निजीकरण के नीति हमले के खिलाफ़ साझा जन संघर्ष खड़ा करने के बारे में
(कुछ पक्षों की चर्चा)
देश के अंदर
निजीकरण की नीतियों का हमला ज़ोरों पर है। मोदी सरकार साम्राज्यवादी ताकतों और उनके जोडीदारों की
सबसे उत्तम प्रतिनिधि बनने के लिए पूरा जोर लगा रही है। निजीकरण के जनविरोधी कदमों का सैलाब आया हुआ है। निजीकरण के इस हमले ने पूरे भारत के श्रमिक लोगों के लिए बड़ी अनिश्चितता और उपेक्षा की स्थिति पैदा कर रखी है। यह उपेक्षा एक तरफ़ निराशा-हताशा, नशों का प्रकोप, प्रवास, आत्महत्याओं जैसी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे रही है और दूसरी तरफ़ निराश लोगों के एक हिस्से का प्रतिगामी राजनीतिक लामबन्दियों के लिए इस्तेमाल किये जाने का आधार उत्पन्न कर रही है। लेकिन दूसरी तरफ़ यह बेचैनी इन कदमों के खिलाफ़ संघर्षों के रूप में फूट रही है। ये संघर्ष जगह-जगह हैं। लद्दाख से लेकर महाराष्ट्र तक, केरल से लेकर पंजाब तक, छत्तीसगढ़ से लेकर राजस्थान तक हर जगह इनकी मौजूदगी है। औद्योगिक मज़दूरों से लेकर किसानों तक, शहरों में रहने वालों से लेकर ग्रामीणों तक, मछुआरों से लेकर एयरलाइंस के स्टाफ तक, आदिवासियों से लेकर डॉक्टरों, इंजीनियरों तक, लगभग हर तबका निजीकरण के हमले के परिणामस्वरूप उपजी अपनी-अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत है। इस तरह देखें तो जन संघर्षों का एक विशाल दृश्य उभरता है जहाँ पीड़ित श्रमिक जनता का काफी बड़ा हिस्सा भारत के सम्पूर्ण नक्शे पर निजीकरण और कॉर्पोरेटीकरण के हमले तले हिलजुल कर रहा है, रोष जता रहा है। लेकिन यह बिखरा-पुंडरा रोष है और अपने व्यापक प्रसार के बावजूद निजीकरण के हमले का मुकाबला करने के नज़रिए से इन संघर्षों की अभी कई बड़ी कमज़ोरियाँ हैं। इन कमज़ोरियाँ को दूर किए बिना ये संघर्ष न सिर्फ़ इस हमले का प्रभावी मुकाबला करने के नज़रिए से बेहद अपर्याप्त हैं बल्कि कई हालातों में तो अपने तबके पर पड़ रहे सीमित असरों को भी रोक सकने योग्य नहीं हो सकते।
जन संघर्षों
की सबसे बड़ी सीमितता यह है कि ये संघर्ष निजीकरण की समग्र नीति के खिलाफ़ नहीं, बल्कि उसके अलग-अलग तबकों पर ज़ाहिर हो रहे असरों के खिलाफ़ हैं। यह बात ऐसी है जैसे कोई किसी गंभीर बीमारी के अलग-अलग लक्षणों के लिए अलग-अलग दवा ले रहा हो। इस तरह अलग-अलग लक्षणों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवा बीमारी को बढ़ने से नहीं रोक सकती, न ही और लक्षण उत्पन्न होने से रोक सकती है। बल्कि बहुत बार तो जिन लक्षणों के लिए इस्तेमाल की जा रही होती है, उन्हें भी ठीक नहीं कर पाती। इलाज के लिए सबसे ज़रूरी बात बीमारी की जड़ की पहचान होना है और फिर उसके लक्षणों की जगह जड़ पर असर करने वाली दवा चाहिए। इसलिए सभी संघर्षशील हिस्सों के लिए यह ज़रूरी है कि वे ज़ाहिर हो रहे लक्षणों के पीछे काम करते कथित आर्थिक