पंजाब के मेहनतकशों की ललकार, बंद करो ऑपरेशन कागार
पंजाब के
जनवादी-जम्हूरी आंदोलन ने एक बार फिर अपने क्रांतिकारी जम्हूरी किरदार के अनुरूप
उत्तरदायित्व निभाते हुए अपना फ़र्ज़ अदा किया है। इस देश में सबसे ज़्यादा
उत्पीड़ित और भेदभाव का शिकार आदिवासी लोगों पर ढाए जा रहे हकूमति प्रकोप के
ख़िलाफ़ मोगा की धरती से एक जोरदार आवाज़ बुलंद की गई है। आदिवासी लोगों और उनके
पक्ष में खड़ी और उनके लिए लड़ने वाली हर ताक़त पर मोदी सरकार द्वारा किये जाने
वाले दमनकारी ख़ूनी हमलों को बंद किये जाने की चेतावनी दी गई है। बुद्धिजीवियों, जम्हूरी अधिकार कार्यकर्ताओं,
माओवादी क्रांतिकारियों
और आदिवासी अधिकारों के लिए डटी हर ताक़त पर हमले को रोकने के लिए आवाज़ उठाई गई।
आदिवासी किसानों के नरसंहार के लिए वास्तव में जिम्मेवार, वैश्विक कॉर्पोरेट घरानों का संबंध, पंजाब के किसानों की
ज़मीनों पर हो रहे हमलों, रोज़गार और पर्यावरण के विनाश से जोड़ कर उजागर
किया गया। इस सभा में दिए गए भाषणों के सरोकार आदिवासी क्षेत्रों से लेकर कश्मीर
के लोगों के हो रहे उत्पीड़न, पंजाब की उपजाऊ ज़मीनों पर किये जा रहे हमलों
और देश में जम्हूरी आवाज़ों की जुबान-बंदी तक विस्तृत थे। यह स्पष्ट किया गया कि
कैसे इन अत्याचारों और जम्हूरी अधिकारों पर हमलों के साझा सूत्र का सबंध तथाकथित
आर्थिक सुधारों के साम्राज्यवादी हमले से जुड़ता है। गाज़ा में हो रहे अमानवीय अत्याचारों
के ख़िलाफ़ और संघर्षरत फ़िलिस्तीनी जनता के हक में भी आवाज़ उठाई गई। पंजाब के
हज़ारों संघर्षशील लोगों का यह जमावड़ा दूर-दराज़ के इलाकों में रहने वाले आदिवासी
लोगों के आंदोलन के साथ एकजुटता का एक औपचारिक नारा मात्र नहीं था, बल्कि यह दोनों के साझा दुश्मनों - वैश्विक साम्राज्यवादी कंपनियों, उनकी सेवक भारतीय हकूमतें और दलाल पूँजीपति वर्गों के ख़िलाफ़ एक
राष्ट्रव्यापी संयुक्त संघर्ष का आह्वान भी था। साम्राज्यवादी पूँजी के हितों की खातिर देश के किसी भी कोने में किये जा रहे
उत्पीड़न का ऐसा विरोध, इस चौतरफा हमले के ख़िलाफ़ मेहनतकश जनता के
राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा।

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