सरकारी विशेषज्ञ कमेटी की रिपोर्ट
एवं राजनीतिक इरादे का सवाल
-स्टाफ रिपोर्टर
साल 2007 में खेतीबाड़ी
कजऱ्े संबंधी सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञों के एक गु्रप की रिर्पोट जारी हुई थी।
आर‐ राधाकृष्ण
इस कमेटी के चेयरमैन थे। इस रिर्पोट के ज़रिए जो बात उभर कर सामने आई वह एक अलग
तथा ठोस टिप्पणी की मांग करता है। यहां इस रिर्पोट की चर्चा का उद्देश्य सीमित है।
यह रिर्पोट भी इस बात की पुष्टि करती है कि देश में किसान आत्महत्याओं के प्रकरण
का कर्जे के साथ गहरा संबंध है तथा इसकी जडे़ देश के खेतीबाड़ी संकट में मौजूद
हैं।
किसानों की
आत्महत्याओं के बारे में टिप्पणी करते हुए रिर्पोट में कहा गया है,“किसान भाईचारे में
बढ़ रहे आत्महत्या खतरा अंशों तथा किसान आत्महत्याओं की बढ़ रही घटनाएं मिल कर
बड़े सामाजिक आर्थिक रोग की तरफ संकेत करती हैं”। इसका अर्थ है कि
आत्महत्या करने वाले हर किसान के पीछे कई और भी ऐसे ही मानसिक उत्पीड़न अधीन हैं‘‘।
रिर्पोट
बताती है कि 1996 में किसान
मर्दों तथा गैर किसान मर्दों संबंधी तुल्नात्मक आत्महत्या मृत्यु दर बराबर थी। पर
इसके पश्चात् किसान मर्दों की आत्महत्या मृत्यु दर में तेज़ी से वृद्विहुई जबकि
गैर किसान मर्दों की आत्महत्या मृत्यु दर में मामूली वृ़िद्ध हुई। आंकड़ों द्वारा
रिर्पोट दर्शाती है कि 1996 से 2005 तक मर्द किसान आत्महत्या मृत्यु दर में औसत सालाना वृद्वि4‐8 प्रतिशत थी। (2015 के ताज़ा आंकड़े
किसान आत्महत्या मृत्यु दर में भारी उछाल को प्रकट करते हैं।)
रिर्पोट
अनुसार बहुत से अध्ययन कजऱ्े का किसान आत्महत्याओं से संबंध नोट करते हैं। अन्य
खतरा अंशों में आर्थिक तथा सामाजिक हैसियत को क्षति, फसल की तबाही तथा
सामाजिक जिम्मेदारियां निभाने में नाकामी आदि शामिल हैं। आत्महत्या खतरा कारक के
तौर पर सबसे बड़ी भूमिका कजऱ्े की है। महाराष्ट्र में इसकी भूमिका बहुत ही बड़़ी
है। यहां किसानों को आत्महत्याओं के लिए मजबूर करने में कर्जे की संभावित भूमिका 87 प्रतिशत आंकी गई
है। दूसरे स्थान पर,
आर्थिक गिरावट का पहलू है जिसकी संभावित भूमिका 74 प्रतिशत है।
रिर्पोट बताती है कि कजऱ्ा, खास तौर पर किसानी का कजऱ्ा हमारे देश में
आफत या बर्बादी के प्रकरण के तौर पर जाना जाता है। रिर्पोट कजऱ्े के आफत बन जाने
की परिस्थितियों को बयान करती हुई कहती है कि ऐसा प्राकृतिक आपदाओं, सूखा, नकली खाद, बीजों व कीटनाशकों
के इस्तेमाल या अन्य आकस्मिक कारणों की
वजह से फसल की हुई बर्बादी की हालत में होता है। या फिर तब, जब ऊँचे लागत खर्चे, तकनीक की स्थिरता
तथा उचित दाम की कमी, किसान के लिए मूल तथा ब्याज चुका पाना असंभव बना देती है।