सुधारों के प्रबल नीति कदम को पहचानें और अपने संघर्ष को इसके खिलाफ़ केंद्रित करें। इस पहचान के अभाव में हर तबका इस हमले के खिलाफ़ अकेला है। उसका संघर्ष सिर्फ़ उसी का ही संघर्ष है। दूसरे संघर्षों के साथ क्या हो रहा है, इस नज़रिए से बे-वास्ता है। इस पहचान के अभाव में वह साझा क्षमता, साझा समझ और साझा ताकत से वंचित है। यह बात उसके संघर्ष को अलग-थलग कर देती है, दूसरे संघर्षों से तोड़ देती है, हकूमतों द्वारा निपटाए जाने और दबाव झेल जाने को आसान बना देती है और इस तरह ऐसे संघर्षों की असरकारी के सीमित रह जाने की गुंजाइशें बढ़ा देती है।
इस नीति
हमले की सही पहचान के आधार पर ही वह साझा ताकत हासिल की जा सकती है जो इस हमले को रोकने के लिए अत्यंत ज़रूरी है। इस पहचान के आधार पर ही वह देशव्यापी एकजुट प्रतिरोध विकसित किया जा सकता है जो इस देशव्यापी नीति आक्रमण को रोक सकता है। इस पहचान के सिर पर ही देशव्यापी जन-प्रतिरोध का मंच बाँधा जा सकता है और सभी तबकों के ज़ोर को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। लेकिन इस साझ की विशेषता सिर्फ़ लोगों की बड़ी संख्या, भागीदारी और बड़े हुए ज़ोर के नज़रिए से ही नहीं है। यह हाकिमों की विरासती 'बाँटो और राज करो' की नीति को काटने के नज़रिए से भी है। हमारे समाज में इस व्यवस्था द्वारा पाले-पोसे गए सामाजिक और कई तरह के तथाकथित
विभाजन इस पक्ष को कहीं अधिक गंभीर बना देते हैं। जाति-पाति भेदभाव, इलाकाई भेदभाव, नस्ली भेदभाव, धार्मिक भेदभाव, सांस्कृतिक अलगाव और अनेक प्रकार के तअस्सुबों को इस व्यवस्था की रक्षा के लिए बार-बार इस्तेमाल किया और गहराया गया है। प्रवासियों और स्थानीय बाशिंदों के बीच तनाव, बहुसंख्यकों की धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ लामबंदी, जातिगत टकराव, एक ही राज्य के दो अलग समुदायों (जैसे कूकी और मैतेई) में टकराव आदि इस लंबी श्रृंखला से कुछ उदाहरण हैं। जिनके कारण साझी जन-विनाशक नीति का संताप झेल रहे हिस्से एक-दूसरे के दुश्मन बनकर खड़े हो जाते हैं। यह भी इस समग्र नीति की पूरी तह तक जाने वाली सही पहचान के न होने के कारण ही होता है कि लोगों के संगठित तबके भी आपसी तअस्सुबों और अलगावों के शिकार हो जाते हैं। एक या दुसरे संगठन के हितों को अपने हितों के टकराव में देखने लगते हैं, एक ही संस्था में साझी मांगें होने के बावजूद अलग-अलग धड़ों में विचरते हैं।
इस साम्राज्यवादी
वैश्वीकरण के हमले की सम्पूर्ण वास्तविकता, गहराई और पसार की पहचान की भारी कमी की हालत में ये तअस्सुब और भेदभाव, हाकिम जमातों द्वारा ठीक इसी जन प्रतिरोध से निपटने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इस साझ की अनिवार्यता इस बात से भी निकलती है कि आबादी के विशाल तबकों की साझेदारी ही निजीकरण विरोधी आंदोलन में किसी एक तबके को कहर का चुनिंदा निशाना बनाने