमस्तक हो जाने में बाधा बन रहा है। देश के शासक वर्गों द्वारा तथाकथित स्वतंत्रता दिवस के जश्नों से दो दिन पहले हुआ यह एक्शन, शासक वर्गों द्वारा तिरंगा फहरा प्रस्तुत की जाती नकली आज़ादी के मुक़ाबले देश पर साम्राज्यवादी उत्पीड़न और लूट की असलियत को उजागर करने का एक अवसर भी बन गया है।

जब देश का राष्ट्रीय पूँजीवाद, छोटे व्यवसाय और व्यापारी वर्ग अभी तक इस संभावित समझौते के ख़िलाफ़ लामबंद होता नहीं दिख रहा, तब ऐसे समय में किसानों की यह कार्रवाई और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह एक्शन खासकर ऐसे तबकों के सामने यह उभारने का जरिया भी बनता है कि किस तरह यह समझौता देश के शोषित-उत्पीड़ित वर्गों के संकट को और भी गहरा करने जा रहा है। वैसे, छोटे व्यापारियों, कारोबारियों और छोटे उद्योगपतियों को प्रभावित करने वाले इस समझौते के खिलाफ इन वर्गों की एकजुट आवाज का अभी तक न उठ पाना भी जनता की साम्राज्यवाद-विरोधी लहर की कमजोरी की अभिव्यक्ति है। किसानों की आवाज के साथ मिल कर, इन वर्गों और तबकों द्वारा समझौते के खिलाफ आवाज उठाना, मोदी सरकार पर कई गुना अधिक दबाव बनाने का कारण बनेगा। लेकिन अभी देश के साम्राज्यवाद-विरोधी जन-आंदोलन को यह मुकाम हासिल करना बाकी है।

यह कार्रवाई कृषि क्षेत्र में तेज होते जा रहे साम्राज्यवादी हमले के प्रति किसानों में बढ़ती जागरूकता की भी अभिव्यक्ति है। कृषि कानूनों के खिलाफ ऐतिहासिक किसान संघर्ष ने इस जागरूकता को फैलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन कानूनों को देश के किसानों की फसलों और ज़मीनों को देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने के कदम के रूप में चिन्हित किया था। साम्राज्यवादी लूट के विरुद्ध किसानों को लामबंद और संगठित करने में जुटे किसान संगठनों ने भी इनका (कृषि कानूनों का) सबंध साम्राज्यवादी हमले से जोड़ कर दिखाने की गंभीर कोशिशें की थीं। उसके बाद एमएसपी की कानूनी गारंटी की माँग को, बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवादी कृषि निगमों द्वारा कृषि को हड़पने की योजनाओं के साथ टकराव के रूप में और अधिक स्पष्टता से देखा जाने लगा है। कृषि क्षेत्र में साम्राज्यवादी हमला और उसका प्रतिरोध, वर्तमान में किसान आंदोलन के लिए ज्वलंत सरोकार का मुद्दा है। देश के किसान, कृषि पर मंडरा रहे साम्राज्यवादी गिद्धों को पहचानने लगे हैं। तेज़ होता साम्राज्यवादी हमला इस पहचान को और गहरा करने का जरिया बन रहा है। यह हमला नए से नए क्षेत्रों में और नए से नए तरीकों से किसानों के हितों पर प्रहार कर रहा है। इन नए-नए तरीकों से किसानों का पड़ रहा वास्ता उनकी सूझ-समझ को और तीखा कर रहा है। किसानों का अमेरिकी साम्राज्यवादी हितों के साथ  यह सीधा टकराव, साम्राज्यवाद-मुर्दावाद के नारे को किसान जनता के मनों में गहराई तक उतारने का आधार बन रहा है। देश की क्रांतिकारी जम्हूरी और सच्ची देशभक्त ताकतों को इस अवसर पर किसानी के बीच साम्राज्यवाद-मुर्दावाद  के मूलतत्त्व का संचार करने के लिए पुरज़ोर प्रयास करने चाहिए।  

Tuesday, September 23, 2025

अमेरिकी टैरिफों की भयंकर मार: उजाड़ेगी निर्यात-उन्मुख उद्योग और रोजगार

 अमेरिकी टैरिफों की भयंकर मार: उजाड़ेगी निर्यात-उन्मुख उद्योग और रोजगार



 

अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर 27 अगस्त से लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के लागू होने के बाद, अमेरिका को सामान का निर्यात करने वाले उद्योग जगत में हाहाकार मच गयी है। भारतीय सामान अमेरिकी बाज़ार में पहले से डेढ़ गुना महंगा हो जाने से उसकी माँग कम हो जाएगी और कम टैरिफ वाले देशों की तुलना में वे अमेरिकी बाज़ार में टिक नहीं पाएगा। टैरिफ लागू होने से पहले ही, इसकी माँग न रहने की आशंकाओं के चलते उत्पादन प्रक्रिया ठप्प होने, ऑर्डरों को होल्ड पर रखने और ऑर्डर रद्द होने का सिलसिला शुरू हो गया था। कारीगर श्रमिकों की छंटनी शुरू हो गई थी और इस मसले का कोई समाधान न निकले की सूरत में इन निर्यात व्यवसायों का विनाश, लाखों श्रमिकों की छंटनी, इन कारीगरों, श्रमिकों और आपूर्ति श्रृंखला में हिस्सेदार कई अन्य सहायक व्यवसायों और परिवारों का भविष्य अनिश्चितता और अंधकार में धकेल दिए जाना तय है। एक व्यापक मानवीय संकट पैदा हो सकता है।

चूंकि ये टैरिफ अभी-अभी लागू हुए हैं, इसलिए इनके विस्तृत प्रभावों के सामने आने में अभी कुछ समय लगेगा, लेकिन फिर भी अलग - अलग निर्यात उद्योगों पर संभावित प्रभाव का अभी से काफी हद तक अनुमान लगाया जा सकता है। जिसकी संक्षिप्त चर्चा नीचे दी गई है:

अमेरिका को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में एक महत्वपूर्ण वस्तु तराशे हुए हीरे, मानक और आभूषण हैं। गुजरात इस हीरा व्यवसाय का मुख्य केंद्र है। वर्ष 2024-25 में भारत ने अमेरिका को लगभग 10 अरब  डॉलर मूल्य के हीरे या हीरे जड़ित आभूषणों का निर्यात किया था, जो कुल हीरा निर्यात का 40 प्रतिशत था। पिछले वर्ष इस पर टैरिफ दर मात्र 2.1% थी। जो अब बढ़कर 52% हो गई है। यदि ये भारतीय माल अमेरिकी बाजार में नहीं बिकता, तो इतनी बड़ी मात्रा के लिए जल्द ही कहीं वैकल्पिक बाजार मिलना आसान नहीं है। इसीलिए गुजरात का हीरा उद्योग शोक में डूबा हुआ है। अकेले सूरत में ही लगभग 12 लाख श्रमिक इस उद्योग से जुड़े बताए जाते हैं। प्राप्त समाचारों के अनुसार टैरिफ लागू होने से पहले ही लगभग एक लाख हीरा श्रमिकों की छंटनी कर दी गई थी। माल की मांग में संभव भावी कटौती लाखों अन्य श्रमिकों के सिर पर छंटनी की तलवार की तरह लटक रही है। व्यवसायों का बड़े पैमाने पर उजाड़ा होना तय है।

अमेरिका को बड़े पैमाने पर किए जाने वाले निर्यातों में कपड़ा और परिधान उद्योग महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वर्ष 2024-25 में इस उद्योग ने अमेरिका को 10.8 अरब डॉलर का निर्यात किया, जो भारत के इस उत्पाद के निर्यात का 35% था। भारत में इस उद्योग से जुड़े दस प्रमुख क्लस्टर हैं। नई टैरिफ दरों के लागू होने से अमेरिका में टैरिफ दरें बढ़कर 63.9% हो गई हैं। इतनी ऊंची टैरिफ दरों का भारतीय निर्यात की मांग पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। भारतीय सामान वियतनाम, बांग्लादेश और कम टैरिफ दरों वाले अन्य देशों के सामान के मुकाबले टिक नहीं पाएगा। प्राप्त समाचारों के अनुसार तमिलनाडु के त्रिपुर, नोएडा, सूरत आदि में उत्पादन प्रकिर्या बंद हो गई है। नोएडा और गुरुग्राम में क्षमता विस्तार की योजनाओं को ब्रेक लग गए हैं। लुधियाना में धागे और कपड़े की बिक्री पर मंदी छाई हुई है। व्यवसायों में लगा पैसा जाम हो गया है। बेंगलुरु में काम शिफ्टों की कटौती लगनी शुरू हो गई है। परिधान और वस्त्र उद्योग ने कम टैरिफ वाले देशों की ओर रुख करने की योजनाएं  बनानी शुरू कर दी हैं। लाखों श्रमिकों, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं हैं, का भविष्य अनिश्चित हो गया है।

