कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नेता कामरेड सुरिंदर तिवाड़ी की जीवन-साधना को लाल सलाम अर्पित करने के लिए 17 मई को समराला पहुँचें
क्रांतिकारी साधना का संदेश
ग्रहण करेंक्रांतिकारी विरासत को बुलंद
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अप्रैल के आख़िरी
दिनों में यह दुखद समाचार मिला कि कामरेड सुरिंदर तिवाड़ी अपना जीवन-पथ पूरा कर इस दुनिया से विदा हो गए। कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आंदोलन और जनता की जनवादी लहर के लिए यह गहरे दुःख का समय है, लेकिन साथ ही कामरेड सुरिंदर तिवाड़ी के गौरवशाली जीवन-संघर्ष पर गर्व करने का समय भी है। उनका जीवन जन-मुक्ति के महान मिशन के लिए समर्पित रहा। जनता को समर्पित एक लंबा राजनीतिक सफर थम गया है, परंतु मिशन के प्रति समर्पित होकर जीने की एक गौरवमयी विरासत छोड़ गया है। यह विरासत जनता की अमूल्य धरोहर है।
जनता को समर्पित जीवन-सफर की शुरुआत:
लुधियाना ज़िले के छोटे
से कस्बे समराला में जन्मे कामरेड सुरिंदर तिवाड़ी का बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था। बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु के बाद उनके स्कूली जीवन में ऐसा दौर भी आया जब वे घर में बिल्कुल अकेले रहते थे। उनकी दसवीं कक्षा का वर्ष ही नक्सलबाड़ी विद्रोह का वर्ष था, और उसी समय से इस आंदोलन का प्रभाव पंजाब के युवाओं के मन-मस्तिष्क में दिखाई देने लगा था। जन-मुक्ति की मशाल साथी सुरिंदर के भीतर भी प्रज्वलित हो उठी थी। कामरेड सुरिंदर तिवाड़ी 1960 के दशक के अंतिम वर्षों में कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की पूरी पीढ़ी की तरह नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के झंझावात से आंदोलन की ओर आकर्षित हुए। इस झटके से शुरू हुआ उनका सफर गहरे अध्ययन और दृढ़ संकल्प के साथ एक लंबे क्रांतिकारी राजनीतिक जीवन में बदल गया, जो लगभग 56 वर्षों तक अडिग रूप से जारी रहा। उनके संगठन द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार उनका निधन उनकी कर्मभूमि में ही हुआ। इसी कर्मभूमि में उन्हें कम्युनिस्ट परम्पराओं के अनुसार अंतिम विदाई दी गई।
साथी तिवाड़ी बी.एस.सी. के दूसरे
वर्ष में थे जब उन्होंने पढ़ाई छोड़कर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आंदोलन में पूर्ण-कालिक (कुल-वक्ती) कार्यकर्ता के रूप में कदम रखा। वे अत्यंत गंभीर और मेधावी विद्यार्थी थे तथा अपने अध्यापकों के प्रिय छात्र थे। स्कूली जीवन के दौरान उनको क्रांतिकारी राजनीतिक चेतना की प्रारंभिक प्रेरणा पंजाबी कवि कुलवंत नीलों से मिली, जो उनके शिक्षक थे। युवावस्था में ही उन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता को व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के बजाय जन-मुक्ति के महान उद्देश्य के लिए समर्पित करने का निर्णय कर लिया। उन्होंने समाज में गहराई तक मौजूद मेहनतकश जनता के शोषण, अन्याय, अत्याचार और भेदभाव को समाप्त कर मानव की स्वतंत्रता, प्रगति और समृद्धि के लिए सामूहिकता पर आधारित कम्युनिस्ट समाज की स्थापना के संघर्ष को अपना आदर्श बना लिया। वह, देश में क्रांति के माध्यम से शोषक वर्गों की सत्ता को पलटकर, मेहनतकश किसानों का जनवादी राज स्थापित करने का आह्वान कर रहे नक्सलबाड़ी आंदोलन में कूद पड़े। उनके पूर्ण-कालिक राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1970 में नक्सलबाड़ी लहर के एक संगठन सी.पी.आई. (एम.एल.) के कार्यकर्ता के रूप में हुई। 1971 में वे कुछ अन्य साथियों के साथ कामरेड हरभजन सोही के नेतृत्व वाली पंजाब कम्युनिस्ट क्रांतिकारी कमेटी में शामिल हो गए।
नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह की विरासत के दृढ़ प्रहरी:
कामरेड सुरिंदर तिवाड़ी उन लोगों
में से थे जिन्होंने नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह की विरासत को सही अर्थों में आत्मसात किया। नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह का तजुर्बा, तेलंगाना किसान आंदोलन और श्रीकाकुलम किसान संघर्ष की तरह दशकों लंबे संघर्ष अमल का अनुभव था। यह किसान विद्रोह दशकों भर में क्रांतिकारियों
द्वारा निर्मित किए गए जन-संघर्ष का शिखर था। यह संघर्ष जनता की भारी भागीदारी के साथ प्रारंभिक मांगों से लेकर भूमि-वितरण की उच्च मांग तक एक लंबे अमल से होता हुआ पहुंचा। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इसके जनवादी क्रांतिकारी स्वरूप की प्रशंसा की। कामरेड नागी रेड्डी और उनके साथियों द्वारा भी इसी जनवादी क्रांतिकारी दिशा को उभारा जा रहा था। कामरेड हरभजन सोही के नेतृत्व वाले संगठन ने भी नक्सलबाड़ी आंदोलन के इसी वास्तविक तत्व को सही ढंग से समझते हुए पंजाब में क्रांतिकारी आंदोलन को सही दिशा में संगठित करने के गंभीर प्रयास किए। उस समय भले ही बड़ी संख्या में क्रांतिकारी युवा अतिवामपंथी मारकेबाज़ प्रवृत्तियों से प्रभावित हो गए थे, लेकिन कामरेड सोही, कामरेड गुरदयाल पहाड़पुर और कामरेड ठाणा सिंह जैसे नेताओं द्वारा नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के वास्तविक संदेश - अर्थात भूमि-वितरण के संघर्ष को राज्य सत्ता के लिए सशस्त्र संघर्ष से जोड़ने पर ज़ोर दिया जा रहा था। इस दरुस्त विचार पर पूरी दृढ़ता और स्पष्टता से खड़े हो कर यवाओं को नक्सलबाड़ी बगावत की दुरुस्त इंकलाबी लीह को ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया जा रहा था। इन नेताओं ने सशस्त्र संघर्ष की तैयारी के लिए जनता को तात्कालिक और आंशिक मुद्दों पर संघर्ष अमल से गुजारने पर जोर दिया। इसके लिए उन्होंने वर्गीय जन-संगठनों के निर्माण और जन-संघर्षों को खड़ा करने की क्रांतिकारी जनवादी लाइन को बुलंद किया। कामरेड तिवाड़ी ने भी नक्सलबाड़ी की इसी विरासत का झंडा बुलंद किया और इस संगठन में शामिल होकर जनवादी क्रांतिकारी संघर्षों के निर्माण में जुट गए।
वे जल्द
ही इस संगठन की नेतृत्वकारी पंक्तियों में शामिल हो गए। महान मोगा संघर्ष के उग्र जन-एक्शनों ने पंजाब में इस लाइन की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पूरे दौर में पंजाब में जन-संगठनों के निर्माण और जन-संघर्ष विकसित करने की नई परंपराएँ स्थापित हुईं।क्रांतिकारियों की फर्जी पुलिस मुठभेड़ों के माध्यम से फैलाई जा रही दहशत को जनता के उग्र जन-संघर्षों ने चकनाचूर कर दिया और जन क्रांतिकारी लहर पंजाब में एक उभरती हुई शक्ति के रूप में सामने आई। जन-संगठनों के संघर्ष तेज़ होने लगे। इसी दौर में जन-संघर्षों को राजनीतिक प्रश्नों से सही तरीके से जोड़ने की दिशा में गंभीर प्रयास किये गए। जनवादी लहर के महत्वपूर्ण जुझारू हिस्सों ने इन विचारों का गहरा प्रभाव ग्रहण किया और इस तरह जन संगठनों द्वारा आयोजित 1974 की मोगा संग्राम रैली इस पहुंच की महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरी।कामरेड तिवाड़ी ने 1970 के दशक में छात्र आंदोलन को क्रांतिकारी दिशा में प्रभावित करने के लिए अथक कार्य किया। वे औद्योगिक मजदूरों और कर्मचारी संघर्षों की, जुझारू और क्रांतिकारी कायापलटी के लिए सही नीतियों का संचार करने में लगातार डटे रहे।
