सूदखोर कजऱ् का मुद्दा एंव
हिंसक वर्ग दुश्मन के खिलाफ
संघर्ष की चुनौती
यह सच्चाई
स्थापित हो चुकी है कि किसान आत्महत्याआंे की जड़ंे उनकी वित्तीय मंदी की अवस्था
में मौजूद हैं। केंद्रीय व प्रांतीय सरकारों के विशेषज्ञों की रिपोर्टें कहती आ
रहीं हैं कि आत्महत्याओं का मुख्य कारण कृषि संकट है। इस संकट ने किसानों व खेत
मज़दूरों को मंदी की चर्मसीमा पर धकेल दिया है। यह मंदहाली प्रधान रूप में कजऱ्ो
द्वारा, विशेषकर
सूदखोर कजऱ्ों के भारी बोझ द्वारा प्रकट हो रही है। सरकार के अपने विशेषज्ञों को
भी यह सिफारिश करनी पड़ रही है कि सूदखोरों का कजऱ्ा चुकाने व बिगड़ी वित्तीय
स्थिति को पुनः पटड़ी पर लाने के लिए किसानों को बैंक कजऱ्े प्रदान करें। अब
इसमें कोई संदेह नहीं रहा कि सूदखोर कर्जे़ का अर्थ आत्महत्या कजऱ् बन गया है।
फिर भी देश
के शासक आत्महत्याओं की घटनाओं के कारणों को ढँकने से बाज़ नहीं आते। पिछले दिनों
इन घटनाओं को बहुत ही मामूली रूप में लेने की मूर्खतापूर्ण मिसाल एक कंेद्रीय
मंत्री ने पेश की थी जिसने यहां तक कह दिया कि इन आत्महत्याओं का कारण नामर्दी तथा
प्यार के मामलों में असफलता है।
बेशर्मी की
ऐसी हालत में यह कोई हैरानी की बात नहीं कि आत्महत्याओं का मुआवज़ा देने, किसान हितकारी
कजऱ्ा कानून बनाने,
ज़मीनों की कुर्कियाँ रोकने, सूदखोरों के लिए
बैंक खाते अनिवार्य करने तथा किसान कजऱ्े का बोझ अपनाने जैसे हर मुद्दे पर सरकार
की कारगुज़ारी बद् से बद्तर हुई है। परन्तु इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि राज
सत्ता का रुख़-रवैया सूदखोर जोकों से विशेष लगाव व किसान खेत मज़दूर जनता से
दुश्मनी के रिश्ते में रंगा हुआ है। किसानों द्वारा आत्महत्या पीडि़तों के लिए
मुआवज़े जैसी आंशिक राहत मांगों से आगे बढ़कर सूदखोर लूट को दी गई अन्य कोई भी
चुनौती उनके लिए असहनीय है। पंजाब के किसान संघर्षों ने बार-बार बड़े भूमिपतियों
तथा सूदखोरों जैसी परजीवी जोंकों के रक्षक, अत्याचारी शासन के क्रूर वार झेले हैं। यह
वही जोंकें हैं जो लूट के मारे किसानों को कजऱ्े के फंदे पर लटका कर आत्महत्याओं
के लिए मजबूर करते हैं। किसानों का मौत के इन सौदागरों के विरूद्ध संघर्ष का अनुभव
दर्शाता है कि उनका मुकाबला वर्गीय घृणा की जहर से भरे बदलाखोर कपटी दुश्मनों से
है। बीती सदी के आखिर में, सूदखोर लूट के खिलाफ़ पंजाब के किसान संघर्षों में, मुद्दों के सचेत
प्रवेश व पैरवी का आरंभ हुआ। तब से ही सूदखोर वर्ग तथा राज-सत्ता के प्रतिक्रम की
झलके सामने आने लगी थीं। सुर्ख रेखा के कालमों में हम पहले भी यह चर्चा करते आए
हैं कि जेठूके फायरिंग की पृष्ठभूमि में कजेऱ् के मसले पर इलाके में लड़ाकू किसान
लामबंदी का श्य तथा इसे शुरूआत में ही दबा देने का इरादा कार्यशील था। बाद में
