स्पोर्टकिंग फैक्टरी जीदा के कामगारों का विजयी संघर्ष
हमारे देश के औद्योगिक
कामगार, श्रमिकों में सबसे अधिक शोषित वर्ग है। चरम अमानवीय, कठोर और खतरनाक कामकाजी हालात, बहुत कम मजदूरी, पूरी तरह असुरक्षित रोज़गार, ठेकेदारों और फैक्टरी मालिकों द्वारा व्यापक पैमाने पर किया जाता तिरस्कार और अत्यंत उत्पीड़न जैसी परिस्थितियों उनके काम को परिभाषित करती सामान्य बातें हैं। इन अमानवीय कामकाजी हालातों को बदलने के लिए विशेष रूप से, और ऐसे दमन और लूट को संरक्षित करने वाली व्यवस्था को बदलने के लिए आम रूप में ही जन संघर्ष की अग्रिम पंक्तियों में आना इन कामगारों की अनिवार्य जरूरत है।
लेकिन हकीकत यह है
कि लोगों के संघर्षों की अग्रिम टुकड़ी बनने के मामले में ही नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के लिए संगठित होने के मामले में भी अभी औद्योगिक मजदूरों की लहर बहुत पीछे खड़ी है। विभिन्न अवसरों पर देश के विभिन्न केंद्रों में औद्योगिक मजदूरों के बड़े-छोटे संघर्ष लगातार फूटते रहे हैं और फूट रहे हैं, लेकिन एकजुट, जुझारू, क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन में बदलने के मामले में अभी भी बड़ी चुनौती सामने है। सरकार द्वारा श्रम कोडों के कार्यान्वयन के बड़े प्रहार और लगातार मजदूर विरोधी फैसलों ने इस आंदोलन की आवश्यकता और भी तीव्र कर दी है। इन नए फैसलों और पहले से लागू मजदूर विरोधी नीतियों के कुल बोझ ने औद्योगिक मजदूरों के अंदर पनप रही बेचैनी को कई गुना बड़ा दिया है और अब यह बेचैनी जगह-जगह फूट रही है।
इस ऊर्जा
की तरंगें पंजाब में भी पहुँची हैं। बठिंडा जिले में जीदा की सपोर्टकिंग फैक्ट्री के मजदूरों का संघर्ष इसकी एक मिसाल बना है। यह फैक्ट्री लुधियाना के ओसवाल ग्रुप द्वारा चलाई जा रही है। इसमें पाँच हज़ार से अधिक मजदूर काम करते हैं। इनमें से अधिकतर मजदूर आसपास के गाँवों से हैं, लेकिन एक गिनने योग्य हिस्सा प्रवासी मजदूरों का भी है। स्थानीय मजदूर मुख्य रूप से खेत मजदूर परिवारों से हैं, इनमें से भी आगे बड़ी संख्या महिला कामगारों की है।
फैक्ट्री के अंदर काम की स्थितियों के मामले में हालात बेहद खराब हैं और पारिश्रमिक बहुत कम है। लेकिन गंभीर हुए कृषि संकट और गैर-योजनाबद्ध कृषि मशीनीकरण के खेत मजदूरों के रोजगार पर पड़े प्रभाव, मनरेगा स्कीम की दयनीय स्थिति और माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के कर्ज़ के खेत मजदूर परिवारों पर फैले पंजों, जैसे कई कारणों से बड़े पैमाने पर खेत मजदूर परिवार इस नगण्य लेकिन निश्चित आय का सहारा देखते हैं और ऐसी फैक्ट्रियों में काम पाने के लिए जोर लगाते हैं और ऐसी काम की स्थितियों में भी काम करते हैं। इस फैक्ट्री के इलाके में अन्य संगठित जन हिस्सों की मौजूदगी है और इस पहलू से औद्योगिक मजदूरों का समर्थक धड़ा बन खड़े होने के मामले में हालात अनुकूल हैं। लेकिन फिर भी लंबे समय से यहाँ औद्योगिक मजदूरों की गैर-संगठितता और गैर-सक्रियता की आम स्थिति के चलते इस फैक्ट्री के अंदर काम की खराब स्थितियों और उत्पीड़न के खिलाफ जोरदार संघर्ष की कोई आवाज़ नहीं उठी।
इलाके में सक्रिय नौजवान भारत सभा (अश्वनी घुद्दा) द्वारा पिछले समय में इस संबंध
