गैर-कानूनी
सरगर्मियां रोकने संबंधी काले
कानून में संशोधन
दमनकारी शक्ति
और उग्र
-नरेन्द्र कुमार जीत
-आर्थिक-संघर्ष भी दहशतगर्द कार्यवाइयों के घेरे में
-परिवार, कम्पनियां, सभाएं,
सोसायटियां, ट्रस्ट, संगठन, आदि को भी गैर-कानूनी घोषित करने
का रास्ता और आसान
-किसी संगठन को गैर-कानूनी घोषित
करके, पाबन्दी की समय सीमा दो साल की बजाय
अब पांच साल होगी।
-जायदाद जब्त करने
के पुलिस तथा अदालतीय अधिकारों में वृद्धि
-साम्राज्यवादियों के साथ संधियों
की रक्षा के लिए सख्त धाराएं
मनमोहन सिंह
सरकार ने 29 दिसम्बर
2011 को लोक सभा में ‘गैर-कानूनी सरगर्मियां रोकने
संबंधी कानून-1967’ में संशोधन करके, इसे और अधिक हमलावर
बनाने, सरकार की साम्राज्यवादीय तथा जन-दुश्मन
नीतियों के विरुद्ध देशभर
में उठ रहे जन-संघर्षों के खिलाफ इसकी धार और तेज करने
तथा लोगों के अधिक से अधिक
हिस्सों को इसके लपेटे
में लाने के लिए बिल पेश किया है। 13 जनवरी
2012 को यह बिल गृह-मंत्रालय की स्थाई
कमेटी (सटेंडिंग कमेटी)
को विचार करने
हेतु भेजा गया।
बाद में कांग्रेस
के नेतृत्व अधीन
शासक सांझे गठजोड़
की तालमेल कमेटी
में सोनिया गांधी,
मनमोहन सिंह, शरद पवार
तथा ममता बैनर्जी
की उपस्थिति में 23 अगसत 2012 को संशोधनों वाले
बिल को स्वीकृति
दे दी गई।
29
नवम्बर को लोकसभा ने संक्षेप सी बहस के बाद ये बिल पास कर दिया। अन्ना डी.ऐम.के. के प्रबोध पांडा तथा पी.पी.ऐम. के सैदुल हक ने, इस बिल पर खुलकर विचार-चर्चा करने के लिए बहस आगे डालने की मांग
की, जो सरकार
ने ठुकरा दी। सिर्फ ऐम.आई.ऐम. के सांसद
असादुदीन उबासी ने इस बिल को टाडा (TADA) तथा (POTA) से अधिक खतरनाक बताते हुए इसका विरोध किया।
इन संशोधनों द्वारा, ‘‘दहशतगर्द कार्यवाई’’ की परिभाषा बदलकर, देश की ‘‘आर्थिक सुरक्षा’’ को प्रभावित करने का बहाना बनाकर, सरकार की निजीकरण, उदारीकरण, तथा विश्वीकरण की जन-दुश्मन नीतियों के विरुद्ध उठ रहे अथवा उठने वाले संघर्षो को भी ‘तहशतगर्द कार्यवाई’ के घेरे में ले लिया है। ‘व्यक्ति’ की परिभाषा बदलकर परिवार, कम्पनियों, सभा-सोसायटियों ट्रस्टों, गैर-पंजीकृत ग्रुपों, संगठनों आदि को भी ‘‘गैर-कानूनी’’ घोषित करने का रास्ता साफ कर लिया है। किसी संगठन को ‘गैर कानूनी’ कह कर उस पर पाबन्दी की समय सीमा 2 साल से बढ़ाकर 5 साल कर दी है। गैर-कानूनी तथा दहशतगर्द कार्यवाइयों के दोषों के अन्तर्गत पुलिस केसों में फँसाए लोगों की जाएदादें जब्त करने के लिए पुलिस तथा अदालतों को और अधिक अधिकार दे दिए हैं। अमरीकी शासकों के नेतृत्व में साम्राज्यवादियों द्वारा शुरू की गई ‘दहशतगर्दी विरुद्ध जंग’ (War Against
Terror) जो वास्तव में पछड़े तथा कम विकसित देशों के प्राकृतिक माल-खजाने हथियाने के लिए जंग है, का बाकायदा हिस्सा बनने के लिए कानूनी प्रावधान तैयार कर दिया गया है।
साम्राज्यवाद पक्षीय नीतियों विरुद्ध उठ रहे जन-संघर्षों का गला दबाने की तैयारी
मौजूदा ‘गैर कानूनी सरगर्मियां रोकने संबंधी कानून’ की धारा-15 अनुसार किसी व्यक्ति या संगठन द्वारा बम्ब-बन्दूकें, विस्फोटक पदार्थ या किसी और ढंग से किसी व्यक्ति अथवा व्याक्तियों को मारने या जख्मी करने, जायदाद की तोड़-फोड़ करके नुक्सान पहुंचाने, भारत या किसी भी विदेशी देश में जरूरी सेवाएं या वस्तुओं की सप्लाई में