जैसे जैसे कजऱ्े के मसले पर किसान संघर्ष मोर्चे प्रचंड होते गए राजसत्ता व
सूदखोर वर्ग का गठजोड़ अपनी वर्गीय नफरत की ज़ालिम नुमाइश लगाता गया। रामपुरा, मौड़, मानसा, चट्ठेवाला,
माईसरखाना, तपा तथा अन्य स्थानों के अनुभव ने इस गठजोड़
के खिलाफ प्रभावकारी संघर्ष की आवश्यक्ताओं को उभारा। यह प्रकट हुआ कि कैसे सूदखोर
वर्ग किसानों के खिलाफ संगठित रूप में पलटवार करने पर उतारू होता है। मुकाबले की
लामबंदी करता है। लट्ठमार ताकत की नुमाइश लगाता है। कूड़ प्रचार का हमला करता है।
ग्रामीण व शहरी का सवाल खड़़ा करता है। फासीवादी हमलों के षड्यंत्रों व कारवाईयों
को अंजाम देता है। बड़ी जोंकों की पार्टियां इस वर्ग में अपने राजनीतिक आधार को
विशेष महत्व देती हैं। इसके साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की जरूरत को प्राथमिक्ता
देता है। सत्ता हाथ में होते हुए इसके लिए रक्त-रंजित राज मशीनरी झोंकते हैं।
संघर्षशील लोगों पर बदले की नीयत से झपटते हैं। सत्ता से बाहर रहने की स्थिति में
भी सूदखोर वर्ग को खुश रखने के हर संभव प्रयास करते रहते हैं। हम इस हालत का
गंभीरता से निरीक्षण व विश्लेषण करते रहे हैं तथा अपने विश्लेषणों व सरोकारों को
सुखऱ् रेखा के कालमों के माध्यम से सांझा करते आए हैं। अगले पृष्ठों में हम
पाठकों के समक्ष चट्ठेवाला संघर्ष के दौरान तथा बाद में इस गंभीर मसले पर हमारे
द्वारा सुर्ख़ रेखा में की गईं कुछ टिप्पणियों के अंश प्रस्तुत कर रहे हैं।
-संपादक
फासीवादी हमलों की सिर उठा रही चुनौती
सूदखोर लूट
के विरुद्ध चट्ठेवाला किसान संघर्ष दौरान किसान दुश्मन शक्तियों के खतरनाक इरादे
प्रकट हुए हैं। सूदखोरों व पुलिस के गठजोड़ द्वारा लोकप्रिय किसान नेता झंडा सिंह
जेठूके को शारीरिक क्षति पहुँचाने के काले मनसूबे सामने आए हैं। भारतीय किसान
यूनियन एकता के सूत्रों के अनुसार रामामंडी के सूदखोर गुट द्वारा श्री झंडा सिंह
जेठूके को निशाना बनाने के लिए पेशावर कातिल गिरोहों की सेवाएं हासिल करने के
प्रयास हुए हैं। उल्लेखनीय है कि रामामंडी की जिस सूदखोर फरम के विरुद्ध चट्ठेवाला
में कुर्की के मसले पर संघर्ष चला है उसके द्वारा डी. आई. जी. रैंक के एक उच्च
पुलिस अधिकारी के साथ अपने नज़दीकी संबंधों की तथा उच्च अफसरों द्वारा बनाए
दर्जर्नों झूठे पुलिस मुकाबलों का छाती ठोक कर ढिंढोरा पीटा जाता रहा है। रल्ला
में श्री जेठूके को अगवा करने की कोशिश जिस्मानी तौर पर नकारा करने के मनसूबे से
की गई थी। परन्तु बाद में इसमें मिली असफलता का गुस्सा पुलिस द्वारा वृद्ध किसानों
पर अत्याचारों तथा हाथ पैर तोड़ देने में प्रकट हुआ है।
इस गंभीर
चुनौती से जुड़े हुए कुछ पक्ष ध्यान माँगते हैं। पिछले समय से किसान संघर्ष खिलाफ
सूदखोर वर्ग का जवाबी प्रतिक्रम, सामूहिक वर्गीय अभियानों के रूप में सामने आ
