शहीद भगत सिंह के इंकलाब के नारे की गूंज बुलंद करो
हमारी
धरती के लोग सदियों से राजाओं, नवाबों, सामंतों, ज़मींदारों और विदेशी आक्रांताओं के शोषण
से पीड़ित रहे हैं। सत्रहवीं शताब्दी में इस धरती पर ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के
आगमन ने इस शोषण को कई गुना बढ़ा दिया था। इस शोषण से मुक्ति पाने के लिए लोग
बार-बार उठ खड़े हुए और आज़ादी के लिए संघर्ष किया। लेकिन ब्रिटिश उपनिवेशवादियों
के विरुद्ध हमारे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन की यात्रा अपने अंदर अत्यंत जटिलताएं
समाए हुए थी। परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण की दो शताब्दियों बीत जाने
के बाद भी और विभिन्न स्थानों पर विद्रोहों की लम्बी श्रृंखला जारी रहने के बावजूद
भी, हमारा स्वतंत्रता आंदोलन ब्रिटिश साम्राज्यवादियों पर
करारा प्रहार करने में कमज़ोर रहा। इन जटिलताओं में एक यह थी कि जनता की
क्रांतिकारी शक्तियों के कमज़ोर होने के कारण, लुटेरे दलाल
वर्ग (जिनकी नुमाइंदगी नेहरू, गांधी, जिन्ना,
पटेल इत्यादि करते थे) राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व के केंद्र की
भूमिका संभाल चुके थे और जनता की विशुद्ध राष्ट्रीय भावनाओं को नपुंसक कार्रवाइयों
के बवंडर में उलझाए रखने में कामयाब हो रहे थे। एक और बाधा यह थी कि ब्रिटिश शासन
के विरुद्ध संघर्षरत शक्तियों के एक बड़े हिस्से को प्राप्त किए जाने वाले
लक्ष्यों के प्रति ही अस्पष्टता थी।
आज़ादी
के नक्श धुंधले थे। साम्राज्यवादी लूट और सामंती लूट के गहरे सबंध और इस गठबंधन को
आज़ादी आंदोलन के साझा चोट लक्ष्य के रूप में चिन्हित करने में अनुभवहीनता थी। सभी
जनशक्तियाँ और यहाँ तक कि पिछली सदी के दुसरे दशक में अस्तित्व में आई कम्युनिस्ट
पार्टी भी साम्राज्यवादी लूट और सामंती लूट की इस बग़लगीर जोड़ी के वास्तविक चरित्र
और इस से मुक्ति का एक स्पष्ट लक्ष्य उभार पाने में बेहद अक्षम सिद्ध हो रही थी।
इस लूट से मुक्ति के लिए जनक्रांति का संदेश भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए
अज्ञात था। ऐसे समय में, भगत सिंह और उनके साथियों
ने अपने बलिदान से क्रांति के संदेश को सींचा और उसे देश की फ़िजा में गूंजाया।
फाँसी के फंदे की ओर निडरता से बढ़ते युवाओं के मुख से इस देश की जनता ने 'इंकलाब ज़िंदाबाद' और 'साम्राज्यवाद
मुर्दाबाद' का पैगाम सुना। इन वीर योद्धाओं द्वारा
न्यायालयों में दी गई तकरीरों, सार्वजनिक हुए लेखों और जेल
से लिखे गए पत्रों के ज़रिये जनता को यह ज्ञात हुआ कि भारतीय जनता को गुलामी से
मुक्ति दिलाने के लिए इस धरती पर क्रांति आवश्यक है। "एक ऐसी क्रांति जिसका
तात्पर्य है - प्रत्यक्ष अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था को बदला जाए। क्रांति,
जिसका मतलब सिर्फ़ शासकों का बदलना नहीं बल्कि एक बिल्कुल नए ढाँचे
और एक नई शासन व्यवस्था की स्थापना है। जिसका मतलब है वो आज़ादी जिसमें इंसान
द्वारा इंसान का शोषण नामुमकिन हो जाएगा।"
ब्रिटिश
