Saturday, April 11, 2026

अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा क्यूबा की कड़ी नाकाबंदी

  अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा क्यूबा की कड़ी नाकाबंदी
देश में गंभीर संकट की स्थिति



साम्राज्यवाद और युद्ध किस तरह अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं, और कैसे साम्राज्यवाद का युद्धों के बिना नहीं चल सकता, अमेरिकी साम्राज्यवाद की हालिया कार्रवाइयाँ इसकी नुमायां उदाहरण हैं। लगभग दो वर्षों तक इज़राइली यहूदी जंगबाजों के साथ मिलकर गाज़ा पर निरंतर लाखों टन बारूद बरसाकर, एक लाख से अधिक लोगों की हत्या कर, गाज़ा में जान-माल को पूरी तरह तबाह कर उसे विशाल खंडहरों में  तब्दील कर देने वाले इस मुजरिम जंगबाज गिरोह ने अब ईरान पर भयानक युद्ध थोप दिया है। इसी बीच बिना रुके अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने वेनेज़ुएला पर सशस्त्र हमला कर वहां सरकार का तख्तापलट किया, राष्ट्रपति को मुजरमों की तरह बांध कर उसका अपहरण किया और उसे जेल में डाल दिया। अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्ज़े की धमकियों और इसकी वजह से यूरोपीय देशों की साँसें फूली रहने के दौरान ही, मध्य-पूर्व में ईरान के साथ भड़काए युद्ध के माहौल के चलते कुछ समय के लिए ग्रीनलैंड की गर्दन दबोचने के लिए बढ़ाया पंजा ढीला हो गया है। हमलावर अमेरिकी साम्राज्यवादियों और उसके सहयोगी इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपी गए इस अन्यायपूर्ण युद्ध का घोषित उद्देश्य वहां की मौजूदा इस्लामी सरकार को गिराकर  वहां अमेरिकी साम्राज्य की कठपुतली सरकार स्थापित करना और ईरान के तेल संसाधनों पर कब्ज़ा करना है।

भयानक बमों, मिसाइलों और अत्याधुनिक हथियारों से लड़े जा रहे इस विनाशकारी युद्ध के शोर-गुल के बीच, अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा  “सत्ता परिवर्तनकी एक और जंग भी तेज़ी से चलाई जा रही है, जिसका निशाना क्यूबा सरकार है। यह जुझारू इरादे वाली सरकार पिछले 66 वर्षों से अमेरिकी साम्राज्यवाद की आँखों में खटकती चली आ रही है। तब से ही यह अमेरिकी प्रतिबंधों और साज़िशों का सामना करते हुए अपनी संप्रभुता, अस्तित्व और आत्मसम्मान को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। इस दफा क्यूबा में यहनिज़ाम परिवर्तनखुला सैन्य हमला करके नहीं, बल्कि घातक नाकाबंदी के माध्यम से उसे झुकाने और अमेरिकी साम्राज्य के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर करने के रूप में किया जा रहा है। हालांकि सैन्य हस्तक्षेप की संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता।

छोटे और निर्बल क्यूबा के खिलाफ शक्तिशाली अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा की गई नाकाबंदी अंतरराष्ट्रीय नियमों का घोर उल्लंघन और पूर्णतया धौंसबाज कार्रवाई है। 1959 में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में जब वहां अमेरिकी पिट्ठू सरकार को पलट कर  क्रांतिकारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक सरकार स्थापित हुई और उसके द्वारा क्यूबा में समाजवाद की स्थापित की दिशा की ओर कदम बढ़ाने की कोशिशें की गईं, तो यह घटना - विकास अमेरिका के लिए कभी भी स्वीकार्य नहीं रहा। अमेरिका द्वारा राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक, सैन्य, और हर किस्म के प्रतिबंध लगाए गए और लगातार कड़े किये जाते रहे। कास्त्रो को खत्म करने के लिए किये कई प्रयासों सहित अनेकों हिंसक साजिशें की जाती रहीं। 1992 से लेकर आज तक लगातार 33–34 वर्षों से संयुक्त राष्ट्र महासभा भारी बहुमत से अमेरिका द्वारा क्यूबा की, की गई इस नाकाबंदी को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताते हुए इसे समाप्त करने की मांग करती रही है, लेकिन साम्राज्यवादी अमेरिका, वैश्विक भाईचारे की इस जोरदार माँग को मानने से इन्कारी चला आ रहा है और क्यूबा के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया जारी रखे हुए है।