रिर्पोट मुख्य कारण का विश्लेशण करती हुई बताती है कि अक्सर ही साहूकारों की ऊँची
ब्याज दर कजऱ्े को आफत बना देती है। मूल तथा मिश्रित ब्याज का बोझ किसानी को अपंग
बनाता है। कजऱ् लेने वाला जमीन गिरवी रखने या बेचने को तैयार हो जाता है और
आजीविका का एकमात्र स्त्रोत गंवा बैठता है। कुछ मामलों में कजऱ्ा उतारने की यह
नाकामी आत्महत्या का अहम कारण बन जाती है। ( रिर्पोट पन्ना न‐ 71 )
विशेषज्ञों
की यह रिर्पोट राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन द्वारा अपने 59वें चरण में तैयार
करवाईं गईं दो सर्वे रिर्पोटों को आधार बना कर किसान कर्जे़ के विभिन्न पहलुओं के
बारे में निरीक्षण पेश करती है। यह रिर्पोटें हैं सर्व भारत कर्ज़ व पूँजी निवेश
सर्वे तथा किसान हालत जायज़ा सर्वे।
साल 2003 की इन सर्वे
रिर्पोटों के अनुसार 8 करोड़ 93 लाख 30 हज़ार किसान घरों में से 48‐6 प्रतिशत किसान घर
कजऱ्धारक हैं। विशेषज्ञों की रिर्पोट टिप्पणी करती है कि जो परिवार कर्जधारकों
में शामिल नहीं हैं उनमें बड़ी संख्या हाशिए पर धकेले हुए उन किसानों की हो सकती
है जिनकाी किसी भी प्रकार के वित्तीय स्त्रोतों तक पहुँच नहीं है। एक कजऱ्ई किसान
परिवार पर औसत कजऱ्ा 25,902 रु. बनता है।
कजऱ्धारकों
की संख्या उन प्रांतों में ऊँची है जहां खेती लागत वस्तुएं घनी मात्रा में
इस्तेमाल हो रहे हैं या फिर खेती विभिन्नता नीति लागू हो रही है। आंध्रा प्रदेश, तामिलनाडू तथा
पंजाब इस सूची में शिखर पर हैं। आंध्रा प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र तथा
पंजाब में कजऱ्धारकों की संख्या तथा प्रति परिवार कजऱ्ा देश की औसत से ऊँचे हैं।
प्रति परिवार किसान कजेऱ् में इस वर्ष पंजाब सब से ऊपर था। विशेषज्ञ कमेटी
खेतीबाड़ी के व्यापारीकरण को इसके कारण के तौर पर नोट करती है।
2003 में किसान
घरों पर कुल कजऱ्ा 1 लाख 12 हजार करोड़ आंका गया है। इसमें 48 हज़ार करोड़
कजऱ्ा गैर संस्थागत स्त्रोतों का है। व्यापारियांे तथा सूदखोरों का हिस्सा 35 करोड़ है। रिर्पोट
बताती है कि 1981 से सहकारी
कजऱ् के हिस्सों की वृ़िद्ध में स्थिरता आई हुई है तथा सरकारी व्यापारिक बैंकों
का हिस्सा नीचे आ गया है। 1991 में यह हिस्सा 35 प्रतिशत से 26 प्रतिशत तक आ गिरा
है। सरकारी व्यापारिक बैंकों के हिस्सों में गिरावट, संस्थागत कजऱ्ों
के गिरते हिस्सों का मुख्य कारण है। स्थिति जायज़ा सर्वे रिर्पाट 2003 के आधार पर यह
रिपोर्ट आंध्रा प्रदेश,राजस्थान, आसाम, बिहार व पंजाब में कुल कजऱ्े में गैर
संस्थागत अर्थात् प्राईवेट कर्जों का बड़ा योगदान
बताती है। इसकी सूचियों में आंध्रा प्रदेश में प्राईवेज कजऱ्े का भाग 70 प्रतिशत तक जाता
है। आंध्रा प्रदेश,