रहा है। ज़ोरदार प्रचार हमला, मुकाबले की लामबंदी तथा लट्ठमार शक्ति को
सक्रिय करना इस प्रतिक्रम का आवश्यक हिस्सा बन रहा है।
चट्ठेवाला
घटनाक्रम के पश्चात् सरकार ने भी किसान संघर्ष से अमन-कानून को खतरे तथा किसान
संगठन का आंध्ा्रा के ‘‘ दहशतगर्दों ‘‘ से संबंध होने का राग अलापा है। इससे पूर्व
संसदीय चुनावों के दौरान मीनिया में एक भूतपूर्व कांग्रेस मंत्री ने खुलेआम मंच से
आमंत्रण दे कर किसान कार्यकर्ताओं पर लट्ठमार हमला करवाया था एवं भाई बखतौर की
घटनाओं के समय यूनियन के जनरल सचिव श्री सुखदेव सिंह कोकरी कलां की टाँग सोच समझ
कर तोड़ी गई थी।
किसान शक्ति के खिलाफ़ सरकारी व गैर सरकारी
संगठित हिंसा के प्रयोग के पक्ष के साथ-साथ, जवाबी लामबंदी तथा कुप्रचार अभियानों का
पक्ष यह प्रकट करता है कि शासक वर्ग किसान जनता की बेचैनी से बुरी तरह भयभीत हैं।
विशेषकर इसके संगठित संघर्ष का रूप धारण कर लेने से भयभीत हैं तथा प्रतिक्रियावादी, हिंसक व फासीवादी
तौर तरीकों को आज़माने की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। किसान संगठन, संघर्षों तथा
नेताओं को कुप्रचार के माघ्यम से बदनाम करने के यत्न इन तौर तरीकों के अभिन्न अंग
हैं।
नवंबर-दिसंबर 2004
कुछ निरीक्षण-कुछ सबक
चट्ठेवाला
घटनाक्रम का ध्यान देने योग्य पहलू यह है कि निजी सूदखोरों द्वारा, एक किसान की ज़मीन
की कुर्की को संगठित रूप में दी गई चुनौती ने राज सत्ता की तीखी प्रतिक्रिया
उत्पन्न की है। बैंक कुर्कियों के विरोध से निपटने की तुलना में कहीं ज्यादा तीखी
प्रतिक्रिया सामने आई है। सूदखोर वर्ग ने राज-मशीनरी की सक्रिय सहायता से संगठित
हमलावर रुख़ इख्तियार किया है। अदालती आदेशों से लैस हो कर, कुर्की के मनसूबों
को अंजाम देने के लिए बड़े स्तर पर पुलिस ताकत झोंकी गई है। उच्च पुलिस अधिकारियों
के स्तर पर खंडित करने तथा दहशत पैदा करने की योजनाएं बनाने तथा उन्हें अंजाम देने
का सिलसिला चलाया गया है। इस प्रकार बड़े स्तर पर खुलेआम व्यवहारिक रूप में यह
प्रदशर््िात किया गया है कि राज सत्ता सूदखोर वर्ग के हितों की रक्षा के लिए
बचनबद्ध है। यह प्रकट किया गया है कि राज सत्ता सूदखोर वर्ग के हितों के विरुद्ध
किसी भी प्रकार की चुनौती को स्वीकार नहीं करेगी। दूसरी ओर किसान जनता ने सूदखोर
लूट के खिलाफ़ अपनी वर्गीय घृणा तथा आक्रोश का ज़ोरदार प्रदर्शन किया है। हज़ारों किसानों
ने दहशत पैदा करने वाले सरकारी कदमों को अंगूठा दिखा कर तथा पुलिस बाधाएँ पार करके
चट्ठेवाला गाँव पहुँचे हैं। जुझार विद्रोही जज़्बा प्रकट हुआ है। जबरन कुर्की के
प्रयत्नों को किसान जनता की संगठित मुकाबला शक्ति का सामना करना पड़ा है। राज
सत्ता की रक्तरंजित ताकत के ज़ोर पर इस मुकाबला शक्ति पर हमलावर रुख़ अपनाने से
शासकों को परहेज़ करना पड़ा है।....