भारत ने पिछले साल अमेरिका को 1.2 अरब  डॉलर मूल्य के कालीन निर्यात किए। भारतीय कालीनों पर टैरिफ अब बढ़कर 52.9 प्रतिशत हो गया है। उत्तर प्रदेश का भदोही, कालीन उद्योग का एक प्रमुख केंद्र है जहाँ लगभग 20,000 करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार होता है। लाखों लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। उच्च टैरिफ दरों के कारण, भारतीय कालीन अब तुर्की, कोलंबिया आदि देशों के निर्यात के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, पिछले साल भारत ने अमेरिका को 2.4 अरब डॉलर मूल्य का झींगा मछली का निर्यात किया, जो कुल मछली निर्यात का 32.4 प्रतिशत था। इस मछली पर पहले 10 प्रतिशत आयात शुल्क था, जो अब बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया है।  7 अगस्त को जब केवल 25 प्रतिशत प्रतिकिर्यातमिक टैरिफ लागू किया गया था, तो झींगा उत्पादक आंध्र के किसानों से मछली के खरीद मूल्य में 20 से 25 प्रतिशत की गिरावट आई थी। अब 50 प्रतिशत टैरिफ लागू होने से निर्यात में तो काफी कमी आएगी ही लेकिन साथ की साथ कीमतें भी बहुत ज्यादा गिर जाएगीं। लाखों झींगा पालक किसान बर्बाद हो जाएंगे। भारत को अरबों डॉलर के राजस्व का नुकसान होगा।

कानपुर और आगरा चमड़ा व्यापार के प्रमुख केंद्र हैं। जहां से हर साल लगभग दो - ढाई हजार करोड़ रुपये के चमड़े के सामान का निर्यात किया जाता है। अकेले आगरा से हर साल 7 से 8 लाख जोड़ी चमड़े के जूते निर्यात किए जाते हैं।

उपरोक्त के अलावा, कई अन्य स्थानों से अमेरिका को विभिन्न प्रकार के सामान का निर्यात किया जाता है। जिसमें हस्तशिल्प, फर्नीचर और बिस्तर, कृषि उत्पाद (जैसे बासमती चावल, गरम मसाले, चाय, शहद, दालें, तिल आदि), ऑटो पार्ट्स, कृषि मशीनरी, मशीनें और मशीन टूल्स, खेलों का सामान, स्टील, एल्युमीनियम और तांबा, रेशमी कपड़े, जैविक रसायन जैसी अनगिनत अन्य वस्तुएँ शामिल हैं।

अमेरिका को किए जाने वाले इन निर्यातों की एक साझा विशेषता यह है कि ये सभी वस्तुएँ मध्यम या लघु एवं सीमांत इकाइयों में निर्मित होती हैं। जहाँ श्रम का अत्यधिक गहन उपयोग होता है। इस प्रकार, इन निर्यातों से लाखों की संख्या में श्रमिक जुड़े हुए हैं जिन पर लगभग उतने ही परिवार निर्भर हैं। इन व्यवसायों से कई अन्य प्रकार के सहायक काम करने वाले श्रमिक भी जुड़े होते हैं। ये व्यवसाय भी अक्सर सरकारी सहायता के मामले में उदासीनता का शिकार रहते हैं। इन शुल्कों का घातक प्रभाव आबादी के सबसे गरीब श्रमिकों के एक बहुत बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लेगा। इसके अलावा, अगर टैरिफों का यह मामला लंबित रहता है, तो भारतीय शासकों के लिए वैकल्पिक बाजार खोजने का काम आसान नहीं होगा। पहले से ही खोई जा चुकी मंडियों में, वहां पैर जमाए बैठों को उखाड़ कर उनके स्थान पर फिर से कब्जा करना आसान नहीं होगा। हमारे जैसे देशों में, छोटे व्यापारियों और असंगठित श्रमिकों का ध्यान रखने वाला निज़ाम भी नहीं है। इसलिए, निर्यात-उन्मुख उद्योगों का टैरिफों की मार में आने का मतलब है यहां कार्यरत श्रमिकों का उजाड़ा।

पंजाब को दोनों ही परिस्थितियों में मार

पंजाब के कई शहर, विशेष रूप से लुधियाना और जालंधर, हर साल 30,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के कपड़ा और परिधान, खेलों का सामान, ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रिक और मशीन टूल्स, कृषि उपकरण आदि का निर्यात करते हैं। फ्री प्रेस जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार 6,000 करोड़ रुपये का कपड़ा, 8,000 करोड़ रुपये के परिधान, 4,000 करोड़ रुपये के ऑटो पार्ट्स, 5,000 करोड़ रुपये के मशीनरी और उपकरण तथा हजारों करोड़ रुपये के अन्य सामान का निर्यात इन टैरिफों से प्रभावित होगा। बड़े पैमाने पर रोजगार का उजाड़ा होगा, जिसका असर बिहार, यूपी, उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी दिखाई देगा। अगर बढ़े हुए टैरिफों का मसला जल्द नहीं सुलझा, तो परिणामस्वरूप पंजाब को यहां के उद्योग और रोजगार पर घातक प्रभाव झेलने होंगे। और दूसरी तरफ अगर हकूमत, अमेरिका से समझौता कर, कृषि बाजार अमेरिकी उत्पादों के लिए  खोलती है, तो इसका भयानक खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ेगा। किसानों की बेचैनी और आंदोलन तेज और उग्र होंगे। इन परिस्थितियों में मोदी सरकार बुरी तरह घिरी हुई है।

                                                                                                            (02-09-2025)

Monday, September 22, 2025

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता वार्ता के बारे में:


 भारत-अमेरिका व्यापार समझौता वार्ता के बारे में:

 

अमेरिका द्वारा भारत पर बढ़ाए गए टैरिफ के मुद्दे को सुलझाने और आपसी व्यापार समझौते पर पहुंचने के लिए भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय वार्ता एक दफा तो खटाई में पड़ गई है। नतीजतन, अमेरिका ने भारत पर अब तक का उच्तम 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है। ये टैरिफ 27 अगस्त से लागू भी हो गए हैं। इनमें से 25 प्रतिशत टैरिफ अमेरिका द्वारा पहले से घोषित जवाबी टैरिफ है। अन्य 25 प्रतिशत टैरिफ अमेरिकी साम्राज्य द्वारा लगाया गया गुंडा टैक्स है। जिस की वजह भारत द्वारा रूस से पेट्रोलियम खनिज तेल खरीदने से इनकार न करना है। अमेरिकी साम्राज्यवादियों का तर्क है कि रूसी तेल खरीदकर भारत जो पैसा रूस को दे रहा है, उससे रूस की युद्ध मशीनरी मजबूत हो रही है और इसी वजह से रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म नहीं हो रहा। अमेरिका ने मनमाने ढंग से साम्राज्यवादी धौंस और अहंकार के जोर दुनिया भर के देशों पर रूसी तेल, हथियार और कई अन्य सामान न खरीदने के आर्थिक प्रतिबंध थोप दिए हैं।

भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के टूटने के दो मुख्य कारण माने जा रहे हैं। एक तो भारत की अमेरिका से कृषि वस्तुओं के निर्बाध प्रवाह के लिए अपने बाजार को खोलने में असमर्थता जाहर करना और आनाकानी करना, और दूसरा, न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, मई में भारत और पाकिस्तान के बीच छिड़े संक्षिप्त युद्ध में अमेरिकी मध्यस्थता के ट्रंप के बार-बार दावों  को दो-टूक शब्दों में स्वीकार न करना और नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रंप के नाम की सिफारिश न करना, यानी उसके व्यक्तिवादी अहंकार को बढ़ावा न देना। इसमें कई अन्य कारण भी आड़े आ रहे हो सकते हैं क्योंकि अमेरिकी साम्राज्य अपनी इच्छाओं के आगे जिस हद तक भारतीय शासकों के झुकने की अपेक्षा करता है, उस हद तक झुकने में भारतीय शासकों की मजबूरियां बाधा बनती हैं। फिर भी, मूल कारण अमेरिकी साम्राज्यवादी लुटेरे हितों के लिए भारतीय शासकों की बाँहें मरोड़ कर भारतीय बाज़ार खुलवाने के ढंग तरीके ही हैं।

क्या भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा 15 अगस्त के भाषण में किए गए इन दावों को इस बात का प्रमाण मान लिया जाना चाहिए कि वे सचमुच छोटे उद्योगपतियों, किसानों और पशुपालकों के हितों की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्प खड़े हैं? क्या उन्होंने विशुद्ध राष्ट्रवादी भावना से अमेरिकी साम्राज्यवादियों के आगे झुकने से इनकार कर दिया है? बिलकुल नहीं। भारतीय शासकों के ये दिखावे और दावे निराधार हैं।

