जियोंद गांव के भूमि मुद्दे की संक्षिप्त पृष्ठभूमि
वर्ष 1760-61 के आसपास फूल रजवाड़ों के उत्तराधिकारी रघु की जागीर स्थापित होने से पहले इस गांव के काश्तकार किसान मालगुजारी
(भूमिकर)
भुगतान सीधे दिल्ली दरबार को करते थे। इसके बाद जमींदार रघु और उसके वंशज 1859
तक बटाईदार काश्तकारों से बटाई वसूलते रहे। वर्ष 1859 में जियोंद गांव पटियाला रियासत के अधीन आ गया। समय के साथ इस गांव में बटाईदारी प्रणाली समाप्त हो गई और राज्य ने कृषकों से नकद राजस्व वसूलना शुरू कर दिया। पटियाला रियासत के प्रति वफादारी की शर्त पर इस गांव का राजस्व सामंत रघु के उत्तराधिकारियों को आवंटित कर दिया गया। यह व्यवस्था वर्ष
1947 तक जारी रही। "पंजाब काश्तकार एक्ट
1887" की धारा
5 के तहत इस गांव के किसान लगभग
717 एकड़ रकबे पर कब्जाधारक मुज़ारे किसानों के रूप में पंजीकृत किये गए थे। 1907-08 से
1947-48 तक की सभी जमाबंदियों में जियोंद के किसानों को काश्तकार मुज़ारों के रूप में दर्ज किया गया है,
जो राजस्व के अलावा कोई और लगान
(हिस्सा/अनुबंध)
नहीं अदा करते थे। यद्यपि मुजारा किसान आंदोलन के दबाव में रियासतों को मुजारा किसानों के कब्जे अधीन भूमि के मालिकाना हक उनको देने के लिए मजबूर होना पड़ा,
लेकिन वास्तव में कई कानूनी खामियां और कमजोरियां खुली रखी गईं । तदनुसार,
11 मार्च
1947 को पटियाला के महाराजा ने एक फरमान (फरमान-ए-शाही)
जारी किया कि जमींदार-मुज़ारा प्रणाली को समाप्त किया जा रहा है और
"काश्तकार अधिनियम"
की धारा 5, 6 और
8 के तहत आने वाले कब्जाधारक मुज़ारों को मालिकाना हक दिया जाएगा। लेकिन यह शर्त रखी गई कि कब्जाधारी काश्तकार को कब्जे वाली जमीन के केवल दो-तिहाई हिस्से का स्वामित्व दिया जाएगा, जबकि शेष एक-तिहाई हिस्सा जमींदार का होगा। इसी हुक्मनामे में यह भी कहा गया था कि भूमि का बंटवारा बिना किसी देरी के एक वर्ष की अवधि में लागू किया जाना चाहिए, लेकिन फिर भी
11 मार्च
1947 के हुक्मनामे को तीन वर्ष बाद उत्परिवर्तन संख्या
3156 दिनांक 20 मई
1950 के माध्यम से लागू किया गया। जिसके तहत जमाबंदी में मुज़ारे काश्तकारों को 2/3 भूमि का तथा जमींदारों को
1/3 भूमि का मालिक दर्ज किया गया,
जबकि जमींदारों व मुज़ारों के बीच भूमि का बंटवारा आज तक भी नहीं हुआ तथा मुज़ारे काश्तकार ही भूमि की जुताई व बुवाई करते आ रहे हैं। कब्जे अधीन सम्पूर्ण रकबे के मालिकाना हक की मांग कर रहे मुजारा किसान आंदोलन के दबाव में सरकार को 11 मार्च
1947 के फरमान-ए-शाही में आंशिक संशोधन करते हुए 12 सितम्बर
1948 को आदेश संख्या 33 जारी करना पड़ा,
जिसके तहत "पंजाब काश्तकार एक्ट
1887" की धारा
5, 6 और 8 के अंतर्गत आने वाले मुजारा किसानों, जो राजस्व के अलावा कोई किराया (हिस्सा/अनुबंध)
नहीं देते थे,
को उनके कब्जे वाली सम्पूर्ण भूमि का मालिकाना हक दे दिया गया। उपरोक्त संशोधन के आलोक में,
पैप्सू अधिनियम की धारा 9 में भी आवश्यक संशोधन किए गए। यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि इन सभी संशोधनों के समय तक
11 मार्च
1947 का फरमान-ए-शाही जियोंद गांव में लागू नहीं हुआ था। इस प्रकार, जियोंद के मुज़ारे किसान कब्जे अधीन पूरी जमीन के मालिक बना दिए जाने चाहिए थे। उपरोक्त कानूनी प्रावधानों तथा बाद में अधिनियमित व संशोधित सभी कानूनों में काश्तकारों को उनके कब्जे वाली समस्त भूमि पर मालिकाना हक प्रदान करने के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, जियोंद गांव के मुज़ारा किसान व जमींदार जमाबंदियों में क्रमश: 2/3 व