क्यूबा के खिलाफ इस अमरीकी हमले की वर्तमान तीव्रता का मुख्य कारण पेट्रोलियम पदार्थों (तेल) के क्यूबा में आयात पर अमेरिका द्वारा लगाया गया पूर्ण प्रतिबंध है। क्यूबा अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए लगभग 80% आयात पर निर्भर है। पहले यह आपूर्ति वेनेज़ुएला और मेक्सिको से होती थी। दिसंबर 2025 में अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला की समुद्री नाकाबंदी के दौरान वहां से क्यूबा को तेल आपूर्ति रोक दी गई। बहुत ही सुगमतापूर्वक वेनेज़ुएला में राज पलटा कर देने में सफल रहने के बाद अमेरिका का अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने क्यूबा सरकार पर और अधिक दवाब बनाना शुरू कर दिया और प्रतिबंध और सख्त कर दिए ताकि क्यूबा में संकटमय हालत उतपन कर वहां की सरकार को घुटनों के बल होने पर मजबूर किया जा सके। 29 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक आदेश जारी कर क्यूबा की सरकार कोअसाधारण और असामान्य खतराघोषित कर दिया और क्यूबा के संबंध में  “राष्ट्रीय आपातकाललागू कर दिया। इससे अमेरिकी सरकार कोइंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्टके तहत व्यापक अधिकार मिल गए, जिनके तहत अमेरिका, क्यूबा को तेल सप्लाई करने वाले देशों का न सिर्फ तेल ही जब्त कर सकता है बल्कि उन देशों पर टैरिफ थोपने के लिए भी अधिकृत हो जाएगा। वेनेज़ुएला से तेल की आपूर्ति पहले ही बंद कर दी गई थी और अब अमेरिका के दवाब के चलते मेक्सिको से भी तेल आपूर्ति बंद हो गई है। क्यूबा पूरी तरह तेल से वंचित हो गया है।

यह कैसी विडंबनापूर्ण और हास्यास्पद बात है कि हथियारों के मामले में अत्यंत अभावग्रस्त, दशकों से प्रतिबंधों और कड़ी नाकेबंदी का शिकार, बड़े स्तर पर बुनियादी जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर, छोटा-सा क्यूबा, साम्राज्यवादी महाशक्ति अमेरिका  के लिए कोईअसाधारण और असामान्य खतराखड़ा कर सकता है! यह तो किसी मेमने के लकड़बग्घे के लिए खतरा बन जाने जैसा बेतुका, हास्यास्पद और मनगढ़ंत आरोप है। लेकिन सबल का कौन निरोध करे, उनका तो हमेशा से सात बीसो सौ ही होता रहा है।