अमेरिका के साथ चले व्यापार वार्ता के कई दौरों में भारतीय पक्ष, अमेरिकी उत्पादों की कर और गैर-कर बाधाओं से मुक्त बिक्री के लिए भारतीय मंडी को काफी हद तक खोल दिए जाने के स्पष्ट संकेत देता रहा है। दरअसल, बजट के दौरान या अन्य अवसरों पर कई वस्तुओं पर कर दरें कम भी की गई हैं। इन्हीं संकेतों - सहमतियों के आधार पर, स्वयं राष्ट्रपति ट्रंप ने शेखी बघारते हुए घोषणा की थी कि वे बहुत जल्द भारत के साथ एक बड़े, शानदार और ऐतिहासिक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले हैं। दोनों पक्षों में जोड़-तोड़ इस बात को लेकर चल रहा था  कि भारतीय शासक कृषि मंडी खोलने के मामले में काफी हद तक झुकने को तो तैयार थे, लेकिन सभी बाधाओं को पूरी तरह से हटाने के लिए अनिच्छुक थे, जबकि अमेरिकी साम्राज्यवादी भारतीय शासकों द्वारा पेश की जा रही रियायतों से संतुष्ट नहीं थे, वे भारतीय शासकों को उनके सामने पूरी तरह दंडवत देखना चाहते थे। भारतीय शासकों की यह आनाकानी या झिझक किसी राष्ट्रवादी अथवा किसान हित भावना की उपज नहीं थी, बल्कि यह किसानों के भीतर फैलती बेचैनी और आक्रोश व पिछले किसान आंदोलन के मद्देनज़र उनकी आखों के सामने नाचता किसान आंदोलन का भूत और इस वजह से उनके पैरों तले खिसकती हकूमति गद्दी का खौफ था जिस की वजह से वे साम्राज्यवादी आकाओं के सामने साष्टांग बिछने को असमर्थ थे। भारत-पाकिस्तान युद्ध के मसले में किसी भी मध्यस्थता को खुले तौर पर स्वीकार करना, भाजपा शासकों द्वारा उभारे  मोदी के 56 इंच के सीने वाले और भारत के महाशक्ति वाले नक्शे को ध्वस्त करने और इस तरह भाजपा को चुनावी क्षति पहुंचाने वाला था। इसलिए, ट्रम्प के बार-बार मध्यस्थता के दावों के बावजूद, मोदी ने ट्रम्प और अमेरिकी साम्राज्य की नाराजगी मोल लेने के बजाय चुप्पी साधे रहना ही बेहतर समझा।

रूसी तेल ख़रीदने के मामले में भारतीय विदेश मंत्री अब तक कई बार साफ़ कर चुके हैं कि उन्होंने न सिर्फ़ अमेरिका के बाइडन प्रशासन की सहमति से, बल्कि उसकी इच्छा के अनुसार भी भारी मात्रा में रूसी तेल का आयात किया, ताकि तेल की क़ीमतों में वैश्विक स्थिरता बनी रहे। निस्संदेह, इसमें भारत सरकार सहित, अमेरिका, रूस, यूरोप आदि सभी मुल्कों का साझा हित था। रूसी तेल ख़रीदने की भारतीय शासकों की यह रणनीति अमेरिकी साम्राज्यवादी हितों के प्रतिकूल नहीं, बल्कि उनके अनुरूप थी।

हालातों में आई तब्दीली के कारण, अब अमेरिकी साम्राज्यवादी अपनी रणनीतिक व अन्य गणनाओं के चलते रूस-यूक्रेन युद्ध को समेटना चाहते हैं और इस मकसद के लिए रूस को मजबूर करने के लिए आर्थिक प्रतिबंधों को कड़ा कर रहे हैं, जिस में रूसी तेल की बिक्री को और कम करना भी शामिल है। अमेरिका लगातार भारत पर रूसी हथियार न ख़रीदने का दबाव बना रहा है और उसे अपनी वैश्विक रणनीतिक योजना में ज़्यादा से ज़्यादा सम्मिलित करने की कोशिश कर रहा है। भारतीय शासक भी लगातार ऐसे कदम उठाते आ रहे हैं जो उन्हें अमेरिकी साम्राज्यवादी योजनाओं के साथ और भी ज़्यादा जुड़े रहने की ओर लिए जा रहा है। पहले भी, भारतीय शासकों ने देश में अमेरिकी हथियारों के निर्माण के लिए समझौते किए हैं। वे और ज़्यादा युद्धक हथियार ख़रीदने पर सहमत हुए हैं। उन्होंने अमेरिका से बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम तेल आयात करने के वादे किये हैं और वर्ष 2025 में रूसी कच्चे तेल के आयात में 25 प्रतिशत तक की कमी की है। भारत के रूसी तेल और हथियारों की खरीद से दो-टूक इनकार न करने को अमेरिकी साम्राज्य से सरकशी नहीं समझा जाना चाहिए - यह अमेरिकी साम्राज्य की अधीनता के विस्तृत ढांचे के भीतर-भीतर, भारतीय शासक वर्ग के हितों को पैरवी के लिए दबाव भी हो सकता है, या एक अप्रत्यक्ष सहमति, जो अब तक रूसी तेल खरीद मामले में उजागर हुई है।

द्विपक्षीय व्यापार वार्ता के टूटने के बाद, अमेरिकी प्रशासन ने भारत के प्रति काफी कुरख़त रवैया अपनाया हुआ है। अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारी लगातार यह बयान देते आ रहे हैं कि भारत एक टैरिफ किंग है, टैरिफ महाराजा! अमेरिकी राष्ट्रपति के व्यापार सलाहकार पीटर नोवरे ने तो भारत पर रूसी तेल खरीद के ज़रिए पुतिन की युद्ध मशीन को मज़बूत करने का आरोप लगाते हुए रूस-यूक्रेन युद्ध को "मोदी का युद्ध" तक कह दिया है। उन्होंने फॉक्स न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में भारत पर "क्रेमलिन के गुनाह धोने वाली मशीन" होने का भी आरोप लगाया है। इससे  भी आगे जाते और जातिगत तंज कसते, नवारो ने भारतीय जनता को मुखतिब होते कहा कि "रूसी तेल खरीदकर आप भारत के ब्राह्मणवादियों को भारतीय जनता की कीमत पर मुनाफ़ा कमाते हुए देख सकते हो। हमें इसे रोकना होगा।"

अपने इन तीखे और कुरख़त बयानों के ज़रिए, अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारी न सिर्फ़ भारतीय राजतंत्र पर अपनी नाराजगी जाहर कर रहे हैं और उसको अपमानित कर रहे हैं, बल्कि वह उसे दूर भी धकेल रहे हैं। लेकिन शायद उन्हें इस बात का विश्वास है कि भारतीय शासकों को उनकी इच्छा अनुसार चलने पर मजबूर करने के लिए उनके हाथ में अभी भी बहुत से पासे मौजूद हैं। सिर्फ़ टैरिफ़ दरों के क्षेत्र में ही, 125 बिलियन डालर की कमाई वाले सेवा क्षेत्र पर नई टैरिफ़ दरें लगाकर वह भारतीय शासकों की चीखें निकलवा सकते हैं। भारतीय हुक्मरानों को घुटनों के बल करने के लिए उनके तरकश में अभी बहुत से तीर मौजूद हैं। वे यूरोपीय संघ के नेताओं को उकसा रहे हैं और उन पर दबाव डाल रहे हैं कि वे रूसी तेल ख़रीदने पर भारत पर वैसे ही आर्थिक प्रतिबंध लगाएँ जैसे अमेरिका ने लगाए हैं।

इन दिनों, भारतीय और चीनी अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय बैठकों, भारतीय विदेश मंत्री की रूस यात्रा और शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन व ऐसी ही अन्य गतिविधियों के मद्देनज़र, सोशल मीडिया और अन्य राजनीतिक हलकों में यह चर्चा ज़ोरों पर है कि भारतीय शासक अपनी निष्ठा अमेरिका से हटाकर उसके राजनीतिक-सैन्य विरोधियों, रूसी-चीनी खेमे की ओर मोड़ रहे हैं और अमेरिकी टैरिफ़ का करारा जवाब देने जा रहे हैं। यह कोरी कल्पना है, सतही समझ की उपज है और वास्तविकता से कोसों दूर है।

