चुग्घे कलां के कुलदीप के मातम स्थल से.......
-पावेल
23-24 के बीच की रात
को चुग्घे कलां के नौजवान किसान कुलदीप सिंह(27) ने बठिंडा के किसान मोर्चे में सलफास निगल कर मौत को गले लगा लिया। संगठनों के
कार्यकर्ताओं ने बचाने की पूरी कोशिश की,फरीदकोट मैडीकल काॅलेज में भर्ती करवाया। परन्तु सुबह तक जि़न्दगी मौत के सामने
हार मान गईं। सफेद मच्छर के कारण कपास की बर्बाद हो चुकी फसल का मुआवज़ा लेने के
लिए लगे मज़दूरों-किसानों के पक्के मोर्चे के दौरान
दूसरी जि़न्दगी भेंट हो चुकी है। मोर्चे के पहले दिन ही किल्लयांवाली गाँव के खेत-मज़दूर मंदर सिंह की दिल का दौरा पड़ने के कारण मृत्यु हो गई थी। शुरूआत
मज़दूर ने की थी अब किसान की बारी थी और कुलदीप ने किसान खेत-मज़दूर की परस्पर सांझ से मुँह नहीं मोड़ा! उसका पाँच वर्षीय मासूम बेटा शायद ही अब पिता की कोई याद संभाल सके।
कृषि संबंधी आत्महत्याओं से पीडि़त
पूरे पंजाब के गाँवों की चिताएँ ठंडी ना होने की पीड़ा झेल रहीं हैं। इस प्रकार
कुलदीप की आत्महत्या पहले से ही लंबी हो चुकी सूची में वृद्धि है। परन्तु कुलदीप
की आत्महत्या संघर्ष के मैदान में हुई है। यह फैसला उसने सचेत रूप में लिया था। वह
धरने की पहली रात को ही वहाँ रुक गया था, अकेला, उसका कोई और साथी उसके साथ वहाँ
नहीं था। उसने आत्महत्या तो की परन्तु भूसे की कोठड़ी में चुपचाप छुपकर नहीं, वह जि़न्दगी के हाथों हारा तो ज़रूर है किंतु हार के दोषियों की शिनाख़्त और
गहरी व स्पष्ट कर गया है। वह सरकार के सिर चढ़कर मरा है। उसे अपनी उपस्थिति सत्ता
के गरूर के सामने उपेक्षित लगी। परन्तु अब फरीदकोट के अस्पताल में पड़ी उसकी लाश
बादल सरकार की चिंता का कारण बन रही है।
कुलदीप का आत्महत्या नोट पंजाब
सरकार को अपनी मौत का जिम्मेदार बताता है। भारतीय कानून अनुसार तो पंजाब सरकार कभी
भी दोषी साबित नहीं होगी। परन्तु ऐसे नोटों की बढ़ रही गिनतियाँ सरकार को जनता की
अदालत में सज़ा सुनाए जाने के दिन ज़रूर लेकर आएंगीं। सारी उम्मीदें खत्म होने तथा
सभी रस्ते बंद हो जाने से चारों ओर जो मायूसी का अंधेरा छा जाता है, उसका अंत आत्महत्या ही होता है। सभी रास्ते बंद हो जाने पर भी कुलदीप के मन
में आस की कोई किरन बाकी थी। अधिकार माँगने वालों की सुनवाई हो सकने की उम्मीद थी।
दुनिया को अलविदा कहने से कुछ समय पूर्व ही अपनी चिट्ठी संगठन के श्रेष्ठ नेता को
सौंप कर जाना एक संकेत है कि वह मौत के बाद भी अपनी बात आगे बढ़ाना चाहता था। कोई
कह सकता है कि आत्महत्या तो आखिर आत्महत्या ही है। लेकिन किसी के लिए यह आत्महत्या
के दौर के बाद कुर्बानियों के दौर की आहट भी हो सकती है।
कुलदीप की मृत्यु की खबर उसके घर
पहुँचने से कुछ समय बाद मैं पहुँचा। उसके घर में हो रहा विलाप दूर से ही सुनाई दे
रहा था। चुग्घे कलां की हवा में शोक की लहर थी। कुलदीप का घर भी पंजाब की गरीब
किसानी के हज़ारों लाखों घरों जैसा ही है जो हरित क्रांति की भांति अपनी चमक गँवा
