Tuesday, March 21, 2017

शहीद भगत सिंह

शहीद भगत सिंह का विचारधारात्मक विकास

कुछ पहलुओं की चर्चा

Jaspal Jassi
शहादत से पूर्व जेल जीवन के दौरान हीद भगत सिंह एक शानदार एवं प्रतिभाशाली कम्युनिस्ट व्यक्तित्व में ढल चुका था। गहरे अध्ययन के फलस्वरूप उसकी असाधारण तेज़ी से हुई विचारधारात्मक प्रगति ने उसे दे के कम्युनिस्ट आंदोलन के नेताओं की कतार में शामिल कर दिया था। जेल के अंदर उसने अपने कंधों पर कम्युनिस्ट पार्टी संगठित करने और क्रांतिकारी आंदोलन को कम्युनिस्ट उद्ेदष्यों तथा तौर तरीकों के अनुसार प्रभावित करने की ज़िम्मेदारी उठाई हुई थी। जीवन के आखिरी दौर में हादत से तुरंत पहले उसके द्वारा जेल से जारी किए गए क्रांतिकारी प्रोग्राम की रूप रेखा में इस बात की पुष्टि की थी।
                वैसे दिसंबर 1925 में ही भारत में कम्युनिस्ट पार्टी गठित हो गई थी (जब तक अभी भगत सिंह एवम् उसके साथी कम्युनिस्ट नहीं बने थे)। अपने बचपन के इस प्रारंभिक दौर में कम्युनिस्ट पार्टी ने अच्छी उपलब्धियाँ कर ली थीं। इसने मज़दूर वर्ग के आंदोलन को लाल रंगत देने की अहम भूमिका निभाई थी। विभिन्न प्रांतों में किरती-किसान पार्टी के खुले मंचों द्वारा लोगों से संबंध बनाने और साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन को प्रभावित करने की कोषिषें की गई थीं। परंतु सर्वहारा नेतृत्व के कारगर और प्रभावशाली राष्ट्र स्तरीय गुप्त केंद्र के तौर पर आवष्यक्ता अनुसार पार्टी को संगठित करने, इसका निर्माण करने तथा और उभारने का कार्य बुरी तरह से पिछड़ गया था। अन्य कारणों के अतिरिक्त ग्रुप-संकीर्णता की मध्यवर्गीय प्रवृति ने इस बात में अहम भूमिका निभाई थी। इसके अतिरिक्त काफी षक्ति मज़दूर-किसान पार्टी के प्लेटफार्म एवं अन्य साधनों द्वारा कांग्रेस के ‘‘वामपक्ष‘‘ के तौर पर स्थापित होने के प्रयत्नों में ही खपत होती रही थी। तत् पष्चात् कम्युनिस्ट अंतर्राष्ट्रीय , चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और कुछ अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा पार्टी का अलग एवं आजाद अस्तित्व स्थापित करने के विषेष महत्व पर ध्यान दिलाया गया था (स्त्रोत-पार्टी इतिहास के बारे में षिक्षा दिशा निर्देषों के लिए जारी की गई सी.पी.आई की पुस्तिका)। षहीद भगत सिंह के कम्युनिस्ट  विचारधारा के दायरे में आ जाने के बावजूद, संगठनात्मक तौर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दायरे में न आ पाने का अन्य कारणों के अतिरिक्त शायद यह भी एक महत्वपूर्ण कारण था। परन्तु देष में मौजूद कुल कम्युनिस्ट षक्तियों  की संगठनात्मक एकता के इस मुद्दे को एक तरफ रखते हुए यह प्रत्यक्ष है कि अपने जीवन के अंतिम दौर में षहीद भगत सिंह अपने तौर पर एक कम्युनिस्ट नेता के रूप में महत्वपूर्ण प्रयास में जुटा हुआ था।ष्
