Monday, December 8, 2025

पर्यावरण का नाश करने वाले व्यावसायिक प्रोजेक्टों के खिलाफ जाग्रित और संघर्षरत लोग

 पर्यावरण का नाश करने वाले व्यावसायिक प्रोजेक्टों के खिलाफ जाग्रित और संघर्षरत लोग

ला-मिसाल संगठित विरोध के करिश्मे

प्रोजेक्ट रोक दिए गए!



हमारे देश के शासकों द्वारा मुल्क पर थोपे गए साम्राज्यवादी निर्देशित नकली 'विकास मॉडल' के विभिन्न प्रभावों के खिलाफ जनता की चेतना अंगड़ाई ले रही है। आर्थिक लूट के मुद्दों के साथ-साथ इस मॉडल द्वारा फैलाया जा रहा जनसंहारक पर्यावरण विनाश भी अब लोगों के सरोकार के दायरे में आ रहा है। खासकर पिछले दो-ढाई दशकों से प्रदेश में फैल रही गंभीर बीमारियों के संकट की जड़ के रूप में भी इस व्यवस्था द्वारा अब तक लाई गई/लाई जा रही जनविरोधी व पर्यावरण-विरोधी लूटेरियों नीतियों की चर्चा होने लगी है। यह शुभ संकेत ही है कि लोग, लग चुके या लगने जा रहे इन जनसंहारक प्रोजेक्टों का विरोध करने के लिए खुद ब खुद सामने आ रहे हैं।

दो वर्ष पहले ज़ीरा शराब फैक्ट्री द्वारा बर्बाद किए जा रहे जल स्रोतों के खिलाफ उस इलाके के लोगों ने लंबे समय तक संघर्ष का मोर्चा मज़बूती से संभाले रखा। सरकारी समर्थन और सभी राजनीतिक पार्टियों द्वारा फैक्ट्री के पक्ष में मौन सहमति के बावजूद, जनसंघर्ष के कारण फैक्ट्री को बंद करने पर मजबूर होना पड़ा। बुद्धा नाले के प्रदूषण के खिलाफ भी हाल के समय में लोगों का बड़ा आक्रोश फूटा, जो आज भी अलग-अलग रूपों में जारी है। इसी प्रकार बठिंडा जिले के कमालू गाँव में टायर जलाकर तेल बनाने वाली फैक्ट्री के विरोध में इलाक़े के गाँवों का आंदोलन पिछले दो महीनों से प्रशासन की सख्ती के बावजूद जारी है। पिछले दो माह में सरकार द्वारा प्रस्तावित रुचिरा पेपर मिल (चमकौर साहिब) और जेएसडब्ल्यू सीमेंट फैक्ट्री तलवंडी आकलियां (मानसा) के खिलाफ स्थानीय निवासियों द्वारा पर्यावरण प्रेमियों की मदद से महत्वपूर्ण सरगर्मी की गई है। फैक्ट्रियों को स्थापित करने के लिए रखी गई जनसुनवाई के दौरान, फैक्ट्री प्रबंधकों और प्रशासन को स्थानीय लोगों ने इन प्रोजेक्टों को जनविरोधी व पर्यावरण-विरोधी सिद्ध करते हुए निरुत्तर कर दिया। यहाँ हम इन दोनों फैक्ट्रियों के खिलाफ हुई जनसुनवाई की संक्षिप्त रिपोर्ट पेश कर रहे हैं।

चमकौर साहिब के इलाके में प्रस्तावित रुचिरा पेपर मिल लगाने का फैसला अकाली दल बादल की सरकार (2012-17) के दौरान हुआ था। कांग्रेस सरकार द्वारा इस फैक्ट्री के लिए दो गाँवों की पंचायती ज़मीन को अवैध तरीके से डमी बोली लगाकर बेच दी गई। वर्तमान 'आप' सरकार ने इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाते हुए गलत तथ्यों के आधार पर आनन-फानन में एन ओ सी जारी कर दीं। यह सब कुछ जनविरोध से डरते हुए पर्दे के पीछे छिपकर किया गया। 29 मार्च को इस फैक्ट्री की जनसुनवाई के बारे में अखबारी विज्ञापन से लोगों को प्रोजेक्ट की जानकारी मिली। 30 अप्रैल को सुनवाई की तारीख तय हुई। 7 अप्रैल को कंपनी द्वारा अधिग्रहीत ज़मीन पर अपना दफ़्तर बनाने की कोशिश की गई, जिसे लोगों ने विरोध कर रोक दिया। जनसुनवाई और फैक्ट्री की स्थापना को रोकने के लिए "चमकौर साहिब मोर्चा" नामक एक समिति बनाई गई, जिसे आगे विभिन्न टीमों में बांट दिया गया। समिति की टीमों ने विभिन्न स्रोतों से आंकड़े इकट्ठा करने के इलावा पहले से लगी पेपर मिलों के इलाकों का दौरा करके इन मिलों के कारण वहाँ के पर्यावरण पर पड़े प्रभावों की रिपोर्टें संकलित कीं। एक टीम ने विभिन्न गाँवों में जाकर लोगों को जागरूक करते हुए जनसुनवाई के दौरान लामबंद करने के किये पूरा जोर लगाया।