चुके हैं। ‘हरित क्रांति‘ के दौर में बने इन घरों की संरचना तथा इन पर टीप-पलस्तर, हो चुके ‘विकास‘ की याद दिलाते हैं। यह वो समय था
जब पंजाब के खेतों में मैक्सीकन गेहूँ आया था तथा कुछ समय बाद मुंडेर की जगह जंगले
बन गए थे। लोगों ने बड़े चाव से उनपर फूल-पत्तियाँ बनवाईं थीं। परन्तु हरित क्रांति के पीला पड़ते ही घरों से बाशिंदों
की उदासी की परछाई की लकीरें अब इन जंगलों पर अंकित हो गईं हैं । यह उदासी अब गाँव
की बाहरी परिक्रमा से नज़र आती है। दिन प्रतिदिन गहरी हो रही यह उदासी किसान जनता
द्वारा विवाहों, संस्कारों पर की जाने वाली फिज़ूल
खर्ची के चर्चों पर हावी हो गई है। उदासी से आत्महत्याओं के सफर की शुरूआत ने यह
चर्चा पूर्णतः बंद करवा दी है। वो दिन भी थे जब कुलदीप जैसों पर संसार के सभी ऐश-ओ-आराम भोगने वालों द्वारा इस प्रकार के इल्ज़ाम लगाए जाते थे।
कुलदीप के साथी बताते हैं कि वह
बहुत मेहनती था। किसी की मृत्यु हो जाने के बाद होने वाली चर्चा की तरह नहीं, वह सचमुच ही परिश्रमी था। थकावट उसके पास भी नहीं फटकती थी। वह अपनी मेहनत
सदका घर की हालत बदल देना चाहता था। मूलभूत अभावों से ग्रस्त पंजाब की किसान जनता
की भांति संयम उसके भीतर तक रचा हुआ था। पंजाब के बहुत सारे नौजवानों पर लगाए जाने
वाले दोष उस पर नहीं लग सकते थे। वोह तो मोटरसाईकिल की जगह साईकिल ही इस्तेमाल
करता था। कभी बेकार नहीं बैठता था। सर्दी के दिनों में भी खेतों के काम काज
निपटाने के बाद फुर्सत की घड़ी में चैपाल में बैठकर धूप सेंकना उसके स्वभाव में
नहीं था। उसका एक हमउम्र साथी याद करते हुए बताता है; यदि कोई और काम ना होता तो वो चारा मशीन का टोका ही दोबारा ठीक करके जड़ देता
था। वह कोई न कोई काम तैयार रखता था। परिवार अभी सुबह नींद से जाग रहा होता, कुलदीप खेत से चारा भी ले आता। घर की कबीलदारी वही चलाता था। शहर जाकर बाज़ार से सभी वस्तुएँ
वही खरीदकर लाता।
चुग्घे कलां के ठाणा सिंह के पास सिर्फ
4 एकड़ भूमि है। वह दोनों पुत्रों कुलदीप व हरप्रीत के साथ खेती करता आ रहा है।
पंजाब के सभी छोटे किसानों की तरह घर का गुज़ारा चलाने के लिए यह भूमि पर्याप्त
नहीं रहती है। अतः परिवार ने लगभग 14 एकड़ भूमि ठेके पर ली है। पंजाब के
बाकी किसानों की तरह यह मेहनतकश परिवार भी कर्ज़ई है। 85 हज़ार बैंक के, 40 हज़ार सोसाईटी
के तथा 3 लाख आढ़तिये (कमिशन एजेंट) के देने हैं। ठेके वाली ज़मीन का 3 लाख अभी सिर पर खड़ा है जिसका ब्याज
देना पड़ रहा है। पंजाब की कंगाल हो रही किसान जनता की तस्वीर वैसे तो इस परिवार
से भी मंदी है। मालिक किसान जाने जाते परिवारों में से अब 18 प्रतिशत पूरी तरह भूमिहीन हो चुके हैं। इससे आगे 16 प्रतिशत अन्य परिवार अढ़ाई एकड़ से कम भूमि वाले हैं।
पिछले कई दिनों से कुलदीप चिंता
में था, उसके दिमाग में बर्बाद हुई फसल
घूमती रहती थी। जिन कजऱ्ों के ब्याज ने पंजाब के हज़ारांे किसानों को निगला है, वही कजऱ्ा कुलदीप के लिए सलफास बन कर आया है। अंत्येेष्टि में बैठे उसके गाँव