शासक वर्गों से सहभागिता के खिलाफ सैद्धान्तिक पोजीशन:
कामरेड सुरिंदर तिवाड़ी शासक वर्गों के साथ
गठजोड़ों के जरिये किसी प्रकार की सहभागिता की नीति के हमेशा विरोधी रहे। उन्होंने कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शक्तियों द्वारा शासक वर्गों के साथ गठबंधन बनाने की प्रवृत्तियों के विरुद्ध दृढ़ राजनीतिक वैचारिक संघर्ष में हिस्सा लिया।
1974
में जब इंदिरा गांधी के फासीवादी दमन के खिलाफ शासक वर्ग के दूसरे गुट द्वारा शुरू किए गए जे.पी. आंदोलन के साथ कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के एक हिस्से में गठबंधन करने की प्रवृत्ति उभरी, तब वे इसके खतरों के प्रति चेतावनी देने वालों में शामिल थे। उन्होंने इसके वर्गीय
सहभागिता तक चले जाने और क्रांतिकारी लाइन से विचलित हो जाने की चिंता जतलाई। उस समय उन्होंने कामरेड सोही के नेतृत्व में इस विचार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ताकतों को शासकों के किसी एक या दुसरे गुट के साथ टोचन होने के
बजाय जनता के सामने मुक्ति का वैकल्पिक आर्थिक और राजनीतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करना चाहिए। आज मोदी सरकार के फासीवादी हमलों के दौर में उनके इस वैचारिक संघर्ष का महत्व फिर उजागर हो रहा है और इस हमले के खिलाफ संघर्ष की सही पहुंच पर खड़े होने के महत्व को दर्शा रहा है।
इस विचार
को पंजाब की जन-जम्हूरी लहर के होनहार और गणनीय हिस्से ने ग्रहण किया। विभिन्न वर्गों के संगठनों ने मोगा में संग्राम रैली आयोजित कर लोगों के सामने राष्ट्र के कल्याण का वैकल्पिक मार्ग और प्रोग्राम रखा।
इमरजेंसी हटने के बाद
1977 में
भारतीय राज ने जनता सरकार के जरिये कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को बहला-फुसलाकर रास्ते से भटकाने की चाल चली। सरकार द्वारा क्रांतिकारियों पर डाले गए मुकदमों को रद्द करने और क्रांतिकारियों को हथियारबंद संघर्ष का रास्ता छोड़ कर 'मुख्यधारा' के पार्लियामेंट्री मार्ग पर आने की पेशकशें की गईं। कम्युनिस्ट-इन्कलाबी लहर का एक हिस्सा इस विचलन का शिकार भी हुआ। पर अन्य कई इन्कलाबियों की तरह कॉमरेड सुरिंदर तिवाड़ी ने इन प्रस्तावों को ठुकराते हुए इन्कलाबी जनयुद्ध की तैयारी में डटे रहने का मार्ग चुना और गुप्तवास रहते हुए सक्रियता बनाए रखने का निर्णय लिया। यह नक्सलबाड़ी के मार्ग पर उनकी अडिग निष्ठा ही थी जिस के चलते वे जीवन भर पार्लियामेंट्री भ्रम से मुक्त रहे और अन्त तक गुप्तवास में रहते हुए क्रांतिकारी जनयुद्ध की तैयारी में जुटे रहे।
संसदीय रास्ते की दलदल अस्वीकार:
कामरेड सुरिंदर तिवाड़ी संसदीय राजनीति की दलदल
