हरित क्रांति के मैदानों की फसलें
सफेद मच्छर एवं आत्महत्याएँ
-डैस्क से विशेष रिपोर्ट
कृषि संकट
तथा कजऱ्ा पीडि़त किसानों की आत्महत्याएँ खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। ताज़ा
कहर सफेद मच्छर के हमले का है। 40-50 हज़ार रुपए प्रति एकड़ ज़मीन ठेके पर लेकर
खेती करने वाले किसानों की तो इसने कमर ही तोड़ डाली है। अच्छी फसल होने से तीन
महीने के रोज़गार की खेत मज़दूरों की उम्मीद भी धूल-धुसरित हो गई है। इस हमले की
लपेट में आई भूमि 5.40 लाख एकड़
है। बर्बाद हुई फसल 2 लाख एकड़ है। नुक्सान का अंदाज़ा 700 करोड़ का है।
किसान खेत मज़दूर संगठनों के अंदाज़े इस सरकारी आंकड़े से कहीं ऊँचें हैं।
किसानों ने
छिड़काव करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, परन्तु मच्छर बेरोक बढ़ता गया है। बेअसर
छिड़कावों का व्यापार करने वाले दोषियों में जर्मन बहुराष्ट्रीय कंपनी बायर क्राॅप
का नाम आता है। भारत में इसकी शाखा बायर कृषि विज्ञान के नामाधीन काम करती है।
इसकी कीटनाशक दवाई ओबेराॅन की सिफारिश केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड ने की है। पंजाब
कृषि विभाग ने इसकी 90 हज़ार लीटर सप्लाई को यकीनी बनाया है। इस पर 33 करोड़ रुपए खर्च
किए हैं। 50 प्रतिशत
सब्सिडी दी है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से इसकी सिफारिश करवाई गई है। कृषि विभाग
के निदेशक मंगल सिंह संधू अनुसार सब्सिडी भारत सरकार के दिशा निर्देशों पर दी गई
है। कृषि विभाग ने सड़कों पर पुडि़याँ बेचने वाले नीम-हकीमों की भांति इसकी ‘सफलता‘ का प्रचार किया है।
बड़े स्तर पर जनसंपर्क अभियान चलाया है। परन्तु सारे वादे तथा दावे निरे धोखे का
माल साबित हुए हैं।
भारतीय
सरकारों तथा विभागों ने इस बात को पूर्णतः नज़रअंदाज़ कर दिया कि यह बहुराष्ट्रीय
कंपनी संसार भर में बदनामी के दागांे से भरी हुई है। इसके बोर्ड मैंबरों पर हिटलर
के गैस चैंबरों को ज़हरीली गैसों की सप्लाई करने के मुकद्दमे चले थे। नशेडि़यों
तथा मरीज़ों के वजर््िात खून से तैयार की गईं इसकी दवाइयों से हज़ारों मौतें हुईं
हैं। 2006 में
हज़ारों जानें जाने के बाद इसकी एक और दवाई टारसीलोल पर पाबंदी लगाई गई। इसकी एक
और गर्भनिरोधक दवाई के खिलाफ जर्मनी की अदालत में 9000 मुकद्दमे दर्ज
हैं। इसके उपयोग के कारण सैंकड़ों पूर्णतः स्वस्थ औरतों की जानें जा चुकी हैं। इस
प्रकार यह कंपनी मुनाफे की अमानवीय पूँजीवादी हवस का अत्यंत घिनौना नमूना बनी हुई
है। सब कुछ जानते-समझते हुए भी इस अपराधी कंपनी को खुली छूट देकर शासकों ने
किसानों तथा अन्य भारतीय जनता के साथ दुश्मनों वाली भूमिका निभाई है।
आजकल यह
कंपनी बीजों तथा कीटनाशकों की मंडी में दनदनाती घूम रही है। फसलों की पैदावार, संभाल, ढ़ुलाई, खोज तथा
जड़ी-बूटियों के क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने की ओर बढ रही है। सन् 2013-14 में बीजों की
बिक्री से एक अरब से ऊपर कमा चुकी है।
बायर एवं
इसके कीटनाशक आॅबेरोन का मामला पहला, भिन्न व एक मात्र मामला नहीं है। कृषि
रसायनों तथा बीजों का कारोबार करने वाली साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के
कुकर्मों की लड़ी बहुत लंबी एवं पुरानी है। ‘हरित क्रांति‘ ने बहुत समय पूर्व
ही भारत को ज़हरीली व खतरनाक कृषि रसायनों की सबसे बड़ी मंडी बना दिया था।
