Thursday, December 10, 2015

5) कीटनाशक अपराध



कीटनाशक अपराधः

पाँच दशकों के इतिहास की एफ.आई.आर.

-सुर्ख लीह डैस्क

            खेतीबाड़ी विभाग के निदेशक, कुछ अन्य अधिकारियों तथा कीटनाशक दवाइओं के कुछ विक्रेताओं की गिरफ्तारी के साथ कीटनाशक घोटाले की चर्चा तेज़ हो गई है। इन गिरफ्तारियों द्वारा सरकार कपास की बर्बादी के लिए ‘‘नकली कीटनाशकों‘‘ की सप्लाई की भूमिका को स्वीकार कर चुकी है। इस घोटाले की परतें खुल रही हैं। ये बात सामने आ चुकी है कि किस प्रकार बायर कंपनी जैसी शक्तिशाली सम्राज्यवादी कंपनियां अपने कीटनाशकों की सप्लाई थोपने में कामयाब हो रही हैं। किसान संगठनों की मांगों में नकली कीटनाशकों का कारोबार करने वालों, इनके सहयोगी अधिकारियों, सरकारी अधिकारियों तथा सियासतदानों के विरुद्ध कानूनी शिकंजा कसने की मांग की जा रही है। ये तो होना ही चाहिए। मौजूदा बर्बादी के अपराधियों को तो सजाएँ मिलनी ही चाहिएँ। परन्तु कीटनाशक अपराध का दायरा कुछ डीलरों, विक्रेता कंपनियों, विभाग के उच्च अधिकारियों अथवा मंत्रियों आदि तक सीमित नहीं है। न ही ये कभी कभार का, कुछ समय पूर्व का या ताज़ा मामला है।
            कीटनाशकों द्वारा फसलों की तबाही के अपराध के हमारे देश में कम से कम आधी सदी का इतिहास है। सभी सरकारें इस मामले में किसानों तथा अन्य लोगों से जानबूझकर सच्चाई छुपाकर रखने की दोषी हैं। सुखऱ्-लीह के सितंबर अंक में हमने इस अपराध के लंबे इतिहास के संबंध में ठोस तथ्य प्रस्तुत किए हैं। (पढ़ें इसी अंक मंे, अनुवादित- ‘‘हरित क्रांति के मैदानों की फसलें, सफेद मच्छर एवं आत्महत्याएँ‘‘) इन तथ्यों से यह बात उभर कर सामने आती है कि हरित क्रांति के आरंभिक काल से ही साम्राज्यवादी कंपनियों की कीटनाशक दवाइयांे का भारत में अन्य किसी भी देश से कहीं बड़े स्तर पर प्रयोग किया जाता रहा है। यह दवाइयाँ संसार स्वास्थ्य संगठन द्वारा वजर््िात घोषित की गईं हैं। यूरोपियन तथा अमरीकी देशों में इनपर पाबंदी लगी हुई है। यह दोनों तथ्य सदैव ही सभी भारतीय सरकारों की जानकारी मंे रहे हैं। ये तथ्य भी चर्चा में रहे हैं कि कौन सी अति खतरनाक दवाइयों का देश के कितने भूक्षेत्र पर छिड़काव हो रहा है। कौन-कौन सी दवाइयाँ कीड़ों द्वारा प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेने के कारण न सिर्फ बेअसर हो चुकी हैं, बल्कि कीट-हमलों में वृद्धि का कारण बन रही हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने इन कीटनाशकों के प्रभाव से सुडान की गेज़रा पट्टी की कृषि के तबाह हो जाने की दुहाई देते हुए बताया कि भारत में किन-किन क्षेत्रों में इसी कारण कृषि बर्बादी का खतरा है। भोजन पदार्थों, जल, मनुष्यों व पशुओं के अंगों तथा विभन्न प्रकार की वनस्पतियों के नमूनों में कीटनाशकों के ज़हरीले अंशों की खतरनाक हद तक ऊँचीं मात्रा सामने आती रही है। परन्तु समय की सभी सरकारों ने हमेशा ही सोची-समझी चुप्पी बनाए रखी।
            इस प्रकार यह मसला न केवल नैतिक अपराध का लंबा सिलसिला है, बल्कि कानूनी पक्ष से भी संगीन अपराध का मामला बनता है। दिल्ली सिक्खों के कत्लेआम के दोषियों, गुजरात सांप्रदायिक कत्लेआम के दोषियों तथा भोपाल गैस कांड के दोषियांे की भांति ही कीटनाशक अपराध के दोषी भी आधी सदी से सुरक्षित घूम रहे हैं। न केवल सुरक्षित घूम रहे हैं बल्कि लोगों की जानों के साथ खेलने का सिलसिला जारी रखते आ रहे हैं। इससे भी बढ़कर अज्ञानता के कारण यह लोगों के आक्रोश एवं राजनैतिक सेंक से भी बचते आ रहे हैं। यही कारण है कि साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आधी सदी की अपराध-लीला के बावजूद कोई मंगल सिंह संधू इन्हें सब्सिडियां देने तथा इनके लिए अभियान चलाने का अपराध ठोक बजा कर करता है।
            मामला यहां तक सीमित नहीं है कि किसी विशेष कंपनी के टैंडरों कोे प्राथमिक्ता देने का दोषी कौन है। बड़ा मसला यह है कि साम्राज्यवादी कीटनाशक कंपनियों के इस ज़हर व्यापार को शिखर तक ले जाने का अपराधी कौन है? असल मसला बदनाम साम्राज्यवादी कीटनाशक कंपनियों के व्यापार पर पाबंदी लगाने के लिए एकजुट होने का है तथा आधी सदी के इतिहास की एफ.आई.आर. के आधार पर सरकारों को अपराधियांे के कटघरे में लाकर खड़ा करने का है। कीटनाशक अपराध के इस लंबे सिलसिले की जांच तथा सज़ाओं की मांग इस पक्ष से महत्वपूर्ण मांग बनती है। 

No comments:

Post a Comment