                भगत सिंह का कम्युनिस्ट आदर्षों के मध्यवर्गीय राष्ट्रवादी समर्थक से सर्वहारा सूझ के रंग में रंगे कम्युनिस्ट व्यक्तित्व में पृथक्ता से उभारने वाला सबसे अहम पहलू उसके द्वारा क्रांतिकारी आतंकवाद को अलविदा कहना था। हीद भगत सिंह की सोच के ऐसा सफर तय करने के लिए कुछ आवष्यक षर्तों के पूर्ण होने की ज़रूरत थी। उसके क्रांतिकारी व्यक्तित्व का विकास संसार भर के क्रांतिकारी आंदोलनों से संबंधित साहित्य का गहराई से अध्ययन करते हुए एवं इसे ग्रहण करते हुए हुआ था। जब वह सही अर्थाें में कम्युनिस्ट नहीं बना था, तब भी उसके विचार सैद्धांतिक नीवों पर टिके हुए थे। उसने अराजकतावादी आंदोलनों के विचारकों तथा सैद्धांतिक व्याख्याकारों की रचनाओं का प्रभाव ग्रहण किया था। फलस्वरूप, उसके इस विष्वास को बल मिला था कि जब परिस्थितियां क्रांतिकारी परिवर्तन की मांग कर रही होती हैं तो क्रांतिकारी आतंकवादी जुझारू कार्यवाहियाँ तूफानों का आगाज़ करने की भूमिका निभाती हैं। ये जनता की क्रांतिकारी षक्ति को उभार कर हरकत में ले आती हैं।
                देष में एक आवष्यक प्रतिष्ठित कम्युनिस्ट पार्टी की अनुपस्थिति में षहीद भगत सिंह का आगामी विकास कुछ अहम ज़रूरतों के पूरा होने पर ही निर्भर करता था। एक महत्वपूर्ण साधन, कम्युनिस्ट अंतर्राष्ट्रीय से संपर्क, उसे हासिल नहीं था।(जब भगत सिंह जेल में था तो हिंदुस्तान सोषलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी ने अपने अहम नेताओं को सोवियत यूनियन भेजने की योजना बनाई थी जो पूरी नहीं हो पाई थी)। दूसरा साधन बुनियादी वर्गों, अर्थात् मज़दूरों-किसानों के क्रांतिकारी वर्गीय आंदोलन के निर्माण का साकारात्मक अभ्यास बनता था। हिंदुस्तान सोषलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी को इस अभ्यास से गुज़रने का मौका नहीं मिल पाया था। तीसरा साधन देष में कम्युनिस्ट नेताओं से संपर्क एवम्् सैद्धांतिक विचार-विमर्ष की प्रक्रिया बनता था। पंजाब के किरती-किसान पार्टी के नेताओं से मिलकर षहीद भगत सिंह को यह अवसर तो हासिल हुआ था, परन्तु इसमें सीमितता यह थी कि भगत सिंह को कायल करने के लिए उच्च स्तरीय माक्र्सवादी सैद्धांतिक व्याख्या की ज़रूरत थी। अपने अन्य गुणों के बावजूद पंजाब की किरती -किसान पार्टी के नेता यह ज़रूरत पूरी करने के लिए तब आवष्यक हद तक सक्षम नहीं थे। श्री सोहन सिंह जोष ने इस बात को स्वीकार किया है कि क्रांतिकारी आतंकवाद का खंडन करने के बावजूद वे ऐसी स्थिति में नहीं थे कि षक्तिशाली सैद्धांतिक बुनियादों को आधार बना कर माक्र्सवाद से इसकी भिन्नता की आवष्यक्तानुसार व्याख्या कर पाते ( स्त्रोत- सोहन सिंह जोष की रचना, षहीद भगत सिंह से मेरी मुलाकातें )।
                इन परिस्थितियों में षहीद भगत सिंह का सैद्धांतिक विकास माक्र्सवादी साहित्य से गहरे सीधे संपर्क, इसके गहन अध्ययन और अपने बलबूते इसे ग्रहण करने की क्षमता पर निर्भर करता था। कारावास दौरान अघ्ययन का मौका मिलने से इस जरूरत के काफी हद तक पूरा होने से और षहीद भगत सिंह की षक्तिशाली ग्रहण क्षमता के कारण से उसके विचारधारक विकास ने गुणात्मक छलांग लगाई। इस छलांग में एक और अहम पक्ष ने भी सहायक भूमिका निभाई। चाहे मिले जुले कारणों की वजह से षहीद भगत सिंह का संगठन मज़दूरों किसानों के वर्गीय आंदोलन निर्माण के आवष्यक साकारात्मक अनुभव से नहीं गुजर पाया था, परन्तु इसके अभ्यास के कुछ नाकारात्मक अनुभव गहन सोच-विचार और इसको गहरे अध्ययन से जोड़कर दुरुस्त निष्कर्ष निकालने के लिए सार्थक सामग्री बन गए थे।