तामिलनाडू, राजस्थान व पंजाब में सुदखोरों के
कर्जें का भाग सरकारी बैंकों से ऊँचा है।
बड़े
किसानों की तुलना में छोटे तथा गरीब किसानोें के काफी बड़े हिस्से प्रभावी तौर पर
सूदखोर तथा अन्य निजी स्त्रोतों के देनदार हैं। एक एकड़ वाले किसान परिवारों ने
आधे से ज्यादा कजऱ् इन निजी स्त्रोतों से लिया था। यह कुल किसान परिवारों का 34.2 प्रतिशत तथा
कजऱ्धारक किसान परिवारों का 31.3 प्रतिशत बनता है। ज़्यादातर प्रांतों में 1 एकड़ वाले मालिक
किसानों ने अपने कजऱ् का 70 प्रतिशत निजी स्त्रोतों से लिया था।
राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम जमीन (1/4 एकड़) वाले किसानों ने कर्जे का 77.4 प्रतिशत हिस्सा
निजी सूदखोरों से लिया था। जैसे जैसे जमीन का स्वामित्व घटता है वैसे वैसे
संस्थागत कर्जे का कुल कजऱ्े में हिस्सा घटता चला जाता है। गरीब किसानों को तो
सहकारी बंैंकों से और भी कम कजऱ् मिलता है।
रिर्पोट
में बताया गया है कि किसानों के सिर पर खड़ा निजी सूदखोर कजऱ्े का 38 फीसदी 30 फीसदी ब्याज दर पर लिया गया है और टिप्पणी करती है कि
इस से गैर संस्थागत कर्जे की मंडी का लुटेरा चरित्र अभिव्यक्त होता है।
रिर्पोट इस
बात पर चिंता ज़ाहिर करती है कि किसान आत्महत्याएँ बढती जा रही हैं तथा कजऱ् इसके
सब में अहम कारणों में से एक है। यह बड़े ज़मीनी संकट को प्रकट करता है। कजऱ्े का
बड़ा कारण बढती खेती लागतें तथा आमदनी में
कमी है। व्यापारिक फसलों की खेती कजऱ्े की वजह बनने वाला एक और खतरा है।
खेतीबाड़ी के संकट के अलावा किसान जनता बच्चों की पढाई तथा स्वास्थ्य खर्चों के
बोझ से दबी पड़ी है। किसान भाईचारे में इस दर्द का अहसास व्यापक है।
रिर्पोट
कहती है कि मध्य 90 से
खेतीबाड़ी क्षे़त्र में नाकारात्मक रूझान जारी रह रहे हैं। मुनाफों की दर गिर रही
है। खतरे बढ़ रहे हैं। प्रकृतिक स्त्रोत समाप्त हो रहे हैं व कृषि विस्तार की हालत
बिगड़ रही है। फसलों के क्षेत्र में वृद्धि की गिरावट उभर कर सामने आई है। पशु
पालन तथा बागबानी में वृद्धि भी नीचे गई है। बढ़ोतरी में घटती रफतार के साथ साथ
खेतीबाड़ी में पूंजी निवेश भी नीचे लुढका है। यह मुख्य रूप से सरकारी क्षेत्र
द्वारा घटते पूंजी निवेश की वजह से है। निजी क्षे़त्र ने इसकी पूर्ति नहीं की।
रिर्पोट के अनुसार बीजाई अधीन शुद्ध रकबा 1970-71 के स्तर पर एवं
कुल रकबा 1990 के स्तर
पर खड़ा हुआ है। हरित क्रांति के सालों में हर साल अढाई करोड़ हैक्टयर अतिरिक्त
जमीन सिंचाई अधीन आती थी। परन्तु 80वें तथा 90वें के दौरान यह
आंकड़ा 80 लाख
हैक्टेयर पर आ गिरा है। इसका मुख्य कारण सरकारी निवेश की कमी है।
रिर्पोट ने
