मजदूर संघर्ष: प्रतीक्षित उभार की आहट
अप्रैल महीने में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में औद्योगिक मजदूर वर्ग द्वारा न्यायोचित मुद्दों पर हुआ रोषपूर्ण आंदोलन लंबे समय से प्रतीक्षित स्वागत योग्य परिघटना है। इस आंदोलन ने देश के भीतर औद्योगीकरण के इस मॉडल की छिपी हुई वास्तविकता को फिर से उजागर किया है कि यह 'तेज़ विकास' मजदूर वर्ग के श्रम की अंधी लूट पर टिका हुआ है और मजदूरों को घोर अमानवीय हालातों में रखकर उनका श्रम निचोड़ता है। इन बड़े कारोबारियों के उद्योगों में इस 'तेज़ विकास' की हकीकत, मजदूर वर्ग के संगठित होने के अधिकार को कुचल कर रखने की नीति से ही गुंथी हुई है। ये निर्यात-आधारित उद्योग या देश की उच्च और उच्च-मध्यवर्गीय जमातों को संबोधित उत्पादन, भारतीय श्रम बाजार में पूंजीपतियों की मनमानी चलने से ही बढ़-फूल रहे हैं।
भारतीय शासक जमातों के लिए
विदेशी पूंजी के लिए भारतीय धरती को आकर्षक बनाने हेतु अन्य लुभावनी छूटों के साथ-साथ श्रम की ऐसी लूट किए जाने की गारंटी देना भी शामिल है। नए श्रम संहिता पहली अप्रैल से लागू हुए हैं और इनका मकसद भी इस बड़ी पूंजी के लिए कारोबारों को आसान बनाना है, जिसका एक अर्थ औद्योगिक मजदूर वर्ग को नाममात्र और औपचारिक सुरक्षा के अधिकारों व वादों से भी वंचित करना है। यह और भी तल्ख हकीकत है कि अभी तो श्रम संहिता लागू होने की प्रक्रिया शुरू ही हुई है। यह बेचैनी और रोष तो पहले श्रम कानूनों के लागू होने के दौरान ही पैदा हुआ है, जिसका स्पष्ट अर्थ है कि वे सभी कानून भी सिर्फ कागजों का श्रृंगार हैं और औद्योगिक मजदूरों के हितों में भुगतने की बजाय पूंजीपतियों द्वारा मनमाने ढंग से दरकिनार किए जा सकते हैं।
यूनियनें तो उन
कानूनों के होते हुए नहीं बनने दी गईं जब औपचारिक रूप में स्पष्टता के साथ यूनियन बनाने का अधिकार कानून के तहत दिया गया था। अब जब यह कानूनी अधिकार भी कागजों में से हटा दिया गया है या बहुत कमजोर कर दिया गया है, तो फिर मजदूरों के संगठित होने के अधिकार का कुचला जाना और भी अधिक यकीनी कर दिया गया है। इस प्रकार ये नए श्रम संहिता उस पनपती हुई बेचैनी और रोष को दबाने और कुचलने के लिए लाए गए हैं, जो बेचैनी पहले कानूनों के होते हुए ही पनप रही है। वैसे हमारे देश में नकली जम्हूरियत है और कानून के राज की जगह आपाशाही राज है, यानी शासक जमातों की मनमानी का राज है। इन हालातों में मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के औपचारिक दावों के लिए लाए गए कानून भी सरकारों को रोड़ा जान पड़ रहे हैं। खासकर विश्व साम्राज्यवादी पूंजी और भारतीय बड़े पूंजीपतियों के संकटों का बोझ जनता पर डालने के लिए जो कदम उठाने की जरूरत बन रही है, वह कदम उठाने में हर छोटी से छोटी बाधा भी दूर की जा रही है।
पर यह
जो मजदूरों के दिलों में पनप रहे रोष का प्रकटीकरण हुआ है, यह सिर्फ हालात का ट्रेलर मात्र है। मजदूरों की तेज की जा रही लूट और साथ ही उनके रोष को कुचलने के लिए किया जा रहा जबर, हालात को और विस्फोटक बनाने जा रहा है। यह घटनाक्रम इस एक बार के इजहार से थम जाने वाला नहीं है। जिन हालातों ने इसे पैदा किया है वे तो और अधिक गहरे संकटों का रूप लेकर आ रहा है। एक तरफ श्रम संहिता और निर्मम कदम तथा दूसरी तरफ आर्थिक संकटों का महंगाई के रूप में मजदूरों पर पड़ने वाला बोझ, ये दोनों जड़त्व परिघटनाएं इस मजदूर हलचल के लिए आधार प्रदान करने वाली हैं।
मजदूर वर्ग की अग्रणी
शक्तियों, कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ताकतों को इस हालात में मजदूर वर्ग के रोष को क्रांतिकारी दिशा में सोद्देश्य करने के लिए जोरदार प्रयास जुटाने की जरूरत है। मजदूर रोष-फुटारों का यह इजहार मजदूरों के असंगठित होने की हालत के दौरान आया है। इन उद्योगों में औपचारिक ट्रेड यूनियन सक्रियता भी गैर-मौजूद है। हर तरह की संगठित सक्रियता वर्जित है। मजदूरों की असंगठित हालत इस रोष-फुटारे की बड़ी सीमितता बनी है। इसे सर करने और इस बड़े क्षेत्र में मजदूर वर्ग को संगठित करने की चुनौती मजदूर वर्ग की अग्रणी शक्ति के सामने है। बड़े उद्योगों में मजदूरों का बड़ा हिस्सा कच्चे मजदूरों या दिहाड़ीदार मजदूरों के रूप में काम करता है, जबकि बहुत छोटी परत नियमित मजदूरों की है। पारंपरिक ट्रेड यूनियनें सिर्फ इस नियमित परत तक सीमित हैं, जो परत अपेक्षाकृत सुविधा-प्राप्त भी है। प्रबंधन इस छोटी परत के माध्यम से बड़ी संख्या में दिहाड़ीदार मजदूरों की लूट का रास्ता भी बनाते हैं। इसलिए इस समय इन कच्चे/दिहाड़ीदार मजदूरों के अधिकारों का सवाल प्रमुख सवाल बना हुआ है।