हुकूमत ने फ़िज़ा में इस पैगाम को फैलाने वाली साँसों को तो चाहे दबा दिया,
लेकिन 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' के नारे की गूँज उठती रही, लोगों के कानों तक
पहुँचती रही और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और उनके ख़िदमतगारों के दिलों में दहशत
पैदा करती रही। इन्हीं शब्दों की रोशनी में आगे के सालों में इस धरती पर तिभागा और
तेलंगाना जैसे विद्रोह भड़क उठे और मज़दूरों की विशाल संघर्ष लहरें उठी। महान
नौसैनिक विद्रोह के दौरान, यह नारा कराची और बम्बई की
दीवारों पर चमक उठा तथा लोगों और विद्रोही सैनिकों के होठों पर गूंज उठा, जिसने ब्रिटिश उपनिवेशवादियों को यहाँ से भागने पर मजबूर कर दिया था।
1947
में सत्ता परिवर्तन द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन की पीठ में खंजर घोंपा गया। इस दंभी
खेल के ज़रिये लोगों के समक्ष एक बड़े बदलाव का भ्रम पैदा कर,
साम्राज्यवादियों के उत्तराधिकारी भारतीय शासकों द्वारा इन शब्दों
को ही अप्रासंगिक कर देने की ख्वाइशें पाल लीं गई। लेकिन इस परिवर्तन के साथ,
न तो लोगों का संताप समाप्त हुआ, न ही लूट के
खिलाफ संघर्ष समाप्त हुआ, न ही इन शब्दों का संदर्भ समाप्त
हुआ। इन शब्दों की गूंज 1947 के बाद भी शासकों को आतंकित करती आ रही है।
श्रीकाकुलम, नक्सलबाड़ी से लेकर बस्तर तक, ये शब्द बार-बार बुलंद होते रहे हैं। साम्राज्यवादी शोषण के इजहारों के
विरुद्ध जन संघर्षों में यह प्रतिध्वनि जीवंत रही और जन संघर्षों को रौशनी और गति
प्रदान करती रही। जैसे-जैसे नव-उपनिवेशवाद और सामंतवाद के संयुक्त शोषण के पाश की
जकड़न हमारी धरती के लोगों पर कसती जा रही, इन शब्दों को
प्रतिध्वनित करने की आवश्यकता और उनके वास्तविक अर्थ को पहचानने की चाह तीव्र होती
जा रही है।
भगत
सिंह ने एक मुल्क के हाथों दुसरे मुल्क के शोषण के खात्मे की जो बात की थी,
आज हमारे देश के मेहनतकश लोग उसी शोषण के असंख्य रूपों के शिकार
हैं। साम्राज्यवादी शोषण ने हमारे देश के हर क्षेत्र में कैंसर की तरह गहरी जड़ें
जमा ली हैं। कृषि, उद्योग, सेवा,
बाजार, प्राकृतिक संसाधन आदि हर क्षेत्र से धन
और श्रम का साम्राज्यवादी शोषण हमारी अर्थव्यवस्था को बेदम बना रहा है। एक देश के
हाथों दुसरे देश का यह साम्राज्यवादी शोषण न केवल संसाधनों की जब्ती के माध्यम से,
बल्कि अपनी मर्जी की नीतियों और कानूनों को हमारी जनता पर थोपने के
माध्यम से भी प्रकट हो रहा है। क्रांति इस शोषण के पूर्ण उन्मूलन की घोषणा है। हर
क्षेत्र में हमारी राष्ट्रीय संपत्ति को निचोड़ रही विदेशी कंपनियों का निष्कासन
और जब्ती नव-जम्हूरी क्रांति के प्रमुख कार्यों में से एक है। साम्राज्यवादी शोषण
की इस रक्त-चूसने वाली जोंक को अपनी देह से हटाकर ही हमारे देश की अर्थव्यवस्था
अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है, फल-फूल सकती है और अपने
लोगों के लिए समृद्धि का सबब बन सकती है।
इसी
प्रकार,
हमारे देश में सदियों से चला आ रहा परिसंपत्तियों का अत्यधिक असमान
