किसानों के प्रचंड रोष का करिश्मा
लैंड पूलिंग नीति रद्द
पंजाब
में देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए लैंड बैंक बना कर देने की सभी
सरकारों की संयुक्त परियोजना को किसान जनता की एकजुट शक्ति ने एक वार तो शिकस्त दे
दी है। संघर्ष अभी शुरू ही हुआ था कि किसानों के गुस्से के शुरुआती ट्रेलर ने ही 'आप' सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। लोगों
में उमड़ रहे गुस्से की सोशल मीडिया पर प्रकट हो रही झलकियों ने ही पंजाब सरकार को
कंपकंपी छेड़ दी। आप सरकार के इस यू-टर्न
में कृषि कानूनों के खिलाफ ऐतिहासिक किसान संघर्ष का प्रताप भी शामिल है। जिन
किसान नेताओं और किसान संगठनों को मुख्यमंत्री तुछ समझने की चेष्टा कर रहे थे,
उन्हें उन्हीं के सामने घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा। आखिरकार
लैंड पूल नहीं की जा सकी और मान सरकार का "विकास" का पहिया थम गया!
ज़मीनें
हड़पने की इस व्यापक परियोजना को यूं ब्रेक लगा देना कोई साधारण प्राप्ति नहीं है।
पंजाब की आप सरकार और उसका दिल्ली नेतृत्व इसे सफल बनाने के लिए एड़ी चोटी का जोर
लगा रहा था। एक दफा तो पार्टी के पूरे नेतृत्व और सरकार ने जनता को बरगलाने के लिए
अपने सारे संसाधन और प्रचार तंत्र पूरी तरह झोंक दिए थे। लेकिन लोगों की ज़मीन पर
बोले जा रहे इस प्रत्यक्ष डाके के चलते, लोगों
को तमाम कोशिशों के बावजूद भ्रमित कर पाना मुश्किल था।
यह
भी एक दिलचस्प हकीकत है कि यह योजना सिर्फ़ आप सरकार की ही नहीं थी। भूमि बैंक
बनाकर देने और लुटेरी कंपनियों के धंधों के लिए ज़मीनें पेश करने की यह योजना लगभग
डेढ़ दशक से चली आ रही है, लेकिन यह इसलिए परवान
नहीं चढ़ पा रही क्योंकि पंजाब के किसान ज़मीनों पर हो रहे हमले को अच्छी तरह
पहचान चुके हैं और उसके ख़िलाफ़ जूझते आ रहे हैं। ज़मीनों पर हो रहे हमलों के
ख़िलाफ़ किसानों के गुस्से ने तमाम शासक वर्गीय अवसरवादी पार्टियों को यह भी दिखा
दिया है कि सत्ता में आने पर भी, अपने साम्राज्यवादी आकाओं
से किए गए वादों को पूरा करना अब आसान नहीं रहा। वैसे तो केंद्री स्तर से ही 2013 के भूमि अधिग्रहण क़ानून को बदलने की योजनाएँ बन रही हैं। लेकिन देश में
जगह-जगह भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ किसानों का विरोध, मोदी
सरकार को इस क़ानून को बदलने से हाथ पीछे खींचने को मजबूर करता चला आ रहा है।
लैंड
पूलिंग नीति के ख़िलाफ़ प्रकट हुए किसानों के इस रोष ने दिखा दिया है कि अब
कंपनियों को ज़मीनें सौंपना कोई आसान सा काम नहीं है। इसके लिए हकूमत को दूसरे
हथकंडे और भ्रामक तरीके ढूँढ़ने होंगे। यूं तो लैंड पूलिंग नीति भी पिछली नीति के
मुक़ाबले एक भ्रामक तरीक़ा ही थी। यह तरीका प्रत्यक्ष जबरन भूमि अधिग्रहण से बचने
का एक प्रयास भी था और एक तरह से किसानों को धोखे में रखकर उनकी सहमति प्राप्त
करने की मंशा थी। लैंड पूलिंग का यह तरीका अन्य राज्यों की सरकारों द्वारा भी
अपनाया जा रहा है ताकि 2013 के भूमि अधिग्रहण
अधिनियम की आड़े आ रही कुछ शर्तों को दरकिनार किया जा सके। लेकिन विकसित शहरी
सम्पदाओं में प्लॉटों के सब्ज़बाग किसानों को भ्रमित करने के लिए काफी न थे।
संगठित