में कोशिशें भी की गई थीं और फैक्ट्री मजदूरों से मिलकर उनकी काम की स्थितियों से संबंधित काफी जानकारी एकत्रित की गई थी। इस जानकारी में जो तस्वीर सामने आई थी, उससे फैक्ट्री मजदूरों की लूट और उत्पीड़न की स्थितियाँ उभरती थीं। इस फैक्ट्री के अंदर काम की स्थितियाँ विशेष रूप से कठोर हैं। इस फैक्ट्री में धागा बनाया जाता है। रूई से धागा बनाने के अनेक चरण हैं और हर चरण में मजदूरों को रूई और रेशे की हवा में घुली धूल के अंदर साँस लेनी पड़ती है। यह हवा फेफड़ों के लिए बेहद घातक होती है और इस फैक्ट्री के मजदूर अक्सर ही साँस से संबंधित गंभीर रोगों के शिकार होते रहते हैं। यह धूल सिर्फ साँस के द्वारा ही नहीं, कानों और यहाँ तक कि आँखों के द्वारा भी शरीर में जाती है। धागे की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए फैक्ट्री के अंदर का तापमान लगातार 45 डिग्री सेल्सियस रखा जाता है और मजदूरों को इस भीषण गर्मी में काम करना पड़ता है। मशीनों का शोर बेहद ऊँचा होता है और मजदूरों के बताने के अनुसार बहुत बार यदि कोई ज़रूरत पड़ने पर शोर भी मचाए तो दूसरों को आवाज़ नहीं सुनाई देती। यह शोर कानों पर बेहद खतरनाक प्रभाव डालता है और मजदूरों की सुनने की शक्ति कुछ ही वर्षों में क्षीण हो जाती है।
कानून के अनुसार
स्वास्थ्य के लिए ऐसी खतरनाक काम की परिस्थितियों में
मजदूरी करने वाले कामगारों को न केवल हर प्रकार के प्रभावी सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराना अनिवार्य होता है, उनके मेडिकल चेकअप के लिए विशेष प्रबंध किए जाने अनिवार्य होते हैं, बल्कि ऐसे खतरनाक उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों का पारिश्रमिक भी आम मजदूरों से अधिक होता है। लेकिन इस फैक्ट्री में मजदूरों को 434 रुपए प्रतिदिन दिहाड़ी दी जाती थी जो कि आम दिहाड़ीदारों से भी कम है। मेडिकल सुविधाओं की स्थिति यह है कि विशेष मेडिकल सुविधाएँ तो दूर, अधिकतर मजदूरों के ईएसआई कार्ड भी नहीं बनाए गए थे या बने हुए भी फैक्ट्री अधिकारियों के कब्जे में ही थे। न केवल मजदूरों को ओवरटाइम की उचित आय नहीं दी जाती थी, बल्कि लगवाए गए ओवरटाइम का भी उन्हें कभी हिसाब नहीं दिया जाता था। यहाँ तक कि ओवरटाइम के समय में हेराफेरी करने के लिए मजदूरों को सैलरी स्लिप भी नहीं दी जाती थी। दूसरी ओर आवश्यकता से कम मजदूरों से काम लेने के कारण ओवरटाइम मजदूरों पर जबरदस्ती थोपा जा रहा था और इसके बारे में भी मजदूरों को ठीक मौके पर ही सूचित किया जाता था। पूरी की पूरी शिफ्ट को बिना पहले सूचित किए ओवरटाइम करवाने के लिए रोक लिया जाता था और इसके परिणामस्वरूप सभी को घरों की व्यस्तताओं और आने-जाने की पूर्व-योजनायों में बड़ी गड़बड़ियों और परेशानियों का सामना करना पड़ता था। क्योंकि ये मजदूर गाँवों से फैक्ट्री की बसों पर आते हैं, इसलिए जब कोई शिफ्ट रोक ली जाती है तो ओवरटाइम न करने का मतलब भी फैक्ट्री से अनियमित बसों या अन्य साधनों द्वारा हरान-परेशान होकर गाँवों में पहुँचना बन जाता है। इसलिए ओवरटाइम करना महिलाओं के लिए मजबूरी बना हुआ था। न केवल ओवरटाइम कटवाने के लिए, बल्कि कभी इमरजेंसी की स्थिति में छुट्टी लेने के लिए भी मजदूरों को बेहद भारी परेशानी और झंझट का सामना करना पड़ता था। छुट्टी के लिए एक अधिकारी से दूसरे तक चक्कर लगवाकर ही बस का समय निकाल दिया जाता था। हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों के लिए खाने और रहने के बहुत खराब प्रबंध थे और एक-एक कमरे में आठ-आठ लड़कियों को ठूँसा हुआ था। खाने का मानक इतना खराब था कि वे अक्सर ही गाँवों से आने वाली मजदूर साथियों से अपने लिए खाना मंगवाती थीं। फैक्ट्री में मजदूर महिलाओं को फोन ले जाने की पूर्ण मनाही थी।