पहले ही अनेकों प्रतिबंधों से क्षीण हुए क्यूबा के लिए तेल आपूर्ति बंद होने से मुसीबतों की बाढ़ आ गई है। तेल न मिलने के कारण तेल की राशनिंग शुरू हो गई है। चूल्हे जलाए रखना असंभव होने लगा है। बिजली उत्पादन एवं आपूर्ति लड़खड़ाने लगी, कई जगहों पर पूर्ण ब्लैक-आउट से लेकर 20 घंटे तक बिजली कटौती होने लगी है। रेफ्रिजरेटर न चलने के कारण खाद्य सामग्री एवं दवाइयाँ नष्ट होने लगी हैं। कृषि एवं उद्योग लड़खड़ाने लगे हैं। परिवहन ठप हो गया है और पेट्रोल पंपों और राशनिंग पर लंबी लाइनें लगने लगी हैं। विमानन ईंधन समाप्त हो जाने के कारण सभी हवाई सेवाएँ ठप हो गई हैं और दुनिया से हवाई संपर्क कट गया है। क्यूबा में खाद्य पदार्थों, आवश्यक दवाइयों, चिकित्सा उपकरणों एवं अन्य अनिवार्य आवश्यकताओं का अकाल पड़ गया है। गंभीर बीमारियों की रोकथाम एवं उपचार के लिए वह देश बिल्कुल असहाय हो गया है, जो दुनिया भर में कोविड महामारी, बाढ़, भूकंप, युद्धों जैसी आपदाओं के समय निःस्वार्थ एवं स्वैच्छिक सेवाएँ प्रदान करने के लिए विश्वभर में प्रशंसा का पात्र रहा है।

तेल आपूर्ति ठप होने से पर्यटन उद्योग, जो क्यूबा की आय का महत्वपूर्ण साधन था, बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हवाई उड़ानें ठप हो जाने से पर्यटन कारोबार ठप हो गया है। बिजली आपूर्ति पर बड़ी कटौती के कारण कारोबार मुश्किल से चल रहे हैं या बंद हो गए हैं। स्कूल बंद हो गए हैं। कृषि उत्पादन, मुख्य रूप से गन्ने की फसल 40 प्रतिशत कम हो गई है। आयात ठप होने से खाद्य पदार्थों की क़िल्लत हो गई है, भुखमरी से मौतें बढ़ने वाली हैं। बेरोजगारी और गंभीर हो रही है। वित्तीय, व्यापारिक, आर्थिक एवं औद्योगिक-तकनीकी आयातों पर लंबे समय से प्रतिबंध के कारण उत्पादन रुक सा गया है। इन कारणों से पिछले 4-5 वर्षों में लगभग 10 लाख से अधिक युवा क्यूबा से पलायन कर चुके हैं। बड़े-छोटे कई अन्य कारणों के साथ-साथ साम्राज्यवादी नाकाबंदी के इस कठोर एवं दीर्घकालिक नागपाश ने क्यूबा को ऐसी दयनीय स्थिति में ला खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

क्यूबा में सत्ता-परिवर्तन के लिए ट्रंप प्रशासन की "अधिकतम दबाव" की नीति के तहत, क्यूबा की गर्दन पर कसे जा रहे नागपाश में, बदली हुई वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों और अमेरिकी साम्राज्य द्वारा इन पर जा रही प्रतिक्रिया का भी महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद एकमात्र सक्रिय महाशक्ति के रूप में बने रहने के बाद अब अमेरिका एक संकटग्रस्त एवं पतनशील महाशक्ति है। रूस-यूक्रेन युद्ध, जो कि रूस, और अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो के बीच युद्ध है, ने दिखला दिया है कि रूस पुनः एक जबरदस्त सैन्य शक्ति के रूप में उभर रहा है। चीन एक बड़ी गंभीर एवं व्यापक चुनौती के रूप में तेजी से उभर रहा है। अमेरिकी साम्राज्य की विश्व-प्रभुता को चुनौती देने के लिए नए-नए मोर्चे बन रहे हैं। डॉलर की चमक मंद पड़ रही है। अमेरिका को पुनः महान बनाने के ट्रंप प्रशासन के नारे इसी वास्तविकता की स्वीकारोक्ति हैं। ट्रंप प्रशासन द्वारा रचित नई सुरक्षा रणनीति अमेरिकी साम्राज्य की इसी बौखलाहट की परिचायक है। अमेरिका के चर्चित मुनरो सिद्धांत का डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपनाया गया संस्करण अब "डोनरो सिद्धांत" के नाम से पुकारा जाने लगा है।