अभी तक, भारतीय प्रशासन की ओर से एक भी शब्द या बयान नहीं आया जिसमें भारतीय शासकों ने ट्रंप समेत अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारियों के तीखे और भड़काऊ बयानों या कार्रवाइयों की कड़ी निंदा की तो बात ही छोड़ो, औपचारिक खंडन ही किया हो। व्यापार वार्ता का सिलसिला अमेरिका ने ही तोडा है, भारत ने नहीं। बातचीत के अभी भी अंदर-खाते जारी रहने और कोई रास्ता निकाल कर मसले को जल्दी निपटा लिए जाने के आभास और संकेत मिल रहे हैं। बढ़ते तनाव के इस माहौल के दौरान ही, अमेरिका को खुश करने हेतु, भारत ने जोखिम उठाकर भी, कपास के टैरिफ-मुक्त आयात की अनुमति देकर कपास उत्पादक किसानों के हितों की बलि चढ़ा दी है। चर्चा है कि आने वाले दिनों में भारतीय कृषि बाज़ार अमेरिकी दूध और दूध उत्पादों के लिए भी खोला जा रहा है। चीनी - भारतीय अधिकारियों की उच्च-स्तरीय बैठकें भारतीय पूँजीपतियों और व्यापारिक हलकों के दबाव के कारण हो रही हैं, जो चीन से अन्य देशों की तुलना में सस्ता माल, मशीनरी और तकनीक आयात कर ऊंचे मुनाफे कमाना चाहते हैं। भारत ने अभी तक ब्रिक्स या शंघाई सहयोग संगठन में किसी भी ऐसे बयान या कार्रवाई का समर्थन नहीं किया जो जाहिरा तौर पर अमेरिका के विरुद्ध हो। भारत अभी भी अमेरिकी रणनीतिक योजना को आगे बढ़ाने वाले क्वाड समूह का सदस्य है, और दिसंबर में इसका शिखर सम्मेलन करवाने जा रहा है। इसके अलावा और कुछ भी इस तरह का नहीं है जो पाला बदली की ओर इशारा करता हो। हालाँकि, दुनिया में हो रही भू-राजनीतिक घटनाओं और घटनाक्रमों के ठोस संदर्भ में इस तरह की पाला बदलियों को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। लेकिन फिलहाल, भारतीय शासक अमेरिकी साम्राज्यवादी संरक्षण में ही 'विकास' के पथ पर चलने में विश्वास रखते हैं।

अमेरिकी टैरिफों से भारत के लिए पैदा हुए संकट के संदर्भ में, भारत के प्रधानमंत्री ने "स्वदेशी" और "मेक इन इंडिया" के महत्व पर ज़ोर दिया है। गुजरात में मारुति-सुज़ुकी द्वारा ई-विभाग नामक इलेक्ट्रिक कार निर्माण संयंत्र का उद्घाटन करते हुए, उन्होंने स्वदेशी की अपनी परिभाषा बयान की। उन्होंने कहा, "जापान द्वारा निर्मित हर चीज़ स्वदेशी है। स्वदेशी के बारे में मेरी अवधारणा बहुत सरल है... चाहे डॉलर हो या पाउंड, मुद्रा काली हो या सफेद, मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन उत्पादन प्रक्रिया में जो पसीना बहाया जाता है, वह मेरे देशवासियों का होना चाहिए। इस उत्पादन से मेरी मिट्टी की खुशबू, मेरी मातृभूमि भारत की खुशबू आनी चाहिए।" यह कैसा स्वदेशीपन और कैसी आत्मनिर्भरता है?

यदि कोई उत्पाद केवल भारतीय श्रमिकों की कड़ी मेहनत से स्वदेशी बनता है, तो फिर औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों द्वारा निर्मित सभी प्रोजेक्ट, भले ही उनका उद्देश्य औपनिवेशिक हितों की पूर्ति ही क्यों न रहा हो, स्वदेशी ही थे! बहुराष्ट्रीय निगम/कॉर्पोरेट घराने जो तीसरी दुनिया के देशों में अत्यधिक लाभ कमाने के लिए बड़े बड़े प्रोजेक्ट स्थापित कर रहे हैं, वे स्वदेशी ही हैं! यह कैसा स्वदेशीपन है जो श्रम के अमानवीय शोषण के माध्यम से देश की भौतिक संपदा की लूट का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। यह देश की भूमि, जल, बिजली, श्रमशक्ति, पर्यावरण आदि को निचोड़कर बड़े मुनाफों की मलाई साम्राज्यवादी देशों को बँटने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। अक्सर, ऐसे कॉर्पोरेट व्यवसाय उन्नत तकनीक का इस्तेमाल कर बहुत कम नौकरियाँ पैदा करते हैं, सरकारों से अनगिनत सुविधाएँ हड़प लेते हैं, तकनीकी जानकारी साझा नहीं की जाती या फिर उस समय की जाती है जब यह अप्रचलित और बेकार हो जाती है। ऐसे व्यवसाय जब चाहें तब बहिर्प्रवाह कर सकते हैं। हाँ, ये करों के रूप में तत्कालीन सरकारों और  शासक समूहों के लिए कुछ आय उत्पन्न करते हैं, लेकिन कुल मिलाकर, ये देश के औद्योगीकरण के केंद्र नहीं, बल्कि लूट और मुनाफाखोरी के केंद्र होते हैं। ये देश की आत्मनिर्भरता को मज़बूत नहीं करते।

टैरिफ़ के कारण भारत जिस मौजूदा संकट का सामना कर रहा है, वह निर्यातोन्मुखी विकास का संकट है। यह विकास मॉडल देश की ज़रूरतों की पूर्ती की दिशा में सेधित नहीं है। यह देश की कृषि, हस्तशिल्प, उद्योग और सेवाओं के सामंजस्यपूर्ण और संतुलित विकास तथा देश को अधिकतम सीमा तक आत्मनिर्भर बनाने और जनशक्ति के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य से बनाई गई व्यवस्था नहीं है। यह निर्यात-आधारित विकास मॉडल उन कॉर्पोरेट घरानों के हितों की ओर निर्देशित है जो हमेशा सस्ती से सस्ती श्रम शक्ति के आधार पर सभी प्रकार के उत्पादों का उत्पादन कर अधिकतम लाभ कमाने की फिराक में रहते हैं। जनता की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा की ओर निर्देशित संतुलित विकास का आधार तैयार करने के लिए भारती जनता को अभी संघर्ष करना होगा।

वर्तमान में, भारतीय जनता को मोदी सरकार पर वह दबाव और बढ़ाना चाहिए, जिसके चलते यह समझौता प्रक्रिया एक दफा रुक गई है। इसलिए, जमीनी स्तर पर लोगों को लामबंद करने की आवश्यकता है ताकि भारतीय शासकों को इस समझौते से पूरी तरह हटने के लिए मजबूर किया जा सके।

                                                                                                                                                                                (अगस्त 2025)

Friday, September 19, 2025

पंजाब के मेहनतकशों की ललकार, बंद करो ऑपरेशन कागार

 पंजाब के मेहनतकशों की ललकार, बंद करो ऑपरेशन कागार



 

पंजाब के जनवादी-जम्हूरी आंदोलन ने एक बार फिर अपने क्रांतिकारी जम्हूरी किरदार के अनुरूप उत्तरदायित्व निभाते हुए अपना फ़र्ज़ अदा किया है। इस देश में सबसे ज़्यादा उत्पीड़ित और भेदभाव का शिकार आदिवासी लोगों पर ढाए जा रहे हकूमति प्रकोप के ख़िलाफ़ मोगा की धरती से एक जोरदार आवाज़ बुलंद की गई है। आदिवासी लोगों और उनके पक्ष में खड़ी और उनके लिए लड़ने वाली हर ताक़त पर मोदी सरकार द्वारा किये जाने वाले दमनकारी ख़ूनी हमलों को बंद किये जाने की चेतावनी दी गई है। बुद्धिजीवियों, जम्हूरी अधिकार कार्यकर्ताओं, माओवादी क्रांतिकारियों और आदिवासी अधिकारों के लिए डटी हर ताक़त पर हमले को रोकने के लिए आवाज़ उठाई गई। आदिवासी किसानों के नरसंहार के लिए वास्तव में जिम्मेवार, वैश्विक कॉर्पोरेट घरानों का संबंध, पंजाब के किसानों की ज़मीनों पर हो रहे हमलों, रोज़गार और पर्यावरण के विनाश से जोड़ कर उजागर किया गया। इस सभा में दिए गए भाषणों के सरोकार आदिवासी क्षेत्रों से लेकर कश्मीर के लोगों के हो रहे उत्पीड़न, पंजाब की उपजाऊ ज़मीनों पर किये जा रहे हमलों और देश में जम्हूरी आवाज़ों की जुबान-बंदी तक विस्तृत थे। यह स्पष्ट किया गया कि कैसे इन अत्याचारों और जम्हूरी अधिकारों पर हमलों के साझा सूत्र का सबंध तथाकथित आर्थिक सुधारों के साम्राज्यवादी हमले से जुड़ता है। गाज़ा में हो रहे अमानवीय अत्याचारों के ख़िलाफ़ और संघर्षरत फ़िलिस्तीनी जनता के हक में भी आवाज़ उठाई गई। पंजाब के हज़ारों संघर्षशील लोगों का यह जमावड़ा दूर-दराज़ के इलाकों में रहने वाले आदिवासी लोगों के आंदोलन के साथ एकजुटता का एक औपचारिक नारा मात्र नहीं था, बल्कि यह दोनों के साझा दुश्मनों - वैश्विक साम्राज्यवादी कंपनियों, उनकी सेवक भारतीय हकूमतें और दलाल पूँजीपति वर्गों के ख़िलाफ़ एक राष्ट्रव्यापी संयुक्त संघर्ष का आह्वान भी था। साम्राज्यवादी पूँजी के हितों  की खातिर देश के किसी भी कोने में किये जा रहे उत्पीड़न का ऐसा विरोध, इस चौतरफा हमले के ख़िलाफ़ मेहनतकश जनता के राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा। 

                                                   