फिर भी इस
अनुभव से कुछ ध्यान देने योग्य सबक उभरते हैं। सूदखोर वर्ग के खिलाफ संघर्ष
मुकाबलतन जटिल तथा कठिन संघर्ष है। सरकार के खिलाफ संघर्ष मुद्दों की तुलना में, ऐसे संघर्षों के
दौरान सरकार को सूदखोर वर्ग के मुकाबले ज्यादा ज़ोरदार व संगठित वर्गीय दबाव का
सामना करना पड़ता है और उनके खरे प्रतिनिधि होने का सबूत देना पड़ता है। ऐसी हालत
में शासकीय प्रहारों को पछाड़ कर उपलब्धियां जुटाने के लिए किसान जनता को मुकाबलतन
ज़्यादा शक्तिशाली संगठित हमलावर ताकत की ज़रूरत है जो तीखे हमलों की लडि़यों को
रोक कर परास्त करने मंे सक्षम हों। यह ज़रूरत यूनियनों के प्रभाव अधीन दायरे को
ठोस संगठित ताकत के रूप में ढ़ालने के विशेष यत्न जुटाने की मांग करती है। जटिल
हमलावर परिस्थितियों में संघर्षों का सफल नेतृत्व करने में सक्षम टोलियों की गिनती
तथा गुणों में वृ़ि़द्ध के लिए विशेष यत्न जुटाने की मांग करती है।
नवंबर-दिसंबर 2004
सूदखोर वर्ग की हिंसक वृत्ति
चुनौती कबूल करने की ज़रूरत
....सूदखोर वर्ग, शासक वर्ग तथा
शासकीय प्रबंध प्रणाली का इतना ज़्यादा भड़का हुआ व भयभीत व्यवहार सामने आने की
वजह क्या है ?
इसका ठोस
कारण सूदखोर वर्ग की इस धारणा में पड़ा है कि यदि संकटग्रस्त किसान जनता की सबसे
निचली परत, उनकी
जागीरू दबिश व अधीनता तोड़ने की जुर्रत करने लगी तो समझो बग़्ाावत आज भड़की या कल।
क्योंकि जितनी लूट डेढ़, दो या तीन रु. सैंकड़ा सूद के प्रचलित व स्वीकृत तरीके द्वारा
होती है उससे कई गुना ज़्यादा लूट जागीरू दबिश, अधीनता, मुहताजगी तथा
दुश्मनी वाले रिश्ते संबंधी किसानों की अनजानता द्वारा होती है।
वर्तमान
अवस्था में गरीब तथा मध्यम वर्गीय किसान जनता एक प्रकार से सूदखोरी के लिए बंधक
असामी बनी हुई है। क्योंकि किसानी के हाथ आने वाला कृषि मुनाफा, कृषि लागत वस्तुएँ
पैदा करने वालीं एवं इनका व्यापर करने वालीं, देसी तथा विदेशी कंपनियों के अंधाधुँद
मुनाफों में परिवर्तित हो जाता है। या फिर
आढ़तिओं की पर्ची पर दोम दर्जे का मिलावटी माल बेचने वालीं बेनामी कंपनियों के
अंधाधुँद मुनाफों में परिवर्तित हो जाता है। बाकी सूदखोरों के खाते में जमा हो
जाता है। परिणामस्वरूप घरेलू खर्च चलाने के लिए अगली फसल बोने से लेकर बेचने तक, ठेके पर ली गई
ज़मीन की पेशगी ठेका राशि के भुगतान के लिए कोई बचत शेष नहीं रहती। कोई नगद राशि
हाथ में भी नहीं होती। अपितु किसान के उधार खाते का बोझ बढ़ जाता है। नगद राशि की इस कमी को पूरा करने
के लिए सरकारी योजनाओं के नामाधीन बनीं कोआपरेटिव सोसाइटियों एवं कृषि बैंकों आदि
का ‘‘कमी पूरी
करने का‘‘ कोई इरादा
नहीं होता। न सरकारी बजटों में से ऐसा कोई धन इन्हें प्रदान करवाया जाता है।
किसानों को मिलता है बचा-खुचा। वो भी बैंकों के दलालों या सूदखोरों की जेबें गर्म
करने के बाद। पैसों की इस कमी को पूरा करने के लिए कुछ परिवार जनों की खातिर
वैकल्पिक रोज़गार के साधन भी लगभग खत्म हो चुके हैं। जिन्हें दूर दराज
मेहनत-मज़दूरी, नौकरी या
छोटे कारोबार में कोई रोज़गार मिला हुआ था उन्हें भी घर का रास्ता दिखाया जा रहा
है। अंततः संपूर्ण परिवार का, गरीब किसान जनता की सारी आबादी का सारा बोझ
कृषि पर आन पड़ता है। इस प्रकार किसान जनता, कृषि व्यवसाय, प्राप्त भूमि के
टुकड़े तथा लूट के स्थापित रूझान के साथ जकड़ी हुई है। इसके, इस पेशे से बाहर