30 अप्रैल को जनसुनवाई शुरू होने पर, लोगों ने 'पर्यावरण रिपोर्ट' (Environment Impact Report), जो कानूनी रूप से सुनवाई से एक माह पूर्व आम जनता को उपलब्ध करवाई जानी चाहिए, जारी न करने पर ज़ोरदार आपत्ति जताई। जनसुनवाई इसी रिपोर्ट के आधार पर होनी चाहिए थी, लेकिन प्रशासन और कंपनी अधिकारी इसी तरह 'जनसुनवाई' करवाए जाने पर जोर डालते रहे। जनता के ज़ोरदार विरोध के कारण, प्रशासन को कार्रवाई रजिस्टर में दर्ज करना पड़ा कि यह सुनवाई बिना रिपोर्ट दिए की जा रही है। लोगों ने आपत्ति जताई कि कंपनी से आधा किलोमीटर दूर नीलो नहर और कुछ ही मीटर दूर बुद्धा दरिया है। एक ड्रेन अधिग्रहित ज़मीन के बीच से निकलती है। कानूनी रूप से इतने जल स्रोतों के नज़दीक फैक्ट्री नहीं लग सकती, तो एन ओ सी किस आधार पर दी गई? सरहिंद नहर से फैक्ट्री के लिए रोजाना 1 करोड़ 57 लाख लीटर पानी लिया जाएगा, इससे जल संकट पैदा होगा। फैक्ट्री से निकलने वाले मानव उपयोग के लिए अयोग्य पानी के पुन: उपयोग की कोई योजना नहीं है, क्योंकि यहां की ज़मीन 'सेम' है, जिससे खेती के लिए इस पानी का उपयोग असंभव है। कंपनी को इतने पानी के उपयोग के लिए 3000 एकड़ ज़मीन चाहिए, पर उनके पास सिर्फ 43 एकड़ है। ऐसे में प्रदूषित पानी या तो भूमि जल को गंदा करेगा या बुद्धा नाले से सतलुज को प्रदूषित करेगा। यह डी कैटेगरी की सबसे अधिक प्रदूषित फैक्ट्री मानी जाती है, जो मनुष्यों और पर्यावरण के लिए अत्यंत ख़तरनाक है। जहां कहीं भी पेपर मिलें चल रही हैं, वहां के लोग काला पीलिया, पोलियो, मंदबुद्धिता, बांझपन, कैंसर, और चमड़ी रोगों से पीड़ित हैं। लोगों ने अपने तर्कों के जरिये यह आपत्ति भी जताई कि कंपनी की रिपोर्ट को प्रदूषण बोर्ड के अधिकारियों द्वारा बिना जांच के ही कंपनी के पक्ष में उसी तरह स्वीकार कर लिया जाता है। जनता के तथ्यपूर्ण तर्कों के आगे निरुत्तर हुआ प्रशासन बार-बार लोगों पर अपनी झुंझलाहट ज़ाहिर कर रहा था।जनता के कड़े विरोध और दवाब के कारण, सुनवाई के अंत में प्रशासन को मौखिक वोटिंग करवानी पड़ी जिसमें कंपनी के कर्मचारियों को छोड़कर सभी लोगों ने फैक्ट्री लगाने के विरोध में असहमति दिखाई। इस तरह जनता ने अपनी चेतना और एकता के बल पर इस जनसुनवाई में सामूहिक रज़ा  लागू करते हुए इस जनविरोधी प्रोजेक्ट को खारिज करवा दिया। जनता के विरोध की अभिव्यक्ति इतनी प्रबल थी कि प्रशासन अगले कदम उठाने से चुप्पी साध गया।