बैंक कर्जे़ में खेतीबाड़ी के असल हिस्से के निर्धारित अंश(18 प्रतिशत) से काफी
नीचे रहने पर चिंता व्यक्त की है। इसका कहना है कि उत्पादन की स्थिति देखते हुए
खेती क्षेत्र प्राईवेट कर्जे़ का बोझ नहीं झेल सकता।
मंडीकरण की
खस्ता हालत का जि़क्र करते हुए रिर्पोट कहती है कि सरकार द्वारा मंडियाँ नियमित की
जानी चाहिएँ व मंडी की आधारभूत संरचना का विस्तार होना चाहिए।
इसके
अतिरिक्त रिर्पोट में किसानों के लिए फसली बीमा तथा मौसम बीमे की सुविधाओं के
अलावा गिरी कीमतों की पूर्ति के लिए विशेष फंड कायम करने की सिफारिश की गई है।
खेती लागत
पदार्थों का क्षेत्र ज़्यादा से ज़्यादा निजी व्यापारियों के लिए खोले जाने का
संबंध रिर्पोट में नकली लागत पदार्थों की भरमार से जोड़ा गया है। विशेष कर
राष्ट्रीय बीज कार्पोरेशन को समेटने के
कदमों का नकली बीजों के उछाल से संबंध बताया गया है।
रिर्पोट
ध्यान दिलाती है कि व्यापारिक छूटों ने घरेलू मंडी में खेती जिंसों की कीमतों पर
असर डाला है। खास कर कौफी,चाय,रबड,काली मिर्च तथा तेल बीजों की खेती करने वाले किसानों का
नुकसान हुआ है। रिर्पोट यह भी नोट करती है कि 90वें दशक के बाद
खेती पैदावार का निर्यात प्रभावशाली नहीं रहा।
रिर्पोट
कहती है कि गरीबी की कागार पर खड़े किसानों द्वारा संगिठत व सामूहिक उत्पादन की
राह में भुमि स्वामित्व की असामानता एक बड़ा रोड़ा है।
विशेषज्ञों
की यह रिर्पोट तैयार करने का कदम खेती क्षेत्र के किसान कर्जे़ व आत्महत्याओं के
प्रकरण की गंभीर हालत में लिया गया था। विशेषज्ञों ने खेती में सरकारी पूँजी निवेश
व सस्ते संस्थागत कजऱ्े के प्रसार को छोटे किसानों के लिए राहत व तबदीली के बडे़
स्तंभ के रूप में पेश किया था। परन्तु वर्तमान ढांचे के अंदर अंदर विशषज्ञों की
सीमित सिफारिशों को भी कहीं जगह नहीं दी गई। यह शासकों के नकारात्मक इरादों की वजह
से हुआ है। इस प्रकार कजऱ्े का मसला भूमि सुधारों के मसले के बाद नाकारात्मक
राजनैतिक इरादे तथा ढोंग का बड़ा उदाहरण बन गया है।
अतः
परिस्थिति हर पक्ष से बिगड़ती गई है। संभावित खतरा सुरक्षा गारंटी लागू करने के
लिए कदम उठाने तथा अन्य सभी पक्षों से हालत वैसे ही बद्तर बनी हुई है। सरकारी
पूँजी निवेश की दृष्टि से अकाल पड़ा हुआ है। खेती संबंधी सरकारी कजऱ्ों के
विस्तार के लिए सरकारों ने विशेषज्ञों की सिफरिशांे को इतने पाखंडी ढंग से लागू
किया है कि इनका मंतव्य ही उलटा दिया है। कर्जों की भरी हुई गंगा खेती क्षेत्र को
चिपकी हुईं जोकों की तरफ उडे़ल दी है।
आत्महत्याओं
में आया ताज़ा उछाल इन काले सियासी इरादों का परिणाम है तथा अर्ध जागीरू खेती के
भूमि संकट की स्पष्ट अभिव्यक्ति है।
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