निकलने, इसे
मुनाफेयोग्य बनाने के सारे रास्ते बंद किए जा चुके हैं। सोच-समझकर बंद किए जा चुके
हैं। सरकारी नीतियों के परिणामस्वरूप बंद किए जा चुके हैं। ऐसे हालात में किसान
जनता की यह परत सूदखोर की बंधक असामी बन जाती है। सूदखोर की मुहताज व बेबस हो जाती
है। इसी धौंस सदका सूदखोर शरेआम डाके मारने पर उतर आता है। इस प्रकार सूदखोर वर्ग
की अपने बंधक वर्ग विरुद्ध डाकों की कड़ी शुरू हो जाती है।
पहला डाका
कलम के ज़ोर पर शुरू होता है। खाली प्रोनोट पर दस्तख़त करवाना, मनमजऱ्ी का ‘‘मूल‘‘ बनाना, मजऱ्ी का ब्याज
लगा लेना साधारण बात है। फसल बोने-बेचने तक उधार कितनी बार गया, कितना गया, घरेलू खर्च के लिए
उधार कितनी बार, कितना गया? तथा बही-खाते पर
कितना चढ़ा?कितने गुना
चढ़ा?इसका भेद
सूदखोर के पास ही रहता है। खेत से आढ़तिए के पास गई फसल, कितने की हुई?काट-छाँट कर क्या बचा?यह राज़ भी सूदखोर
की कलम के पास ही होता है। सूदखोर के हाथ में दिया यह सारा हिसाब-किताब बड़ी
हेरा-फेरियों का साधन बनता है। इस प्रकार कलम की सरदारी सूदखोर के हाथ में, होने से उसकी कमाई
में उछाल आता है।
दूसरा डाका
पर्ची के ज़ोर पर डाला जाता है। क्योंकि कृषि लागत वस्तुओं का खर्चा सूदखोर से
मिलता है, यह नगद
नहीं पर्ची पर मिलता है। जिस दिन, जितनी वस्तु खरीदनी है, उस दिन उसकी पर्ची
मिलती है। यही हाल दिन-प्रतिदिन के घरेलू खर्चों का होता है। गुड़-चाय, कपड़ा आदि सब पर्ची
पर आता है। इसके अतिरिक्त सुख-दुख, बिमारी-दुर्घटना एवं मुकद्दमा आदि किसी भी
प्रकार के विशेष खर्चे हों, पर्ची पर ही काम चलता है। पर्ची देकर खरीदी
वस्तु का रेट ऊँचा होता है। माल घटिया या मिलावटी होता है। नाप-तोल में भी कम होता
है। इसके अतिरिक्त हर पर्ची के पीछे सूदखोर का कमिशन अलग होता है। पचर््िायों के
बनते पैसों पर सूद अलग होता है। इस प्रकार किसान की खपत तथा खरीद मंडी की सरदारी
सूदखोर के हाथ में होने से उसकी कमाई में उछाल आता है।
तीसरा बड़ा
डाका तब पड़ता है जब कारोबार में टूट चुके किसानों को मूल व ब्याज की आसमान छूती
रकमें वसूल की जाती हैं। न्यायाधीश को पैसे पूज कर डिग्री करवाई गई हो या पुलिस को
खरीद कर, किसान को
गिरफ्तार करवा कर,
इकरारनामा लिखवाया जाए या चुपचाप लिखा-पढ़ी द्वारा नाक बचा
पाने का यत्न हो, किसान के
पास देने के लिए नगद रकम नहीं होती। घर, ज़मीन, जायदाद, पशु या कृषि-औज़ार, जो कुछ भी बचा हो, बिकाऊ होता है, सूदखोर को मंज़्ाूर
होता है। पर इनमें से भी अच्छी मनपसंद चीज़ ले जाना, आधे पौने रेट पर ले
जाना, सूदखोर का
धर्म है। यह स्वीकृत रीति है। इससे भी आगे गिरवी ज़मीन का निपटारा करके, धोखे से अपने नाम
लिखवा लेना, पूर्व
लिखित भूमि के स्थान पर धोखे से अधिक भूमि के नंबर डलवा लेना, आम होता है। इस
प्रकार दीवालिया हो चुके किसान की ज़मीन जायदाद व माल-असबाब की नीलामी तथा खरीद
करने की सरदारी सूदखोर के हाथों में होने की वजह से उसकी कमाई में उछाल आता है।
किसान जनता
संघर्ष की राह पकड़ती है, इसपर सूदखोर वर्ग जल-भुन जाता है। मीठी ज़्ाुबान वाला, कपटी तथा पारिवारिक
सदस्य की भांति पेश होने वाला यह सूदखोर, लोहे की लट्ठ बन जाता है। हिसाब के लिए
पहुँचने वालों के दिमाग भेदने लगता है। यह है सूदखोर वर्ग का असली रंग-रूप। हकीकत!