विभाजन और उससे उत्पन्न सामंती शोषण भी क्रांति के माध्यम से ही समाप्त होगा।
संपत्ति के इस ग़ैर-बराबरी वाले विभाजन के उन्मूलन ने ही मनुष्य द्वारा मनुष्य के
शोषण के आधार को नष्ट करना है। सदियों से मुट्ठी भर लोग अत्यधिक संसाधनों की मिल्कियत
के बल पर उच्च हैसियत और प्रतिष्ठा का आनंद लेते आ रहे है। इसके विपरीत, अपने श्रम से इस समाज को गति देने वाले लोग संसाधनहीन चले आ रहे हैं और हर
कदम पर खुद को दीन, कमजोर और असहाय महसूस करते आ रहे हैं। ये
लोग जीवन में पैर पैर पर धक्के खाने और संसाधनों पर मलकियत जमाए रखने वालों की
मिन्नत मोहताजी को मजबूर होते रहे हैं। भूमि के असमान वितरण को समाप्त कर, मेहनतकशों को भूमि और संपत्ति का स्वामित्व देना क्रांति का दूसरा प्रमुख
कार्य है। भूमि, औजारों और संसाधनों पर लोगों का समान
स्वामित्व वह आधार तैयार करता है जिसके माध्यम से मोहताजी को तोड़ा जा सकता है और
लोगों के गौरव-प्रतिष्ठा को बहाल किया जा सकता है।
क्रांति
के माध्यम से भूमि और संसाधनों का इस तरह हुआ पुनर्वितरण लाखों लोगों के लिए
रोजगार का आधार बनता है। भूमि की उपलब्धता से न केवल कृषि क्षेत्र में बड़ी संख्या
में लोगों को रोजगार मिलेगा, बल्कि इसके साथ ही
अनेक अन्य क्षेत्रों में भी रोजगार के अनंत अवसर सृजित होंगे। क्रांति से सृजित
जनपक्षधर समाज में ही उद्योग, सेवा एवं अन्य क्षेत्रों में
ऐसी नीतियाँ लागू की जा सकेंगी, जिनका उद्देश्य बेकार पड़ी
श्रमशक्ति को अधिकतम रोजगार प्रदान करना होगा, न कि
साम्राज्यवादी मुनाफों की आवश्यकताओं के अनुसार अंधाधुंध मशीनीकरण जैसी
कार्यप्रणाली को लागू करना। इस प्रकार, क्रांति ने वह आधार तैयार करना है जिस के ज़रिये सभी के लिए
रोजगार का लक्ष्य वास्तविक रूप से प्राप्त किया जा सकेगा।
भगत
सिंह और उनके साथियों ने कहा था कि क्रांति वह करिश्मा है जिसे प्रकृति भी पसंद
करती है। क्रांति के माध्यम से ही प्रकृति न्याय के सिद्धांत को लागू किया जा सकता
है। हमारे देश के लोगों को कदम कदम पर अनेकों भेदभावों का सामना करना पड़ता है।
क्रांति उन सभी भेदभावों का उन्मूलन करेगी। मुट्ठी भर लोगों की समृद्धि की रक्षा
करने वाली वर्तमान व्यवस्था बहुसंख्यक मेहनतकश जनता की बदहाली और उत्पीड़न के सहारे
ही चल रही है। इसीलिए इस अन्याय को सुनिश्चित करने के लिए उत्पीड़न,
भेदभाव, दमन इस व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं।
यह व्यवस्था लोगों के बीच छोटे-मोटे मतभेदों की रेखाओं को गहरा करके, मेहनतकश लोगों को भ्रमित और विभाजित करती है। इसी वजह से, तथाकथित आज़ादी और जम्हूरियत के दशकों बाद भी लिंग, नस्ल,
धर्म, जाति, क़ौमियत आदि
के आधार पर भेदभाव जारी रह रहे हैं। क्रांति ने ऐसे सभी भेदभावों के उन्मूलन की
नींव रखनी है। इन मतभेदों को बढ़ावा देने वाली ताकतें क्रांति की कट्टर दुश्मन
हैं। ऐसी सभी ताकतों को नष्ट कर, क्रांति प्रकृति विस्तार
में सम्मिलित सभी मनुष्यों के लिए समानता की वाहक बनेगी।
हमारे
देश में,
लाभ-लोलुप साम्राज्यवादी व्यवस्था ने न केवल मानव श्रम और पृथ्वी के