से सरकार के हाथ रोक सकती है। आम हड़तालें, घेराव, जाम, बंद जैसी शक्लें इस पहचान से उपजी साझेदारी के कारण ही कामयाब हो सकती हैं और इसके न होने के हालत में लोगों के आपसी टकरावों का कारण बन सकती हैं। यही साझे हित हैं जो संघर्षों के दौरान पैदा हुई मुश्किलों को बिना किसी हिचकचाहट के झेलने की क्षमता बख्शते हैं। इसलिए ऐसी चेतन साझेदारी निजीकरण विरोधी संघर्ष की अनिवार्य आवश्यकता है। हमारे मौजूदा संघर्षों की एक और सीमितता यह है कि ये संघर्ष मुख्य तौर पर इस व्यवस्था द्वारा स्थापित कानूनी बंधनों के अंदर ही लड़े जा रहे हैं जबकि ये कानून लोगों के संघर्ष के हक को पैरों तले रौंदने के लिए ही बनाए गए हैं। निजीकरण का हमला बेहद व्यापक है और इस राज्य मशीनरी का हरेक अंग पूरी क्षमता से इस हमले में लोगों के खिलाफ़ कूद पड़ा है। इस हमले के खिलाफ़ विशाल, जुझारू, खाड़कू, दृढ़ और दीर्घकालिक आंदोलन ही प्रभावी हो सकते हैं। इस राह पर अनेक कुर्बानियाँ दरकार हैं। धड़ल्ला और दृढ़ता दरकार है। लंबा दम रखकर लड़ने का सब्र दरकार है। इस नज़रिए से हमारे आज के संघर्षों को ऐसी ज़रूरतों के मुताबिक़ होने की आवश्यकता है।
इस तरह
मौजूदा संघर्षों में नीतियों की स्पष्ट पहचान और साझे तथा जुझारू संघर्षों की अनिवार्य आवश्यकता का संचार करने का अहम कार्य सामने है। यह कार्य किए बिना संघर्षों को उच्च स्तर पर ले जाना संभव नहीं हो सकेगा। लेकिन इसके साथ ही एक और अनिवार्य कार्य निजीकरण विरोधी संघर्षों पर क्रांतिकारी राजनीति की प्रभावी छाप स्थापित करने का भी है। इस राजनीति की छाप के बिना निजीकरण विरोधी संघर्ष अपने अंजाम तक नहीं पहुँच सकता।
निजीकरण विरोधी संघर्षों पर क्रांतिकारी राजनीति की प्रभावी छाप से क्या मतलब है?
1. इसका एक मतलब
यह है कि नीति के पीछे काम करती इस व्यवस्था की राजनीतिक प्रकृति को उघाड़ा जाए। यह व्यवस्था भारत के बड़े जमींदारों और दलाल पूँजीपतियों की मुट्ठी भर जमात की प्रतिनिधित्व करने वाली व्यवस्था है। जिसके हित साम्राज्यवादी ताकतों से बंधे हुए हैं। निजीकरण समेत उसकी समग्र नीतियाँ साम्राज्यवादियों और उनके भारतीय जोड़ीदारों की सेवा करती हैं और लोगों की विशाल बहुसंख्या के विपरीत भुगतती हैं। इसलिए बुनियादी मुद्दा इस व्यवस्था की पूर्ण कायापलट कर सच्ची जन प्रतिनिधित्व वाली वैकल्पिक व्यवस्था के सृजन का है। क्रांति के जरिये मुट्ठी भर जोकों की जमात को शक्तिहीन करके विशाल मेहनतकश जनता को सत्ता देने की है।
2. इस छाप
