Tuesday, June 9, 2026

बंधुआ मजदूरी पर टिकी गिग अर्थव्यवस्था

 बंधुआ मजदूरी पर टिकी गिग अर्थव्यवस्था

 

भारत की ऐप-आधारित अर्थव्यवस्था (गिग अर्थव्यवस्था - यानी ऐसे काम जिनके लिए स्थायी मजदूर नहीं रखे जाते और ऐप्स जैसे उबर, ब्लिंकिट आदि के माध्यम से काम करवाया जाता है) को अक्सर नवीनता, लचीलापन और उद्यमी स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में सराहा जाता है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि 2020–21 में भारत में ऐप-आधारित श्रमिकों की संख्या 77 लाख थी, जो 2029–2030 तक बढ़कर 2 करोड़ 35 लाख होने का अनुमान है। खाना और किराना 10 मिनट में पहुँचाया जाना, स्क्रीन पर एक टच से टैक्सियों की उपलब्धता, और "अपने मालिक आप बनो" का वादा करने वाली ऐप्स, शहरी उपभोक्ताओं के लिए रोजमर्रा की सुविधा बन चुकी हैं। हालांकि, इस डिजिटल चमक-दमक के पीछे एक कठोर वास्तविकता छिपी हुई है, जो संवैधानिक और मानवाधिकारों से संबंधित गंभीर चिंताएँ पैदा करती है। वास्तव में, आज भारत में ऐप-आधारित काम का बड़ा हिस्सा जबरन बंधुआ मजदूरी का ही एक रूप है, जो पुराने समय की तरह जंजीरों या अनुबंधों के माध्यम से नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी, एल्गोरिदमिक नियंत्रण (कंप्यूटर निर्देशों) और सजा के निरंतर खतरे के साथ चलता है। यह महज एक नैतिक दावा नहीं है; यह एक कानूनी दावा है। जिसे ऐप्स नवाचार कहती हैं, भारतीय संविधान की धारा 23 उसे जबरन मजदूरी कहती है।

भारत के संविधान की धारा 23 के तहत, जबरन (बंधुआ) मजदूरी को उसके सभी रूपों में प्रतिबंधित किया गया है। चालीस साल से भी पहले, सुप्रीम कोर्ट ने पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (आशियाद वर्कर्स केस, 1982) में स्पष्ट किया था कि "जोर-जबरदस्ती" केवल शारीरिक या कानूनी दबाव तक सीमित नहीं है। श्रमिक की आर्थिक मजबूरी के कारण थोपा गया श्रम, जहाँ मजदूरों के पास झुकने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता, वह भी जबरन मजदूरी के दायरे में आता है। संविधान की यह व्याख्या आज के समय में विशेष रूप से उपयुक्त है।

हाल की खबरों में डिलीवरी श्रमिकों के थकावट से चूर हो जाने, सेवा समय की असंभव शर्तों को पूरा करने के लिए दौड़ते रहने, या अपने वश से बाहर की देरी के लिए सजा भुगतने की घटनाएँ सामने आई हैं, जो यह उजागर करती हैं कि रफ्तार और कुशलता को मानवीय सम्मान की कीमत पर हासिल किया जा रहा है। सामान पहुँचाने के समय निर्धारित किए जाते हैं, कामकाज के प्रदर्शन की धुंधले मापदंडों के माध्यम से निगरानी की जाती है, और स्वचालित तरीके से जुर्माने लगाए जाते हैं, जैसे कि तनख्वाह कम करना, प्रेरणा राशियाँ (इंसेंटिव) वापस लेना, या श्रमिकों के पहचान खाते (आई डी) अचानक बंद कर देना आदि। जो श्रमिक अपनी रोजी-रोटी के लिए दैनिक कमाई पर निर्भर करते हैं, उनके लिए मालिक को काम से जवाब देने का सवाल ही पैदा नहीं होता। लक्ष्य से पीछे रहना, ज़्यादा ऑर्डर रद्द करना, या ट्रैफिक, मौसम, या सिर्फ थकावट के कारण देरी होना, यह सब कमाई के तत्काल नुकसान का कारण बन सकते हैं। यह स्थिति कम और असुरक्षित पारिश्रमिक के कारण और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि कोई तनख्वाह सहित छुट्टी, स्वास्थ्य बीमा या दुर्घटना सहायता मौजूद नहीं है।