और जागरूक किसानों को यह याद रखना चाहिए कि सरकार ने भले ही संघर्ष के दबाव में यह
फैसला बदला है लेकिन उपजाऊ ज़मीनों को जबरन अधिग्रहित करने की नीति नहीं बदली।
भूमि बैंक बनाने की परियोजना अभी वहीं की वहीं है और वह भूमि बैंक राज्य के
किसानों की ज़मीनों को जबरन छीनकर ही बनाया जाना है। कंपनियों को कारोबार के लिए
ज़मीनें सौंपकर विकास करने का मॉडल लागू करने की योजना अभी उसी तरह कायम है और इस
योजना के तहत ज़मीनें अधिग्रहित करने के वैकल्पिक रास्ते तलाशे जाएगें। इसलिए,
उन वैकल्पिक रास्तों को चिन्हित करने के लिए सतर्कता ज़रूरी है। लैंड
पूलिंग नीति के लिए ज़मीनें इकट्ठा करने की एक परियोजना से पीछे हटी सरकार ने
शामलात और पंचायती ज़मीनों को बेचने का रास्ता पकड़ लिया है। साथ की साथ यह कदम
उठाना दर्शाता है कि ज़मीनों पर हमला कितना गहरा, जोरदार और व्यापक है और इसका मुक़ाबला करने के लिए संगठित
किसान लहर की सूझ-समझदारी और दृढ़ संकल्प की मांग करता है। विश्व साम्राज्यवादी
कंपनियों और देश के बड़े पूंजीपतियों द्वारा राज्य में कारोबार करने की पहली शर्त
भूमि बैंक है। विभिन्न परियोजनाओं के लिए वांछित ज़मीन के बिना, वे राज्य में आने को तैयार नहीं हैं। इसलिए, किसानों
की उपजाऊ ज़मीनों के जबरन अधिग्रहण की नीति को रद्द करवाने के लिए अभी एक लंबे
संघर्ष की ज़रूरत है।
ज़मीनों
के जबरन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ संघर्षों के दौरान, साम्राज्यवादी
कंपनियों और बड़े पूँजीपतियों के हितों की पूर्ति करने वाले विकास के इस पूरे मॉडल
पर निशाना साधना ज़रूरी है क्योंकि इस मॉडल को रद्द करवाए बिना ज़मीन बैंक बनाने
की योजनाओं को ध्वस्त नहीं किया जा सकता। जनता के विनाश के इस मॉडल को रद्द करवाने
तथा कृषि और उद्योग की समानांतर-एकीकृत प्रगति पर आधारित देश के आत्मनिर्भर विकास
के जन-हितैषी विकास मॉडल को लागू करवाने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है।
वर्तमान जीत से उत्पन्न उत्साह को इस तरह के लक्ष्य निर्धारित करने और उनके लिए
संघर्ष करने की प्रेरणा में बदलना होगा।
इस
जीत के बाद, समराला में 24 अगस्त
को संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा आयोजित विजय रैली में उमड़े जनसैलाब ने एक ओर जहाँ
लोगों में जीत के प्रति उत्साह और एकता के हौंसले का परिचय दिया है, वहीं दूसरी ओर मंच से किसान संगठनों के नेताओं द्वारा दिए गए भाषणों में
ज़मीनों और कृषि क्षेत्र पर तेज़ होते साम्राज्यवादी हमलों के ख़तरे के प्रति
सरोकारों को बहुत ही स्पष्टतया से उजागर किया गया। इस बात पर चौकसी का इजहार भी
व्यक्त हुआ कि किसानों की ज़मीनों पर ख़तरा अभी टला नहीं है। मंच से पंजाब में
किसान-मज़दूर हितकारी कृषि नीति बनाने और लागू करने की माँग की गई। साथ ही,
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले
विनाशकारी प्रभावों पर चर्चा हुई और किसानों के लिए विध्वंसकारी इन क़दमों से बाज
आने के लिए मोदी सरकार को कड़े शब्दों में ताड़ना की गई। कुल मिलाकर, यह एकत्र्ता संघर्ष की जीत का जश्न मनानें के साथ-साथ इसे और मजबूत करने
और इस तरह के तमाम हकूमति हमलों के खिलाफ संघर्ष की आवश्यकता को उजागर करने का एक
अवसर बन गई।
No comments:
Post a Comment