मजदूरों के इस
स्तर की लूट के कारण ही फैक्ट्री मालिकों ने पिछले समय में अपने काम का काफी विस्तार किया था। नई ज़मीनें, नए यूनिट और नई मशीनें इस फैक्ट्री में शामिल हुई थीं। लेकिन मजदूरों की कम संख्या से ही इन मशीनों पर काम लिया जा रहा था। एक मजदूर को अकेले ही कई-कई पल्लों पर काम करना पड़ रहा था। फैक्ट्री अधिकारियों और काम की निगरानी के लिए रखे गए सुपरवाइजरों, ठेकेदारों का मजदूरों के प्रति व्यवहार बेहद खराब था। इन स्थितियों के चलते मजदूरों के अंदर लंबे समय से रोष बढ़ता जा रहा था। पिछले समय में अधिकारियों के साथ बहस-मुबाहिसे और टकराव की छिटपुट घटनाएँ भी होती रही थीं। पिछले कुछ समय से छह नंबर खाते के मजदूरों का, अधिक पल्लों पर काम कराने के खिलाफ अधिकारियों के साथ टकराव चल रहा था।
19
तारीख को इस खाते के कामगार ही फैक्ट्री गेट पर इकट्ठा हो गए और बाकी खातों के मजदूर अपने आप ही बसों से उतरकर इनमें शामिल होते गए। इन मजदूरों ने फैक्ट्री गेट पर धरना शुरू कर दिया। इस धरने की खबर सुनते ही इलाके के जन संगठनों के नेता और कार्यकर्ता इन मजदूरों के समर्थन में फैक्ट्री गेट पर पहुँचने शुरू हो गए। प्रबंधन को फैक्ट्री मजदूरों को बातचीत का न्योता देना पड़ा। मौके पर पहुँचे खेत मजदूर यूनियन के सूबा प्रधान जोरा सिंह नसराली और नौजवान भारत सभा के नेता सुखवीर सिंह खेमुआणा भी फैक्ट्री मजदूरों के साथ गए। प्रबंधन ने एक सप्ताह के अंदर माँगें हल करने का लिखित विश्वास दिया। माँगें न माने जाने की सूरत में जन संगठनों के समर्थन से एक सप्ताह बाद 26 तारीख को फिर बड़ी तैयारी के साथ पूर्ण हड़ताल और धरने का कार्यक्रम तय कर लिया गया।
इसके अगले दिनों में हालात की आवश्यकता,
संघर्ष की स्वतःस्फूर्त स्थिति और इस संघर्ष के दौरान उभरकर आए मजदूर नेताओं की नौसिखियों वाली स्थिति को समझते हुए और इस स्थिति में वास्तविक मदद प्रदान करने के लिए आगे आते हुए भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहाँ), लोक मोर्चा पंजाब और नौजवान भारत सभा (अश्वनी घुद्दा) संगठनों द्वारा फैक्ट्री मजदूरों की बड़ी संख्या वाले गाँवों में इस हड़ताल की तैयारी के लिए प्रभावी मुहिम चलाई गई। बने हुए हालातों के अंदर किए जाने वाले कामों, इसमें मौजूद खतरों, यूनियन बनाने की आवश्यकताओं आदि पक्षों को जोरदार तरीके से उभारा गया। प्रवासी मजदूरों और स्थानीय कामगारों के अंदर एक-दूसरे के प्रति बने पूर्वाग्रहों की काट को विशेष रूप से संबोधित हुआ गया। कामगारों में फूट डालने और उभरकर आए नेताओं को चुनिंदा निशाना बनाने से प्रबंधन के हाथ रोकने के लिए तैयारी पर जोर दिया गया। इन संगठनों द्वारा दर्जन भर से अधिक गाँवों में तैयारी की गई। इस तैयारी मुहिम के दौरान भी कामगारों का धरने के प्रति जोरदार उत्साह देखने को मिला और इन संगठनों द्वारा करवाई जा रही बैठकों को बहुत ध्यान से सुना और समझा गया।
ऐसी तैयारी की भनक