संसाधनों का शोषण किया है, बल्कि यह मुनाफे के लिए प्राकृतिक
पर्यावरण को भी नष्ट कर रही है। लाभ की इसी हवस के कारण ही धरती से कई प्रकार की
वनस्पतियाँ, जनजातियाँ और नस्लें विनष्ट हो गई हैं। अनेकों
जगहों पर बाढ़, सूखा और आपदाएँ, मुनाफों
की इसी लालसा का परिणाम हैं। मुनाफे की इस हवस ने इस धरती पर लाखों दुर्घटनाओं को
जन्म दिया है और अनगिनत मानव जीवन की बलि ली है। क्रांति के ज़रिये ही मुट्ठी भर
लोगों के मुनाफों हेतु प्रकृति से छेड़छाड़ के प्रयासों पर अंकुश लगाया जा सकता
है। हमारे प्राकृतिक पर्यावरण को विनाश से बचाया जा सकता है और उसे लंबे समय तक
रहने योग्य रखा जा सकता है।
साम्राज्यवादी
ग़लबा और भारतीय शासकों की निरंकुश, विस्तारवादी
और अल्पसंख्यक-विरोधी निति मिलकर भारत में
अनेकों भाषाओं, संस्कृतियों और क़ौमियतों को कुचलते आए हैं।
कश्मीर जैसी क़ौमियतें दशकों से निरंकुश और दमनकारी शासन से पीड़ित हैं। हमारी
भूमि के लोग पश्चिमी संस्कृति के दबदबे तले रह रहे हैं। उन पर थोपी गई विदेशी भाषा
उनकी मौलिकता की बलि ले रही है और वे अपनी मातृभाषा से दूर होने के लिए अभिशप्त
हैं। इस ग़लबे के कारण हमारी अनेकों भाषाएँ हजारों शब्द खो चुकी हैं और पतन की ओर
अग्रसर हैं। क्रांति के ज़रिये ही इस राष्ट्रीय उत्पीड़न से मुक्ति हासिल होगी।
हमारी मातृभाषाओं और संस्कृति को फिर से खिलने का अवसर मिलेगा।
हमारे
देश में सामंतवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी क्रांति ने वह नींव रखनी है जिस
पर भगत सिंह द्वारा परिकल्पित समाजवादी समाज का निर्माण किया जाएगा। वह समाजवादी
व्यवस्था जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को पूरी तरह समाप्त करेगी। उस समाज में
वह भौतिक आधार निर्मित होगा जिससे मानव शक्ति के हाथों को काम करने के साधन उपलब्ध
होंगे,
वह सामाजिक आधार निर्मित होगा जहाँ मनुष्य रोजी-रोटी की चिंताओं से
मुक्त हो, वह बौद्धिक आधार निर्मित होगा यहां असंख्य मानव
मस्तिष्क दो वक्त की रोटी के बंधनों से मुक्त हो मौलिक विचारों के रचयिता बनते हैं,
वह सांस्कृतिक आधार निर्मित होगा यहां मनुष्य खुदगर्ज़ी से ऊपर उठकर
इस समाज की भलाई के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है। यही एकमात्र मार्ग है जिस पर
चल कर मानव समाज एकजुट होकर और पूरी क्षमता के साथ समस्त मानव जाति की समृद्धि के
लिए दृढ़ उद्यम करता है।
इस
प्रकार,
आज भी भगत सिंह द्वारा बुलंद किया गया क्रांति का मार्ग ही भारत की
मेहनतकश जनता की वास्तविक स्वतंत्रता का एकमात्र मार्ग है। इस मार्ग पर चलकर ही
सभी प्रकार के शोषण की बेड़ियाँ तोड़ी जा सकती हैं और सदियों से उत्पीड़ित मेहनतकश
जनता सही मायनों में जिंदगी जी सकती है। इसी मार्ग पर दीन-हीन का गौरव और निर्बल
का बल निहित है। समय, भगत सिंह द्वारा गूँजऐ गए 'इंकलाब ज़िंदाबाद' के नारे को उसी साहस, दृढ़ निश्चय, विश्वास और जज़्बे के साथ बुलंद किये
जाने की प्रतीक्षा कर रहा है।
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