से हमेशा मुक्त रहे। वे देश में जम्हूरी क्रांति के मिशन के प्रति प्रतिबद्ध रहे। उनका दृढ़ विचार था कि 1947 में देश में केवल सत्ता का हस्तांतरण हुआ था; अंग्रेज साम्राज्यवादियों की जगह देशी दलाल पूंजीपतियों और ज़मींदारों ने सत्ता संभाल ली थी। साम्राज्यवादी लूट और उत्पीड़न के केवल रूप ही बदले थे। वे मानते थे कि भारत अब एक साम्राज्यवादी देश के बजाय कई साम्राज्यवादी शक्तियों की लूट का क्षेत्र बन चुका है। साम्राज्यवादी और सामंती शोषण से पूर्ण मुक्ति के लिए मजदूरों, किसानों, खेत-मजदूरों, छोटे व्यापारियों और राष्ट्रीय पूंजीपतियों को राष्ट्रीय मुक्ति के प्रोग्राम के गिर्द संगठित होना होगा। इस समूचे कार्य का नेतृत्व मजदूर वर्ग की पार्टी ही कर सकती है और यह संघर्ष भूमि-वितरण के गिर्द निर्मित किये जा रहे संघर्ष के जरिये, मुकाबले की जन-सत्ता का निर्माण करते हुए आगे बढ़ेगा। उनका दृढ़ विचार था कि देश की संसदीय व्यवस्था इस उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकती। यह संसदीय ढाँचा और इसकी संस्थाएँ शासक वर्गों द्वारा लोकतंत्र के नाम पर रचा गया एक छलावा हैं। यह जम्हूरियत झूठी है और लोगों के सामने खरी जम्हूरियत के निर्माण का कार्य पड़ा है।
इस कार्यपूर्ती
लिए जन-संघर्षों को क्रांतिकारी दिशा में आगे बढ़ाने के लिए उनहोंने निरंतर दृढ़ निश्चय संघर्ष किया। उन्होंने इस पहुंच का प्रचार किया और जन नेतृत्व को
शिक्षित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस संदर्भ में उन्होंने अनेकों लेख लिखे, जो विभिन्न क्रांतिकारी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।
मार्क्सवाद-लेनिनवाद और माओ विचारधारा में अडिग विश्वास:
एक कम्युनिस्ट
क्रांतिकारी के रूप में उन्होंने मार्क्सवाद-लेनिनवाद और माओ विचारधारा में अटूट विश्वास व्यक्त किया। उन्होंने इस वैज्ञानिक विचारधारा को दृढ़ता से अपनाया और वैचारिक स्पष्टता के साथ इन विचारों पर कायम रहे। लहर में आए विचलन और भटकाव के विभिन्न नाजुक दौरों में वे एक निष्ठावान और वैचारिक रूप से परिपक्व कम्युनिस्ट क्रांतिकारी के रूप में अडिग खड़े दिखाई दिए। माओ त्से तुंग की मृत्यु और नागी रेड्डी के निधन ने उनके मनोबल को कमजोर नहीं किया, बल्कि वे और अधिक दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़े। आंदोलन में हुई टूट-फूट ने उनके उत्साह को कम नहीं किया। वे कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शक्तियों की, लाइन आधारित एकता के प्रबल समर्थक थे। मार्क्सवादी सिद्धांत की शक्ति के आधार पर उन्होंने गलत प्रवृत्तियों के खिलाफ संघर्ष में हिस्सा लिया और इन का मुकाबला करते हुए सही लाइन की स्थापना और रक्षा में योगदान दिया। समाजवादी चीन के पूंजीवादी दिशा में चले जाने से भी क्रांति के प्रयोजन में उनका विश्वास कमजोर नहीं पड़ा, उनके इन्कलाबी जज़्बे को बेदिल नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने संगठन द्वारा इस घटनाक्रम के किए गए विश्लेषण से अपनी समझ को और गहरा किया और अपने निश्चय को और अधिक पक्का किया। उन्होंने सभी महत्वपूर्ण मोड़ों पर गहन सैद्धान्तिक अध्ययन के साथ राजनीतिक-वैचारिक बहस में गहरी भागीदारी की। बौद्धिक चिंतन के प्रयत्नों में भी उन्होंने निष्ठा के साथ भाग लिया। वे पूरी स्पष्टता से सही राजनीतिक-वैचारिक पोजीशनों पर खड़े रहे। कम्युनिस्ट-इन्कलाबी संगठन की स्थापना के कार्यों में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। गुप्तवास रहते हुए कठिन परिस्थितियों में इन्कलाबी लहर के नेतृत्व का कार्य निभाया। वे विभिन्न मौकों पर कम्युनिस्ट-इन्कलाबी संगठनों की नेतृत्व पंक्तियों में रहे। इस समय वे सी.पी.आर.सी.आई. (एम.एल.) की पंजाब प्रदेश कमेटी और केंद्रीय कमेटी के सदस्य थे।