                जेल जीवन दौरान षहीद भगत सिंह के विकास की गति आष्चर्यजनक प्रभाव डालती है। अपनी क्रांतिकारी गतिविधि के पहले दौर में षहीद भगत सिंह आराजकतावादी नेता पीटर क्रोपटकिन का यह हवाला दिया करते थे:
                ‘‘एक मात्र कार्यवाही ही कुछ दिनों में हज़ारों पुस्तिकाओं से ज्यादा प्रचार कर देती है। सरकार अपनी रक्षा करती है, गुस्से की दयनीय स्थिति में भड़क उठती है, परन्तु इस तरह वह एक या ज्यादा व्यक्तियों द्वारा ऐसी और कार्यवाहियों को आमंत्रित कर बैठती है, और बाग़ियों को हीरोइज़्म के मार्ग पर धकेल देती है, एक कार्यवाही दूसरी को जन्म देती है। विरोधी बगावत की कतारों में आ जाते हैं। सरकार गुटों में बंट जाती है। आपसी द्वैष-भाव विरोधों को तीखा करते हैं। रियायतें बहुत देरी से पहुँचती हैं और इन्कलाब फूट पड़ता है।..... धन, संगठन और साहित्य की और ज़रूरत नहीं होती। एक व्यक्ति ही हाथ में मशाल व डायनामाईट लेकर संसार को निर्देष दे सकता है‘‘
                परन्तु जेल जीवन दौरान षहीद भगत सिंह ‘‘आतंकवाद‘‘ के बारे में नीचे लिखी गंभीर टिप्पणी करता हैः
 ‘‘बंब का मार्ग 1905 से चला आ रहा है और यह क्रांतिकारी भारत पर एक दर्दनाक टिप्पणी है। ़़ ़ ़ ़आतंकवाद क्रांतिकारी मानसिकता का जनता में गहराए न जा सकने पर एक पछतावा है। इस प्रकार यह हमारी असफलता को कबूल करना भी है। ़ ़ ़ सभी देषों में इसका इतिहास असफलता का इतिहास है। फ्रांस, रूस, जर्मन, बालकिन देषों, स्पेन और सभी जगह यही कहानी है। हार का बीज इसके भीतर ही अंकुरित होता है‘‘
                ‘‘पछतावे‘‘ से संबंधित षहीद भगत सिंह की टिप्पणी क्रांतिकारी आतंकवाद के बारे में लैनिन की टिप्पणियों से मिलती जुलती है। परन्तु षहीद भगत सिंह और भी आगे जाता है। वह ये अहम बात करता है कि व्यावहारिक परिणामों के पक्ष से क्रांतिकारी आंदोलन पर आतंकवाद तथा गांधीवाद का प्रभाव तत्व में  एक सा है। क्रांतिकारी आतंकवाद की सीमाओं की चर्चा करते हुए वह कहता है कि क्रांतिकारी आतंकवाद यदि पूरे ज़ोर से वह कुछ भी कर दिखाए ‘‘जो इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ तब भी आतंकवाद अधिकतम साम्राज्यवादी ताकतों को समझौते के लिए मज़बूर ही कर सकता है। ऐसे समझौते हमारे उद्देष्य अर्थात् पूर्ण आज़ादी से हमेशा ही कहीं दूर रहेंगें। इस प्रकार आतंकवाद एक समझौता एवम् सुधारों की एक किस्त निचोड़ कर निकाल सकता है और यही प्राप्त करने के लिए गांधीवाद ज़ोर लगा रहा है‘‘
                आयरलैंड के अनुभव को आधार बनाकर षहीद भगत सिंह क्रांतिकारी आतंकवाद को ‘‘क्रांतिकारी सामाजिक आधार से विहीन राष्ट्रवादी आदर्षवाद‘‘ कहता है़, जो ‘‘सभी परिस्थितियां अनुकूल होने के बावजूद भी साम्राज्यवाद से समझौते की रेत में खो सकता है‘‘ और क्रांतिकारी आतंकवादियों से प्रष्न करता है,‘‘क्या भारत को अभी भी आयरलैंड की नकल करनी चाहिए?, चाहे वह की भी जा सकती हो तब भी‘‘ इसका कुल मिलाकर परिणाम यह है कि ‘‘ आतंकवाद के षैतान को कोई दाद देने की आवष्यक्ता नहीं है‘‘