बाढ़ की आपदा - पुनर्वास और मुआवज़ा अधिकारों के लिए जन-आंदोलन

 बाढ़ की आपदा -
पुनर्वास और मुआवज़ा अधिकारों के लिए जन-आंदोलन



 

चंडीगढ़:  5 सितंबर को भारतीय किसान यूनियन (एकता-उग्राहां) द्वारा पंजाब के बाढ़ प्रभावित किसानों और मज़दूरों समेत सभी लोगों के लिए पूर्ण  और पर्याप्त मुआवज़ा और पुनर्वास की मांगों को लेकर अपने सक्रियता क्षेत्र के 16 जिलों में जिला/उप-मंडल अधिकारियों के माध्यम से पंजाब और केंद्र सरकार को ज्ञापन भेजा गया। संगठन के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां और उप-सचिव जगतार सिंह कालाझाड़ द्वारा एक संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से यह जानकारी देते हुए बताया गया कि आज इस मुद्दे पर 14 जिलों में डीसी कार्यालयों और 15वें जिले में 2 उप-मंडल कार्यालयों के सामने विरोध प्रदर्शन करने के बाद अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा गया। इन प्रदर्शनों में महिलाओं और युवाओं सहित बड़ी संख्या में किसानों मज़दूरों ने भाग लिया। संगरूर में अपने संबोधन के दौरान श्री उग्राहां ने आरोप लगाया कि बाढ़ की भविष्यवाणी के बाद भी लोगों को बाढ़ से बचाने के लिए कोई तत्काल प्रबंध नहीं किए गए, बल्कि बाढ़ की चपेट में आ जाने के बाद भी कई दिनों तक किसी भी सरकार ने विस्थापित हुए, मारे गए और फसलों/मकानों/पशुधन आदि का भारी नुकसान झेलने वाले लोगों की खबरसार नहीं ली। बाढ़ के कारण टूटे और टूट रहे बांधों की मरम्मत और बचाव के प्रबंध भी अधिकांश स्थानों पर पीड़ितों की सहायता कर रहे लोगों अथवा खुद  पीड़ितों द्वारा ही किए गए हैं। बाढ़ के कारण उजड़े लोगों के आश्रय, राशन, तिरपाल और पशुओं के लिए चारे आदि के प्रबंध भी शुरुआती दिनों में बड़े पैमाने पर आम लोगों द्वारा ही किए गए, जो लगातार जारी हैं। बाढ़ आपदा का सामना करने के इन राहत कार्यों में युवाओं के जज्बे और उत्साह की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। ज्ञापन में तत्काल राहत की मांगों के संबंध में वक्ताओं ने कहा कि पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड व अन्य स्थानों पर बादल फटने व भारी वर्षा के कारण बड़े पैमाने पर हुए जान-माल, फसलों, मकानों व जमीनों के विनाश को यद्यपि पंजाब सरकार ने देर आए दुरुस्त आए के अनुसार राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है लेकिन केंद्र सरकार द्वारा भी इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाना चाहिए। इस के लिए राष्ट्रीय आपदा निधि जारी कर बड़े पैमाने पर तत्काल राहत कार्यों को आगे बढ़ाया जाए। जिन परिवारों के सदस्यों की जान इस कारण गई है, उन्हें भारी आर्थिक सहायता प्रदान कर सांत्वना दी जाए। पशुधन व अन्य सहायक व्यवसायों का नुकसान, मकानों, फसलों व जमीनों वगैरा का विनाश झेलने वाले लोगों के नुकसान की शत-प्रतिशत भरपाई के लिए पर्याप्त धनराशि तुरंत जारी की जाए। आवश्यक बुनियादी ढाँचे, सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक स्थानों को हुए नुकसान की मरम्मत के लिए भी धनराशि जारी की जानी चाहिए और पानी उतरते ही पुनर्निर्माण कार्य शुरू किये जाने चाहिए। स्वास्थ्य विभाग को वर्षा जल प्रदूषण से उत्पन्न होने वाली और बड़े पैमाने पर फैलने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए उच्च स्तर पर निवारक उपाय करने चाहिए। वर्षा ऋतु से पहले नदियों, नालों, बाँधों और बाढ़ द्वारों आदि की जाँच, सफाई, मरम्मत इत्याद  में की गई घोर लापरवाही भविष्य में नहीं दोहराई जानी चाहिए। ऐसी लापरवाही के दोषी राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें लोगों के जीवन और संपत्ति से खिलवाड़ करने के लिए कड़ी सजा दी जानी चाहिए। पंजाब की नदियों और नहरों के किनारों, बाँधों और बाढ़ द्वारों आदि का सम्पूर्ण ढाँचा पुराना और जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। वर्तमान समय में विकसित हो चुकी नई तकनीक का उपयोग कर इसका पूर्ण नवीनीकरण किया जाना चाहिए। इसके अलावा, नदी और नहर के पानी के संरक्षण और उपयोग तथा इसे हर खेत तक पहुँचाने के लिए उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। अतिरिक्त वर्षा जल के भूमि में पुनर्भरण के लिए, प्रत्येक नदी और नहर के किनारे विभिन्न स्थानों पर कच्चे तल वाले तालाबों में चौड़े और गहरे बोरहोल खोद कर एक नया ढांचा निर्मित किया जाना चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पंजाब और केंद्र सरकारों द्वारा बड़ी बजट राशि आरक्षित की जानी चाहिए। इस प्रकार, बाढ़ की स्थायी रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए और बाढ़ की मार पड़ने पर राहत उपायों के लिए पर्याप्त धनराशि रखी जानी चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग में लगातार वृद्धि, जंगलों और पहाड़ों की बड़े पैमाने पर की जा रही कटाई और पर्यावरण/जलवायु/जल में फैलाया जा रहा प्रदूषण कॉर्पोरेट विकास मॉडल का परिणाम है। बादल फटना, बाढ़ की भीषण मार और तूफानों से होने वाली तबाही जैसी तमाम घटनाएँ प्रकृति के साथ किये जा रहे इसी खिलवाड़ का नतीजा हैं। इसलिए कॉर्पोरेट विकास मॉडल से प्रेरित नीतियों को रद्द किया जाना चाहिए। वक्ताओं ने दावा किया कि भले ही पंजाब सरकार को लैंड पूलिंग नीति के मामले में मुँह की खानी पड़ी है लेकिन साथ ही, वह पंचायती ज़मीनों और अन्य सरकारी ज़मीनों/संपत्तियों को नीलाम करने के रास्ते पर चल पड़ी है। ऐसी सभी संपत्तियाँ लोगों की सेवा, रखरखाव और उपयोग के लिए हैं। इसलिए चेतावनी दी गई कि पंजाब सरकार लोगों की ज़मीनें और संपत्तियाँ छीनने की नीति पर अमल करने से बाज आए, अन्यथा जन-संघर्षों का सामना करने के लिए तैयार रहे। विभिन्न स्थानों पर सभाओं  को संबोधित करने वाले वक्ताओं में राज्यस्तरीय नेता श्री उग्राहां और श्री कालाझार के इलावा संबंधित जिलों के प्रमुख नेता जनक सिंह भुटाल, हरदीप सिंह टल्लेवाल और हरिंदर कौर बिंदु शामिल थे। 

Thursday, September 11, 2025

बाढ़ की चपेट में पंजाब :

 बाढ़ की चपेट में पंजाब : आपदा से जूझते और

 एक दुसरे का सहारा बनते लोग
हुकुमती जवाबदेही और मुआवजा हक का सवाल




मानसून के इस सीजन में पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड बाढ़ की भीषण चपेट में आए हुए हैं। भारत - पाक सीमा के दोनों तरफ का पंजाब बाढ़ की भयानक मार झेल रहा है। हमारी तरफ के मौजूदा हालतों की तस्वीर हमारे सामने है और यह काफी गंभीर और व्यापक नुकसान को दर्शा रही है। पहले ब्यास और रावी के पानी ने माझा और दोआबा के साथ-साथ फिरोजपुर-फाजिल्का क्षेत्रों में काफी नुकसान किया और अब सतलुज और घग्गर भी उफान पर हैं। भाखड़ा बांध के फ्लड गेट भी खोले जा रहे हैं। बाकी बांध भी इस समय खतरे के निशान पर बह रहे हैं। रोपड़, लुधियाना, पटियाला और संगरूर क्षेत्रों में भी पानी की मार पड़ने का खतरा बना हुआ है। जलमग्न हो चुके पंजाब में हो रहे नुकसान का अभी से अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। अब तक की रिपोर्टों के अनुसार, बाढ़ से 4.33 लाख एकड़ क्षेत्र प्रभावित हुआ है। इन्हीं अनुमानों के अनुसार भी किसानों की फसलों का लगभग तीन हजार करोड़ का नुकसान हो चूका है। दिहाड़ीदार मजदूरों और अन्य छोटे धंधों वालों की दुश्वारियों का कोई अंदाजा ही नहीं है। अब तक 1400 गांव बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं और यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। राज्य के 3.54 लाख लोग प्रभावित हुए हैं और 32 लोगों की अब तक मृत्यु हो चुकी है। यह तो अभी प्रारंभिक आंकड़े हैं, संकटमय स्थिति की पूरी तस्वीर नहीं है। जो दुश्वारियाँ लोग झेल रहे हैं और जो इस कारण आने वाले समय में झेलनी पड़ेंगी, उनका आकार-विस्तार और गहराई अंदाजों से परे है। यह पंजाब के लोगों के लिए गहरे संकट की घड़ी है, बहुत मुश्किल वक्त है। गरीबी और जीवन-यापन के संकटों में जीवन की गाड़ी खींच रहे मेहनतकश लोगों के लिए यह बहुत बड़ी आपदा है, उनके जीवन में भारी हलचल है। घर उजड़ रहे हैं, दोबारा बसने के लिए सालों-साल लगेंगे। यह दर्द जितना बयान किया जा सके, कम है। जितना बांटा जा सके, कम है। इस समय प्रान्त के लोगों का पहला सरोकार इस आपदा से निपटना है, इससे पार पाना है, इस पर विजय प्राप्त करना है और मानवीय हस्ती की गरिमा को बरकरार रखना है। इस आपदा से निपटना लोगों के लिए प्राथमिक कार्य बन गया है।