बाधा डालने, भारत या विदेश में किसी ऐसी जायदाद को तबाह करने या नुक्सान पहुंचाने, जो भारत सरकार, किसी राज्य सरकार या उनकी एजेंसियों की तरफ से भारत की सुरक्षा या किसी अन्य मक्सद के लिए उपयोग में लाई जा रही हो, या लाई जाने वाली हो, किसी जनतक अधिकारी को ताकत के बल पर धमकाने या मारने या ऐसा करने के लिए कोशिश करने, भारत सरकार, किसी राज्य सरकार या किसी विदेशी सरकार या किसी और व्यक्ति को कोई कार्यवाई करने या न करने के लिए मजबूर करने के लिए किसी व्यक्ति को अगवा करने, बंधक बनाने, जान से मारने या जख्मी करने की धमकी देने आदि में से कोई भी कार्यवाई, भारत की एकता, अखण्डता, सुरक्षा या स्वाधीनता के लिए खतरा खड़ा करने या ऐसी इच्छा के साथ की गई कार्यवाई ‘दहशतगर्द कार्यवाई’ समझी जाएगी तथा दोषी व्यक्ति उम्र कैद तक की सजा, भारी जुर्माने तथा जायदाद जब्त किये जाने की सजा का भागीदार होगा।
अत्यंत लचकीली परिभाषा- कोई भी लपेट में
मौजूदा कानून की पहली धारा में ही यह बात दर्ज है कि कोई भी व्यक्ति जो भारत में अथवा इसकी सीमाओं से बाहर, इस कानून का उलंघन करता है या इसका पालन नहीं करता, उसे इस कानून अनुसार सजा दी जा सकती है। विदेशों में रहने वाले भारतीय, दुनिया भर में कहीं भी तायनात सरकारी कर्मचारी, भारत में रजिस्टर हुए हवाई तथा समुंद्री जहाजों पर काम करते कर्मचारी अथवा सफर करते लोग भी इसके दायरे में आते हैं। नए संशोधन के माध्यम से इसकी चोट का दायरा ‘व्यक्तिगत’ की परिभाषा बदलकर और विशाल किया जा रहा है। ये संशोधन इस कानून की धारा नं. 2 में किया जा रहा है, जिसके अनुसार कोई भी परिवार, कम्पनी, फर्म, लोगों का संगठन अथवा समूह चाहे वो किसी सरकारी कानून के अनुसार रजिस्टर हो या न हो तथा इनके नियंत्रण अधीन काम करती एजेन्सियां, शाखाएं अथवा दफतर भी इसकी लपेट में लाए गए हैं। लोगों के किसी भी समूह, ग्रुप या एकत्रता के, चाहे उसका कोई भी बाकायदा संगठनात्मक ढांचा हो या न हो, इस कानून के लपेटे में आने से, इसका हमलावर चरित्र और तीखा हो गया है। मान लीजिए किसी शहर या गांव में कोई दो-चार व्यक्ति मिलकर शहीद भगत सिंह अथवा $गदर लहर के शहीदों की विचारधारा का अध्यन अथवा प्रचार करने के लिए, ‘शहीद भगत सिंह विचार मंच’ या ‘गदर लहर विचार मंच’ बना लेते हैं या अवतार पाश, लाल सिंह दिल, संत राम उदासी, जगमोहन जोशी आदि कवियों की कविताएं पढऩे या उन पर विचार-चर्चा करने के लिए महीने में एक आध बार गांव की चौपाल, धर्मशाला या किसी ढ़ाबे पर एकत्रित हो जाते हैं अथवा देश की दशा पर विचार विमर्श करने के लिए कहीं पर मिल बैठते हैं, अथवा फेस बुक पर कोई ग्रुप बना लेते हैं, तो वो भी गैर-कानूनी सरगर्मियों के दोषी घोशित किए जा सकते हैं, इन कार्यों के लिए यदि परिवार के एक-दो सदस्य भी मिलकर बैठते हैं तो पुलिस उनकी सरगर्मियों को भी ‘‘गैर-कानूनी’’ घोषित कर सकती है तथा उन पर पाबन्दी ठोस सकती है। यदि कोई सभा, सोसायटी, ट्रस्ट अथवा ग्रुप लोक-पक्षीय