क्रांतिकारी जन-आंदोलन के निर्माण में अग्रणी भूमिका:
खालिस्तानी और हकूमति
आतंकवाद के दौर में वे दोनों प्रकार के आतंकवाद के विरुद्ध जनता के प्रतिरोध को संगठित करने में अग्रिम पंक्ति में रहे। उन्होंने सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष और धर्म के खिलाफ संघर्ष में अंतर करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। सांप्रदायिकता विरोधी संघर्ष का, वर्गीय संघर्ष से समायोजन करने पर बल दिया। खालिस्तानी और हकूमति आतंकवाद के दौर में वे जनता की आत्मरक्षा के प्रश्न को गंभीरता से संबोधित हुए। पंजाब में औद्योगिक मजदूरों और कर्मचारियों के संघर्षों का नेतृत्व करने में उन्होंने विशेष भूमिका निभाई। इन संघर्षों को क्रांतिकारी दिशा देने के लिए गंभीर और निरंतर प्रयास किए। इस दिशा की आवश्यकता और महत्व के बारे में आंदोलन के कार्यकर्ताओं को शिक्षित करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। मजदूर आंदोलन की समस्याओं का समाधान उनका गहरा सरोकार बना रहा। मजदूर-कर्मचारी लहर के विकास के लिए उन्होंने केवल औपचारिक ट्रेड यूनियन गतिविधियों तक सीमित रहने के बजाय राजनीतिक संघर्ष केंद्रों के निर्माण पर ज़ोर दिया। पंजाब में क्रांतिकारी जनवादी आंदोलन के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी भूमिका रही। इन्कलाबी जनवादी लाइन पर विकसित हो रहे जन-संघर्षों में,
उनके द्वारा इस लाइन के किये गए संचार-प्रसार कार्यों की भूमिका भी शामिल है।
क्रांति को समर्पित आदर्श जीवन:
उनका संघर्षपूर्ण जीवन एक समर्पित
कम्युनिस्ट क्रांतिकारी के रूप में आदर्श जीवन था। उनके लिए क्रांतिकारी मिशन हमेशा सर्वोपरि रहा और वे हर क्षण उसे जीने वालों में से थे। वे क्रांतिकारी कार्यों के साथ पूरी तरह एकाकार थे। उन्होंने पूरी ज़िंदगी मजदूर बस्तियों में जनता के बीच रहकर क्रांतिकारी कार्यों को आगे बढ़ाते हुए बिताई। भूमिगत जीवन की कठिनाइयों का उन्होंने हमेशा मुस्कुराते हुए और ऊँचे मनोबल के साथ सामना किया। शहीद भगत सिंह ने कहा था कि क्रांति के लिए युवाओं को अपना जीवन गाँवों और मजदूर बस्तियों में बिताना होगा। साथी तिवाड़ी उन लोगों में से थे जिन्होंने क्रांति के लिए कुर्बानी के बारे में कहे भगत सिंह के इन शब्दों को व्यवहार में उतारा। क्रांति के कठिन पथ पर एक अथक पथिक के रूप में उनके कदमों के निशान अमिट हैं। अपनी राजनीतिक-वैचारिक प्रतिबद्धता, स्पष्टता और गहरे समर्पण के कारण वे क्रांतिकारियों की वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा बने रहेंगे।
साथी सुरिंदर तिवाड़ी की जीवन-साधना अमर है। आइए, 17 मई को उनके जन्मस्थान समराला में एकत्र हो, उनकी साधना के पन्नों से रूबरू हो, उनकी शानदार क्रांतिकारी जिंदगी से प्रेरणा ले, इस क्षति को क्रांतिकारी लहर में दृढ़ता से डटे रहकर पूरा करने का संकल्प लें।
समय:
सुबह 11 बजे
स्थान:
दाना मंडी, चावा रोड, समराला (लुधियाना)
कामरेड सुरिंदर तिवाड़ी श्रद्धांजलि समारोह समिति, पंजाब
समिति सदस्य:
जसपाल जस्सी (कन्वीनर), पावेल कुस्सा, हरजिंदर सिंह, जोरा सिंह नस्राली, मेजर सिंह दूलोवाल, रुपिंदर सिंह रूप ककराला कलां, बहन माया देवी ककराला कलां (शहीद तरसेम बावा की बहन)
संपर्क:
94643 60755,
98763 94024, 94170 54015
प्रकाशन तिथि:
07 मई
2026

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