इस आपदा से निपटने के लिए लोगों को इस राज-व्यवस्था से भी निपटना होगा, क्योंकि यह महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह राज-व्यवस्था और इसका प्रशासनिक ढांचा ही है, जो बदलते मौसमों को भी आपदाओं में बदल देता है। यह जनविरोधी ढांचा और इसकी अक्षम कारगुजारी है, जो अधिक बारिश को ही बाढ़ में बदल देती है और एक आपदा का भयावह दृश्य रच देती है। लुटेरी जमातों की मुनाफे की लालसा सामान्य मौसमी घटनाओं को भी लोगों के लिए संकट में बदल देती है। मौसम की मार, चाहे वह सूखा हो या बारिश, को कई गुना बढ़ा देती है। इसीलिए पानी की कमी, सूखा और बाढ़ हमारे देश के लोगों की नियति बन गए हैं। ऐसा होने में यहां इस ढांचे की कमजोर बुनियादों और अपर्याप्त ताने-बाने जैसे बुनियादी कारण हैं, वहीं तात्कालिक तौर पर इसमें हकूमतों की लचर कार्यकुशलता, लोगों के प्रति वफादारी का अभाव, विश्वासघात की घोर प्रवृत्ति, कुप्रबंधन, लापरवाही और समग्र रूप से जनविरोधी रवैया भी सम्मिलित है। ये दोनों पहलू मिलकर विशेष मौसमी घटनाओं को आपदाओं में परिवर्तित कर रहे हैं।  

पंजाब में आए मौजूदा बाढ़ों में भी ये दोनों पहलू शामिल हैं। मूल कारण तो धरती पर हो रही मौसमी तब्दीलियां और जोंक विकास मॉडल द्वारा प्रकृति की जा रही तबाही है। पृथ्वी पर हो रही मुनाफाखोर तकनीकी प्रगति ने सहज प्राकृतिक चक्र को भारी नुकसान पहुंचाया है। यह क्षति बहुत व्यापक और गंभीर है। यह विकृत और बेडोल अनियोजित प्रगति धरती पर पर्यावरणीय बदलावों के लिए जिम्मेदार है। ओजोन परत की तबाही, बढ़ता तापमान, सिकुड़ते ग्लेशियर, फैलते समुद्र, ढहते पहाड़, सूखे और तबाही मचाने वाली बाढ़ें इत्यादि तक इन बदलावों की लंबी श्रृंखला है। विश्व पूंजीवाद के फलस्वरूप उतपन इस घटनाक्रम में हमारा देश भी शामिल है। हमारे पड़ोसी राज्यों जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक प्रक्रियाओं के साथ मुनाफामुखी पर्यटन व्यवसायों और मुनाफाखोर औद्योगिक परियोजनाओं के जरिए जमकर खिलवाड़ किया गया है। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, पहाड़ों की तबाही और विनाश ने मिलकर, यहां पड़ने वाली बारिश से होने वाली क्षति को कई गुना बढ़ा दिया है। यहां होने वाली सामान्यतः बारिश भी अब बाढ़ का रूप ले लेती है और यह नीचे की ओर बसे पंजाब में आकर तबाही मचाती है। आगे, पंजाब में भी यही जोंक विकास मॉडल प्राकृतिक चक्र को रौंदे जा रहा है। यहां भी बेतहाशा हो रही खनन गतिविधियों ने नदियों के किनारों को कमजोर कर दिया है। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बुरी तरह प्रभावित कर दिया गया है। नदियों के समग्र प्रवाह क्षेत्र को मुनाफामुखी लालसाओं ने सँकरा कर दिया है और पानी बढ़ने की स्थिति में जब नदी अपने स्वाभाविक प्रवाह क्षेत्र तक फैलती है तो वह नुकसान में बदल जाता है।

इसके अलावा, नदियों के किनारों पर बांधों की रखरखाव, मजबूती और निर्माण किसी भी हकूमत के लिए कोई मुद्दा नहीं होता, क्योंकि इसके लिए सरकारी बजट की जरूरत होती है। बड़ी रकम जुटाने की आवश्यकता पड़ती है यद्पि इन रकमों से कोई सीधा मुनाफा नहीं मिलता। इसलिए नदी के पानी को नियंत्रित करने, संभालने और नियमित प्रवाह में रखने के लिए राज्य में कोई प्रभावी ढांचा नहीं है। जो पुराने डैम बने हैं, बस वही हैं। दशकों से नदियों के पानी को नियंत्रित करके और अधिक उपयोग में लाने के लिए कुछ नहीं किया गया। पंजाब और हरियाणा में पानी के बंटवारे को लेकर ही सियासी खेल खेले जाते रहे हैं, लेकिन नदी के पानी की संभाल करके किसी भी तरह से सिंचाई ढांचे का विस्तार नहीं किया गया। इन परियोजनाओं के निर्माण पर एक पैसा भी खर्च नहीं किया गया। अब न केवल पानी व्यर्थ बह रहा है, बल्कि यह तबाही भी मचा रहा है। नदियों की विनाशकारी मार को काबू करने के लिए वही करने की जरूरत है, जो दुनिया के कई देश कर चुके हैं। वे काफी हद तक बाढ़ों पर काबू पा चुके हैं या उनसे होने वाली क्षति को काफी हद तक सीमित कर चुके हैं। और ऐसा करने के लिए चंद्र भ्रमण तकनीक की भी जरूरत नहीं है। साधारण किस्म के छोटे-छोटे डैम बनाने हैं। हमारे शासकों द्वारा भले ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की बातें की जा रही हों, लेकिन हमारे देश का नाकारा बुनियादी ढांचा पानी के तेज प्रवाहों को भी संभालने और निपटने में सक्षम नहीं है।

तात्कालिक संदर्भ में भी मानसून सीजन के दौरान बाढ़ की संभावना को मद्देनजर रख की जाने वाली तैयारियां अनुपस्थित हैं। मौसमी नालों, नदियों और ड्रेनों की सफाई न करना सहित, सभी इंतजाम गायब हैं। बांधों की सफाई नहीं की गई। इस बार भी भारी बारिश की भविष्यवाणियों के बावजूद सरकार लापरवाह रही। बी.बी.एम.बी. के पानी के मुद्दे पर हरियाणा के साथ टकराव का नाटक करने में व्यस्त रही। इन कुप्रबंधनों में बांधों को जरूरत के अनुसार खाली करने, अतिरिक्त पानी को समायोजित करने की क्षमता बनाने और उच्चतम सीमा तक पानी भरने से बचाने के लिए नियंत्रित मात्रा में पानी को छोड़ते रहने जैसे कदम न उठाना भी शामिल है। ऐसे कदम कुछ हद तक पानी की मार को सीमित करने में भूमिका निभा सकते थे। उल्लेखित गंभीर रूप से अक्षम बुनियादी ढांचे के कारण इन तात्कालिक कदमों की जरूरत कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन ये सभी प्रयास सरकारी बजट की मांग करते हैं, सरकारी खर्च - चेष्टा मांगते हैं, लोगों के प्रति वफादारी मांगते हैं, और राजनीतिक इच्छाशक्ति मांगते हैं। लेकिन सरकारों के पास इनमें से कुछ भी नहीं है। न तो इस ओर ध्यान है, न ही यह हकूमति सरोकार का मुद्दा है। बस सब कुछ 'भगवान के भरोसे' है। बस संकट खड़ा हो जाने पर नौटंकी है, भागदौड़ करने का प्रभाव है, बड़े-बड़े ऐलान हैं, फोटो-शूट हैं। इस मामले में सभी अवसरवादी सत्ताधारी और राजनेता एक-दूसरे से आगे निकल जाने की दौड़ में शमिल हैं। अपने आप को बड़े जन-हतैषी के रूप में पेश करने के लिए उतावले हैं। अपने वोट बैंक सुनिश्चित करने के लिए पानी के पास खड़े होकर, हाथों में रोटियां रखकर खाने का नौटंकी कर रहे हैं। वास्तव में तो वह अपने अवसरवादी व्यवहार की नुमायश ही लगा रहे हैं। हकीकत यह है कि सरकार के पास इस आपदा के समय डूबते लोगों को पानी से निकाल पाने के बहुत ही लचर इंतजाम हैं। सरकारी सहायता बेहद अपर्याप्त है जो लोगों तक राहत पहुंचाने के मामले में बहुत सीमित है। हमेशा की तरह लोग ही लोगों का सहारा बन रहे हैं। पंजाब के अन्य क्षेत्रों से दयालु और हिम्मती लोगों की टोलियां हर तरह की मदद ले बाढ़ प्रभावित इलाकों की ओर जा रही हैं। समाज सेवी संगठन और जन-संगठन सहायता जुटा रहे हैं। सहायता के लिए लोगों को लामबंद कर रहे हैं। पंजाबी कौमियत अपनी मानवीय प्रगतिशील परंपराओं को जीवंत रखे हुए है और इसकी जड़ों को और गहरा कर रही है। हरियाणा के गांवों से भी पंजाबी लोगों के लिए सहायता इकट्ठा करने की वीडियो और खबरें आई हैं। लोगों का भाईचारा उनकी आपसी सांझ को दर्शा रहा है। इसे और मजबूत कर रहा है। यह आपदाओं के समय अपनी मज़बूती दिखा रहा है।