ब्रिटिश
ऐग्रो कैमीकल ऐसोसीएशन फाॅर आॅक्सफाम ने 45 वर्ष पूर्व एक सर्वेक्षण के आधार पर बताया
था कि अमरीका से जिन कीटनाशकों का पिछड़े देशों को निर्यात किया जा रहा है, उनमें से तीस फीसदी
स्वयं अमरीका में प्रतिबंधित हैं। इंग्लैंड भी अपने देश में प्रतिबंधित 11 कीटनाशक पिछड़े
देशों में बेच रहा था। परन्तु इसके बावजूद भारतीय शासक हमारे देश में इन कीटनाशकों
की पैदावार, आयात तथा
प्रयोग में वृद्धि करते गए। इस प्रकार 1982 तक भारत में प्रतिबंधित कीटनाशकांे की
मात्रा इनके उपयोग के 70 फीसदी तक पहुँच गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा यह कीटनाशक
ज़हरीले तथा खतरनाक घोषित किए गए थे। इन प्रतिबंधित कीटनाशकों में डी.डी.टी., बी.एच.सी., पैराथीन, हैपचारल, लिंडेन, बी.डी.सी.पी., 4-डी हर्बीसाईट, पैराकफ तथा
टैक्साफाईन शामिल थे। डी.डी.टी. से 20 गुना ज़हरीली पैराथीन का 100 मिलीग्राम अर्थात्
एक ग्राम का 10वां भाग
चमड़ी पर लगते ही एक किलो के चूहे को मार सकता है।
इसके
अतिरिक्त रिव्यू अधीन संदिग्ध कीटनाशकों की एक और लंबी संपूर्ण सूची तैयार की गई
थी। विश्व स्वास्थ्य संस्था ने इन्हें ‘‘अत्यंत खतरनाक‘‘ व ‘‘अति खतरनाक‘‘ श्रेणियो में शामिल
किया था। इनमें एलडीकार्ब, कारबोफ्रान, कलोरोफैनफिनफास, डाईक्लोरोविष, ऐंडोसलफान, मोनोक्रेटोफास, आॅक्सीडेमेटिन, मिथाईलफौरेट, फासफोमीडिन तथा
पायरमफाॅस इथाईल शामिल थे।
फिर भी
भारत में इनकी 510 लाख
किलोग्राम सालाना खपत हो रही थी। यह विश्व भर में कीटनाशकों के प्रयोग की सबसे
ऊँची मात्रा थी। यह चर्चा ज़ोरों पर थी कि ये कीटनाशक मानव स्वास्थ के लिए भीषण
अभिषाप हैं। हर प्रकार के भोजन पदार्थों, जल, दुधारू पशुओं, मछलियों, मुर्गियों, मानवीय अंगों तथा
लहू तक में, इनके
खतरनाक हद तक ऊँचे अंशों की बड़े स्तर पर प्राप्त नमूनों द्वारा पुष्टि हो रही थी।
दूसरी तरफ
इन कीटनाशकों के कृषि के लिए आफत बन जाने के बड़े सबूत सामने आ रहे हैं। यह
हानिकारक कीड़ों को खाने वाले जीव जंतुओं, पँछियों तथा मित्र कीड़ों का सफाया किए जा
रहे हैं। पर फसलों के दुश्मन कीड़ों तथा नदीन में इनसे लड़ने की क्षमता विकसित हो
रही है। कीड़ों के लश्कर बड़े हो रहे हैं। 1982 तक कीड़ों की ऐसी 15 किस्में ध्यान में
आ चुकी थीं जिन पर हर प्रकार के रसायण बेअसर हो रहा थे। 20 ऐसी किस्मों का
पता चल चुका था जो एक कीटनाशक के संपर्क में आते ही उससे मिलते-जुलते अन्य
कीटनाशकों के विपरीत मुकाबले की क्षमता (क्राॅस रजि़स्टेंस) विकसित कर लेते हैं।
बाज़ार में महंगेे से महंगे एवं नए से नए कीटनाशकों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों का
बोलबाला था। परन्तु खेतों में सफेद मक्खी, अमरीकन कीड़े, लीफ-वर्म, बाल-वर्म तथा
प्लांट हाॅपर जैसे कीड़ों का बोलबाला था। गेहूँ तथा धान की फसलों पर कीड़ों की 18 अन्य नई किस्मों ने
हल्ला बोल दिया था।
बिमारियों
के लिए छिड़काव के नतीजे भी कुछ अलग नहीं थे। पंजाब-हरियाणा में गेहूँ का 30 से 40 फीसदी रकबा फलेरी
माईनर की लपेट में था। करनाल बँट ने दूसरे दौर का हल्ला बोल दिया था। बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के बिना परखे रसायणों की भूमिका चर्चा में आ रही थी। फलेरी माईनर के
मुकाबले के लिए प्रयुक्त रसायणों की वजह से गड़बड़ हो गई थी। पंजाब कृषि