तलवंडी साबो पावर लिमिटेड थर्मल प्लांट के नज़दीक गाँव तलवंडी अकलियां, ज़िला मानसा में प्रस्तावित सीमेंट फैक्ट्री का भी लोगों ने इसी तरह विरोध लामबंद किया। यहाँ कंपनी ने चुपचाप 45 एकड़ ज़मीन खरीद तो ली, लेकिन इस ज़मीन को जी टी रोड से जोड़ने के लिए और जमीन खरीदने के लिए किये जा रहे प्रयासों के समय गाँव वालों को फैक्ट्री की भनक लग गई। उसी दिन से ही गाँववाले फैक्ट्री न लगने देने के लिए सक्रिय हो गए। गांव के युवाओं की कमेटी जो दिल्ली किसान संघर्ष के दौरान सक्रिय रही थी, ने फिर से संगठित हो मोर्चा संभाल लिया। इस कमेटी ने आसपास के गाँवों के लोगों और पंचायतों लामबंद करना शुरू कर दिया। साथ ही चमकौर साहिब मोर्चा, ज़ीरा फैक्ट्री विरोध मोर्चा और अन्य पर्यावरण प्रेमियों के साथ सम्पर्क कर, इस फैक्ट्री के लोगों और पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी हासिल की। फैक्ट्री स्थापना के खिलाफ इलाक़े की पंचायतों के प्रस्ताव पारित करवा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपे गए। मजदूरों और किसानों की यूनियनों से भी संघर्ष में साथ देने की अपील की गई। 14 जुलाई को होने वाली जनसुनवाई से एक दिन पहले, गाँववासियों ने विभिन्न पहलुओं को कवर करती एक प्रश्नावली तैयार की और जनसुनवाई के दौरान डटकर खड़ने का संकल्प दोहराया। चमकौर साहिब में हुई पिछली किरकिरी के कारण पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस बार ' पर्यावरण प्रभाव रिपोर्ट' (EIR) सुनवाई से एक महीना पहले जारी कर दी। सुनवाई के दिन समस्त गाँव परिवारों सहित एकजुट होकर सभा में शामिल हुआ। जनसुनवाई में सबसे पहले कंपनी ने कहा कि सिर्फ प्रभावित लोगों को ही बोलने दिया जाए, लेकिन लोगों की एकजुटता के चलते किसी को भी आपत्ति दर्ज कराने का हक लागू करवा लिया गया। कंपनी की रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों की धज्जियां उड़ाते हुए लोगों ने आपत्ति जताई कि थर्मल प्लांट के प्रदूषण से पहले ही गंभीर रोगों की चपेट में आ चुके लोगों के हालात इस फैक्ट्री के लगने से और भी दयनीय हो जाएंगे। कंपनी के बड़े पैमाने पर रोज़गार देने के दावों की फूंक निकालते हुए लोगों ने साबित कर दिया कि स्थायी रोजगार केवल 240 लोगों को मिलेगा, और उसमे भी स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने का कोई प्रावधान नहीं है। इलाके में हवा की गुणवत्ता माप 126 है, जबकि 100 के ऊपर, ऐसी रेड कैटेगरी की फैक्ट्री कानूनन नहीं लग सकती। फैक्ट्री लगने पर रोज़ाना आने वाले 1500 ट्रकों की पार्किंग के लिए कंपनी के पास न तो कोई योजना है, न ही जगह। 2011 की जनगणना के आधार पर रिपोर्ट में क्षेत्र को पिछड़ा हुआ बताकर, फैक्ट्री द्वारा 'जनकल्याण योजनाओं' के सहारे इलाके के विकास का दावा किया गया था, पर लोगों ने पिछले डेढ़ दशक में थर्मल द्वारा प्रदान किए गए "विकास की बरकतों" की तफ़सील पेश करते हुए इस दावे को पूरी तरह नकार दिया। सुनवाई में उपस्थित प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की ज़ीरा शराब फैक्ट्री संघर्ष के समय निभाई पक्षपाती भूमिका को भी लोगों ने सार्वजनिक रूप से उजागर किया। सुनवाई के अंत में हुई ज़ुबानी वोटिंग में वहां उपस्थित लोगों ने एकमत से फैक्ट्री लगाने के विरोध में वोटिंग की। इस प्रकार यह जनसुनवाई भी सरकारी और कारपोरेट कंपनियों के कागज़ी छल-प्रपंच और जनविरोधी इरादों के खिलाफ जनता के सामूहिक विरोध का इज़हार बन गई।