                उस समय क्रांतिकारी आतंकवाद का भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के अंदर रूझान नहीं था। इसका प्रतिनिधित्व आम तौर पर मध्यवर्गीय राष्ट्रवादी हिस्से करते थे। तब भी षहीद भगत सिंह की उपरोक्त टिप्पणी की तुलना किसी हद तक लैनिन की उन टिप्पणियों से की जा सकती है जो उसने मज़दूर आंदोलन के अंदर गलत रूझानों के तौर पर एक तरफ क्रांतिकारी आतंकवाद और दूसरी तरफ आथर््िाकवाद-सुधारवाद के एक समान तत्व के बारे में की हैं।
                क्रांतिकारी परिस्थितियां उत्पन्न करने और इन्कलाब प्रारंभण में़ क्रांतिकारी आतंकवाद की भूमिका के बारे में स्वप्नमई धारणाओं से गहरी भिन्नता की एक और झलक भी षहीद भगत सिंह द्वारा जारी किए क्रांतिकारी प्रोग्राम के प्रारूप में मिलती है। वह यह स्पष्ट सूझ अभिव्यक्त करता है कि क्रांति की सफलता  आवष्यक वस्तुगत एवम् अन्तर्गत षर्तों के पूरे होने पर निर्भर करती है। वह अक्तूबर क्रांति की सफलता के लिए लैनिन के कथानुसार तीन आवष्यक षर्तों का उल्लेख करता है। राजनैतिक-आथर््िाक स्थिति, जनता की मानसिक तैयारी और परीक्षा की घड़ियों में नेतृत्व देने में सक्षम प्रषिक्षित क्रांतिकारी पार्टी। वह दूसरी व तीसरी षर्त पूरी करने के लिए क्रांतिकारी कारकुनों के सक्रिय होने को ‘‘प्राथमिक कार्य‘‘ बयान करता है और ‘‘इस मुद्दे को सामने रख कर‘‘ क्रांतिकारी व्यावहारिक गतिविधियों  का प्रोग्राम बनाने पर ज़ोर देता है। ‘‘जनता को लड़ाकू कार्य के लिए तैयार करने और लामबंद करने‘‘ को वह कार्यकर्ता का  प्राथमिक कर्तव्य कहता है।
                देष में क्रांति के लिए वर्गीय राजनैतिक षक्तियों की कतारबंदी के प्रष्न पर भी षहीद भगत सिंह तथा साथियों की सोच अहम लंबे कदम बढाती नज़र आती है। क्रांति की चालक षक्ति के तौर पर मज़दूरों-किसानों की भूमिका से संबंधित षहीद भगत सिंह के दृष्टिकोण की चर्चा होती रही है। कांग्रेस और ‘‘भारतीय पूँजीवाद‘‘ के हाथों ‘‘विष्वासघात‘‘ के खतरे के बारे में उसकी टिप्पणियां भी काफी चर्चा का विषय हैं। परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि षहीद भगत सिंह तथा साथियों की रचनाएं साम्राज्यवादी पूँजी की भारतीय अर्थव्यवस्था में भूमिका व इसकी राजनैतिक अर्थसंभावनाओं के निरीक्षण की तरफ बढ़ती दिखाई देती हैं। इन रचनाओं में यह स्पष्ट कहा गया है कि साम्राज्यवादी पूँजी के प्रवेष द्वारा इसके साथ साँझा हितों और अधीनता के रिष्ते में बंधी हुई बडे़े पूँजीपतियों की परत विकसित होती जा रही है और राष्ट्रीय हितों पर पहरा देने के पक्ष से इस परत की ‘‘गिरावट‘‘ अटल बनती जा रही है। षहीद भगत सिंह की सोच की यह दिशा संपूर्ण पूँजीवाद से साम्राज्यवाद-विरोधी साँझे मोर्चे की उस नीति से टकराती है, जिसने बाद में जाकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के क्रांतिकारी नेतृत्व की श्ूमिका की सीमितताएँ निष्चित् कर दी थीं। दिलचस्प बात यह है कि षहीद भगत सिंह एवम् उसके साथी सारे पूँजीपति वर्ग को एक समान हितों वाले वर्ग के तौर पर देखने की धारणा से मुक्त होने की दिशा में कदम बढ़ाते दिखाई देते हैं। जैसे कि पहले ज़िक्र आया है उन्होंने विदेषी पूँजी से वफादारी और सांझ के रिष्ते में बंधे पूँजीवाद के लिए ‘‘बड़े पूँजीपति‘‘ षब्द का प्रयोग किया है। दूसरी तरफ ऐसी टिप्पणियां मौजूद हैं जो साम्राज्यवाद के प्रभुत्व के प्रयोग से भारत में पूँजीवाद