विश्वविद्यालय ने ग्रैमीनन तथा आईसोप्रोटोन का छिड़काव बंद करने की हिदायत कर दी
थी। पंजाब सरकार द्वारा 300 नदीननाशकों के टैंडर जारी होने थे। बिना परखे नदीननाशकों पर
पाबंदी के खिलाफ बहुराष्ट्रीय कंपनियों, डीलरों तथा स्थानक उत्पादकों द्वारा पंजाब
सरकार पर दबाव डाला जा रहा था। पहले रसायणों का आयात केवल हिंदुस्तान इंसैक्टीसाइड
लिमिटिड के माध्यम से हो सकता था। परन्तु अब केंद्र सरकार ने पंजाब के स्थानक
उत्पादकों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों से आयात की गई सामग्री के साथ यह नदीननाशक
दवाइयाँ तैयार करने की अनुमति दे दी थी। परन्तु अभी भी विश्वविद्यालय की सिफारशों
के पालन की मजबूरी पंजाब सरकार के लिए रुकावट बन रही थी। अतः पंजाब कृषि
विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की जबरन जुबान बंद कर दी गई। विश्वविद्यालय ने
साजि़शी पलटी मार कर उन्हीं बिना परखे हुए रसायणों के ग्रुप के प्रयोग की सिफारिश
कर दी जिसे एक साल पहले उसने रद्द कर दिया था। इस प्रकार हिंदुस्तान इंसैक्टीसाइड
लिमिटिड को दरकिनार करके बिना परखे हुए रसायण जनता पर थोप दिए गए। (देखें-इंडियन
एैक्सप्रैस, 30 नवंबर,1982 तथा जफरनामा फरवरी,1983)
यह उस समय
की बात है जब इंदिरा गांधी ने समाजवाद की नकली रट लगाना छोड़ दिया था और आयात
उदारता के नए दौर की डुगडुगी पकड़ ली थी। अतः कीटनाशकों के आयात तथा पैदावार के
लिए देश के दरवाज़े और चैड़े किए जा रहे थे। पुराने अथवा वैकल्पिक नामों के अधीन
इनके आयात एवं पैदावार में तेज़ी आ रही थी। ( जिसकी रफ्तार 90वें के विश्वीकरण
तथा आथर््िाक सुधारों के अगले दौर में और अधिक तेज़ हो गई थी।)
80 के दशक
में बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा इनके कीटनाशकों के बारे में दो बातों के कारण संसार
भर में धिक्कारपूर्ण चर्चा हुई। इन कीटनाशकों ने सूडान में ‘गेज़रा‘ नामक कपास पट्टी की
खेती को तबाह कर दिया था। भारत में भी इन कीटनाशकों का खर्चा फसल के कुल खर्चे के 60-70 फीसदी तक जा रहा
था। जबकि कीड़ांे के हल्ले भयानक होते जा रहे थे। कई कृषि विशेषज्ञों तथा कीट
माहिरों ने भय प्रकट किया था कि भारत के बडे भूमि क्षेत्रों के साथ गेज़रा जैसी
होनी हो सकती है।
दिसंबर 1984 में भोपाल में
अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कारबाईड के कीटनाशकों के प्लांट में से रिसी
ज़हरीली गैस मिथाइल आईसोसाइनेट ने हज़ारों
लोगों की बली ले ली थी। इसने लाखों लोगों को अपने भयानक असरों की लपेट मंे
ले लिया था। इसने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अमानवीय मुनाफाखोरी की व्यापक चर्चा
छेड़ दी।
परन्तु
भारतीय शासक इन अपराधियों के विरुद्ध कुछ करने की बजाय विदेशी पूँजी का उत्साह
कायम रखने की राष्ट्रध्रोही रट लगाते रहे। यह हैरानी की बात नहीं है कि 2 वर्ष पूर्व उसी
ऐंडोसलफान रसायण द्वारा केरल के किसानों पर कहर ढाए जाने के समाचार आए,
जिस प्रतिबंधित रसायण के प्रयोग के विरुद्ध 45 वर्ष पूर्व भारत
के वैज्ञानिकों ने आवाज़ उठाई थी।
पंजाब एवं
हरियाणा के किसानों तथा खेत मज़दूरों की रोज़ी रोटी पर आॅबेरोन का जानलेवा छिड़काव
शासकों के इस लंबे जन-दुश्मन व्यवहार का ही एक उदाहरण है।
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