इस आपदा के मौके पर लोगों को खुद आगे आकर पीड़ित लोगों का हाथ मजबूती और दृढ़ता से थामने और हर तरह की सहायता करने की प्रवृत्ति को और बल देने की जरूरत है। ऐसे संकटों के समय क्षेत्रीय, जातिगत, ग्रामीण-शहरी या अन्य प्रकार की तथाकथित विभाजन रेखाएं टूटती हैं और मेहनतकश लोगों की मानवीय, भाईचारक और वर्गीय सांझ गहरी होती है। इसलिए हर तरह के विभाजनों से ऊपर उठकर मेहनतकश लोगों के सांझे भाईचारे को उभारने और इसे और पक्का करने की जरूरत है। लोगों द्वारा अपनी ओर से थोड़ा-थोड़ा जोड़कर भेजी गई सहायता न केवल भौतिक दृष्टि से, बल्कि भाईचारे की मजबूती के दृष्टिकोण से भी मूल्यवान है। यह लोगों की असीमित अव्यत सामर्थ्य को भी उजागर करती है और संकटों से निपटने के लिए लोगों की सामूहिक संगठनात्मक कार्रवाई करने की क्षमता में विश्वास जगाती है। हमेशा की तरह उभर रही इस प्रवृत्ति को और मजबूत करने की जरूरत है। लोकपक्षीय शक्तियों और वर्गीय लोक संगठनों को ऐसे प्रयासों में जोर-शोर से सक्रिय होना चाहिए। लोगों के साझा प्रयास जुटाने की पहल को बढ़ावा देना चाहिए और इस तरह का प्रयास जुटाने के उद्यम में अग्रिम भूमिका निभानी चाहिए।

जन शक्तियों को दोहरी जिम्मेदारी उठानी होगी। जहां एक ओर लोगों को अधिक से अधिक राहत कार्यों के लिए लामबंद और संगठित करने की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर सरकारों की जवाबदेही तय करने और उन्हें कटघरे में खड़ा करने के कार्य की अगुवाई का जिम्मा भी लोकपक्षीय क्रांतिकारी और जनवादी शक्तियों पर है। लोगों द्वारा बाढ़ पीड़ितों की सीधी सहायता में सक्रियता सरकारों को बरी करने का जरिया नहीं बननी चाहिए, बल्कि इसका सरकारों की जवाबदेही तय करने और लोगों के प्रति बनती जिम्मेदारी को निभाने के लिए दबाव डालने की सरगर्मी के साथ समन्वय करना चाहिए। हकूमति अक्षमता और नाकारा कारगुजारी को उजागर किया जाना चाहिए। कड़ी आलोचना की जानी चाहिए और जिम्मेदारी तय कर उचित सजा की मांग की जानी चाहिए।

इस अवसर पर पंजाब और केंद्र सरकारों से यह मांग की जानी चाहिए कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों में तेजी लाई जाए, हर तरह की सहायता के लिए सरकारी तंत्र और ढांचे को सक्रिय किया जाए, राज्य और केंद्र के संसाधनों को बाढ़ की मार झेल रहे लोगों की सहायता के लिए झोंका जाए। हकूमत सक्रिय हो, पानी में फंसे लोगों को बचा रही टोलियों को सरकारी सहायता उपलब्ध करवाए। यह समय सरकारी बजटों पर हक जतलाने का सबसे अहम समय है। इस हक को तत्काल सरकारी सहायता और राहत कार्यों में तेजी लाए जाने के लिए भी जतलाया जाना चाहिए, और साथ ही पुनर्वास के लिए मुआवजा राशि के लिए भी। सरकारी खजाने को लोगों के लिए खोले जाने की मांग करने की जरूरत है लेकिन इसके लिए संघर्ष की जरूरत होगी। पुनर्वास का कार्य कोई साधारण कार्य नहीं है, मामूली और नगण्य राशियों के साथ या आधे-अधूरे वितरण के जरिये आँसू पोंछने जैसी औपचारिक कार्रवाइयों को नामंजूर किये जाने और पुनर्वास के लिए हर पहलू से सहायता की मांग किये जाने की जरूरत है। इसमें घरों, फसलों, पशुओं सहित हुए हर नुकसान के मुआवजे के साथ-साथ कर्ज माफी, ब्याज मुक्त कर्ज, दोबारा बुवाई के लिए सहायता, और खेत मजदूरों तथा अन्य संपत्ति-विहीन वर्गों के लिए गुजारा भत्ता देने, कॉर्पोरेट और अन्य बड़े जोंक लुटेरों पर  प्राकृतिक आपदा विशेष कर लगाने, अडानी/अंबानी, बादल/अमरिंदर जैसे धन कुबेरों से प्राकृतिक आपदा वसूली के जरिये पैसा इक्कठा कर बाढ़ पीड़ितों को देने की मांगें शामिल हैं। भले ही यह अवसर तत्काल राहत कार्यों में जुटने, पुनर्वास में सहयोग करने और साथ ही सरकार पर हर तरह की जिम्मेदारी के लिए दबाव बनाने का है, लेकिन यह अवसर बाढ़ की मार पर काबू पाने से संबंधित महत्वपूर्ण और बुनियादी कदमों को उभारने का भी है। बुनियादी समाधान के इन कदमों में नदियों के प्रवाह को अवैध निर्माणों और अन्य व्यावसायिक बाधाओं से मुक्त रखना, अनावश्यक और विनाशकारी खनन को बंद करना, तटबंधों को मजबूत करना और इसके लिए भारी बजट जुटाना, छोटे बांधों के निर्माण की नीति अपनाना और उनका उचित प्रबंधन करना, राज्य में सिंचाई ढांचे का विस्तार करना, वर्षा जल का संरक्षण और भंडारण करना, प्राकृतिक जल प्रवाह की बहाली करना, प्राकृतिक तालाबों और जलाशयों के माध्यम से भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था करना, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में विनाशकारी तथाकथित विकास परियोजनाओं को रद्द करना, पहाड़ों और जंगलों का संरक्षण करना और अधिक पेड़ लगाने की नीति अपनाना, तथा समग्र रूप से पर्यावरण को नष्ट करने वाले इस जनविरोधी और जोंक हितकारी मॉडल को रद्द करना शामिल है। भले ही इन दिनों ये तात्कालिक संघर्ष के मुद्दे न हों, लेकिन इन मुद्दों का जन चेतना में संचार करना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि बाढ़ रोकने और नदी जल संरक्षण के दृष्टिकोण से इनका बुनियादी महत्व है। ऐसा न करने पर बाढ़ की मार बार-बार पड़ेगी और आने वाले समय में यह और ज़्यादा भीषण होगी। इसलिए, स्थायी रोकथाम के लिए इन मुद्दों को अब उभारना, और फिर इन्हें संघर्ष का मुद्दा बनाने की दिशा में बढ़ना आवश्यक है।


(सुर्ख लीह के सितंबर-अक्टूबर अंक से)

Monday, September 1, 2025

बठिंडा में हुई राज्य स्तरीय कन्वेंशन का संदेश:


 

बठिंडा में हुई राज्य स्तरीय कन्वेंशन का संदेश:

-तीव्र भूमि सुधारों की मांग को ले लामबंद हों खेत मजदूर और किसान
-जमीन प्राप्ति और सुरक्षा के लिए संघर्षों के साझा आधार को सुदृढ़ किया जाए  

 