इस नई सुरक्षा नीति के अनुसार ट्रंप प्रशासन पश्चिमी गोलार्ध, विशेषकर उत्तरी एवं लातीनी महाद्वीप को अपना पिछवाड़ा मानते हुए इसे अपनी निर्विवाद प्रभुता वाले क्षेत्र के रूप में बनाए रखना सुनिश्चित करेगा। इसमें किसी भी प्रतिद्वंदी की घुसपैठ या प्रभाव क्षेत्र सहनीय नहीं होगा। अमेरिकी प्रभुता मानने से अनिच्छुक वेनेजुएला, क्यूबा, कोलंबिया आदि राज्यों में व्यवस्था-परिवर्तन के प्रयास उपरोक्त डोनरो डॉक्ट्रेन की अमलदारी की दिशा में उठाए जाने वाले बड़े कदम हैं। ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा, पनामा नहर पर अमेरिकी नियंत्रण और कनाडा एवं मैक्सिको आदि हकूमतों को ट्रंप द्वारा दी जा रही धमकियां, सारतः इन पर अमेरिका की निरंकुश सरदारी थोपने के परिचायक हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादी अपनी विश्व-प्रभुता बनाए रखने के रास्ते में चीन को भावी बड़ी चुनौती मान रहे हैं। इस भावी चुनौती का सामना करने के लिए वे विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों- ऊर्जा संसाधनों, खनिज पदार्थों, परिवहन मार्गों, बाजारों, प्रभाव क्षेत्रों आदि को हथियाने की होड़ में लगे हुए हैं।

अमेरिका में अति दक्षिणपंथी वर्गों द्वारा क्यूबा में अमेरिकी साम्राज्य-विरोधी सरकार की स्थापना को कभी भी स्वीकृति नहीं दी गई। उनके अनुसार ऐसी सरकार को चलते करने का कार्य अनावश्यक लटका हुआ है। ये हिस्से वर्तमान परिस्थितियों को इस कार्य को अंजाम देने का सुनहरा अवसर मान रहे हैं। इसीलिए ट्रंप प्रशासन द्वारा "ज्यादा से ज्यादा दबाव डालने" का पैंतरा अपनाया गया है। साथ की साथ चरणबद्ध परिवर्तन के वादे का कपट भी खेला जा रहा है जिसे ट्रंप "मैत्रीपूर्ण समाधान" होने की संभावनाएँ बता रहा है। अमेरिका-ईरान युद्ध का परिणाम और विश्व राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ने वाले इसके प्रभाव भी क्यूबा की नियति पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं।

क्यूबा अब तक अमेरिकी साम्राज्यवादी साजिशों और धौंस का सफलतापूर्वक सामना करता आया है। अमेरिका द्वारा रचित नई सुरक्षा रणनीति के प्रसंग में क्या क्यूबा टिक सकेगा या नहीं, यह वहाँ की वर्तमान सरकार की सूझ-बूझ और दृढ़ इरादे पर निर्भर करता है कि वह अपने आपको और क्यूबा की जनता को इस चुनौती का सामना करने के लिए कैसे तैयार करती है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ और ताकतों का संतुलन, प्रगतिशील शक्तियों के पक्ष में नहीं है। इसलिए क्यूबाई सरकार और जनता के लिए चुनौती बहुत ही गंभीर है। परंतु इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि लोग असंभव परिस्थितियों में भी रास्ता निकाल लेते हैं। यदि क्यूबा दृढ़-संकल्पित और सफलतापूर्वक इस चुनौती का सामना करता है तो यह दुनिया भर में प्रगतिशील शक्तियों को उत्साह और हौसला देगा। यदि अमेरिकी साम्राज्यवादी सुगमता से ही अपने दुष्ट प्रयोजनों को प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं तो यह दुनिया भर की न्यायप्रिय और क्रांतिकारी शक्तियों के लिए एक और दुर्भाग्यपूर्ण पछाड़ होगी।

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