Thursday, September 25, 2025

भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते के खिलाफ संघर्ष का झंडा थामे सड़कों पर उतरे किसान

        भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते के खिलाफ संघर्ष का झंडा थामे सड़कों पर उतरे किसान




 

13 अगस्त को संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर देश के किसानों द्वारा भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते के खिलाफ उठाई आवाज बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण कार्रवाई थी। कृषक जनता की विशाल भागीदारी वाली यह कार्रवाई, कृषि क्षेत्र पर मंडरा रही  साम्राज्यवादी गिद्धों के हमलों के खिलाफ किसान लहर के तीब्र होते ज्वार की अभिव्यक्ति भी बन गई है। इसके अलावा, किसान संगठनों के एक अन्य साझा मंच, किसान मजदूर मोर्चा ने भी इस व्यापार समझौते के खिलाफ एक्शन किये हैं। कुछ अन्य किसान संगठनों ने भी मोदी सरकार से इस समझौते से दूर रहने की मांग की है। देश के संगठित किसानों की यही आवाज है जो ट्रम्प के सामने दंडवत हो रही मोदी सरकार को डरा रही है और कृषि कानूनों पर हुए संघर्ष की याद दिला रही है। ट्रम्प द्वारा मांगी जा रही मनोवांछित रियायतें देते समय मोदी के हाथ-पाँव फुला रही है। अमेरिकी माल की बाढ़ से कृषि क्षेत्र के और भी गंभीर होने जा रहे संकट की बेचैनी को किसान संगठनों द्वारा संघर्ष के रस्ते ढाल लिए जाने का खतरा मोदी द्वारा  ट्रम्प के आगे साष्टांग नतमस्तक हो जाने में बाधा बन रहा है। देश के शासक वर्गों द्वारा तथाकथित स्वतंत्रता दिवस के जश्नों से दो दिन पहले हुआ यह एक्शन, शासक वर्गों द्वारा तिरंगा फहरा प्रस्तुत की जाती नकली आज़ादी के मुक़ाबले देश पर साम्राज्यवादी उत्पीड़न और लूट की असलियत को उजागर करने का एक अवसर भी बन गया है।

जब देश का राष्ट्रीय पूँजीवाद, छोटे व्यवसाय और व्यापारी वर्ग अभी तक इस संभावित समझौते के ख़िलाफ़ लामबंद होता नहीं दिख रहा, तब ऐसे समय में किसानों की यह कार्रवाई और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह एक्शन खासकर ऐसे तबकों के सामने यह उभारने का जरिया भी बनता है कि किस तरह यह समझौता देश के शोषित-उत्पीड़ित वर्गों के संकट को और भी गहरा करने जा रहा है। वैसे, छोटे व्यापारियों, कारोबारियों और छोटे उद्योगपतियों को प्रभावित करने वाले इस समझौते के खिलाफ इन वर्गों की एकजुट आवाज का अभी तक न उठ पाना भी जनता की साम्राज्यवाद-विरोधी लहर की कमजोरी की अभिव्यक्ति है। किसानों की आवाज के साथ मिल कर, इन वर्गों और तबकों द्वारा समझौते के खिलाफ आवाज उठाना, मोदी सरकार पर कई गुना अधिक दबाव बनाने का कारण बनेगा। लेकिन अभी देश के साम्राज्यवाद-विरोधी जन-आंदोलन को यह मुकाम हासिल करना बाकी है।

यह कार्रवाई कृषि क्षेत्र में तेज होते जा रहे साम्राज्यवादी हमले के प्रति किसानों में बढ़ती जागरूकता की भी अभिव्यक्ति है। कृषि कानूनों के खिलाफ ऐतिहासिक किसान संघर्ष ने इस जागरूकता को फैलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन कानूनों को देश के किसानों की फसलों और ज़मीनों को देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने के कदम के रूप में चिन्हित किया था। साम्राज्यवादी लूट के विरुद्ध किसानों को लामबंद और संगठित करने में जुटे किसान संगठनों ने भी इनका (कृषि कानूनों का) सबंध साम्राज्यवादी हमले से जोड़ कर दिखाने की गंभीर कोशिशें की थीं। उसके बाद एमएसपी की कानूनी गारंटी की माँग को, बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवादी कृषि निगमों द्वारा कृषि को हड़पने की योजनाओं के साथ टकराव के रूप में और अधिक स्पष्टता से देखा जाने लगा है। कृषि क्षेत्र में साम्राज्यवादी हमला और उसका प्रतिरोध, वर्तमान में किसान आंदोलन के लिए ज्वलंत सरोकार का मुद्दा है। देश के किसान, कृषि पर मंडरा रहे साम्राज्यवादी गिद्धों को पहचानने लगे हैं। तेज़ होता साम्राज्यवादी हमला इस पहचान को और गहरा करने का जरिया बन रहा है। यह हमला नए से नए क्षेत्रों में और नए से नए तरीकों से किसानों के हितों पर प्रहार कर रहा है। इन नए-नए तरीकों से किसानों का पड़ रहा वास्ता उनकी सूझ-समझ को और तीखा कर रहा है। किसानों का अमेरिकी साम्राज्यवादी हितों के साथ  यह सीधा टकराव, साम्राज्यवाद-मुर्दावाद के नारे को किसान जनता के मनों में गहराई तक उतारने का आधार बन रहा है। देश की क्रांतिकारी जम्हूरी और सच्ची देशभक्त ताकतों को इस अवसर पर किसानी के बीच साम्राज्यवाद-मुर्दावाद  के मूलतत्त्व का संचार करने के लिए पुरज़ोर प्रयास करने चाहिए।  

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