का एक मतलब यह है कि संघर्षशील लोगों के विशाल हिस्से निजीकरण विरोधी संघर्ष के, बुनियादी तब्दीली के लिए एक अगले कदम के रूप में महत्व को पहचानने लगें। निजीकरण के खिलाफ़ संघर्ष साम्राज्यवादी गुलामी से मुक्ति के संघर्ष का अंग है। इस व्यवस्था के अंदर असमान बँटवारे के खात्मे के लिए ज़रूरी क्रांतिकारी संघर्ष का एक अंग है। यह समझते हुए और निजीकरण के हमले के खिलाफ़ लड़ते हुए, आज के रक्षात्मक संघर्षों को दबावमुखी संघर्षों में बदलने की ओर आगे बढ़ें, निजीकरण के फौरी कदमों को जाम करते हुए - सरकार द्वारा पहले लिए कदमों से पीछे हटने का दबाव बनाएं, जन विरोधी कानूनों के लागू होने को जाम करते हुए - जनहितैषी कदम उठाने और जनहितकारी कानून बनाने के लिए मजबूर करें। जन विरोधी कदमों को चुनौती देने से - जन विरोधी व्यवस्था को चुनौती देने की ओर बढ़ें। इस तरह कदम दर कदम अपनी क्षमता को विकसित करते हुए संपूर्ण जन रज़ा वाली लोक जम्हूरियत की स्थापना की ओर चलें।
3. इसका एक मतलब
यह भी है कि लोग इस व्यवस्था के अंदर दोस्तों और दुश्मनों की कतारबंदी के बारे में स्पष्ट हों। इन नीतियों से लाभ उठाने वाली बड़ी साम्राज्यवादी कंपनियाँ और कारोबार जन आक्रोश का निशाना बनें। भारतीय दलाल पूँजीपति जो साम्राज्यवादियों के साथ साझेदारी के रास्ते लोगों को लूटने में भागीदार हैं और इस अमल के जरिये दुनिया के खरबपतियों में शुमार हो रहे हैं, उनके कारोबार भी चोट निशाने पर आएँ। भारतीय जमींदार जिनकी जागीरें लोगों पर साम्राज्यवादी धावों से जुड़कर बड़ी होती जा रही हैं, वे भी साम्राज्य के साथी के रूप में नश्र हों। भारतीय हाकिम जमातों के सभी धड़े इन नीतियों के पैरोकार के रूप में निशाने पर आएँ। दूसरी तरफ़ सभी जन हिस्सों की इन नीतियों के खिलाफ़ आंदोलन में साथी के रूप में पहचान गहरी हो। इन नीतियों की सबसे अधिक मार झेल रहे आदिवासी, खेत मज़दूर, औद्योगिक मज़दूर इस आंदोलन के अग्रिम दस्ते बनकर उभरें। गाँवों में किसान और शहरों में ठेका मज़दूर इसकी विशाल लड़ाकू ताकत बनें। इन्हें आबादी के अन्य हिस्सों की व्यापक हिमायत और सहयोग हासिल हो।
4. इसका एक मतलब
यह है कि निजीकरण विरोधी संघर्ष सचेत रूप में कानूनी बंधनों की सीमाओं का उल्लंघन कर आगे बढ़ने वाला संघर्ष हो। जो कानून इन कदमों के खिलाफ़ लोगों के संघर्ष के रास्ते में अड़ंगा बनते हैं, उन्हें उल्लंघित किया जाए। इस तरह हाकिम जमातों के कायदे-कानूनों के निषेध दर निषेध से - लोगों के कायदे-कानून बनाने, लागू करने और स्थापित करने की ओर बढ़ा जाए। संघर्ष की शुरुआती उठान के दौरान आम हड़तालें, घेराव, बंद जैसी आंदोलन शक्लें, जो सरकारी कामकाज में बड़ा अड़ंगा बनती हैं, अपनाई जाएँ। जिनके जरिये लोगों में हकूमति व्यवस्था को जाम करने की अपनी क्षमता के बारे में चेतना का विकास हो।
5. इसका मतलब यह भी
है कि लोग इन संघर्षों की सफलता के लिए एकजुट, देशव्यापी और केंद्रीकृत अगुवाई की ज़रूरत समझें। ऐसी केंद्रीकृत अगुवाई के लिए अपनी क्रांतिकारी पार्टी होने की ज़रूरत का एहसास करें और ऐसी पार्टी बनाने की ओर अग्रसर हों। ऐसी क्रांतिकारी पार्टी बनाने की ओर बढ़ें जिसका स्पष्ट निशाना साम्राज्यवादी गलबे से पूर्ण मुक्ति और बड़े जमींदारों तथा दलाल पूँजीपतियों की सत्ता से पूर्ण बेदखली हो। ऐसी पार्टी की अगुवाई में दबाई गई जमातों, दबाई गई क़ौमियतों, औरतों, आदिवासियों, दलितों तथा जातिगत दमन के खिलाफ़ संघर्षों और समाज के अन्य आर्थिक, जम्हूरी संघर्षों को एक तार में पिरोकर एक अजेय ताकत में बदला जा सकता है।