वालों को जहां उसके जाने का गम है वहीं उसकी मौत से सब के सांझे दर्द की सुनवाई हो
जाने की उम्मीद भी बँधी है। उन्हें लगता है कि उसके घर के बिल्कुल पास पूरी तरह
तबाह हो चुकी कपास अब अकेले उसके परिवार की चिंता नहीं रही बल्कि अब यह मीडिया में
चर्चा का विषय बनेगा, क्योंकि अब चैनलों वाले धडा़धड़
पहुँच रहे हैं। इसी आस से एक गाँव निवासी कहता है,‘‘ क्यों भई अब तो सरकार हिलेगी ?‘‘ वे यह तो जानते हैं कि हमारे घरों
में रोज़ाना मातम होते हैं पर कोई मातम मीडिया, सरकार व लोगों के लिए ध्यान का केंद्र बन कर उनकी समस्याओं को इस तरह भी उभार
सकता है यह बात उनके लिए नई है। इसी लिए वह गाँव के इस मातम स्थल से उठकर बठिंडा
में गर्माए संघर्ष के अखाड़े तक का सफर तय करने के लिए अग्रसर हो रहे हैं। कल
सैंकड़ों की गिनती में गाँव वालों का काफिला बठिंडा मोर्चे में शामिल हो रहा है।
गाँव वालों के चेहरों से गम व उम्मीद के मिलेजुले हावभाव पढ़े जा सकते हैं।
कुलदीप की मौत शासकों के सरोकार का
मुद्दा नहीं है, उनका नींद से जागना तो बहुत दूर की
बात है। राज करने का उनका व्यवहार दशकों से ऐसे हज़ारों मातमों का जिम्मेदार है।
कुलदीप की मौत मोर्चे में डटे जुझारूओं के आक्रोष को प्रचंड करने में अपनी भूमिका
निभा रही है। उनकी तनी हुई मुठ्ठियों से देखा जा सकता कि कुलदीप की जलती चिता का
सेंक शासकों के चेहरों को झुलस देगा
क्योंकि इस सेंक में अब जनता के आक्रोष का संेक भी समा चुका है।
सुखऱ् लीह (पंजाबी) अक्तूबर 2015 से
बदनामी का एक और दाग
बठिंडा धरने के पहले दिन ही दिल का
दौरा पड़ने से शहीद हुए मज़दूर कारकुन मंदर सिंह का श्रद्धांजली समागम
किल्लयांवाली गाँव में किया गया। इस समय 1500 के लगभग मज़ूदरों-किसानों की एकत्रता हुई। दर्जन के
लगभग वक्ताओं ने मंदर सिंह को श्रद्धांजलियाँ भंेट कीं। संघर्ष को जीत तक जारी
रखने के ऐलान हुए तथा सरकार को फिटकारें दी गईं।
परन्तु कुलदीप द्वारा मोर्चे में
की गई आत्महत्या ने तो लोगों के आक्रोष को कहीं ज़्यादा प्रचंड कर दिया। जन आक्रोष
के सेंक से झुलस जाने के डर से किसी भी मंत्री-संतरी ने उसके घर अफसोस के लिए जाने की हिम्मत नहीं की। नौजवान किसान की लाश
फरीदकोट अस्पताल में रखी हुई थी। परिवार तथा संगठनों द्वारा 10 लाख मुआवज़े की माँग, परिवार के एक सदस्य को नौकरी तथा
परिवार पर चढ़े कर्जे़ को माफ करने की माँगें मानने पर ही अंतिम संस्कार करने का
ऐलान किया गया था। परिवार को रातों-रात फरीदकोट ले जा कर आधी रात को
ही लाश का पोस्टमर्टम करवा कर लाश वापिस घर लाई गई और सवेरे 8 बजे तक पुलिस पहरे में अंतिम संस्कार किया गया। नज़दीकी रिश्तेदारों को भी
नहीं बताया गया।
बादल सरकार की इस करतूूत
के खिलाफ ज़ोरदार प्रतिक्रिया हुई। लोगों में तीखा रोष उत्पन्न हुआ। हुकूमत की थू-थू हुई। परिवार को दिया 5 लाख का चैक भी बदनामी के
इस दाग को धो न सका।
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