के आज़ाद विकास का गला घोंट देने की तरफ इशारा करती हैं और इस प्रकार विदेषी पूँजी से विरोधी हितों वाले पूँजीवाद के अस्तित्व का संकेत बनती हैं। गुरदित्त सिंह कामागाटामारू की कंपनी के साथ बर्तानवी साम्राज्यवादियों के व्यवहार को साम्राज्यवादी प्रभुत्व के भारतीय पूँजी से षत्रुता वाले रिष्ते को महत्वपूर्ण मिसाल के तौर पर दर्ज किया गया हैं। इसके अतिरिक्त षहीद भगत सिंह की जेल डायरी में बिपन चंद्र पाल के लेख में लंबा कथन मौजूद है। इस रचना में भारत में मौजूद उन पूँजीपतियों के सरोकारों एवम् इच्छाओं से संबोधित हुआ गया है जो भारत में विदेषी पूँजी के आयात को अपने हितों से टकराव में देख रहे थे। कांग्रेस में गर्म विचारों वाले कहे जाते इन नेताआंे ने पूँजीपति वर्ग की इस परत का प्रतिनिधित्व  किस हद तक किया, किया भी या किया ही नहीं, इस बहस को एक तरफ छोड़ते हुए, यह बात नोट करने योग्य है कि यह रचना स्वराज के अर्थों की व्याख्या करते हुए, इसे देष में विदेषी पूँजी के आयात के विरुद्ध सख़्त प्रतिबंधों के अधिकार से जोड़ती है, ‘‘अंग्रेज़ों को देष में घुसने नहीं देंगें‘‘ कहने तक जाती है, राज्य प्रबंध एवम् इसकी नीतियों के जैसे के तैसा रहने की हालत में नौकरशाही में भारतीय प्रतिनिधियों की थोक भर्ती को भी फिजूल करार देती है और यह दावा करती है कि गला घोंटने वाले प्रतिबंधों से मुक्त हो कर भारतीय पूँजीवाद संसार मुकाबले में बर्तानवी पूँजीवाद को पीछे छोड़ सकता है और समानान्तर ‘‘भारतीय साम्राज्यवाद‘‘ की हैसियत इख्तियार करने तक पहुँच सकता है। षहीद भगत सिंह ़द्वारा गहरी दिलचस्पी से नोट किया यह कथन ‘‘बड़े पूँजीपतियों‘‘ के बारे में उसकी टिप्पणियांे से जुड़ कर,साम्राज्यवाद के साथ आथर््िाक हितों के बुनियादी रिष्तों के आधार पर उसमें भारतीय पूँजीपति वर्ग के भीतर अंतर कर पाने की सूझ के बीज होने की बात को सामने लाते हैं।
                सूझ में सामने आया यह अंतर ही था जो चीनी क्रांति के अनुभव द्वारा माओ विचारधारा में दलाल पूँजीवाद एवम् राष्ट्रीय पूँजीवाद के विरोधी वर्ग लक्षणों के स्पष्ट चिन्ह के रूप में प्रकट हुआ और दलाल पूँजीवाद को निशाना बनाते हुए राष्ट्रीय पूँजीवाद से साँझा मोर्चा बनाने की दिशा का आधार बना। पूँजीपति वर्ग के ‘‘वामपंथ‘‘ एवम् ‘‘दक्षिणपंथ‘‘ में अंतर तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की लीडरषिप भी करती रही है। परन्तु यह अंतर इस वर्ग के अलग-अलग हिस्सों के किरदार से ज्यादा भूमिका के आधार पर किया जाता रहा है। बड़े पूँजीपति वर्ग समेत समूचे पूँजीवाद के हितों को विदेषी साम्राज्यवाद से टकराव में देखा जाता रहा है। दक्षिणपंथ उस हिस्से को घोषित किया जाता रहा है जो समूचे ‘‘भारतीय पूँजीवाद‘‘के साम्राज्यवाद से टकराव वाले व स्वतंत्र समझे जाते हितों की रक्षा करने से भाग निकलते हैं तथा साम्राज्यवाद के आगे घुटने टेकने के खतरे की गुँजाइष रखता है। ऐसी धारणा के अनुसार सम्पूर्ण पूँजीवाद ही दोहरे एवम् ढुलमुल चरित्र वाला मध्यम स्तर का वर्ग बन जाता है और इसका कोई भी हिस्सा प्रतिक्रियावादी वर्ग के तौर पर क्रांति की चोट का निशाना नहीं रहता।
