अमेरिकी टैरिफों की भयंकर मार:
उजाड़ेगी
निर्यात-उन्मुख उद्योग और रोजगार
अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर 27
अगस्त से लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के लागू होने के बाद, अमेरिका
को सामान का निर्यात करने वाले उद्योग जगत में हाहाकार मच गयी है। भारतीय सामान
अमेरिकी बाज़ार में पहले से डेढ़ गुना महंगा हो जाने से उसकी माँग कम हो जाएगी और
कम टैरिफ वाले देशों की तुलना में वे अमेरिकी बाज़ार में टिक नहीं पाएगा। टैरिफ
लागू होने से पहले ही, इसकी माँग न रहने की आशंकाओं के चलते
उत्पादन प्रक्रिया ठप्प होने, ऑर्डरों को होल्ड पर रखने और ऑर्डर रद्द
होने का सिलसिला शुरू हो गया था। कारीगर श्रमिकों की छंटनी शुरू हो गई थी और इस
मसले का कोई समाधान न निकले की सूरत में इन निर्यात व्यवसायों का विनाश, लाखों
श्रमिकों की छंटनी, इन कारीगरों,
श्रमिकों और आपूर्ति
श्रृंखला में हिस्सेदार कई अन्य सहायक व्यवसायों और परिवारों का भविष्य अनिश्चितता
और अंधकार में धकेल दिए जाना तय है। एक व्यापक मानवीय संकट पैदा हो सकता है।
चूंकि ये टैरिफ अभी-अभी लागू हुए हैं, इसलिए
इनके विस्तृत प्रभावों के सामने आने में अभी कुछ समय लगेगा, लेकिन
फिर भी अलग - अलग निर्यात उद्योगों पर संभावित प्रभाव का अभी से काफी हद तक अनुमान
लगाया जा सकता है। जिसकी संक्षिप्त चर्चा नीचे दी गई है:
अमेरिका को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में एक
महत्वपूर्ण वस्तु तराशे हुए हीरे, मानक और आभूषण हैं। गुजरात इस हीरा
व्यवसाय का मुख्य केंद्र है। वर्ष 2024-25 में भारत ने अमेरिका को लगभग 10
अरब डॉलर मूल्य के हीरे या हीरे जड़ित
आभूषणों का निर्यात किया था, जो कुल हीरा निर्यात का 40
प्रतिशत था। पिछले वर्ष इस पर टैरिफ दर मात्र 2.1% थी। जो अब बढ़कर 52%
हो गई है। यदि ये भारतीय माल अमेरिकी बाजार में नहीं बिकता, तो
इतनी बड़ी मात्रा के लिए जल्द ही कहीं वैकल्पिक बाजार मिलना आसान नहीं है। इसीलिए
गुजरात का हीरा उद्योग शोक में डूबा हुआ है। अकेले सूरत में ही लगभग 12
लाख श्रमिक इस उद्योग से जुड़े बताए जाते हैं। प्राप्त समाचारों के अनुसार टैरिफ
लागू होने से पहले ही लगभग एक लाख हीरा श्रमिकों की छंटनी कर दी गई थी। माल की
मांग में संभव भावी कटौती लाखों अन्य श्रमिकों के सिर पर छंटनी की तलवार की तरह
लटक रही है। व्यवसायों का बड़े पैमाने पर उजाड़ा होना तय है।
अमेरिका को बड़े पैमाने पर किए जाने वाले निर्यातों
में कपड़ा और परिधान उद्योग महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वर्ष 2024-25
में इस उद्योग ने अमेरिका को 10.8 अरब डॉलर का निर्यात किया, जो
भारत के इस उत्पाद के निर्यात का 35% था। भारत में इस उद्योग से जुड़े दस
प्रमुख क्लस्टर हैं। नई टैरिफ दरों के लागू होने से अमेरिका में टैरिफ दरें बढ़कर 63.9%
हो गई हैं। इतनी ऊंची टैरिफ दरों का भारतीय निर्यात की मांग पर बहुत बुरा असर
पड़ेगा। भारतीय सामान वियतनाम, बांग्लादेश और कम टैरिफ दरों वाले अन्य
देशों के सामान के मुकाबले टिक नहीं पाएगा। प्राप्त समाचारों के अनुसार तमिलनाडु
के त्रिपुर, नोएडा,
सूरत आदि में उत्पादन
प्रकिर्या बंद हो गई है। नोएडा और गुरुग्राम में क्षमता विस्तार की योजनाओं को
ब्रेक लग गए हैं। लुधियाना में धागे और कपड़े की बिक्री पर मंदी छाई हुई है।
व्यवसायों में लगा पैसा जाम हो गया है। बेंगलुरु में काम शिफ्टों की कटौती लगनी
शुरू हो गई है। परिधान और वस्त्र उद्योग ने कम टैरिफ वाले देशों की ओर रुख करने की
योजनाएं बनानी शुरू कर दी हैं। लाखों
श्रमिकों, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं हैं, का
भविष्य अनिश्चित हो गया है।
भारत ने पिछले साल अमेरिका को 1.2
अरब डॉलर मूल्य के कालीन निर्यात किए।
भारतीय कालीनों पर टैरिफ अब बढ़कर 52.9 प्रतिशत हो गया है। उत्तर प्रदेश का
भदोही, कालीन उद्योग का एक प्रमुख केंद्र है जहाँ लगभग 20,000
करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार होता है। लाखों लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप
से इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। उच्च टैरिफ दरों के कारण, भारतीय
कालीन अब तुर्की, कोलंबिया आदि देशों के निर्यात के साथ प्रतिस्पर्धा
नहीं कर पाएंगे।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, पिछले
साल भारत ने अमेरिका को 2.4 अरब डॉलर मूल्य का झींगा मछली का निर्यात
किया, जो कुल मछली निर्यात का 32.4
प्रतिशत था। इस मछली पर पहले 10 प्रतिशत आयात शुल्क था, जो
अब बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया है।
7 अगस्त को जब केवल 25 प्रतिशत प्रतिकिर्यातमिक टैरिफ लागू किया
गया था, तो झींगा उत्पादक आंध्र के किसानों से मछली के खरीद
मूल्य में 20 से 25 प्रतिशत की गिरावट आई थी। अब 50
प्रतिशत टैरिफ लागू होने से निर्यात में तो काफी कमी आएगी ही लेकिन साथ की साथ
कीमतें भी बहुत ज्यादा गिर जाएगीं। लाखों झींगा पालक किसान बर्बाद हो जाएंगे। भारत
को अरबों डॉलर के राजस्व का नुकसान होगा।
कानपुर और आगरा चमड़ा व्यापार के प्रमुख केंद्र हैं।
जहां से हर साल लगभग दो - ढाई हजार करोड़ रुपये के चमड़े के सामान का निर्यात किया
जाता है। अकेले आगरा से हर साल 7 से 8 लाख जोड़ी चमड़े के जूते निर्यात किए
जाते हैं।
उपरोक्त के अलावा,
कई अन्य स्थानों से
अमेरिका को विभिन्न प्रकार के सामान का निर्यात किया जाता है। जिसमें हस्तशिल्प, फर्नीचर
और बिस्तर, कृषि उत्पाद (जैसे बासमती चावल, गरम
मसाले, चाय, शहद,
दालें, तिल
आदि), ऑटो पार्ट्स,
कृषि मशीनरी, मशीनें
और मशीन टूल्स, खेलों का सामान,
स्टील, एल्युमीनियम
और तांबा, रेशमी कपड़े,
जैविक रसायन जैसी अनगिनत
अन्य वस्तुएँ शामिल हैं।
अमेरिका को किए जाने वाले इन निर्यातों की एक साझा
विशेषता यह है कि ये सभी वस्तुएँ मध्यम या लघु एवं सीमांत इकाइयों में निर्मित
होती हैं। जहाँ श्रम का अत्यधिक गहन उपयोग होता है। इस प्रकार, इन
निर्यातों से लाखों की संख्या में श्रमिक जुड़े हुए हैं जिन पर लगभग उतने ही
परिवार निर्भर हैं। इन व्यवसायों से कई अन्य प्रकार के सहायक काम करने वाले श्रमिक
भी जुड़े होते हैं। ये व्यवसाय भी अक्सर सरकारी सहायता के मामले में उदासीनता का
शिकार रहते हैं। इन शुल्कों का घातक प्रभाव आबादी के सबसे गरीब श्रमिकों के एक
बहुत बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लेगा। इसके अलावा, अगर
टैरिफों का यह मामला लंबित रहता है,
तो भारतीय शासकों के लिए
वैकल्पिक बाजार खोजने का काम आसान नहीं होगा। पहले से ही खोई जा चुकी मंडियों में, वहां
पैर जमाए बैठों को उखाड़ कर उनके स्थान पर फिर से कब्जा करना आसान नहीं होगा। हमारे
जैसे देशों में, छोटे व्यापारियों और असंगठित श्रमिकों का ध्यान रखने
वाला निज़ाम भी नहीं है। इसलिए, निर्यात-उन्मुख उद्योगों का टैरिफों की
मार में आने का मतलब है यहां कार्यरत श्रमिकों का उजाड़ा।
पंजाब
को दोनों ही परिस्थितियों में मार
पंजाब के कई शहर,
विशेष रूप से लुधियाना
और जालंधर, हर साल 30,000
करोड़ रुपये से अधिक
मूल्य के कपड़ा और परिधान, खेलों का सामान, ऑटो
पार्ट्स, इलेक्ट्रिक और मशीन टूल्स, कृषि
उपकरण आदि का निर्यात करते हैं। फ्री प्रेस जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार 6,000 करोड़
रुपये का कपड़ा, 8,000 करोड़ रुपये के परिधान, 4,000 करोड़
रुपये के ऑटो पार्ट्स, 5,000 करोड़ रुपये के मशीनरी और उपकरण तथा
हजारों करोड़ रुपये के अन्य सामान का निर्यात इन टैरिफों से प्रभावित होगा। बड़े
पैमाने पर रोजगार का उजाड़ा होगा, जिसका असर बिहार, यूपी, उत्तराखंड
जैसे राज्यों में भी दिखाई देगा। अगर बढ़े हुए टैरिफों का मसला जल्द नहीं सुलझा, तो
परिणामस्वरूप पंजाब को यहां के उद्योग और रोजगार पर घातक प्रभाव झेलने होंगे। और
दूसरी तरफ अगर हकूमत, अमेरिका से समझौता कर, कृषि
बाजार अमेरिकी उत्पादों के लिए खोलती है, तो
इसका भयानक खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ेगा। किसानों की बेचैनी और आंदोलन तेज
और उग्र होंगे। इन परिस्थितियों में मोदी सरकार बुरी तरह घिरी हुई है।
सितंबर 2025
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