जैसा कि हालिया
रोष-उभार ने भी दिखाया है कि इन मजदूरों की संघर्ष ललकार ही औद्योगिक मजदूर वर्ग की इस शिथिलता वाली हालत को झकझोर सकती है और मजदूर वर्ग आंदोलन के नए वेग का आधार बन सकती है। इस रोष-उभार ने देश के मजदूर वर्ग आंदोलन के नेतृत्व पर काबिज संशोधनवादी, सुधारवादी और अर्थवादी नेतृत्वों की हकीकत फिर उघाड़कर सामने ला दी है। इन नेतृत्वों वाली ट्रेड यूनियनें न केवल इन तूफानी केंद्रों से दूर ही रही हैं, बल्कि इस उभार की हालात बनने पर भी भ्रातृत्वता जाहिर करने की कोई जन-लामबंदी करने से भी निर्लिप्त ही रही हैं। औपचारिक बयानबाजी से आगे जन-लामबंदी और रोष को संगठित करने के कदमों से दूर ही रही हैं। इस हालात ने एक बार फिर इन सुधारवादी और अर्थवादी नेतृत्वों के खिलाफ संघर्ष के जोर पर इनकी जकड़न तोड़ने के कार्य की तात्कालिकता उभारी है।
मुख्य रूप से चाहे
अधिकांशतः औद्योगिक मजदूरों ने तत्काल मांगों के तौर पर न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि और अन्य सुविधाओं के मुद्दों के लिए आवाज उठाई है, पर बढ़ती महंगाई और घरों के किराए का बोझ इनके रोष को भड़काने का मुख्य कारण बना है। यह हालात दर्शाती है कि इनके संगठित होने और संघर्षरत होने के लिए सिर्फ फैक्टरियों से संबंधित मांगों पर ही गुंजाइशें मौजूद नहीं है, बल्कि आवासीय प्रबंधों और गुजर-बसर की आवश्यकताओं की पूर्ति के मुद्दों पर भी लामबंदी की असीम संभावनाएं हैं। इसलिए जरूरत इन औद्योगिक मजदूरों को संगठित होने के लिए चेतन करने और संगठित संघर्षों के महत्व से प्रवृत्त करने के लिए उनके बीच दृढ़ इरादे से सख्त-जान काम करने की है।
वर्तमान दौर में, बड़े कारपोरेट उद्योगों में मजदूरों को संगठित
करने के मामले में मानेसर क्षेत्र की मारुति कंपनी के मजदूरों द्वारा संगठित होने के प्रयासों का अनुभव महत्वपूर्ण है। इस तजुर्बे के विवेचन तथा हाँ-पक्षीय और ना-पक्षीय, यानी हर तरह के अनुभवों से सबक लेने के मामले में यह काम क्रांतिकारी शक्तियों के लिए महत्वपूर्ण सामग्री बनता है। मुल्क में साम्राज्यवादी हमले से मुकाबले और क्रांतिकारी वर्गीय संघर्षों की असल ताकत, औद्योगिक मजदूर वर्ग के द्वारा संघर्षों के मैदान में उतरने से ही आनी है। औद्योगिक मजदूर वर्ग के साथ किसानी का गठजोड़ ही सभी वर्गीय संघर्षों की ताकत का आधार बनता है। औद्योगिक मजदूर वर्ग के स्वाभाविक संबंध, ग्रामीण मजदूरों और किसानों के साथ गठजोड़ के संदर्भ में स्वाभाविक कारक भी बन जाते हैं। वह अभी भी ग्रामीण पृष्ठभूमि से टूटे हुए नहीं हैं, बल्कि गहरी तरह जुड़े हुए हैं। कोरोना संकट की तरह अब भी महंगाई की मार ने एक हिस्से को वापस उन ग्रामीण क्षेत्रों की ओर लौटने के लिए मजबूर किया है। ग्रामीण क्षेत्रों के साथ ऐसे संबंध हमारे देश के औद्योगिक मजदूर वर्ग का महत्वपूर्ण लक्षण हैं और यह संबंध किसानी के साथ हैं।
औद्योगिक मजदूर वर्ग की इस
बेचैनी को भ्रमित करके खारिज करने हेतु केंद्रीय सरकार और राज्य के पास बहुत से फासीवादी प्रोजेक्ट हैं। इसलिए क्रांतिकारी शक्तियों के सामने इस बेचैनी और रोष को संगठित करने और सही संघर्ष मार्ग पर चलाने की चुनौती और भी बड़ी है। औद्योगिक मजदूर वर्ग ने इस संघर्ष के माध्यम से असीम संभावनाएं प्रस्तुत की हैं, जिन्हें वास्तविक क्रांतिकारी वर्गीय संघर्ष में पलटने के लिए सही नीति से लैस होकर तनदेही से जुटने की जरूरत है। नव-जम्हूरी क्रांति की अग्रणी जमात के रूप में औद्योगिक मजदूर वर्ग का स्वयं जमात के तौर पर संघर्षों के दृश्य-पटल पर उभर आना बेहद आवश्यक परिघटना है। क्योंकि अन्य क्रांतिकारी जमातों के संघर्षों की कामयाबी इसकी अगुवाई से जुडी हुई है।
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