अन्य शासक वर्गीय पार्टियों की तरह पंजाब सरकार द्वारा लागू किया जा रहा कारपोरेटी विकास मॉडल ही पंजाब के जल संसाधनों को ज़हरीला बना रहा है। पंजाब सरकार की बड़े उद्योगपतियों के हितों को पूरा करने वाली और जनविरोधी भूमिका इन प्रोजेक्ट्स की सेवा में खुलकर सामने आती है। इस गंभीर मुद्दे पर जनता का लामबंद होना और विरोध करना एक सकारात्मक घटनाक्रम है।जन-पक्षधर जम्हूरी और क्रांतिकारी शक्तियों द्वारा इसे प्रोत्साहित करने की जरूरत है। जनता के पर्यावरणीय सरोकारों को लोगों के वर्गीय-तब्काती संघर्षों के साथ जोड़ने के लिए प्रयास जुटाने की जरूरत है, क्योंकि इस तरह की लामबन्दियों और विरोध सरगर्मियों में मौकापरस्त सियासतदानों की मौजूदगी इन्हें पथभृष्ट कर निहित स्वार्थों की बली चढ़ा दिए जाने के खतरे समाए होती है। जनविरोधी औद्योगिक प्रोजेक्टों के विरोध में जनता की स्वतःस्फूर्त सक्रियता एक सकारात्मक घटनाक्रम है, लेकिन सत्ता के लिए लालायित मौकापरस्त सियासतदानों की उपस्थिति इस स्वतःस्फूर्त सक्रियता को निहित स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने का साधन बन सकती है। प्रवासी श्रमिकों के खिलाफ ज़हर उगलने वाले हिस्सों की मौजूदगी से इस विरोध का दायरा संकुचित होने के साथ-साथ इस आंदोलन को मेहनतकश जनता में फूट डालने के औजार की तरह इस्तेमाल कर लिए जाने का खतरा भी बना रहता है। प्रस्तावित फैक्ट्री विरोधी संघर्ष में थर्मल मजदूरों के संगठन की भागीदारी एक सकारात्मक घटनाक्रम है।

पर्यावरण प्रदूषण से सबंधित इन औद्योगिक प्रोजेक्ट विरोधी सरगर्मियों को साम्राज्यवादी निर्देशित विकास मॉडल के चौखटे में संबोधित होने की जरूरत है। इस मुद्दे पर लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप, पर्यावरण को संरक्षित करने वाली और सघन श्रम शक्ति को रोजगार मुहैया करवाने वाले छोटे उद्योग लगाने की मांग उभारे जाने की जरूरत है। लेकिन ऐसा करते समय औद्योगिकीकरण का विरोध करने के आख्यान की अभिव्यक्ति से बचना चाहिए। जन-विरोधी औद्योगिक प्रोजेक्टों का विरोध करते हुए, इसे पंजाब बनाम प्रवासी के आख्यान में परिवर्तित होने से रोकने के लिए सतर्क रहने की जरूरत है। हकूमतों को असली दोषी के तौर पर कठघरे में लाए जाने की जरूरत है। जन-केन्द्रित औद्योगिक मॉडल विकसित करने के लिए बड़े कारोबारियों और पूंजीपतियों पर टैक्स लगाकर, पर्यावरण को संरक्षित रखने वाली तकनीक आधारित उद्योगों का विस्तार करने की मांग उभारे जाने की जरूरत है। जन-हितैषी जम्हूरी और जनोन्मुखी शक्तियों को उपरोक्त चौखटे के अनुसार विरोध आंदोलनों को दिशा, मार्गदर्शन और नेतृत्व देने के लिए संघर्षरत हिस्सों के साथ गहराई से जुड़ना ज़रूरी है। ऐसी लामबंदियों को, सही चौखटे और धर्मनिरपेक्ष जम्हूरी आधार के बिना, वोट की राजनीति करने वाले नेताओं के स्वार्थी मंसूबों, कट्टरपंथी तत्वों की घुसपैठ, क्षेत्रीय संकीर्णता और निहित तब्काती हितों जैसी अलामतों का खतरा बना रहता है। क्रांतिकारी जनहितैषी और जम्हूरी शक्तियों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे इन लामबंदियों व संघर्षों को ऐसे खतरों से बचाएं और सही दिशा में आगे बढ़ाएं।

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