1/3 हिस्से के मालिक चले आते रहे। मुज़ारे काश्तकारों और जमींदारों के बीच राजस्व मामले से संबंधित एक केस मे निर्णय देते हुए,
जो विभिन्न राजस्व और सिविल अदालतों से होते हुए अंततः पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष पहुंचा था,
उच्च न्यायालय ने दिनांक 24-08-1972 के अपने निर्णय में राजस्व उद्देश्यों के लिए काश्तकारों को सम्पूर्ण भूमि का मालिक घोषित कर दिया था। लेकिन दूसरी ओर,
जिले की सिविल अदालतों ने मुज़ारे काश्तकारों के उस अनुरोध को खारिज कर दिया जिसमें "कब्जाधारी किसानों को मालिकाना हक देने संबंधी अधिनियम,
1953" के प्रावधानों और जमीनों पर लंबे समय से चले आ रहे कब्जे के आधार पर उन्हें उनके कब्जे अधीन सारी जमीन का मालिक घोषित करने तथा जमाबंदियों में आवश्यक संशोधन करने के निर्देश जारी करने की मांग की गई थी। जाहिरा तौर पर जिला सिविल न्यायालयों द्वारा ऐसा
12 सितम्बर
1948 के आदेश संख्या 33, पैप्सू अधिनियम की धारा 9 में किए गए संशोधनों तथा कब्जाधारक मुज़ारों को मालिकाना हक प्रदान करने के संबंध में बनाए गए और संशोधित किये गए सभी कानूनों की घोर अवहेलना करते हुए किया गया। कब्जे अधीन पूरी भूमि के मालकाना हक हासिल करने के लिए मुज़ारों द्वारा पंजाब सरकार के राजस्व विभाग के पास भी फरियाद की गई, जिसके परिणामस्वरूप पंजाब सरकार के राजस्व विभाग ने अपने पत्र दिनांक
04.07.1988 द्वारा डिप्टी कमिश्नर बठिंडा को आदेश देते हुए मुज़ारा किसानों को पूरी भूमि का स्वामित्व देने की कार्रवाई करने को कहा। उक्त आदेशों के अनुपालन में एस.डी.एम.
रामपुरा पूल ने अपने पत्र दिनांक 20.12.1988 के माध्यम से तहसीलदार को निर्देश जारी किए कि वे राजस्व अभिलेखों में आवश्यक प्रविष्टियां करते हुए कब्जाधारक काश्तकारों को सम्पूर्ण भूमि का स्वामी नामित करें। जमींदार इस बात से कहां सहमति होने वाले थे? उन्होंने तुरंत उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी। जमींदारों और बटाईदार किसानों द्वारा दायर विभिन्न याचिकाओं का निर्णय करते हुए उच्च न्यायालय ने,
बठिंडा जिला सिविल न्यायालयों के पहले के निर्णयों, जिनमें कब्जाधारी बटाईदार किसानों को उनके कब्जे वाली पूरी भूमि पर मालिकाना हक देने के अनुरोध को खारिज कर दिया गया था, का अनुमोदान करते हुए जमींदारों द्वारा दायर याचिका के हक मे फैसला सुना दिया और उन्हें भूमि के एक तिहाई हिस्से का मालिक घोषित कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा। सामंती वर्गों के न्यायालयों और सरकारी संस्थाओं मे वर्चस्व का इससे अधिक स्पष्ट प्रमाण क्या हो सकता है कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने सामंतवादियों के पक्ष में फैसला सुनाते समय पैप्सू सरकार द्वारा जारी
12 सितम्बर
1948 के आदेश संख्या 33, पैप्सू अधिनियम की धारा 9 में किए गए संशोधनों और कब्जाधारक काश्तकारों को मालिकाना हक देने के लिए बनाए गए और संशोधित किए गए सभी कानूनों को पैरों तले रौंद दिया। जियोंद गांव का हालिया मामला जमींदारों द्वारा दायर याचिका में गांव की चकबंदी के संबंध में उच्च न्यायालय द्वारा पंजाब सरकार को जारी निर्देशों से संबंधित है जिनके अनुपालन मे जिला प्रशासन द्वारा गांव की सरहदबंदी की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी। निस्संदेह भूमि का सीमांकन किसानों के हाथों से भूमि छिनने तथा जमींदारों द्वारा भूमि हड़पने की प्रक्रिया में एक निर्णायक मोड़ साबित होने वाला है।
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