Thursday, December 10, 2015

6) खेत मज़दूर और कजऱ्



पंजाब के खेत मज़दूर और कजऱ्

-विश्व भारती




पंजाब सरकार इस बात से ढीठता से इन्कार करती रही है कि खेत मज़दूरों द्वारा गरीबी तथा कजऱ्  की वजह से आत्महत्याएँ की जा रही हैं। इसने खेत मज़दूरों को आत्महत्याओं संबंधी हूए सर्वे के दायरे से  बाहर रखने की कोशिश की तथा संगठित खेत मज़दूर शक्ति के दबाव की वजह से ही ऐसा सर्वे करवाना मंजूर किया।
            अब तक सर्वाधिक प्रभावित जि़ले बठिंडा व संगरूर  के अध्ययन से यह बात सामने आई है कि साल 2000 से 2008 तक इन दोनों जि़लों में 1,133 खेत मज़दूरों ने आत्महत्याएँ की हैं। यह गिनती कुल आत्महत्याओं का 45.2 फीसदी बनता है। 65 फीसदी आत्महत्याएँ कजऱ्े की वजह से हुई हैं। आत्महत्याएँ करने वाले खेत मज़दूरों की सालाना आमदन 19,419 रु. बनती है। जबकि ऐसे मज़दूरों के सिर औसत कर्जा़ 70,036 रु. बनता है। इस प्रकार कजऱ्ा सालाना आमदन के साढ़े तीन गुना से ज्यादा बनता है। अर्थशास्त्री कहते हैं कि यदि कजऱ्ा  सालाना आमदन से दोगुना हो तो उस व्यक्ति को दीवालिया समझ लेना चाहिए। अर्थ शास्त्रियों का अंदाजा है कि मानसा जि़ले की हालत इससे भी भयानक हो सकती है जहां लूट का अर्ध जागीरू रूप ज्यादा उभर कर प्रकट होता है।
            इससे पहले 1998 में विकास तथा संचार संस्था चंडीगड़ के एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहीं आत्महत्याओं में 45.2 फीसदी खेत मज़दूरों से संबंधित हैं। कई मामलों में घर के पुरुष के आत्महत्या कर लेने के बाद उसकी विधवा भी आत्महत्या कर लेती है। संगरूर तथा बठिंडा जि़लों में 8 वर्षों में पचास औरतों ने आत्महत्याएँ की हैं। पंजाबी यूनिवसर््िाटी पटियाला के एक सर्वेक्षण के अनुसार पंजाब के 70 फीसदी से ज्यादा खेत मज़दूर कजऱ्े के जाल में फंसे हुए हैं। पड़ताल में शामिल हर मामले ने दर्शाया है कि खेत मज़दूरों पर यह कजऱ्ा बहुत ही बुनियादी जरूरतांें की वजह से चढा है। पंजाब के 40 फीसदी से ज्यादा ग्रामीण गरीब अपनी आमदन का 62 फीसदी खाने पर खर्च करते हैं। अन्य जरूरतें जोड़कर यह खर्चा 76 फीसदी बन जाता है। बाकी का 24 फीसदी कपड़ों तथा ईंधन पर खर्च होता है। क्योंकि खेत मज़दूर कजऱ्ा वापिस करने में असफल रहते हैं इसलिए उन्हें ब्याज उतारने के लिए बंधुआ मज़दूरी करनी पड़ती है। जहां तक मूल का संबंध है कई बार यह पीढ़ी दर पीढ़ी की मुशक्कत के बाद भी पीछा नहीं छोडता। संगरूर जि़ले के ढंडोली कलाँ की हमीर कौर का मामला कजऱ्ा गुलामी की तस्वीर पेश करता है। उसने 2,000 रु. का कजऱ्ा उतारने के लिए 30 साल तक काम किया तथा बाद में उसकी बहू ने 8 साल बिना वेतन मज़दूरी की। 38 साल की इस मुशक्कत के बाद भी गाँव के ज़मींदार ने उसे ‘‘ हिसाब किताब‘‘ लगा कर बताया कि उसके सिर 20,000 का कजऱ्ा खड़ा है। हमीर कौर ने बताया कि वह 30 साल तक बिना किसी वेतन के ज़मींदार के 35 पशू संभालती रही है। जब वह वृद्ध हो गई तो ज़मींदार ने उसे एक बछड़ा दे दिया तथा कहा कि अब वह अपनी बहू को काम पर भेजा करे। 2004 में उसके लड़कों ने ज़मींदार से हिसाब-किताब पूछा तो उसने कहा कि बही खाते गुम हो गए हंै। उसकी बहू ने काम पर जाना बंद कर दिया। फिर ज़मींदार के गुृंडे आए तथा बच्चों समेत पूरे परिवार की मारपीट की तथा फिर से ज़मींदार ने दावा किया कि अभी 20,000 रु. का कजऱ्ा उसके सिर खड़ा है।
            पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में खेत मज़दूरों की आम तौर पर यही हालत है। सिर्फ लूट के ढ़ंग-तरीकों में फर्क है। वे कजऱ्े के जाल मंे फँसते जाते हैं और उनकी हालत बंधुआ मज़दूर वाली बन जाती है।
(‘न्यू एज़की एक लंबी रचना से संक्षिप्त)

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