प्रबंधन तक भी पहुँची और उसने इस धरने को विफल करने के लिए पूरा जोर लगाया। गाँवों के प्रतिष्ठित लोगों, पंचायत सदस्यों और स्थानीय राजनीतिक नेताओं के जरिये कामगारों को डराने-धमकाने के प्रयास किए गए और उन्हें इन बैठकों का हिस्सा बनने से रोका गया। फैक्ट्री द्वारा गाँवों में करवाए गए नगण्य और प्रचारात्मक विकास कार्यों का हवाला देने या अन्य मजदूरों को फैक्ट्री में नौकरी पर रखवाने का लालच देने से लेकर सीधी धमकियाँ देने तक हर हथियार इस्तेमाल किया गया। एक जगह तो चलती बैठक के दौरान ही एक स्थानीय नेता ने, बैठक का प्रबंध करने की वजह से गाँव के फैक्ट्री कामगार को धमकाने की कोशिश की। लेकिन कामगारों के जोश के आगे ये सभी कोशिशें असफल साबित हुईं। फैक्ट्री के अंदर भी और बाहर गाँवों में भी धरने की जोरदार तैयारियाँ चलती रहीं।
फैक्ट्री की पहली
शिफ्ट सुबह 6 बजे शुरू होती है। 26 तारीख को सुबह लगभग चार बजे के करीब ही भ्रातृ संगठनों के नेता, कार्यकर्ता और कुछ फैक्ट्री कामगार पहुँचने शुरू हो गए। बठिंडा का पुलिस प्रशासन पूरी तरह से प्रबंधन के समर्थन पर था और मजदूरों को इकट्ठा होने से रोकने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिस की तैनाती की गई। लेकिन इसके बावजूद भ्रातृ संगठनों के कार्यकर्ता और फैक्ट्री कामगार इकट्ठा हो गए और धरना शुरू हो गया। इसी जमावड़े में सपोर्टकिंग वर्कर यूनियन जीदा चुनी गई। कड़कती धूप के बावजूद पूरा दिन धरना चलता रहा। भ्रातृ संगठनों द्वारा पीने का पानी, चाय, स्टेज के लिए तम्बू आदि का प्रबंध किया गया। जीदा टोल प्लाजा वर्कर यूनियन भी काफी बड़े जत्थे के साथ इस जमावड़े में शामिल हुई और प्रबंधों के मामले में भी काफी मदद की।
भारतीय किसान यूनियन एकता (उग्राहाँ), खेत मजदूर यूनियन, नौजवान भारत सभा (अश्वनी घुद्दा), नौजवान भारत सभा (मंगा आज़ाद), किरती किसान यूनियन आदि संगठनों के नेताओं ने इस धरने को संबोधित किया। फैक्ट्री कामगारों और भ्रातृ संगठनों के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल के प्रबंधन के साथ बातचीत के कई लंबे दौर चले। इस बातचीत के दौरान लेबर अधिकारी और पुलिस प्रशासन खुलेआम प्रबंधन का पक्ष पूरते देखे गए। लेकिन भ्रातृ संगठन के नेताओं और फैक्ट्री कामगारों द्वारा दी गई दलीलों के आगे निरुत्तर होते हुए उन्हें कई माँगें मानने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिनमें बकायदा सैलरी स्लिप देना, अकुशल कामगारों की दिहाड़ी 481 रुपए और अर्ध-कुशल कामगारों की दिहाड़ी 511 रुपए करना, रात की शिफ्ट लगाने वालों को दिन की शिफ्ट से 12 रुपए अधिक देना, हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों को सही खाना देना, जबरन रखे ईएसआई कार्ड वापस देना और खोए हुए और नए कार्ड बनाना, ओवरटाइम की दिहाड़ी के लिए अलग से जल्दी ही बातचीत करना और इस हड़ताल में शामिल हुए और अगुआई कर रहे कामगारों में से किसी के खिलाफ भी कार्रवाई न करना आदि शामिल थे। इन बातों पर कामगारों की मुख्य रूप से सहमति थी, लेकिन तनख्वाह में बढ़ोतरी वाली बात अभी भी अटकी हुई थी और प्रबंधन द्वारा की गई बढ़ोतरी संतोषजनक नहीं लग
रही थी। इसलिए यह संघर्ष जारी रखने का एलान हुआ और अगले दिन फिर से इकट्ठा होने के एलान के साथ रात को कामगार घर-घर चले गए। संगठनों द्वारा मांग किये जाने पर पुलिस द्वारा कामगारों को अपनी बसों में उनके गाँवों में पहुँचाया गया।
लेकिन बातचीत का एक