                इस प्रसंग में षहीद भगत सिंह द्वारा बड़े पूँजीपति वर्ग के, साम्राज्यवादी हितों से बंधे होने को चिह्नित करना काफी महत्वपूर्ण बन जाता है। चिह्नित करने के इस संकेत में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उस मार्ग से भिन्नता के बीज समाए हुए हैं जिस पर चलते हुए यह झोली के लगभग सारे फूल कांग्रेस के प्लेटफार्म को मज़बूत करने के लिए अर्पण करती रही है, जिसे यह साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय साँझे मोर्चे का प्लेटफार्म कहती थी।
                शहीद भगत सिंह द्वारा भारतीय क्रांति का खाका बनाने के प्रयत्नों में बड़े पूँजीवाद तथा इसके कांग्रेसी प्रतिनिधियों द्वारा साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी आंदोलन को धोखा देने के खतरे की पेषबंदियों (पहले ही प्रबंध करने) पर ज़ोरदार महत्व दिया था। इस प्रकार के खतरे का सामना करने के लिए भी षहीद भगत सिंह लोगों को अपनी पार्टी, कम्यूनिस्ट पार्टी का निर्माण करने के लिए विषेष तौर पर तत्पर था। कांग्रेस तथा बड़े पूँजीपतियों की भूमिका के बारे में भ्रमों से मुक्त पार्टी जो क्रांतिकारी परिस्थितियों में समय पर उपयुक्त हस्तक्षेप कर सके और क्रांति की बागडोर अपने हाथ में लेकर इसे जीत तक पहुँचा सके। 
                परन्तु कुछ विचारधारक सीमितताओं को पार पाना अभी षेष थीं। पूँजीपति वर्ग एवम् कांग्रेस के हाथों ‘‘धोखे‘‘ के बारे में षहीद भगत सिंह की चेतावनियों में यह बात भी शामिल थी कि वह क्रांति द्वारा राज सत्ता छीन कर इसे तुरंत समाजवाद की स्थापना के लिए जुटाने का उदद्ेष्य रखता था। यूरोपियन देषों एवम् अमरीकी षैली पर पूँजीवादी राज्य की स्थापना का संकल्प उसने अपनी माक्र्सवादी समझ के आधार पर रद्द किया हुआ था। साम्राज्यवादी प्रभुत्व के अधीन देषों में मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में साम्राज्यवाद-विरोधी जागीरदारी-विरोधी क्रांति, प्रोलेतारी डिक्टेटरषिप या सिर्फ मज़दूर-किसान राज्य के स्थान पर सभी क्रांतिकारी वर्गाें का साँझा जनतांत्रिक अधिनायकत्व और ऐसी क्रांति के लिए राष्ट्रीय पूँजीवाद समेत सभी क्रांतिकारी वर्गों के साँझे मोर्चे से संबंधित संकल्प चीनी क्रांति के अनुभव द्वारा बाद में निखर कर स्थापित हुए थे। साम्राज्यवादी प्रभुत्व की अधीनता वाले पिछड़े देषों में क्रांति के प्रष्न से संबंधित कम्युनिस्ट इंटरनैष्नल की अहम रचनाएँ भी तब षहीद भगत सिंह की पहुँच में नहीं थीं।लैनिन, साम्राज्यवादी प्रभुत्व अधीन पिछड़े देषों के बारे में ज़ोर देकर कहता रहा था कि समाजवाद इन देषों में तत्काल ‘‘आरोपित‘‘ नहीं किया जा सकता। उसने एक और अहम बात यह कही थी कि इन देषों में कम्युनिस्टों का माक्र्सवाद की पहले ही तैयार पुस्तकों से काम नहीं चलेगा। अपनी क्रांति का ठोस नीति-मार्ग उन्हें स्वयं परिस्थितियों से जूझते हुए बनाना होगा। कम्युनिज्म ‘‘आरोपन‘‘ के विरुद्ध लैनिन की इन चेतावनियों को तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  की लीडरषिप ने महत्व दिया पर वे खुद माथा-पच्ची करके भारतीय क्रांति का दुरूस्त नीति-मार्ग बनानेे में नाकाम रही। बल्कि लैनिन की चेतावनियां उसके लिए साम्राज्यवाद विरोधी साँझे मोर्चे के नाम पर साम्राज्यवाद के वफादार बड़े पूँजीपति वर्ग से साँझा मोर्चा बनाने और यहां तक कि उसकी नेतृत्व वाली भूमिका स्वीकार करने को सही ठहराने का कारण बन गईं।