इसकी मानवीय कीमत बेहद भयानक है। भारत में हर घंटे नौ दोपहिया सवार मरते हैं, और ऐप-आधारित गिग श्रमिकों पर तेजी से डिलीवरी करने का बढ़ता दबाव इसमें एक महत्वपूर्ण योगदान देने वाला कारक है। सरकारी सड़क सुरक्षा आंकड़े भी बताते हैं कि वर्ष 2025 में (सितंबर तक) अकेले, हैदराबाद, साइबराबाद और राचाकोंडा शहरों में सड़क दुर्घटनाओं में 91 गिग श्रमिक घायल हुए या मारे गए, यानी लगभग हर तीन दिनों में एक दुर्घटना। ये खतरे केवल सड़कीय मौतों तक सीमित नहीं हैं। दिल्ली में 2023 के एक मामले में, एक महिला उबर ड्राइवर, जिस पर टूटी बोतल से हमला किया गया था, ने बताया कि ऐप का आपातकालीन (SOS) बटन बार-बार दबाने के बावजूद कोई मदद नहीं पहुंची। जैसा कि श्रमिकों ने नोट किया है, इन ऐप प्लेटफार्मों के सुरक्षा प्रबंध बिल्कुल भी भरोसेमंद नहीं हैं। भारी बारिश, 45 डिग्री सेल्सियस की भयानक गर्मी, या देर रात की शिफ्टों में काम करने के बावजूद, श्रमिकों को प्रेरक राशियाँ (इंसेंटिव) हासिल करने के लिए आगे काम जारी रखने के दबाव का सामना करना पड़ता है। निश्चित समय पर सामान पहुँचाने का अक्सर अर्थ होता है कि तनख्वाह पूरी तरह गंवा देनी। इस संदर्भ में, अति-तेज डिलीवरी मॉडल, जैसे कि Blinkit जैसी ऐप्स द्वारा 10 मिनट में सामान पहुँचाने के वादे, श्रमिकों के लिए काम की नवीनता नहीं बल्कि समय के विरुद्ध एक खतरनाक दौड़ के रूप में प्रकट होते हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित कर रहे हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शोषण किसी सामाजिक खालीपन में नहीं होता। जाति-पाति व्यवस्था इस बात को जोरदार रूप से निर्धारित करती है कि गिग काम में कौन प्रवेश करता है और कौन इसके सबसे कठोर बोझ को सहता है। ऐप-आधारित श्रमिक बाजार में बहुसंख्यक दलित, बहुजन, आदिवासी और प्रवासी श्रमिकों की है, ऐसे समुदाय जिन्हें लंबे समय से मजदूरी के असुरक्षित, असंगठित और सामाजिक रूप से निम्न समझे जाने वाले कामों की ओर धकेला गया है। यह स्थिति गिग अर्थव्यवस्था के तहत श्रमिकों की भर्ती प्रक्रिया और दैनिक कामकाज दोनों में दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, बैंगलुरु जैसे शहरों में, अर्बन कंपनी (Urban Company) ने सफाई और घरेलू कामों के लिए बस्तियों और झुग्गियों से सक्रियता से श्रमिकों की भर्ती की है, जिससे सफाई के कामों में हाशिए पर धकेले गए समुदायों का केंद्रीकरण और बढ़ा है। काम पर आने के बाद, भेदभाव एक आम घटना बन जाता है। गुजरात में डिलीवरी श्रमिक और टैक्सी ड्राइवर बताते हैं कि उन्हें जाति-आधारित पूर्वाग्रह से बचने के लिए ऐप्स पर अपने उपनाम छुपाने के लिए मजबूर किया जाता है। रेस्तरां में, डिलीवरी श्रमिकों को अक्सर अलग प्रवेश मार्गों का उपयोग करने के लिए कहा जाता है, जबकि ग्राहक उनके हाथों से सीधा ऑर्डर लेने से इनकार कर सकते हैं और उन्हें पार्सल बाहर छोड़ने का निर्देश देते हैं। नई दिल्ली जैसे शहरों की गेटबंद कॉलोनियों में, डिलीवरी श्रमिकों और अन्य "सहायक स्टाफ" के लिए अलग सर्विस लिफ्ट निर्धारित की गई हैं, जो स्पष्ट रूप से उनके निम्न सामाजिक दर्जे को प्रकट करती हैं।

गिग अर्थव्यवस्था में जबरन मजदूरी की पहचान करने और रोकथाम के लिए तो किसी नए नैतिक ढांचे की जरूरत है और ही किसी नए क्रांतिकारी कानूनों की। इसके लिए पहले से मौजूद संवैधानिक सिद्धांतों की ईमानदारी से उपयोग की आवश्यकता है। यदि श्रमिक भूख, बेघर होने, या श्रम बाजार (लेबर मार्केट) से निकाले जाने के जोखिम के कारण, किसी काम से इनकार नहीं कर सकते, तो स्वतंत्र इच्छा महज एक कल्पना है। यह जबरन मजदूरी है और भारतीय संविधान की धारा 23 का उल्लंघन है। जैसे-जैसे भारत में श्रम के भविष्य के बारे में बहस चलती है, केंद्रीय सवाल यह नहीं है कि गिग प्लेटफॉर्म सक्षम, विस्तार योग्य या लाभकारी हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या तकनीकी नवाचार के नाम पर संवैधानिक उल्लंघनों को दैनिक चलन बनाने की अनुमति दी जा सकती है?

(निर्मल गोराना, गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन (GIPSWU) के राष्ट्रीय समन्वय समिति के संयोजक हैं, और पानखुड़ी अग्रवाल किंग्स कॉलेज लंदन में शोधकर्ता हैं।)

 

(इंडियन एक्सप्रेस से अनुवाद)

No comments:

Post a Comment