पंजाब खेत मजदूर यूनियन और लोक मोर्चा पंजाब द्वारा  29 अगस्त को बठिंडा में भूमि प्राप्ति और सुरक्षा के मुद्दों पर एक राज्य स्तरीय कन्वेंशन आयोजित की गई और इन मुद्दों पर किसानों और खेत मजदूरों को लामबंद करने के लिए राज्य में "फिर से करो भूमि वितरण" नामक एक लामबंदी अभियान शुरू किया गया। अनाज मंडी में एकत्र हुए इस सम्मेलन में दोनों संगठनों के सक्रिय कार्यकर्ता, संघर्षशील किसान कार्यकर्ता और नेता भी शामिल हुए।

इस सम्मेलन को दिल्ली से पहुंचे जम्हूरी अधिकारों की एक प्रमुख कार्यकर्ता डॉ नवशरण ने विशेष रूप से संबोधित किया। उन्होंने कहा कि देश की सरकारें भूमि सुधारों के ज़रिए ज़मीनों की अन्यायपूर्ण रूप से नाबराबर मलकियत को ख़त्म करने के औपचारिक एजेंडे को तो बहुत पहले ही छोड़ चुकी हैं और इसके उलट, ज़मींदारों के साथ-साथ अब कॉर्पोरेट घराने भी विशाल भूखंडों की मलकियत के ज़रिए नए ज़मींदारों के रूप में उभर रहे हैं। उन्होंने किसानों की ज़मीनों को कंपनियों को सौंपने के लिए देश भर में किए जा रहे हमले के पैमाने और गंभीरता पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि कैसे देश और राज्यों की सरकारें साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारोबार के लिए भूमि बैंक बनाने की योजना बना रही हैं और पंजाब की लैंड पूलिंग नीति भी इसी लैंड बैंक नीति का एक हिस्सा थी। उन्होंने कहा कि लोगों के जीवन की बेहतरी के लिए, कंपनियों को ज़मीन सौंपने के बजाय, भूमि सुधारों के ज़रिए खेतिहर मज़दूरों और ग़रीब किसानों को ज़मीन का मालिकाना हक़ देने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने के लिए देश में भूमि सुधार बेहद ज़रूरी हैं। उन्होंने भूमि के न्यायपूर्ण बटवारे और किसानों की जमीनों पर हो रहे हमलों से सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण और बुनियादी मुद्दों को लोगों के बीच लामबंदी का मुद्दा बनाने के लिए दोनों संगठनों के प्रयासों का स्वागत किया।

पंजाब खेत मज़दूर यूनियन के राज्य सचिव लछमन सिंह सेवेवाला, लोक मोर्चा पंजाब के राज्य सचिव जगमेल सिंह के अलावा प्रमुख किसान नेता सुखदेव सिंह कोकरी कलां ने भी सम्मेलन को संबोधित किया। नेताओं ने लोगों से आह्वान किया कि वे तीब्र भूमि सुधारों को लागू करके खेत मजदूरों और भूमिहीन किसानों को भूमि और कृषि उपकरणों का मालिक बनाने के मूल मुद्दे पर लामबंद हों और इससे संबंधित मांगों, जैसे: भूमि हदबंदी अधिनियम को सख्ती से लागू करना, जमींदारों के लिए अतिरिक्त भूमि रखने का रास्ता बंद करना, सभी परिवारों को भूमि उपलब्ध कराने के लिए जरूरत के अनुसार भूमि सीमांकन को तर्कसंगत बनाना, साहूकारों की लूट को खत्म करना, सरकारी नजूल और बेनामी जमीनों को खेत मजदूरों और भूमिहीन किसानों के लिए आरक्षित करना और बड़ी कंपनियों को उनके हस्तांतरण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना, आबादकार किसानों को भूमि का मालिकाना हक देना और पूर्व और वर्तमान जमींदारों द्वारा बटाईदार किसानों की जमीनों को जब्त करने के कदमों को रोकना इत्यादि के लिए संगठित हों और संघर्षों के मैदान में उतरें। वक्ताओं ने इन मांगों के समाधान को एक वैकल्पिक जनहितैषी विकास मॉडल से भी जोड़ा और इन कदमों को जनहितैषी विकास का रास्ता अपनाने की दिशा में बुनियादी कदम बताया। कृषि क्षेत्र से सामंती शोषण के खात्मे के साथ-साथ साम्राज्यवादी शोषण के खात्मे की आवश्यकता को भी उभरा गया। इन मांगों को हासिल करने के लिए साधारण औपचारिक संघर्षों से आगे बढ़कर, उग्र जनसंघर्षों की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।

खेत मजदूर प्रवक्ता ने जहाँ जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव की परिघटना को भूमि के स्वामित्व के अभाव से जोड़ा, वहीं किसान नेता ने किसानों की भूमि पर हो रहे हमलों से सुरक्षा और जमीन प्राप्ति के संघर्षों में खेत मजदूरों और किसानों की एकजुटता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने जाति के आधार पर ज़मींदारों द्वारा किसानों को खेत मज़दूरों के ख़िलाफ़ लामबंद करने के कू-चलन को परास्त कर देने तथा किसानों और खेत मज़दूरों के, जमीनों पर हो रहे हमलों से सुरक्षा और जमीन प्राप्ति के साझा हितों को आगे बढ़ाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने जातिगत अहंकार को सिरे से नकारते हुए इसे किसान-खेत मज़दूर एकता में एक बड़ी बाधा बताया। उन्होंने तथाकथित निचली जातियों के लोगों की महान श्रमिकों के रूप में सराहना की। लोक मोर्चा पंजाब के प्रवक्ता ने पंजाब में ज़मीन प्राप्ति के लिए उठ रही आवाज़ और खेत मज़दूरों में ज़मीन के अधिकारों के लिए तीब्र हो रही मांग का ज़िक्र किया और संगरूर में खेत मज़दूरों द्वारा ज़मीनों पर अपने अधिकार जताने के घटनाक्रम को इस तीब्र हो रही मांग की अभिव्यक्ति के तौर पर एक शुभ संकेत बताया।

पंजाब खेत मजदूर यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष ज़ोरा सिंह नसराली की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन के दौरान संयुक्त रूप से घोषणा की गई कि इन मुद्दों पर अगले महीने पंजाब के विभिन्न इलाकों में सम्मेलन और जन-प्रदर्शन आयोजित किए जाएँगे। सम्मेलन के दौरान एक विशेष प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें मांग की गई कि लैंड पूलिंग नीति के रद्द होने के बाद अब पंजाब सरकार द्वारा वैकल्पिक तरीकों से पंचायती ज़मीनों के अधिग्रहण के लिए अपनाए जा रहे कदमों को तुरंत रोका जाए और पंचायती ज़मीनें बेचने के प्रस्ताव पारित करने के जो निर्देश दिए जा रहे हैं उन्हें तुरंत वापस लिया जाए। इसके साथ ही, सम्मेलन में राज्य में बाढ़ की गंभीर स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई और बाढ़ से प्रभावित लोगों के साथ अपनी सहानुभूति व्यक्त की गई। उन्होंने सरकार से माँग की कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के लिए युद्धस्तर पर राहत कार्य चलाए जाएँ और सरकारी खजाने से पुनर्वास मुआवज़े के लिए तुरंत कदम उठाए जाएँ। संगठनों ने सभी जन-पक्षधर संगठनों और जन-पक्षधर ताकतों से बाढ़ प्रभावित लोगों की हर संभव मदद के लिए आगे आने का आह्वान किया। सम्मेलन के अंत में एक प्रतीकात्मक मार्च भी निकाला गया, जिसमें इन माँगों को लेकर ज़ोरदार नारेबाज़ी की गई।

सम्मेलन के आयोजक नेताओं ने कहा कि आज के सम्मेलन में हुई चर्चाओं को अगले महीने तक खेत मज़दूर बस्तियों और ग़रीब भूमिहीन किसानों तक पहुँचाया जाएगा और उन्हें इन मुद्दों पर लामबंद करते हुए ज़ोरदार संघर्षों की नींव रखने के लिए प्रेरित किया जाएगा। दोनों संगठनों ने इन मुद्दों पर चर्चा करते हुए एक पुस्तिका भी प्रकाशित की है, जिसे आने वाले दिनों में अभियान के दौरान गाँवों में वितरित किया जाएगा।

इस सम्मेलन का मुख्य संदेश भूमि पुनर्वितरण के सवाल और उससे जुड़े मुद्दों के साथ-साथ, इन मुद्दों को अपनी जमीनों पर हो रहे हमलों से सुरक्षा  के लिए संघर्षरत किसान आंदोलन के सरोकारों से जोड़ना था। जमीनों की सुरक्षा और जमीन प्राप्ति के सरोकारों के बीच आने वाली जातिगत बाधा को एक सही वर्गीय दृष्टिकोण से संबोधित होने का संदेश भी उभारा गया। इस प्रकार, इस सम्मेलन के द्वारा, एक क्रांतिकारी भूमि आंदोलन के निर्माण के लिए आवश्यक सही दिशा को उजागर किया गया। आशा है कि इस दिशा के अनुरूप लामबंदी, राज्य में भूमि मुद्दे को आवश्यक सही संघर्ष चौखटे में उभारने का साधन बनेगी। 

(सुर्ख लीह की रिपोर्ट)