                जेल जीवन का दौर विचारधारात्मक विकास का ऐसा पड़ाव था जब षहीद भगत सिंह लोगों की सामाजिक मुक्ति के ठोस क्रांतिकारी प्रोग्राम के प्रष्न को संबोधित हो रहा था। ऐसे ठोस प्रोग्राम के बिना उसे ‘‘राष्ट्रीय जज़्बातों को अपील करना फ़िजूल बात‘‘ प्रतीत होती थी। उसका विचार था कि देष में ‘‘राष्ट्रीय क्रांति ‘‘ द्वारा ‘‘अमरीका जैसे भारतीय गणतंत्र‘‘ की कोषिष अवास्तविक है। उसका विचार था कि पूँजीवाद मज़दूरों-किसानों जिन पर ‘‘राष्ट्रीय क्रांति निर्भर करती है‘, से डरता है। इसलिए ‘‘साम्राज्यवाद‘‘ को ‘‘राष्ट्रीय क्रांति ‘‘ द्वारा नहीं बल्कि ‘‘मज़दूर क्रांति ‘‘ द्वारा ही गद्दी से उतारा जा सकता है।‘‘कोई अन्य वस्तु इस उद्देष्य की पूर्ति नहीं कर सकती‘‘‘‘हमें याद रखना चाहिए कि मज़दूर क्रांति के बिना न किसी अन्य क्रांति की इच्छा रखनी चाहिए और न ही यह सफल हो पाएगी‘‘। जनता को ‘‘समझाना पड़ेगा कि क्रांति उनके हित में है तथा उनकी अपनी है। मज़दूर प्रोलेतारी की क्रांति प्रोलेतारी के लिए‘‘। इस रौषनी में षहीद भगत सिंह साम्राज्यवाद एवम् जागीरदारी के अंत के लिए समाजवादी आथर््िाक कदमों को अपने प्रोग्राम का आधार बनाता है। परन्तु ऐसे प्रोग्राम के प्रसंग में देष में साम्राज्यवाद विरोधी पूँजीवाद के अस्तित्व को नोट करने का महत्व धुँधला पड़ जाता है।
                उपरोक्त चर्चा एवम् माक्र्सवादी सामग्री को तेज़ी से ग्रहण करने की षहीद भगत सिंह की क्षमता के प्रसंग में पिछड़े देषों में क्रांति से संबंधित लैनिन एवम् कम्युनिस्ट इंटरनैष्नल की सैद्धांतिक सामग्री षहीद भगत सिंह तक न पहुँच पाना एक बहुत ही महत्वपूर्ण घाटे वाला ‘‘संयोग‘‘ बन जाता है। यदि ऐसा हो जाता तो षहीद भगत सिंह की क्षमता का इस्तेमाल ऐसी क्रांति का माथा तलाषने एवम् तराषने की समस्या से लगना था जो समाजवाद की तत्काल स्थापना का साधन न होने के बावजूद भी पूँजीवाद की स्थापना का साधन न बने बल्कि अगले पड़ाव पर होने वाले समाजवादी इन्कलाब का अंग बन सके। इस नुक्ते पर छानबीन करके और इसे ग्रहण कर लेने की स्थिति में इन्कलाब के लिए वर्गीय कतारबंदी के सवाल को संबोधित होने के लिए, पहले जिक्र अधीन आए कुछ पक्षांे से षहीद भगत सिंह काफी बेहतर स्थिति में दिखाई देता है। पूँजीवादी क्रांति के विकल्प के रूप में, समाजवाद से पहले की जाने वाली क्रांति के संकल्प से जुड़कर पूँजीवाद के विभिन्न हिस्सों में अंतर करने की तरफ अग्रसर उसकी पहुँच नया महत्व ग्रहण करने की संभावना रखती थी। ‘‘लोगों द्वारा लोगों के लिए राजसत्ता पर कब्ज़ा‘‘- क्रांति का यह संकल्प पेष करते हुए भगत सिंह द्वारा दिए गए षब्दों ‘‘लोग‘‘ एवम् ‘‘राष्ट्र‘‘की परिभाशा महत्वपूर्ण है। उसके लिए ‘‘लोग‘‘ एवम् ‘‘राष्ट्र‘‘ के अर्थ मात्र मज़दूर वर्ग तक सीमित नहीं हंै। दूसरी तरफ वह चेतावनी देता है कि ‘‘राष्ट्र कांग्रेस के लाऊड स्पीकर नहीं हैं‘‘। वह ‘‘लोगों‘‘ में 95 फीसदी जनता को शामिल करता है। षहीद भगत सिंह के सामने बुर्जुआ राष्ट्रीय क्रांति के विकल्प के रूप में रूस की अक्तूबर क्रांति का माॅडल