दौर चलाकर अगले दिन प्रबंधन और उनकी पीठ पर खड़ा स्थानीय प्रशासन और अधिकारी फिर से सख्ती के पैंतरे पर आ गए। अगले दिन इस संघर्ष को पटरी से उतारने के लिए पुलिस ने सुबह ही फैक्ट्री कामगारों की धर-पकड़ शुरू कर दी। गाँवों से कामगारों को लेकर जो भी बसें फैक्ट्री गेट पर पहुँच रही थीं, उनमें से उतरने वाले कामगारों को पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर विभिन्न थानों में ले जाया जा रहा था। सवा सौ के करीब फैक्ट्री मजदूर लड़के और लड़कियाँ, जिनमें नौजवान भारत सभा के नेता सुखबीर खेमुआणा और दूसरी नौजवान भारत सभा के नेता मंगा आज़ाद भी शामिल थे, को गिरफ्तार करके किल्ली निहाल सिंह, नंदगढ़ और नेहियाँ वाला के थानों में रखा गया। इनकी गिरफ्तारी की खबर सुनते ही भारतीय किसान यूनियन एकता उग्राहाँ और खेत मजदूर यूनियन के कार्यकर्ताओं को इन थानों के सामने पहुँचने के संदेश मिल गए। इन संगठनों के कार्यकर्ता कुछ समय के अंदर ही थानों के सामने जा पहुँचे। दो थानों में तो वे अंदर जाकर भी फैक्ट्री कामगारों से मिले, उनका हौसला बढ़ाया और उनके खाने-पीने का प्रबंध किया। साथ ही इस ज़बर के विरोध में जाम लगाने का एलान हो गया। संगठनों के कार्यकर्ता और फैक्ट्री कामगार पहले जीदा गाँव में इकट्ठा हुए और वहाँ से मार्च करते हुए आकर बठिंडा-अमृतसर मुख्य सड़क पर अनिश्चितकालीन जाम लगा दिया। भीषण गर्मी में तपती हुई सड़क पर लोग जमकर बैठ गए। हालातों में आई इस तब्दीली ने प्रशासन की सारी गणनाएँ उलट दीं और उन्हें दोबारा बातचीत का न्योता देने के लिए मजबूर होना पड़ा। नेताओं द्वारा यह एलान कर दिया गया कि जब तक सभी मजदूर छोड़े नहीं जाते, तब तक प्रशासन या प्रबंधन के साथ कोई बातचीत नहीं की जाएगी। इसलिए प्रशासन को गिरफ्तार मजदूरों को रिहा करने के लिए मजबूर होना पड़ा। रिहा होने के बाद ये मजदूर नारों की गूंज के साथ जनसमूह में शामिल हुए और नेतृत्व टीम अन्य भ्रातृ संगठनों के साथ दोबारा बातचीत के लिए गई। इस बातचीत में प्रबंधन को पहले मानी गई माँगों के अलावा अकुशल कामगारों की दिहाड़ी 500 रुपए और अर्ध-कुशल कामगारों की दिहाड़ी 520 रुपए करने के लिए मानना पड़ा। खींचतान के दौरान एक लड़की के तोड़े गए मोबाइल की भरपाई करना भी माना गया। लड़कियों के साथ खींचतान करने वाले गार्ड के खिलाफ कार्रवाई करना माना गया। अधिकारियों और ठेकेदारों का व्यवहार सही रहने की गारंटी दी गई।
लोगों की साझा
ताकत के जोर पर एक बार यह संघर्ष जीत लिया गया है। इस संघर्ष की बड़ी उपलब्धि यह है कि अब बकायदा तौर पर सपोर्टकिंग वर्कर यूनियन अस्तित्व में आ चुकी है। लेकिन इस यूनियन की राह में अभी भी बहुत सी मुश्किलें हैं। माने गए समझौते के कार्यान्वयन के लिए तैयारी की आवश्यकता है और आने वाले समय में यूनियन और नेतृत्व की रक्षा के लिए भी तैयारी की आवश्यकता है। अपने दम पर प्रबंधन से भिड़ सकने में सक्षम होने का अपरिहार्य कार्य भी सामने है। इसके साथ ही निःस्वार्थ समर्थन पर आए भ्रातृ संगठनों के साथ साझेदारी को पहचानने और मजबूत करने की आवश्यकता है। यह साझेदारी ही भविष्य में फैक्ट्री कामगारों का संघर्षपूर्ण सहारा बन सकती है और दूसरी ओर यह साझेदारी ही बड़ी और प्रभावी उपलब्धियों के लिए आवश्यक किसान-मजदूर एकता की ओर बढ़ सकती है।
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