चट्ठेवाला, माईसरखाना, तथा गुरूहरसहाय की
हिंसक घटनाएँ भी इसी जागीरू चरित्र का परिणाम हैं। अंधाधुँद जागीरू मुनाफे की
रक्षा के लिए श््रूण-हत्या कर देने की प्रवृति का इज़हार हैं। नवजात का गला घोंटकर
खत्म कर देने के प्रचलित जागीरू रिवाज़ हैं। इन सभी स्थानों पर जागीरदारी लूट तथा
दबिश की सलामती के लिए तत्पर रहती सरकार का सारा छल तथा बाहूबल इस सूदखोर प्रबंध
की सेवा में दनदनाते हुए कारवाई के लिए पहुँचता रहा है। इसलिए यह किसान लहर के
गंभीर जुझारूओं के लिए खुली चुनौती है। हिंसक प्रवृति वाले इस वर्ग के खिलाफ, लड़ाई की शुरूआत के
वक्त भी सिर पर कफन बाँध कर मैदान में आने की अत्यावश्यक ज़रूरत है। ऐसे दृढ़
इरादे, कुर्बानी
की भावना तथा प्रसन्न चिŸा से चुनौती कबूल करने की ज़रूरत है।
मई-अगस्त 2005
सूदखोरी का खूनी फंदा
12 अक्तूबर
को बीरोके खुर्द (जि़ला मानसा) में एक किसान की ज़मीन की कुर्की करने आए
सूदखोर-आढ़तिया पारिवारिक सदस्यों तथा गुंडा गिरोह के साथ भारतीय किसान यूनियन
एकता (डकौंदा) के कार्यकर्ताओं के साथ तीखी झड़प हो गई। यूनियन का ब्लाॅक
प्रतिनिधि पिरथीपाल पाल सिंह कजऱ्े में डूबे किसान की ज़मीन की रक्षा करता हुआ
शहीद हो गया। सूदखोर गिरोह के ज़मीन पर कब्ज़ा करने आए कई सदस्य ज़ख्मी हो गए।
सूदखोर गिरोह की यह खूनी कार्यवाई बेहद भड़काहट पैदा करने वाली है। सर्वव्यापक
निंदा की हकदार है।
कर्जे़ की
चक्की में पिसी हुई किसान जनता को भीतर तक दहला देने वाली इस वारदात ने उनमें
भय-कंपन उत्पन्न नहीं की बल्कि आक्रोश की तरंग पैदा की है। उभरती सुखऱ् किसान लहर
को अपने खून से सींचने वाले पिरथीपाल की मृतक देह को हज़ारों किसानों ने तहे दिल
से श्रद्धांजलि अर्पित की है। मृतक काया को अग्नि देने, अस्थियां एकत्र
करने, अंतिम
विदायगी देने तथा सतलुज किनारे अस्थि विसर्जन में किसान समूहों ने भारी गिनती में
शामिल हो कर अपना ग़म व गुस्सा प्रकट किया है। पिरथीपाल के कातिलों के गलों मंे
फंदा डालने तथा भूमि-रक्षा आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए किसान संगठनों द्वारा
तत्काल रूप मंें तीखी कारवाई की गई है....
.....इस नए हमले
ने साधू सिंह तखतूपुरा की शहादत तथा खन्ना-चमयारा के किसानांे के कत्लों के अभी तक
ताज़े व रिस रहे जख़्मों पर नमक छिड़क दिया है। किसान जनता तथा किसान-मज़दूर
संगठनों में इस समझ को प्रचंड किया है कि आथर््िाक हमले को आगे बढ़ाने के लिए शासक
कातिलाना हमलों का सहारा ले रहे हैं। जैस-जैसे आथर््िाक धावा तेज़ हो रहा है, खूनी हमला भी तेज़
हो रहा है। यह समझ विकसित हुई है कि आथर््िाक हितों की रक्षा तथा प्राप्ती के लिए
खूनी हमले के खिलाफ लड़े बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता.....