था। पिछड़े देषों की क्रांतियों की विषेषता से संबंधित लैनिनवादी सैद्धांतिक सामग्री हासिल होने की स्थिति में लोगों द्वारा राजसत्ता पर कब्ज़े का उसका संकल्प, भारत की ठोस परिस्थितियों के अनुसार निखर कर पूरी स्पष्टता से प्रकट होने की संभावना रखता था। मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में सभी क्रांतिकारी वर्गों के सांझे जनवादी अधिनायकत्व के संकल्प के तौर पर पेष होने की संभावना रखता था। ऐसा संकल्प जनवादी क्रांति की तात्कालिक आवष्यक्ताओं के आधार पर सम्पूर्ण पूँजीवाद से सांझे मोर्चे की सी.पी.आई. की कार्यदिशा का साकारात्मक विकल्प बन सकता था। परन्तु इतिहास को षहीद भगत सिंह की उभर रही कम्युनिस्ट क्रांतिकारी प्रतिभा की ऐसी संभावित झलकें देखने, आँंकने औैैर परखने का अवसर प्राप्त नहीं हो सका।
                यह बात भी दिलचस्प है कि कम्युनिस्ट बन रहे पिछड़े देषों के मध्यवर्गीय राष्ट्रवादियों को, जो सोवियत यूनियन में माक्र्सवाद की षिक्षा हासिल कर रहे थे, को दो नुक्तों पर कायल करनेे पर लैनिन का विषेष ज़ोर लगता रहा था। लैनिन का पहला नुक्ता क्रांतिकारी आतंकवाद की निरर्थकता के बारे में था और दूसरा पिछड़े देषों की जनता पर तत्काल ‘‘कम्युनिज़्म आरोपित करने‘‘ की कोषिषों की निरर्थकता के बारे में था (स्त्रोत-सोवियत यूनियन में भारतीय क्रांतिकारी )। अपनी बौैद्धिक क्षमता के ज़ोर पर षहीद भगत सिंह ने उपलब्ध माक्र्सवादी साहित्य को आधार बना कर पहले नुक्ते पर स्पष्टता हासिल की। दूसरे अहम नुक्ते से संबंधित ज़रूरी अध्ययन सामग्री षहीद भगत सिंह को हासिल न हुई।‘‘95 प्रतिषत‘‘ लोगों के राज का उसकी परिकल्पना, साम्राज्यवाद से मुक्ति को सामाजिक मुक्ति के प्रोग्राम पर आधारित करने की उसकी पहुँचपूँजीवाद के एक हिस्से की साम्राज्यवाद से वफादारी के बारे में उसकी स्पष्टता, इसके विरोधी हितों वाले पूँजीवाद के अस्तित्व पर उसका ध्यान, क्रांति की स्वतंत्र नेतृत्व षक्ति के तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण का उसका संकल्प-उसकी विचारधारात्मक सूझ के यह अहम अंष मात्र एक आगामी विचारधारक संकेत माँगते हुए प्रतीत होते हैं। लैनिन का यह सुझावपूर्ण संकेत कि पिछड़े देषों का समाजवाद की तरफ कूच, इन देषों के जनवादी क्रांतियों के विषेष मार्गों को समझने व तराषने पर निर्भर करता है। उन समयों में जब भगत सिंह अभी मात्र 23 वर्ष  का नौजवान था, और भारत अपना ‘‘माओ त्से तुङ’’ तलाष रहा था, उपलब्ध हुआ यह संकेत भगत सिंह को ‘‘कुछ और ही बना देने’’ की संभावना रखता था। षहादत से महज़ कुछ क्षण पूर्व षहीद भगत सिंह लैनिन की किताब पढ़ रहा था। उसके अपने षब्दों में वह लैनिन से ‘‘मुलाकात‘‘ कर रहा था। काष! यह ‘‘मुलाकात‘‘ औैर लंबी हो सकती! और यदि यह सचमुच हो सकती.......यह खयाल षहीद भगत सिंह को गंभीरता से पढ़ने वालों के मनों में हमेशा दिलों की धड़कनें बढ़ाने वाली उत्सुक्ता जगाता रहेगा।

                परन्तु आज षहीद भगत सिंह के वारिसों के लिए अधिक महत्वपूर्ण पाष की यह टिप्पणी है कि उन्होंने माक्र्सवाद-लैनिनवाद को उस से आगे पढ़ना है, जहाँ फाँसी के तख़्ते पर जाते हुए भगत सिंह लैनिन की किताब का पन्ना मोड़ कर छोड़ गया था।