विचारधारा को समर्पित हैं, संघर्षों के दौरान लोगों के कन्धे से कन्धा मिलाकर चलता है, जन-हितकारी विचार, सांस्कृति तथा व्यवहार का प्रचार-प्रसार करता है, उन्हें भी सरकार जब चाहे दबोच सकती है। कुछ माह पूर्व सरकार ने कबीर कला मंच के कुछ कलाकारों- जो दलितों में क्रांतिकारी चेतना का संचार करता है, पर सरकार ने गैर-कानूनी सरगर्मियां रोकने के कानून अधीन मुकद्दमा दर्ज कर लिया, जबकि कुछ समय पूर्व इन कलाकारों द्वारा बनाई फिल्म ‘‘जै भीम कामरेड’’ को इनाम दिया गया था। संशोधित कानून मुताबिक सरकार कबीर कला मंच पर भी पाबन्दी लगा सकती है।
पाबन्दी की समय-सीमा दो साल से बढ़ाकर पांच साल
इस कानून की धारा 6 में संशोधन करके, सरकार किसी भी संगठन पर ‘‘गैर-कानूनी’’ होने का ठप्पा लगाकर पाबन्दी लगाने की समय-सीमा 2 साल से बढ़ाकर 5 साल कर रही है। हमारे देश के शासक राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मंचों से गला फाड़-फाड़ कर भारतीय संविधान में दर्ज बुनियादी अधिकारों- जिनमें से एक, संगठित होने का अधिकार है, का गुणगान गाते हुए नहीं थकते, ‘गैर-कानूनी’ सरगर्मियां रोकने वाला कानून इस अधिकार का गला दबाता है। साल 1967 में जब ये कानून संसद में पेश किया गया था तो पाबन्दी की समय-सीमा तीन साल थी। परन्तु सांझी संसदीय कमेटी ने ये समय-सीमा घटाकर 2 साल कर दी थी। समाजवादी पार्टी का नेता जार्ज फर्नान्डेस तो पाबन्दी की समय-सीमा केवल एक वर्ष तक सीमित करने के पक्ष में था, परन्तु नव-उदारवादी नीतियां लोगों पर जबरदस्ती ठोसने के लिए सरकार पाबन्दी की समय-सीमा में अढ़ाई गुना वृद्धि कर रही है।
इस कदम के पीछे सरकार बिल्कुल ही बेतुकी तथा हस्यास्पद दलील लेकर आई है कि इससे पाबन्दी लागू करने पर होने वाला खर्चा कम हो जाएगा। यदि खर्चे की सचमुच इतनी ही चिन्ता है तो पाबन्दी लगाई ही क्यों जाती है? सरकार ने ये दलील भी दी है कि पाबन्दी की समय-सीमा बढ़ाने से, संबंधित संगठन संबंधी सही खुफिया जानकारी एकत्रित करने, अदालत में उसके सदस्यों के विरुद्ध दायर किए गए भिन्न-भिन्न मुकद्दमों तथा पुलिस द्वारा इन मुकद्दमों के बारे में सरकार से मंजूरी लेने के लिए दी गईं दरखास्तों की स्थिति जानने में आसानी होगी। वास्तव में होता ये है कि पुलिस किसी भी संगठन पर पाबन्दी पहले लगा देती है तथा उसकी सरगर्मियों संबंधी राज्य सरकारों से हलफनामे तथा खुफिया रिर्पोटें बाद में एकत्रित करती है। इसका मकसद पाबन्दी को जायज ठहराने के लिए सबूत पैदा करना होता है। सिमी (SIMI) के मामले में भी ऐसा ही हुआ था।
विदेशी साम्राज्यवादी आर्थिक हितों तथा संधियों की रक्षा का हथियार
अमरीकी सरकार के नेतृत्व में सास्राज्यवादियों द्वारा शुरू की गई ‘दहशतगर्दी विरुद्ध जंग’ (War against