6. इसका एक मतलब
यह है कि लोग निजीकरण के हमले को, हमारे देश में चले आ रहे ज़मीनों और संसाधनों के असमान बँटवारे को मज़बूत करने के साधन के रूप में देखें। निजीकरण विरोधी आंदोलन को इस असमान बँटवारे के खिलाफ़ आंदोलन से जुड़वा रूप
में चलाएँ। जैसे शुरुआती शक्लों में साम्राज्यवादी कंपनियों से ज़मीनों की रक्षा का आंदोलन - अधिशेष भूमि के खेत मज़दूरों और बेज़मीन गरीब किसानों में पुनर्वितरण के आंदोलन से जुड़वा रूप में चलाया जाए। सूदखोर आढ़तियों और माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के खिलाफ़ आंदोलन साझे तौर पर चलाया जाए। बड़ी कंपनियों को टैक्स छूट और जमींदारों को सब्सिडियाँ देना बंद करने की मांग साझे तौर पर बुलंद की जाए। बड़े जमींदारों, दलाल पूँजीपतियों और साम्राज्यवादियों की सम्पत्तियाँ जब्त कर इन्हें जनहित में लगाने की मांग साझे तौर पर उभारी जाए। इस तरह ज़मीनों की प्राप्ति के संघर्षों से जुड़कर ही, निजीकरण विरोधी जन संघर्षों को व्यापक प्रसार और प्रभावी क्षमता हासिल होनी है।
7. इस तरह
निजीकरण विरोधी आंदोलन को जमींदारा असमान बँटवारे के खिलाफ़ आंदोलन से आत्मसात करते हुए और लोगों की जम्हूरी दावा-जतलाई का विस्तार करते हुए कदम दर कदम लोक जम्हूरियत की
राह पर आगे बढ़ा जाए। जन लहर इन आंदोलनों की प्राप्तियों की रक्षा के लिए, अपनी संगठित शक्ति की रक्षा के लिए बाकायदा इंतज़ाम करे। इन संघर्षों को जम्हूरी हकों की रक्षा और प्राप्ति से जोड़ा जाए।
8. इसका एक मतलब
यह है कि इस निजीकरण विरोधी संघर्ष को दुनिया भर के लोगों द्वारा साम्राज्यवादी नीतियों के विरोध में जगह-जगह लड़े जा रहे संघर्षों के अंग के रूप में देखा जाए। दुनिया भर के साम्राज्यवाद विरोधी जन व क़ौमियत आंदोलनों से एकजुटता ज़ाहिर की जाए और साम्राज्यवाद के खिलाफ़ साझा चोट मारने की ओर बढ़ा जाए। यह समझा जाए कि न सिर्फ़ इस संघर्ष को कामयाबी के लिए दुनियाभर के श्रमिक लोगों की हिमायत ज़रूरी है बल्कि अन्य देशों में ऐसी ही नीतियों के खिलाफ़ लड़ रहे लोगों को भी हमारे देश के लोगों की हिमायत ज़रूरी है। जैसे किसान संघर्ष के समर्थन में भी अनेक देशों से हिमायत की जन आवाज़ उठी थी और विश्व स्तर पर मोदी सरकार की हो रही बदनामी का भी दबाव बना था।
इस तरह
क्रांतिकारी और जनपक्षीय जम्हूरी राजनीति की प्रभावी छाप के चलते ही हमारे मौजूदा संघर्ष निजीकरण विरोधी विशाल जन जद्दोजहद में बदल सकते हैं और यह जद्दोजहद लोक जम्हूरियत की सुर्ख सवेर का अरुणोदय हो सकती है।
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