....शासकों के
अत्याचारी व्यवहार के खिलाफ मालवा, माझा व दुआबा हरकत में आ गया है। सूदखोर
श्रेणी, भू-माफिया
तथा सियासतदानों के गठजोड़ के खिलाफ, उनकी लूटने तथा मारपीट करने के चले आ रहे
पुश्तैनी चरित्र के खिलाफ संघर्ष की चुनौती उभर आई है।......
....सूदखोर
वर्ग के किसी व्यक्ति के विरुद्ध जायज़ कानूनी कार्यवाई करवाने के लिए उठने वाली
किसानों की सामूहिक आवाज़ को वहीं पर दबाने के लिए यह वर्ग, वर्ग के रूप में
हरकत करता है। जंगी जेहाद खड़ा करता है। हिंसक हो कर दोषी को बचाने के लिए तत्पर
होता है। राजनैतिक एवं पैसे की ताकत झोंकता है। राज कर रही पार्टी पर, वर्गीय वफादारी
निभाने के लिए दबाव डालता है। पुलिस तथा प्रशासन को हमला करने के लिए उŸोजित करता है। इन
सभी भागीदारों, जोटीदारों
का सांझा हमला उभरता है। सामूहिक किसान आवाज़ पर प्रहार करने को अमादा हो उठता है।
पिछले सभी वर्षों का यह स्थापित दस्तूर है। .....
......किसानों की
भूमि तथा जीवन छीनने वाले कई तीव्र रूप प्रकट होते आ रहे हैं। ज़मीन की कुर्की
आढतिया करे या बैंक या सरकार किसी बहाने भूमि अधिग्रहण कर ले, या भू-माफिया किसी
ज़मीन पर कब्ज़ा कर ले। या कोई किसान कजऱ्े के बोझ तले आकर सारी भूमि बेचकर
भूमिहीन हो जाए। गरीब किसानों के हाथों से भूमि तेज़ी से खिसक रही है। बैंकों, सूदखोरों की जलालत
से पीडि़त या ‘‘कहाँ से
कमाऊँ कहाँ से खिलाऊँ‘‘ की चिंता का मारा किसान जनता का एक हिस्सा, आत्महत्याआंे
द्वारा मौत के मुँह में जा रहा है। एक अन्य हिस्सा धरती, जल तथा पर्यावरण को
अंधाधुँद मुनाफों के लिए दूषित किए जाने के कारण कैंसर जैसी बिमारियों से मौत के
मुँह में जा रहा है। जब ज़मीनों को हड़पने तथा जिंदगी छीनने के इस तांडव को
अस्वीकार करते हुए,
इसके खिलाफ उंगली उठाने के लिए सामूहिक रूप में किसान जनता
सक्रिय होती है तो इस गुंडागर्दी की जिम्मेदार शक्तियाँ जल-भुन जाती हैं। बडे़
सूदखोरों, बड़े
जागीरदारों, भू-माफिया, बड़े व्यापारियों
तथा इनकी सरकारों की सरकारी व गैर सरकारी हिंसक शक्तियां आपसी बेशर्म तालमेल द्वारा मौत बरसाने पर उतर
आती हैं। इस प्रकार यह लड़ाई चर्चित मुद्दे के समाधान से कहीं बड़ी तथा लंबी बन
जाती है। इसलिए जहां एक तरफ तो इन इज़हारों के खिलाफ दृढ़ विरोध को प्रचंड करने की
जरूरत है वहीं दूसरी तरफ साथ के साथ ही, किसान समूहों को यह संकट पैदा करने तथा
तीव्र करने के पीछे अपनाईं जा रहीं बुनियादी नीतियों की जानकारी देना बेहद आवश्यक
है जिससे उन्हें लंबे तथा तीखे संघर्षों के लिए तैयार किया जा सके, ताकि किसानी संकट
के बुनियादी कारणों को हल करने की तरफ अग्रसर हुआ जा सके।
नवंबर-दिसंबर, 2010
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