Terror) जो वास्तव में पछड़े तथा कम विकसित देशों के प्राकृतिक माल-खजाने हड़पने की जंग है, का बाकायदा हिस्सा तथा भागीदार बनने के लिए भारतीय शासकों ने ‘गैर-कानूनी सरगर्मियां रोकने के कानून’ की धारा 15 में संशोधन करके साम्राज्यवादी देशों द्वारा स्वीकृत कुछ संधियों तथा कनवैन्शनों- जो उन्होंने अपने व्यापार, शहरी हवाबाजी, जहाजरानी, तथा राजदूतों की रक्षा के लिए तैयार की हुई हैं- के अधीन दर्ज जुर्मों को, इस कानून अधीन ‘दहशतगर्द कार्यवाई’ करार दिया है तथा दण्ड-योग्य बनाया है। फिलहाल इस सूची में नौ संधियां दर्ज की गई हैं, परन्तु सरकार इस सूची में और संधियां, नोटीफिकेशन जारी करके जोड़ सकती है। ‘आर्थिक सुरक्षा’ के नाम पर विदेशी पूंजी तथा कारोबार की रक्षा संबंधी अंतर्राष्ट्रीय संधियां किसी भी समय इसमें शामिल की जा सकती हैं।
‘गैर-कानूनी’ तथा ‘दहशतगर्द’ घोषित किए गए संगठनों के सदस्यों के लिए आर्थिक सहायता की पूर्णत: मनाही
इस कानून की धारा-17 में संशोधन करके ‘गैर-कानूनी’ तथा ‘दहशतगर्द’ घोषित किए गए संगठनों के सदस्यों के लिए किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता जायज ोतों से हो या नाजायज से, ऐसा अपराध बना दिया गदा है, जिसके लिए कम से कम पांच साल से लेकर उम्र कैद तथा जुर्माने की सजा दी जा सकती है। किसी एक-अकेले ‘दहशतगर्द’, ‘दहशतगर्द गिरोह’ अथवा ‘दहशतगर्द संगठन’ के फायदे के लिए किसी भी तरीके से मदद इकट्ठी करनी अथवा देनी जुर्म है। इस परिभाषा से साफ झलकता है कि किसी ‘दहशतगर्द’ करार दिए गए व्यक्ति को डाक्टरी सहायता अथवा कानूनी सहायता देना भी इस कानून अधीन अपराध बना दिया गया है।
जायदाद जब्त करने के विस्तृत अधिकार
सभी कानूनों में अकसर ये स्वीकृत स्थिति है कि मुजरिम की मृत्यु होने के बाद उसके विरुद्ध आरंभ की गई फौजदारी कार्यवाई स्वयमेव ही समाप्त हो जाती है। ये माना जाता है कि जुर्म का संबंध मुजरिम के साथ है, उसके वारिसों या जमीन जायदाद को इस कारण सजा नहीं दी जा सकती। परन्तु गैर-कानूनी सरगर्मियां रोकने वाले, कानून की धारा 33 में संशोधन करके अदालत को ये अधिकार दिया गया है कि मुजरिम के मरने के बाद भी उसकी जमीन-जायदाद जब्त की जा सकती है।
एक तरफ जब सम्पूर्ण भारत में लोकतांत्रिक अधिकारों के संगठन इस कानून को जड़ से रद्द करवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो उस समय केन्द्र सरकार तथा संसद द्वारा इसे और अधिक हमलावर बनाने के लिए कदम उठाने बेहद निन्दनीय हैं एवम् शासकों के अत्याचारी निरंकुष तथा गैर-लोकतांत्रिक चरित्र की पोल खोलता है। अब तक इस कानून का शिकार होने वालों में, मुख्य रूप में वे लोग ही शामिल हैं जो जन-हितों के हितैशी है, जैसे डा. बिनायक सेन, सीमा आजाद, विश्व विजय, जतिन मरांडी आदि। पंजाब में भी इसका प्रयोग किसान तथा खेत मजदूर संगठनों के नेताओं तथा जन-हितैशी राजनीतिक कारकुनों पर ही किया गया है। इसलिए सभी संघर्षशील तथा लोकतांत्रिक जनता को सरकार के इस दमनकारी कदम का डटकर विरोध करने के लिए आगे आना चाहिए।
‘‘आर्थिक-सुरक्षा’’ का सवाल- पक्षपाती वर्गीय दृष्टिकोण
संशोधित कानून अनुसार, ‘भारत की एकता, अखण्डता, सुरक्षा या स्वाधीनता के साथ ‘आर्थिक सुरक्षा’ भी जोड़ दिया गया है। भारतीय शासकों की नजरों में देश की आर्थिक सुरक्षा का अर्थ यहां के बहुगिनती गरीब तथा मध्य-वर्ग, किसानों, खेत-मजदूरों, उद्योगिक मजदूरों, छोटे दुकानदारों, दलितों, आदिवासियों, मछुआरों आदि के आर्थिक हितों की नहीं बल्कि देसी-विदेशी बड़ी कम्पनियों के हितों की सुरक्षा है। यदि बेलगाम मुनाफाखोरी, सट्टेबाजी, कालाबाजारी या जमाखोरी से जरूरी वस्तूएं, खाध-खुराक, सब्किायां, चीनी, कपड़ा, कीट-नाशक, दवाइयां, बीज आदि की कीमतें बढ़ती हैं, प्लाटों, सीमेंट, सरिए, रेत-बजरी आदि के भाव आसमान छूते हैं तथा गरीब आदमी के लिए घर छोडऩा दुभर हो जाता है, एक तरफ सरकारी गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है, दूसरी तरफ करोड़ों लोग भूखे मरते हैं, लाखों लोग बिमारियों के कारण इलाज के बिना मरते हैं, किसानों को उनकी खून-पसीने की मेहनत से पैदा की गई फसलों के जायज दाम नहीं मिलते, उद्योगिक मजदूरों को उनके श्रम का जायज पारिश्रमिक नहीं मिलता। ठेकेदारी प्रणाली द्वारा उनका खून चूसा जाता है। लाखों इंजीनियर, डाक्टर, अध्यापक तथा उच्च विद्या प्राप्त नौजवान बेरोजगारी अथवा अर्ध-बेरुजगारी की हालत में निम्न वेतनों पर निर्वाह करने पर मजबूर हैं। देश के माल-खजानें, जल, जंगल, तथा जमीन आदि देसी-विदेशी बड़ी कम्पनियों को कौडिय़ों के भाव लुटाए जाते हैं, देश की श्रम-शक्ति, राष्ट्रीय खजाना तथा प्राकृतिक-खजाना अपने देश के लोगों की जरूरतें पूरी करने के लिए तथा बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों को बेलगान मुनाफे देने के लिए लुटाए जाते हैं तो हमारे देश-द्रोही शासकों को देश की ‘आर्थिक सुरक्षा’ के लिए कोई खतरा महसूस नहीं होता। परन्तु यदि लोग, यहां के प्राकृतिक माल-खजाने, नदियां, जंगल तथा उपजाऊ जमीनों, देसी-विदेशी कम्पनियों के हवाले करके लाखों परिवारों को उजाडऩे के विरोध में, उद्योगिक मजदूर श्रम का जायज पारिश्रमिक लेने तथा रोजगार की सुरक्षा के लिए, बेरोजगार नौजवान रोजगार प्राप्ति के लिए, किसान फसलों के जायज दाम, सस्ते बीज, कीटनाशक तथा खादें, सस्ती दरों पर कजा तथा कमीशन एजेन्टों की लूट की समाप्ति के लिए, खेत मजदूर आवासीय प्लाटों, रोजगार की गारंटी, जन-वितरण प्रणाली के माध्यम से सस्ता अनाज तथा अन्य आवश्क वस्तूएं, भूमि सीमाबन्दी लागू करके हर प्रकार की अतिरिक्त मीनें भूमिरहित लोगों में बांटने आदि मांगों को पूरा करवाने के लिए, जाति के आधार पर भेदभाव और दमन को खत्म करने के लिए, उद्योगिक प्रदूषण तथा इससे पैदा होने वाली बिमारियों के इलाज तथा रोकथाम के लिए, जिन्दगी की अन्य आधारभूत जरूरतों जैसे रोटी, कपड़ा और मकान, शिक्षा, स्वास्थय, बिजली, पानी तथा अन्य सामाजिक सेवाओं की प्राप्ति के लिए, हर प्रकार की लूट, अत्याचार तथा दमन से मुक्त, स्वस्थ तथा खुशहाल समाज के निर्माण का सपना साकार करने के लिए संघर्ष करते हैं, संगठित होते हैं, धरने, प्रदर्शन करते हैं, राष्ट्रीय राजमार्ग तथा रेल-मार्ग जाम करते हैं, पुलिस अत्याचार के विरुद्ध सीना तानकर खड़े होते हैं तो शासक ‘आर्थिक सुरक्षा’ को खतरे का शोर मचाते हैं। ‘गैर कानूनी सरगर्मियां रोकने संबंधी’ कानून सें मौजूद संशोधन, इन संघर्षों का गला घोंटने के लिए किए जा रहे हैं। ये डंडे के जोर पर साम्राज्यवादी पक्षीय आर्थिक नीतियां, बेदर्दी से लागू करने की ओर बढ़ाए जा रहे शर्मनाक कदम हैं।
(26 जनवरी 2013, विषेश सप्लीमैंट में से)